जब इश्क़ तुम्हे हो जायेगा…

कल जगजीत सिंह के जन्मदिन पर लिखने का विचार आया, जैसा किसी न किसी के बारे में रोज़ आता है, लेकिन उनके गीत, ग़ज़ल सुनने में इतना खो गये की विचार ही त्याग दिया।

आप सभी ने जगजीत सिंह को सुना तो होगा ही। मेरा उनसे मिलना बिल्कुल सही समय पर हुआ – मतलब जब मैं स्कूल में पढ़ रहा था। बहुत से उनके शेर समझ में नहीं आते थे लेकिन उनकी आवाज़ ने दिल में जगह बना ली थी। कॉलेज पहुँचते पहुँचते इश्क़-मुश्क का किताबी ज्ञान हो गया था तो जगजीत सिंह साहब की आवाज़ में दिल की दास्ताँ कुछ और भाने लगी।

भोपाल में उनके काफी सारे प्रोग्राम होते लेकिन मेरा कभी जाना नहीं हुआ। उनको एक बार देखा था चित्रा सिंह जी के साथ मुम्बई में जब हम दोनों एक ही होटल में दो अलग अलग कार्यक्रम के लिये गए थे। उस समय सेलफोन तो हुआ नहीं करते थे (मतलब अपने पहुँच के बाहर थे) तो सेल्फी का सवाल नहीं था। बस उनका वो मुस्कुराता हुआ चेहरा याद है।

जगजीत सिंह साहब को इसलिये और ज़्यादा चाहता हूँ क्योंकि उनके ज़रिये मेरी मुलाक़ात हुई ग़ालिब से। नाम सुना था लेकिन कलाम नहीं। गुलज़ार के मिर्ज़ा ग़ालिब सीरियल देखिये तो लगता है जैसे जगजीत सिंह की आवाज़ बनी ही थी ग़ालिब सुनाने के लिए।

ज़िंदगी के अलग अलग मुकाम पर जगजीत सिंह जी ने बहुत साथ दिया है। उस समय बाकी भी कई सारे ग़ज़ल गायक थे लेकिन जगजीत सिंह ग़ज़ल के मामले में पहला प्यार की तरह रहे। उन दिनों एक और सीरियल आया था सैलाब जिसमें भी जगजीत सिंह की गायी हुई ग़ज़ल थी – अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपने सफ़र के हम हैं।

ये ग़ज़ल सीरियल में किरदारों की ज़िंदगी में चल रहे कशमकश को बयां करती। सचिन खेड़ेकर और रेणुका शहाणे मुख्य भूमिका में थे और सीरियल शायद 30-35 एपिसोड में ख़त्म हो गया था। उस पूरे सीरियल को जगजीत सिंह साहब की इस एक ग़ज़ल ने बाँध रखा था।

वैसे तो मुझे उनकी सभी ग़ज़लें पसंद हैं लेकिन प्यार का मौसम है तो फ़िलहाल के लिये जब इश्क़ तुम्हे हो जायेगा।

वाशी में एक होटल है \’चिनाब\’ जो सिर्फ और सिर्फ जगजीत सिंह साहब की ग़ज़लें ही सुनाता है। मतलब पूरा माहौल रहता है। मौका मिले तो रात में तब्दील होती शाम के साथ खाट पर आराम से पसरे हुए लुत्फ़ उठायें जगजीत सिंह की मखमली आवाज़ का।

सालगिरह मुबारक ग़ज़ल सम्राट।

I quit

As I typed heading for this post, I travelled back to September 2018 when I quit my job. It\’s been four months since I left a good, secure job. There were many reasons behind that spur of the moment decision but largely it was fuelled by the fact that I was not in a happy space. I had a great team of young talented writers, we were doing good, many of our ideas were picked up by our rivals – but overall it was not a very happy place for me.

Your workplace is where you spend a major part of your day and some more while working from home – as was the case with me. So if the place or people are not adding any value to your life it\’s better to walk away and do something you really like. But will it be sufficient to pay the monthly bills and take care of emergencies?

This is the question that always stopped most of us from taking the plunge. The fear of what future has in store for us. Frankly, I too was in that space and today, four months after I quit and still jobless, I am writing this is because I know I don\’t have to worry about the bills. But for how long – now that is the question that gives me some anxious moments and then I move on.

Ever since I started working sometime in 1998, I have always looked for a place which challenged me and where I enjoyed tackling those challenges. The enjoy part came from seniors who guided us – the juniors, challenged us to think differently and gave us environment which was stress free. Now, we all know everywhere you will find characters who get pleasure from torturing others. But after a period of time you realise such characters can be found anywhere and everywhere and the trick is to get your work done despite all the trouble they create. Some times they win, some times you.

I lost the game in September when I put in my papers. All my boss wanted was – call him daily, consult him for every little thing and keep him informed (read: share gossip on the floor). Nothing much, you would say. Working with bosses with different approach to work makes you understand ultimately what is your style of working and you start developing that. So like I said in a previous post on how to identify real vs fake leaders, the approach to work develops over a time. If you are surrounded by people who panic or someone who is cool, you tend to pick up these traits and also see how you as a person respond to a similar situation.

In the last job I was not the business head who would take a call on everything. Eventually everything had to be cleared by the higher ups. But it was their approach to even small, mundane requests that got me thinking. Working in the digital domain made me realise one important thing – you have to be really fast with your decision, else you miss the bus.

Did I miss the bus or the bus missed me? Well, it does not matter.

देश प्रेम और गणतंत्र दिवस, स्वतंत्रता दिवस की मेगा सेल

पिछले कुछ सालों से 26 जनवरी और 15 अगस्त हमारे राष्ट्रीय पर्व के साथ साथ खरीदारी करने के बड़े दिन बन गये हैं। चूँकि ग्राहक को छूट बड़ी लुभाती है, पिछले लगभग दस सालों से इन दो दिनों के आगे पीछे महा सेल का ही इंतज़ार रहता है- न कि उन दो दिनों का जो किसी भी राष्ट्र के लिये बहुत महत्वपूर्ण होते हैं।

सही मायनों में अमेज़ॉन और फिल्पकार्ट के आने के बाद से इन दिनों की महत्ता और बढ़ गयी है। अगर आप शॉपिंग मॉल की भीड़भाड़ से बचना चाहते हैं तो अपना देश प्रेम आप इस ऑनलाइन सेल के ज़रिये दिखा सकते हैं। अब तो हालत ये है कि बच्चे भी ये जान गये हैं कि दीवाली के अलावा इन दो दिनों में भी जमकर डिस्काउंट मिलता है तो वो भी इसका इंतज़ार करते हैं। हमारे गणतंत्र दिवस और स्वाधीनता दिवस की इससे अच्छी मार्केटिंग क्या हो सकती है।

