ट्विटर पर कल किसी ने एक सवाल पूछा की अगर आपकी ज़िंदगी कोई फ़िल्म होती तो आप उसको क्या रेटिंग देते। अर्थात आप उसको 5 में से कितने स्टार * देते। वैसे तो ये पूरा कार्यक्रम मज़े के लिये किया था लेक़िन लोगों के जवाब काफ़ी चौकानें वाले थे।
लगभग 90 प्रतिशत जवाब वहाँ पर नेगेटिव थे। कुछ ने अपने को – में रेटिंग दी तो कुछने अपने को 0। बहुत ही कम लोग थे जो अपनी ज़िंदगी से ख़ुश दिखे। मुझे जवाब देने वालों के बारे में कोई जानकारी तो नहीं है लेक़िन इतना कह सकता हूँ इनमें से ज़्यादातर एक मध्यम वर्गीय परिवार के तो होंगे ही। ठीक ठाक स्कूल/कॉलेज भी गये होंगे और शायद बहुत अच्छा नहीं तो ठीक ठाक कमा भी रहे होंगे। फ़िर इतनी निराशा क्यूँ?
ज़िन्दगी से शिक़ायत होना कोई बुरी बात नहीं लेक़िन अगर मैं स्वयं अपने बारे में अच्छा नहीं सोचूंगा तो राह चलता कोई भी व्यक्ति जिसके पास अपने ही कई झमेले होमगे, ऐसा क्यूँ करेगा। हम में से किसी की भी ज़िन्दगी परफ़ेक्ट नहीं होगी लेक़िन ये हमारी सोच ही इसे बेहतर बना सकती है।
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कुछ साल पहले की बात है। मैं अपने तत्कालीन बॉस से किसी विषय पर चर्चा कर रहा था। बात करते करते मैंने उन्हें कुछ कह दिया। शायद दीवार फ़िल्म में जैसा शशि कपूर जी अमिताभ बच्चन जी से कहते हैं और जवाब में अमिताभ बच्चन कहते हैं \”उफ़्फ़ तुम्हारे ये उसूल, ये आदर्श\”।
हमारे बीच बातचीत टीम के सदस्यों को लेकर चल रही होगी और मैं उनका मुखिया होने के नाते उनके लिये ही कुछ बोल रहा होऊँगा इसका मुझे पक्का यक़ीन है। लेक़िन बॉस ने जो कहा उससे मुझे थोड़ा दुख भी हुआ और थोड़ा आश्चर्य भी।
पिछले कुछ हफ़्तों से घर में एक बड़े समारोह की तैयारी चल रही थी। कोरोना के चलते ये अब एक इंटरनेट पर होने वाली गतिविधि बन गया था। इसके लिए हमें बहुत से पुराने पारिवारिक मित्रों को ढूंढना पड़ा और कई रिश्तेदारों से भी संपर्क में आने का मौक़ा मिला। बहुत से ऐसे लोग जिनसे हम वर्षों से मिले नहीं, और बहुत से ऐसे जिनसे हम कई बार मिलते रहे हैं – सब मिले।
इस समारोह में कई बार ऐसा हुआ कि जब किसी से बात करी तो उस दिन वो बॉस से हुई बात याद आ गयी। मेरे कुछ कहने पर उन्होंने कहा \”अरे यार कहाँ तुम ये मिडिल क्लास वैल्यू को लेकर बैठे हुये हो। इनको कोई नहीं पूछता\”। वो शायद मुझे चेता रहे थे कि आज इन चीज़ों का कोई मतलब नहीं है तो मुझे भी बहुत ज़्यादा इमोशनल नहीं होना चाहिये।
जबसे इस कार्यक्रम के सिलसिले में बात करना शुरू हुआ तो मुझे उनकी याद आ गयी और याद आया अपना जवाब। मैंने उन्हें कहा, \”सर ये किसी के लिये भी दकियानूसी या बेकार हो सकती हैं, लेक़िन मेरे लिये ये बहुत अनमोल हैं क्योंकि इन्ही को मानते हुये मैं जीवन में आगे बढ़ा हूँ औऱ मेरा व्यक्तित्व इनसे ही बना है। मेरा विश्वास इनमें है किसी और का हो न हों। और मैं चाहता भी नहीं की कोई मुझे इनके सही, ग़लत होने का कोई सबूत दे\”।
पिछले दिनों जिनसे भी बात हुई सबने मेरे माता-पिता के बारे में ख़ूब सुंदर बोल बोले, लिखे और उनके प्रति अपना आदर, प्रेम सब व्यक्त किया। किसी ने बहुत ही छोटी सी बात बताई की अगर कोई आपको बुलाये तो क्या है या हाँ की जगह जी कह कर जवाब दिया जाये ये सीख उन्हें पिताजी से मिली तो किसी ने उनके व्यक्तित्व की सरलता बताई जिसके चलते कोई बड़ा या कोई छोटा, सब उनसे अपनी बात कर सकते थे।
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ग्लास आधा भरा है या आधा खाली ये आपके दृष्टिकोण पर निर्भर करता है।