लेकिन ये भी अच्छा है। कम से कम इन दो दिनों को ही सही हम अपना देश प्रेम तो दिखाते हैं। हाँ ये बात जरूर है कि इससे इस सेल से जुड़े लोगों की अच्छी खासी कमाई हो जाती है। लेकिन देश के नाम पर सब चलता है।

वो लोग भी जो किसी राज्य के मुख्यमंत्री को प्रधानमंत्री बताते हैं या जिन्हें हमारे उत्तर पूर्वी राज्यों की राजधानियों के बारे में नहीं पता हो, उन्हें इन सेल के बारे में सब कुछ पता होता है।

अगर गलती से आप कहीं मॉल चले जायें, जैसा कि इस बार मैंने किया, तो आपको बदहवास से लोग घूमते दिखेंगे। जो सेल के पहले दिन चले गये वो एक्सपर्ट बन जाते हैं और अपने जानपहचान वालों को बताते हैं कहाँ क्या अच्छा है। जो देश से बहुत ज़्यादा प्यार करते हैं वो ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों जगहों की तुलनात्मक स्टडी भी कर देते हैं और ट्विटर पर आपको इसका ज्ञान भी मिल जाता है।

इस पूरे प्रकरण में सबसे ज़्यादा परेशान, दुखी, मायूस होते हैं पति। नहीं सेल से उन्हें तो वैसे कोई परेशानी नहीं होती क्योंकि उनका पैसा ऐसे या वैसे तो निकलेगा ही। लेकिन सामान चुनने और बिलिंग काउन्टर पहुंचने के बीच उनकी मानों आधी ज़िंदगी निकल जाती है। उसपर ट्रायल रूम का नाटक। कई बार मैं और मेरे जैसे कई पति अपनी पत्नी छोड़ दूसरों की बीवियों को निहारते रहते हैं। इसको अन्यथा न लें। जब आप बाहर खड़े हों और इंतजार कर रहे हों तो ये एक मजबूरी होती है। हाँ फिल्मों के जैसे आप इस पर अपनी कोई राय नहीं दे सकते क्योंकि उसके बाद जो होगा उससे आपकी शॉपिंग अधुरी रह जायेगी।

मोबाइल फ़ोन और व्हाट्सएप का इससे अच्छा इस्तेमाल मैंने नहीं देखा। दुकानें अलग अलग फ्लोर पर हैं? ड्रेस पहन कर देखी जाती है और फ़ोटो व्हाट्सएप कर दी जाती है। आप उसे देख टिप्पणी कर सकते हैं। अगर आपकी पत्नी या गर्लफ्रैंड ज़्यादा समय लेती हैं तो आप कहीं सुस्तालें। आपको फ़ोन करके बुला लिया जायेगा।

कल जब मैं ये नज़ारा देख रहा था तो देश प्रेम के दो नज़ारे दिख रहे थे। एक जो 26 जनवरी की सुबह राजपथ पर देखा था और दूसरा जिसका मैं भी एक हिस्सा था। भारत हमको जान से प्यारा है…

Leaders: How to identify real vs fake

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Bosses. The term brings out mixed emotions based on our personal experience. But word Leader has no such mix up. As an employee we know, understand and identify who a true leader is because – he brought the best out of us. Having worked with real leaders (who were the real bosses) and fake leaders who are where they are because of their marketing skills, it can be said few people have leadership qualities.

So what makes a good leader great?

  1. Freedom: A good leader believes in freedom. They not only enjoy freedom, they also want their team members to enjoy it – with a condition though. Be responsible and don’t misuse it.
  2. Trust: A good leader understands the importance of trust. They know they have reached where they have is because someone trusted them at one point of time. They return the favour by trusting their team members. This trust is earned over a period of time.
  3. Deliver results: A good leader knows that in the end what matters is result. People are not interested in knowing what you have achieved. Your leader will help you with the how to achieve it and will help you prepare for tougher challenges in future.
  4. Spot talent: A good leader is keen observer. He identifies talent, grooms him/her and let them prosper. All the talented individual need a good leader who can become their mentor.
  5. Appreciate: A good leader knows how important it is to appreciate. He also knows even if the goal is not achieved but the efforts were sincere, appreciation goes a long way for the team to start all over again.

A good leader has all these qualities and more. A good leader knows his job is to promote talent and not sycophants – for he knows he would not be here if his boss/leader had promoted someone with better marketing skills.

Be curious, ask questions, stop following

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Life teaches us every minute. If we are ready to learn, that is. About us and others. Remember the time when we are growing up and the big plans we made? These plans are pure – untouched by the cruel world and the way it treats people who have ideas.

But somewhere along the way we keep aside the plan and join the mad race. We believe this is the natural thing to do. We see everybody around us doing the same and we start believing this is what we too should do. No questions asked. This is beginning of stopping the growth on its tracks.

No question, no answer

Ever since we land on this planet, we observe our surroundings and we question. Why is this, how it works, what is this. In short life is all about asking questions. My ten-year-old son had so many questions when he was young. But now he same lots of answers and very few questions. When he was small he had a new set of questions every day. At times I got tired of answering all his queries. But that didn\’t stop him from asking.

This is the biggest lesson I have learnt. To ask questions and keep on asking them. This is what leads to growth of self. But the grown ups no longer remember asking questions. We follow. Everywhere we go we follow. Like the navigation guide inside their cars and mobiles, we work on the guide inside us and keep moving till we reach a dead end. Which is too late to ask for the right directions.

Stop and start, now

We live a life so mechanised that if were never bother to stop and ask Why, Where, What? Oh yes, we do have these queries when we want to inquire about something like a sale or about a product. But we seldom ask the office manager who takes us to a guided tour to the workshop why a certain process is being followed. We assume this is the best practice to follow and based on that silly assumption we too start following it. We never question. We take the safe route. Why bother. Let it be. We are not interested in growth. Our growth.

Of course there is a process that needs to be followed. But if no one questions why, would we evolve? How can we better what we already have? The purpose of asking a question is to get information that matters to us and no one else. Yet, as we grow in life we stop seeking answers and then we hit a wall.

Conclusion

It is for our own good that we should ask questions and continue to ask them till we are here on this planet. It is only our curiosity that has brought us here. It pays to remain curious. Encourage people around you to ask questions, remain curious.

The (fixed) entertainment awards season is here, again

The Entertainment industry awards season is here. The first set of awards, Star Screen Awards, is already over and done with and more will follow in the coming days. Every year without fail the award functions are held recession or no recession. Some awards disappear and reappear and some continue. There was a time when I would look forward to the awards and stay up till late in the night.

Not waiting for the newspapers next morning. And always believed that it was telecast LIVE. But slowly it became clear that it was all stage managed. It was meant to keep everybody happy.

When Aamir Khan refused to attend these ceremonies and rightly so and was no where in the nominations either, the tamasha became more clear. This when he was doing the routine stuff (not the class stuff he is doing these days) and successful films. The whole process is a big sham. Someone who has done good job but does not fit into the popular category is compensated with a Critics award.

Unlike Oscar awards the awards in India are either property of publishing house or TV channels. So someone not in good books of the channel or the media house will not be even considered. So the awards are not free and fair.

The less said about the performance in these ceremonies the better. Every year the usual suspects perform. We have seen Katrina Kaif enough on channels singing Sheila Ki Jawani and she is back again performing on the same song. The performance is not as good as the original song (it did not save the film either). This year I think it will be Suraiyya from Thugs of Hindostan. But since the movie has flopped, will she be asked to perform? May be yes on a medley of Zero and TOH songs.

We need awards that are independent. I as a viewer would like to believe the awards are given to deserving people and not to people who confirm their presence to get the award.

Don\’t let one bad experience stop you from trying something again

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Security is one thing that we all look for in life. A majority of us trying to look for all things secure, opt for jobs offering us that security. Only a handful of try the route less taken and those who do have a more fulfilling life than the rest of us.

But how secure one wants to play in life? I have a friend who parked his vehicle a kilometer away thinking the place he was going to will have a parking problem. But that without checking out if there was one. He relied on his past experience and did that.

On the other hand there was another acquaintance who started late for a meeting thinking it will start late and end late as usual. Again going by his past experience.

But both were wrong on that given day. There was no traffic and ample parking space and the meeting lasted just ten minutes.

Would their life be different if they had not allowed their presumptions to cloud their view? If my friend first visited the place and checked if there was any parking problem, he would have been pleasantly surprised. His approach would have been to things ahead in the day would have been different. Same applies to the second case.

We often judge people and situations based on our previous experience. But there are chances, like stated above, that our predictions fall flat. We always judge on the basis of our bad experience in any situation.

I am quite sure the two gentlemen above will do the same thing again next time too for we always take something good happening to us as an aberration. But this comes from experience and also from our mindset.

Take another situation. A friend of mine was having a bad day with his boss. He tried his best to stay in the job and fight it out. He finally quit. Tried something else which did not work out. But he did not give up. He continued his fight. Today he is doing quite good. Again it was his attitude which made him what he is today.

As they say it is how you look at it: glass as half full or half empty. So here\’s to the glass half full. Enjoy.

Are our film critics really impartial?

Every Friday there is some move or the other releasing. While fans of actors and actress watch the films of their favourite actors irrespective of how the movie performs at the box office, there is a good number of people who wait for the reviews and decided whether to watch the film or not. These critics influence the audience and now that we have social media, the good or bad spreads really fast.

It happened with Thugs of Hindostan. The movie was trashed by the critics – who did not like the movie for their own reasons. I however watched the film first day first show before the verdict was out and I liked the movie for what it offered. Imagine my shock when I read reviews which described the movie as one of the worst of 2018. Specially in case of Thugs of Hindostan I felt there was a campaign against the film.

The critics advised against watching the Hindi film Aashiqui 2. Instead, they suggested watching the old one again. Some reviews said the male lead Aditya Roy Kapoor was pathetic and had not so encouraging words for the female lead Shraddha Kapoor as well. Even the music by Jeet Ganguly was strictly ok. All in all this was not the movie you should be investing your money and time. So the ‘critics’ said.

Now, the problem with our so called critics is that they have seen the world’s best and compare our products to them. They find all the loopholes in our stories and none in the cinema of the world. They want our movies to be like theirs. Sure. Do they insert songs in their movies that is being released in India?

Our movies are unique because of so many reasons with music being just one of them. Our treatment of movies is different from theirs and should remain so. How many of the mainstream Indians have seen Wong Kar Wai’s classic In The Mood For Love? Our esteemed critics go gaga over movies like this which if released in India will be pulled out after first day itself. But our esteemed critics think otherwise. They see our movies from the perspective of world cinema.

The critics want so many script changes after watching the movie that the director may even refuse to call it his film. Mind you, none of them will like a similar suggestion about their articles. They will fight with their editors if the paragraphs are even interchanged. Changing the intro of the story will actually need no less than the owner calling them personally. But that does not stop them from suggesting a similar thing to a film director.

It\’s tough being a critic. More so when you have movies like Golmaals, Housefulls or Bol Bachchans or the recent Himmatwalas to review. But look what they had to say about these gems and you know where our critics are heading.

As for Thugs of Hindostan or Aashiqui 2 or so many others go watch them and decide for yourself. I enjoyed Aashiqui 2 for the pure, unadulterated romance.  That is as rare as finding non-sensical debate on TV shows. The lead pair looks good and the music is excellent. Unlike the music these days that come with a life of 3-months, this music will proudly find a place in my library of evergreen music. And so will the DVDs whenever they are out.

2019 के अनुभव अविस्मरणीय हों…

ये नये शब्द का जादू ही कुछ और होता है। इसका अगर आपको सबसे अच्छा उदाहरण देखना हो तो किसी छोटे बच्चे को देखें। जब वो बड़ा हो रहा होता है तो उसके लिये हर चीज़ नई। और जब वो चलना सीख रहा होता है तो उसका उत्साह देखते ही बनता है। दो पैरों पर पहले धीरे धीरे चलना, फ़िर दौड़ना, गिरते रहना लेकिन फ़िर उठना और फ़िर से चलना और दौड़ना।

कल रात घड़ी ने 11.59 के बाद जब 12.00 का समय दिखाया तो हम सिर्फ एक नये दिन, एक नये महीने में ही नहीं बल्कि एक पूरे नये वर्ष में भी प्रवेश कर गये। कहने को तो सिर्फ एक दिन ही बदलता है लेकिन ये \’नया\’ शब्द हम सब में एक नई उम्मीद, एक नई आशा जगा देता है।

इस वर्ष आपके अनुभव जैसे भी हों, अविस्मरणीय हों और हम सब थोड़े ही सही लेकिन एक बेहतर इंसान बनें, ऐसी शुभकामनाएं आप सभी के लिये।

समस्या है तो समाधान भी होगा

सुबह से श्रीमती जी थोड़ी सी विचलित सी दिखीं। मैंने अपने दिमाग़ में सुबह का पूरा सीक्वेंस दोहराया कि कहीं इसमें मेरा कोई योगदान तो नहीं है। मैंने उनके कार्यक्षेत्र (रसोईघर) में किसी तरह का कोई उल्टा पुल्टा काम भी नहीं किया था। चाय के बारे में भी सब कुछ अच्छा ही बोला था मतलब अच्छी चाय के बारे में अच्छा ही बोला जायेगा और वही ग़ुलाम ने किया था।

मैं निश्चिंत था आज न किसी का जन्मदिन है जिसे मैं भूल गया हूँ। वैसे उनकी सखियों की शादी की सालगिरह और जन्मदिन याद रखने का ज़िम्मा मुझे दिया गया है। अगर चूक हुई तो दोनों ही तरफ से सुनने को मिलता है। जब तक व्हाट्सएप पर था तो वहाँ सबके सहयोग से ये कार्य बहुत ही आसानी से सम्पन्न हो जाता था। जबसे व्हाट्सऐप से हटा हूँ तो अपनी कमज़ोर होती याददाश्त पर ही निर्भर रहता हूँ।

जिस समय ये विचारों की रेल 180 की मि की रफ्तार से दौड़ रही थी श्रीमती जी अपने व्हाट्सऐप पर दुनिया के कोने कोने में बसे रिश्तेदारों और अपनी सखियों को गुड मॉर्निंग मैसेज के आदान प्रदान में लगी हुईं थीं। मेरे बाद आता है नम्बर बच्चों का तो बच्चों के स्कूल की भी छुट्टी थी तो वहाँ से किसी शिकायत की गुंजाइश नहीं थीं। अगर होती भी तो उसका निवारण फ़टाफ़ट पिछले दिन ही हो जाता। अब ये कोई सरकारी दफ्तर तो है नहीं कि फ़ाइल घूमे। सिंगल विंडो क्लीयरेंस सरकार अभी अमल में ला पाई है। घरों में ये अनन्त काल से चल रहा है। खैर, छुट्टी के चलते बच्चों ने अपने से ही पढ़ाई की भी छुट्टी घोषित कर दी थी तो रोजाना होने वाला एक सीन भी इन दिनों नदारद था।

जितना पतियों को सवाल नापसंद हैं, पत्नियों को अच्छा लगता है कि उनसे सवाल पूछे जायें। मतलब आप इशारे समझ लीजिये और एक छोटा सा सवाल पूछ लें – क्या हुआ। बस जैसे किसी बाँध के दरवाज़े खुलते हैं वैसे ही जानकारी का बहाव शुरू। आप उसमे से काम की बात ढूंढ लें। मैंने वही किया। सुबह सुबह उन्हें ख़बर मिल गयी कि आज काम करनेवाली ने छुट्टी घोषित कर दी है।

कोई बहुत बड़ी बात नहीं थी मेरे हिसाब से क्योंकि जैसे में वैसे हर काम करने वाला छुट्टी का हक़दार होता है। और फ़िर आप अपनी ऊर्जा, समय इसके ऊपर फ़ोन और व्हाट्सएप कर क्यों बर्बाद कर रहे हो? ऐसा मैंने सोचा लेकिन बोला नहीं। जब सामने से तूफान निश्चित दिखाई दे रहा है तो क्यों अपनी नाव उतारी जाये। ऐसे समय ख़ामोश रहना बेहतर है। कोई सुझाव हो तो आप उसको दुनियाभर को बता दें। श्रीमती जी को न बतायें। सो नहीं बताया।

बस यही गलती कर दी। कल मैं फ़ोन पर किसी को उनकी समस्या के लिये कुछ सुझाव श्रीमती जी के सामने दे दिये थे। आपके पास इसके लिये कुछ सुझाव नहीं है? उन्होंने पूछ ही डाला और उसके बाद जैसा सैफ अली खान का दिल चाहता है में सीन था वैसा ही कुछ होता। मतलब की, वो, तो, मैं जैसे चार शब्द मेरे हिस्से में आते।

लेकिन मैंने उनसे दूसरा प्रश्न पूछ लिया समस्या पता है। उन्होंने कहा हाँ। तो अब इसका समाधान ढूँढते हैं।

अपने जीवम में हम अक्सर समस्या पर ही उलझ जाते हैं। वो तो हमें पता होती है लेकिन समाधान नहीं। उसपर ध्यान दें और जो भी दो-तीन समाधान दिखें उसपर काम करना शुरू करें। बात सिर्फ फ़ोकस बदलने की है।

श्रीमती जी इस सलाह के बाद व्हाट्सएप पर कुछ और संदेश का आदान प्रदान किया, एक दो फ़ोन भी लगा लिये और उनका काम हो गया। वैसे श्रीमती जी और बाकी गृहणियों से एक बहुत अच्छी मैनेजमेंट की सीख भी मिलती है। उसपर चार लाइना कल। फ़िलहाल गरम चाय की प्याली इस सर्द सुबह का आनन्द दुगना करने का आमंत्रण दे रही है।

अम्माँ

शाहरुख खान की फ़िल्म स्वदेस में कावेरी अम्माँ की तरह उन्होंने हमें पाला तो नहीं था लेकिन फ़िर भी हम सब उन्हें अम्माँ कहते हैं। उनको ऐसा कैसे बुलाना शुरू किया ये याद नहीं लेकिन घर के सभी सदस्य उन्हें अम्माँ ही बुलाते। शायद उनके माँ के जैसे प्यार करने के कारण ही उनको अम्माँ बुलाना शुरू किया होगा। आज अचानक अम्माँ की याद वो भी इतने लंबे समय बाद कैसे आ गयी?

दरअसल ट्विटर पर एक चर्चा चल रही थी कि कैसे हम अपने घर में काम करने वालों के साथ भेदभाव करते हैं। जैसे उनके खाने पीने के अलग बर्तन होते हैं, शहरों में कई सोसाइटी में काम करने वालों के लिये अलग लिफ़्ट होती है और रहवासियों के लिये अलग। काम करनेवाले उस लिफ़्ट का इस्तेमाल नहीं कर सकते।

इस सब को पढ़ते हुये अम्माँ का चेहरा सामने आ गया। याद नहीं कबसे उन्होंने हमारे घर काम करना शुरू किया। अम्माँ के पति की मृत्यु हो चुकी थी और उनकी कोई संतान नहीं थी। रिश्तेदार आस पास ही रहते थे लेकिन अम्माँ को भी ये पता था कि उनकी नज़र उनके पैसों पर है। शायद इसलिये एक दिन उन्होंने आकर बोला कि उनका एक बैंक खाता खुलवा दिया जाए। घर के पास वाले बैंक में जहाँ हमारा खाता था वहीं उनका भी खाता खुलवा दिया।

उनसे पहले भी कई काम करने वाले आये लेक़िन वो बस काम करती और निकल जातीं। अम्माँ कब सिर्फ़ एक काम करने वाली न होकर घर की एक सदस्य बन गयीं पता नहीं चला। उन्होंने भी कब हमको अपना मान लिया इसकी याद नहीं। उनके हाथ की बनी ज्वार की रोटी का स्वाद कुछ और ही था। अक्सर उनके डिब्बे से अदला बदली कर लेते और वो खुशी खुशी इसके लिये तैयार हो जातीं।

आज ट्विटर पर काफी सारे लोगों ने बताया कि कैसे लोग अपने घरों में काम करनेवालों के साथ व्यवहार करते हैं, कैसे दूसरी जाति के लोगों को सुबह सुबह देखना अपशकुन माना जाता है, कैसे काम करनेवाले जिस स्थान पर बैठते हैं उसको उनके जाने के बाद धो कर साफ किया जाता है इत्यादि।

मुम्बई में जो घर में काम करती हैं वो दरअसल बड़ी विश्वासपात्र हैं। कई बार उनके काम करने के समय हम लोग घर पर नहीं होते लेकिन वो पड़ोसियों से चाबी लेकर काम करके चली जाती हैं। कभी कोई विशेष आयोजन रहता है तो सबसे पहले वो ही भोजन ग्रहण करती हैं क्योंकि उन्हें जल्दी घर जाना होता है।

बाहर निकलिये तो अक्सर ऐसे जोड़े दिख जाते हैं जिनके बच्चों को संभालने के लिये आया रखी होती है। होटल में वो आया अलग बैठती है और उसका काम साहब और मेमसाब को बिना किसी परेशानी के खाना खाने दिया जाये यही होता है। अम्माँ तम्बाकू खातीं थीं तो उनको ऐसे ही चिढ़ाने के लिये मैं बोलता मसाला मुझको भी देना और वो मुझे डाँट कर भगा देतीं।

पिताजी जब रिटायर हुये तो अम्माँ का साथ भी छूट गया। हम सरकारी घर छोड़ कर नये घर में रहने आ गये। अम्माँ के लिये नया घर बहुत दूर हो गया था। शायद एक बार वो नये घर में आईं लेकिन उसके बाद से उनसे कोई संपर्क नहीं रहा। वो अभी भी भोपाल में हैं या महाराष्ट्र वापस आ गईं, किस हाल में हैं पता नहीं लेकिन यही प्रार्थना है कि स्वस्थ हों, प्रसन्न हों और वो मुस्कुराहट उनके चेहरे पर बनी रहे।

पत्र अपडेट: काफी लोगों से पतों का आदान प्रदान हुआ है और दोनों ही पार्टीयों ने जल्द ही पत्र लिखने का वादा किया है। पहले पत्र का बेसब्री से इंतज़ार है।

Darr: Aamir Khan\’s rejection gave Shahrukh Khan his stardom

At a time when films are not remembered beyond their 100 days or so, we are remembering 25 years of Yash Chopra\’s Darr starring Shahrukh Khan, Juhi Chawla and Sunny Deol which was released on December 24, 1993. The film was milestone in both Shahrukh Khan and Juhi Chawla\’s career and in a way also helped Yash Raj banners in their journey. Darr remained in news for reasons other than the obvious much before its shooting began.

The film was first offered to Aamir Khan. In fact Khan had signed the Yash Chopra film and the trade was very excited as it was first collaboration between the king of romance Yash Chopra and Aamir Khan. It was also bringing back the hit pair of Aamir Khan and Juhi Chawla after their not so hit outings post QSQT. The muhurat of the film was also performed with the cast.

But soon it was reported that Aamir Khan was out of the Yash Chopra film and Shahrukh Khan has replaced him. Shahrukh at that point had already done Baazigar in which he had played a negative role. There were many theories doing the rounds at to why Aamir left the film. One version was Aamir Khan insisted on a joint narration with Sunny Deol but Yash Chopra refused. Year later Sunny Deol also said something on similar lines. He did not stop there and called Yash Chopra a cheat and also turned down their offer to launch his son. Sunny Deol did not work with Yash Raj films and Shahrukh Khan after Darr.

[youtube https://www.youtube.com/watch?v=huj9_8uV5y8&w=560&h=315]

The other theory was Yash Chopra did not like Aamir Khan asking too many questions and hence dropped him. Yash Chopra also said in an interview that Aamir Khan developed cold feet after the muhurat as he was playing a negative character for the first time. His family, fans and well wishers advised him against it and he finally said no.

Whatever be the reason, in the end it worked to Shahrukh Khan\’s advantage. As for Aamir Khan he did work with Yash Chopra and their venture Parampara was released the same year but failed to set the box office on fire. The film is best remembered for a couple of songs and Ramya\’s hot scenes with Vinod Khanna.

Coming back to Darr, I liked Juhi Chawla from her first film – Qayamat Se Qayamat Tak. It was combination of everything – the music, story, how she spoke in the film and of course her pairing with Aamir Khan. So when Juhi Chawla did the itsy-bitsy role in Yash Chopra\’s Chandni I was disappointed. But soon there was news that Yash Chopra had offered her a role in his next film. Darr was supposed to be her big film as she was working with a big banner and Yash Chopra was known for presenting his actress in the most beautiful way.

Coming after the debacle of Lamhe, a lot was riding on Darr. Baazigar had released on November 12 and Shahrukh Khan was lauded for his role as Ajay Sharma. Darr was releasing exactly a month after but the story was completely different. Baazigar was still running in theaters when Darr was released. Soon Shahrukh Khan\’s character in Darr and his K..K..K…Kiran became popular and the next big star had arrived.

The music of the film is still loved specially Tu Hai Meri Kiran which incidentally is only playing in the background and we see Shahrukh Khan singing rather different version in the film. The other songs also go well with the story but I must add that I saw the film recently and I thought we could do away with couple of songs like Likha Hai Ye and Solah Button Meri Choli Main for a more enjoyable film.

Darr also has the unique distinction of being made into English in 1996 as Fear.

जब एक पोस्टकार्ड बना पार्टी की सौगात

चलिये पत्र लिखने की बात से ये तो पता चला कि ऐसे भी लोग हैं जिन्होंने आज तक न तो पत्र लिखा है ना उन्हें कभी किसी ने। इसमें आश्चर्य जैसी कोई बात नहीं है। क्योंकि इन लोगों के समझते समझते मोबाइल फ़ोन का आगमन हो चुका था और हम सबको संपर्क में रहने के लिये एक नया तरीका मिल गया था। जिन्होंने कभी पत्रों का आदान प्रदान नहीं किया हो वो इससे जुड़े जज़्बात शायद न समझें। और अगर आने वाली पीढियां इस पर पीएचडी कर लें कि पत्र लिखने की कला कैसे विलुप्त हुई, तो कोई आश्चर्य नहीं होगा।

बदलाव का बिल्कुल स्वागत करना चाहिये लेकिन इस बदलाव ने भाषा बिगाड़ दी। एक तो लोग पहले से लिखना छोड़ चुके थे और उस पर ये छोटे छोटे मैसेज। रही सही कसर व्हाट्सएप ने पूरी कर दी। अब तो लिखना छोड़ कर सिर्फ 🙏, 👍,🤣 जैसा कुछ कर देते हैं और बस काम हो गया। मुझे अपने काम के चलते ऐसे बहुत से युवा पत्रकार मिले जो भ्रष्ठ भाषा के धनी थे।

ऐश्वर्या अवस्थी ने पोस्टमेन की याद दिला दी। हमारे यहाँ जो पोस्टमेन आता था उसको हमसे कोई खुन्नस थी। शायद उसका होना भी वाज़िब था क्योंकि हमारे यहां ढ़ेर सारे ख़त तो आते ही थे साथ में पत्रिकाओं का आना लगा रहता। जब मेरा पीटीआई में चयन हुआ तो इसका संदेश भी डाक के द्वारा मिला। हाँ आदित्य की तरह प्रेम पत्र नहीं लिखे। काश फ़ोन के बजाय लिख दिया होता तो आज दोनों अलग अलग ही सही पढ़ कर मुस्कुरा रहे होते।

ऐसा ही एक संदेश एक सज्जन के पास उनकी बहन ने पहुँचाया। उनकी पत्नी जो गर्भावस्था के अंतिम चरण में थीं उन्होंने पुत्र को जन्म दिया है। अब ये बात एक पोस्टकार्ड पर लिख कर बताई गई थी। ज़ाहिर सी बात है की पत्र कई लोगों द्वारा पढ़ा गया और नये नवेले पिता से पार्टी माँगी गयी और उन्होंने खुशी खुशी दे भी दी। समस्या सिर्फ इतनी सी थी की ऐसा कुछ हुआ नहीं था। डिलीवरी में अभी भी समय था। बहन ने भाई को यूँ ही लिख दिया था। फ़िर तो बहन को जो डाँट पड़ी।

भोपाल के एक सांसद महोदय ने भी इस पोस्टकार्ड का बहुत ही अनोखे तरीक़े से इस्तेमाल किया। उन्होंने अपने पते के साथ पोस्टकार्ड अपने क्षेत्र में लोगो को दे दिये। कोई समस्या हो तो बस मुझे लिख भेजिये। मतदाताओं को ये तरीका बहुत भाया।

सदी के महानायक अमिताभ बच्चन आज भी किसी को उनकी अदाकारी या किसी और काम के लिये बधाई या धन्यवाद अपने एक छोटे से स्वयं के लिखे नोट से करते हैं। नोट की क़ीमत इस लिए तो है ही कि इसे बच्चन साहब ने भेजा है। लेकिन उनके हाथ से लिखा हुआ है तो ये अमूल्य हो जाता है।

इस विषय पर थोड़ी रिसर्च भी कर डाली तो सब जगह यही पढ़ने को मिला। हज़ारों साल पुरानी ये परंपरा को लोगों ने लगभग छोड़ ही दिया है। हाँ जैसा आदित्य द्विवेदी ने कहा, फौज में आज भी ये चलन है। उतने बड़े पैमाने पर शायद नहीं लेकिन फौजी के घरवाले आज भी पत्र लिखते हैं।

फ़ोन पर आप बात करलें तो आवाज़ सुनाई देती है और दिल को चैन आ जाता है। सही मायने में जब आप पत्र लिख रहे होते हैं तो जाने अनजाने आप अपने बारे में कुछ नहीं बताते हुए भी बहुत कुछ बता जाते हैं। वैसे ही पत्र पढ़कर आप एक तस्वीर बना लेते हैं लिखने वाले के बारे। जैसे फ़िल्म साजन में माधुरी दीक्षित बना लेती हैं संजय दत्त की और उनसे प्यार करने लगती हैं। लेखक, कवि, शायर से बिना देखे बस इसलिये तो प्यार हो जाता है।

काफ़ी लोगों की तरह मैंने भी प्रण तो लिया है कि अब पत्र लिखा जायेगा। लेकिन इस पर कितना कायम रहता हूँ ये आप को तब पता चलेगा जब आपके हाथ होगा मेरा लिखा पत्र जिसका जवाब आप भी लिख कर ही देंगे। तो फ़िर देर किस बात की। मुझे sms करें अपना पूरा पता (पिनकोड के साथ)। व्हाट्सएप से मैं हट गया हूँ तो वहाँ कुछ न भेजें।

यादों का खज़ाना

आज ऐसे ही सफ़ाई के मूड में अपनी कुछ पुरानी फ़ाइल और कागज़ात निकाले। इस पूरी प्रक्रिया की शुरुआत होती कुछ इस तरह से की मैं परिवार के अन्य सदस्यों को बोलता हूँ कि वो पुराना सामान निकाले और जिसकी ज़रूरत नहीं हो वो निकाल कर रद्दी में रख दें। ये मेरा सेल्फ गोल होता है क्योंकि फिर मुझे ही सुनने को मिलता है श्रीमती जी से की आप का भी बहुत सारा पुराना सामान रखा है उसे भी देख लीजियेगा।

मैं सिर्फ इसी उद्देश्य से इस काम में जूट जाता हूँ। लेकिन बस शुरू ही हो पाता है कि फिर एक एक कर कुछ न कुछ मिलता रहता है। जैसे इस बार मुझे मिले कुछ पत्र जो करीब 18 साल पुराने हैं। कुछ दोस्तों के द्वारा लिखे हुए और कुछ परिवार के सदस्यों के द्वारा। परिवार वाले पत्र तो उस समय क्या चल रहा था उसके बारे में होते हैं लेकिन दोस्तों के पत्र होते हैं अधिकतर फ़ालतू जानकारी से भरे हुए लेकिन मज़ेदार। अगर उनको अठारह वर्ष बाद पढ़ा जाये तो उसका मज़ा ही कुछ और होता है।

लेकिन अब आजकल जो ये ईमेल और व्हाट्सएप का चलन शुरू हुआ है तो कागज़ पर अपने विचारों को उतारना ख़त्म सा हो गया है। अब तो जन्मदिन या बाकी अन्य आयोजन के उपलक्ष्य में भी फेसबुक या व्हाट्सएप पर बधाई दे दीजिये। बस काम हो गया। इससे पहले दोस्त, घरवाले कार्ड दिया करते थे। दूर रहनेवाले रिश्तेदार भी कार्ड चिट्ठी भेजा करते थे।

लेकिन जैसा कि फ़िल्म नाम के चिट्ठी आयी है गाने में आनंद बक्शी साहब ने लिखा है,

पहले जब तू ख़त लिखता था कागज़ में चेहरा दिखता था, बंद हुआ ये मेल भी अबतो ख़त्म हुआ ये खेल भी अब तो।

वैसे हिंदी फिल्मों में ख़त का इस्तेमाल अमूमन प्यार के इज़हार के लिये ही होता रहा है फ़िर चाहे वो सरस्वतीचंद्र का फूल तुम्हे भेजा है ख़त में हो या मैंने प्यार किया का कबूतर जा या संगम का ये मेरा प्रेम पत्र पढ़कर। लेकिन अब ऐसे गीत बनेंगे नहीं और अगर मेरे जैसे किसी ने ऐसा कर दिया तो सब हंसेंगे की अब कौन पत्र लिखता है।

जब आजकल के नये संपर्क साधन नहीं थे तो नई जगह पहुंच कर वहाँ से पिक्चर पोस्टकार्ड भेजने का भी चलन था। ऐसे ही कुछ मुझे अपने ख़ज़ाने में मिले जब भाई विदेश गया था और जब माता पिता धरती पर स्वर्ग यानी कश्मीर गए थे। अब तो बस सेल्फी खींचो और शेयर करो। विपशना के जैसे कहीं बाहर जाओ तो फ़ोन के इस्तेमाल पर रोक लगा देना चाहिये।

इस डिजिटल के चलते एक और चीज़ छूट रही है और वो है फ़ोटो। सबके मोबाइल फ़ोन फ़ोटो से भरे हुए हैं लेकिन अगर आप और मोबाइल बिछड़ जायें तो… पिछले दिनों जब व्हाट्सएप मोबाइल से हटा रहा तो श्रीमती जी ने आगाह भी किया कि फ़ोटो भी चली जायेंगी। ख़ज़ाने में मुझे बहुत सारी पुरानी फ़ोटो भी मिलीं। ढूँढने पर एक पुराना एल्बम भी मिल ही गया। बस इस सबके चलते यादों का कारवाँ निकल पड़ा लेकिन जिस काम के लिये बैठे थे वो नहीं हुआ।

इस नये चलन को बढ़ावा मैंने भी दिया लेकिन अब जब पुराने पत्र पढ़ रहा हूँ तो लगता है इस सिलसिले को फ़िर से शुरू करना चाहिये। तो बस कल पास के पोस्टऑफिस से कुछ अंतर्देशीय और पोस्टकार्ड लेकर आयेंगे और पहुँचाते हैं आप तक। अगर आप भी इसका हिस्सा बनना चाहते हैं तो अपना पता छोड़ दें कमेंट्स में। वो क्या है ना कि हम फ़ोन नंबर से शुरू कर अपनी दोस्ती सिर्फ फ़ोन तक ही सीमित कर लेते हैं। जब तक मिलने का संयोग न हो तो पते का आदान प्रदान नहीं होता है।

मेरी आवाज़ ही पहचान है

पिछले दो दिनों से घर में माहौल थोड़ा अलग सा है। श्रीमती जी एक मित्र हमारी सोसाइटी छोड़ नई जगह चली गयीं। दोनों की मुलाक़ात दस साल पहले हुई थी जब हम इस सोसाइटी में रहने आये थे। शुरुआत में वो हमारी ही फ्लोर पर रहती थीं लेकिन मुझे उस समय के बारे में कुछ भी याद नहीं है। वो तो जब बारिश होती और उनके पति अपनी कार से बच्चों को छोड़ने जाते, तब उनसे मिलते और यही मुझे याद है। इन दोनों की अच्छी दोस्ती के चलते उनके पति और मेरा भी कभी कभार मिलना हो ही जाता था। लेकिन दोनों सखियों की रोज़ फ़ोन पर बात एक नियम था और संभव हुआ तो मिलना भी। अब ये सब ख़त्म होने जा रहा था और श्रीमती जी इससे बहुत दुखी थीं।

ये जो घटनाक्रम चल रहा था उससे मुझे फ़िल्म दिल चाहता है का वो सीन याद आ गया जब तीनों दोस्त गोआ में एक क़िले से दूर समंदर में एक जहाज़ को देखते हैं। आमिर खान कहते हैं उन तीनों को साल में एक बार गोआ ज़रूर आना चाहिये। सैफ इस प्रस्ताव का अनुमोदन करते हैं। लेकिन अक्षय खन्ना जो शायद सबसे ज़्यादा प्रैक्टिकल होते हैं, आँखों से ओझल होते जहाज़ का हवाला देते हुये कहते हैं कैसे एक दिन उस जहाज़ के जैसे तीनों दोस्त अपनी अपनी मंज़िल की तलाश में निकल पड़ेंगे और साल में एक बार तो दूर दस साल में एक बार मिलना भी मुश्किल हो जायेगा।

श्रीमती जी और उनकी मित्र ने जल्द मिलने का वादा किया तो है लेकिन दोनों जानते हैं मुम्बई जैसे शहर में इस वादे को निभाना कितना मुश्किल है। मुझे तो कई बार फ़्लोर पर ही रहने वाले सज्जनों से मुलाक़ात किये हुए महीनों गुज़र जाते हैं। लेकिन मैं इस मिलने मिलाने के कार्यक्रम का अपवाद हूँ, ऐसा मानता हूँ। बहरहाल दोनों अपनी अगली मुलाक़ात को लेकर काफ़ी उत्साहित हैं।

ऐसे ही मिलने के वादे मैं भी करता रहता हूँ। कोई इंतज़ार कर रहा है कब मैं दिल्ली आऊँ और उसके साथ समय बिताऊँ। इस वादे पर मिर्ज़ा ग़ालिब ने बहुत ही शानदार लिखा भी है:

तेरे वादे पर जिये हम, तो ये जान झूठ जाना
के खुशी से मर न जाते, अगर ऐतबार होता

ऐसे ही बहुत से मिलने के वादे बहुतों से किये हुए हैं लेकिन एक भी वादा झूठा नहीं है। पता नहीं कब मिलना होता है। वैसा भी मेरा इस मामले में रिकॉर्ड बहुत ही ख़राब रहा है। मिलना तो दूर लोग मुझे फ़ोन पर मिल जाने की बधाई देते हैं।

Tere Bin song review: Recycled Simmba song has nothing going for it, not even Ranveer Singh and Sara Ali Khan

The new Rohit Shetty action drama Simmba seems to be completely relying on old hits. Both the songs released so far have been rehashed versions of popular hits. After the first song Aankh Mare which was a recreated version of Tere Mere Sapne song, the second song Tum Bin was released on Friday.

This song is again recreated version of a popular Nusrat Fateh Ali Song Tere Bin Nahin Lagda. Unlike the original which had only Nusrat Fateh Ali Khan doing the honours behind the mic, the fresh version has Rahat Fateh Ali Khan who is joined by Asees Kaur. Tanishk Bagchi who has awarded himself the contract to destroy old bollywood songs, does a rather awesome job (in killing the original song).

The song is supposed to be a love song between the lead pair Ranveer and Sara. Shot in the picturesque Switzerland, it is not a Yash Chopra like song but there are elements like Sara in a sari. But don\’t expect too much as the song is just not up to the mark.

A romantic song in an out and out Rohit Shetty cop drama is odd and you know it\’s there as a dream sequence and is not going to add any value to the narrative. The first song too is a filler song and I won\’t be surprised if it comes in the end credit.

Tere Bin has been a let down and it is not what the makers promised it to be. May be I will watch old romantic song to quench my thirst for a good romantic number.

Book review: Promising subject but script is all over the place

Music Masti Modernity – The Cinema of Nasir Husain by Akshay Manwani

Publisher: HarperCollins Publishers India

Pages: 402

Price: Rs 599

Having grown up on Nasir Husain films, I picked up the book hoping it would let me understand what went in making Nasir Husain the phenonmenon he has become. But early into the book I realise the biggest shortcoming of the book. The three things that made Nasir Husain and his films – the man himself, composer R D Burman and lyricist Majrooh Sultanpuri were no longer there. This actually is the biggest handicap of the book – we never get to know what went into a certain scene or how Nasir Husain took failure.

What we instead get it is lots of assumptions or what people thought about Husain and his films. Both Aamir Khan and Mansoor Khan started working with Nasir Husain when he almost retired from direction or when his career was going downhill. The writer gets some kind of understanding from Javed Akhtar – he and Salim Khan worked with Husain in Yaadon Ki Baarat. But its not the same as you would expect – at least I did not get it.

Much of Nasir Husain\’s success is also because of the music of his films. Here the book completely lets you down as we don\’t get anything from the core members of the team – RD and Majrooh. Instead we get tid bits from Karan Johar and Aditya Chopra.

The only living collaborator of many hits is Asha Parekh but she too makes a very guest appearance like participation in the proceedings. Also in many chapters the writer starts talking about something and then goes completely off the track which spoils the flow.

If you are looking for more on Nasir Husain – this boook is certainly not the one. The one big lesson is – speak to these legends when they are with us instead of speaking to people who have worked with them and their take on the happenings.

यादों से भरी सालगिरह

भोपाल में पिताजी को जो सरकारी घर मिला था उसकी लोकेशन बड़ी कमाल की थी। हबीबगंज स्टेशन के बारे में आपको बता ही चुका हूँ। दो सिनेमाघर भी हमारे घर के पास ही हुआ करते थे ज्योति और सरगम। जो भी बड़ी नई फिल्म रिलीज़ होती वो इन दो में से किसी सिनेमा हॉल में ज़रूर लगती।

चूंकि मेरा घर इनके समीप था तो हर गुरुवार को मेरी ड्यूटी रहती टिकट खिड़की पर खड़े होने की। उन दिनों आज की बुकमाईशो जैसी सुविधा तो थी नहीं तो बस सुबह से यही एक काम रहता की लाइन में लगो और धक्के खाते हुए टिकट निकालो। टिकट न मिलने की स्थिति मे कई बार खाली हाथ भी लौटना पड़ता। उन दिनों टिकट खिड़की से टिकट लेकर फर्स्ट डे फर्स्ट शो देखने का मज़ा आज की एडवांस बुकिंग में कहाँ। और उस दौरान हो रहे हंगामे की क्या बात।

महिलाओं की लाइन में भीड़ कम होती तो लड़के किसी भी अनजानी लड़की को बहन बना टिकट लेने की गुज़ारिश करते। उन लड़कियों के परिवार वाले इन लड़कों पर नज़र रखते के कोई बदतमीजी न करें।

मेरे कॉलेज जाने का रास्ता ज्योति टॉकीज से ही जाता था। नई फिल्म रिलीज़ होते ही मैं बाहर खड़ी भीड़ से अंदाज़ा लगता कि फ़िल्म हिट होगी या फ्लॉप। जब यश चोपड़ा की लम्हे रिलीज़ हुई तो सिनेमा हॉल खाली था। फ़िल्म देखी तो समझ में नहीं आया कि आखिर क्यों लोगों ने इसको पसंद नहीं किया। ऐसा ही कुछ हाल था अंदाज़ अपना अपना का। एक किस्सा शाहरुख खान की फ़िल्म डर का भी है लेकिन उसका ज़िक्र फिर कभी।

हमारे घर की एक ख़ासियत और थी। घर के सामने ही था गर्ल्स हायर सेकंडरी स्कूल, थोड़े आगे जाने पर वुमेन्स पॉलीटेक्निक और उसके बाद गर्ल्स कॉलेज। जिन दिनों विवाह के लिए लड़की ढूंढी जा रही थी उस समय दूर दराज से रिश्ते आ रहे थे। कुछ लोग मेरे दिल्ली और उसके बाद मुम्बई जाने के बाद ये मान चुके थे कि मैं लव मैरिज ही करूँगा। खैर ये हुआ नहीं और खोज चलती रही। लेकिन ये पता नहीं था कि मेरी भावी जीवन संगिनी कई वर्षों से मेरे घर के सामने से ही आ जा रही थीं।

इस तलाश को खत्म हुए आज पंद्रह वर्ष हों गये हैं। दिखता एक लंबा समय है लेकिन लगता है इस बात को अभी ज़्यादा वक़्त नहीं हुआ।

त्रासदी ये है कि पूरा देश भोपाल बनने की कगार पर है और हम सो रहे हैं

कुछ दिन पहले दिल्ली और इन दिनों मुम्बई में शहर की हरियाली पर सरकार की नज़र है। इनके नुमाइंदे खुद तो बढ़िया हरियाली से घिरे घरों में रहते हैं और आम आदमी को विकास का हवाला देकर सब कुछ बेचने को तैयार रहते हैं। कुछ गलती हमारी भी है कि हम खुद उदासीन बने रहते हैं और सब सरकार भरोसे छोड़ देते हैं।

आज से 34 साल पहले हम भोपाल के निवासीयों ने भी सरकार के एक फैसले की बहुत बड़ी कीमत दी थी, शायद आज भी दे रहे हैं।

सर्दी के दिन थे और उन दिनों सर्दी भी कुछ ज़्यादा ही होती थी तो खाना खाने के बाद सब सो ही गये थे कि अचानक लगातार घंटी बजने लगी और ज़ोर ज़ोर से दरवाज़ा पीटने की आवाज़ आने लगी। पहले तो समझ नहीं आया इतनी रात में कौन है और क्या हुआ है।

पुराने भोपाल में रहने वाले हमारे रिश्तेदार दरवाज़े पर खड़े थे। सब अस्तव्यस्त हालत में थे, कुछ को साँस लेने में तक़लीफ़ हो रही थी। लेकिन हुआ क्या था ये किसीको नहीं पता था। शुरुआत में उन लोगों को लगा की बहुत बड़ी आग लगी है क्योंकि सब जगह सफेद धुआं था और लोगों के मुँह से झाग निकल रहा था।

जिसको जैसे समझ में आया अपने घर से निकल गया। ताला लगाया तो ठीक नहीं तो पहली चिंता जान बचाने की थी। नवजात शिशुओं को छोड़ माता पिता घर से निकल गए। उस ठिठुरती सर्दी की रात में कोई बिना किसी गरम कपड़े के तो कोई पायजामा बनियान में घर छोड़ कर भागा। पापा के एक छात्र 5-6 किलोमीटर दौड़े फिर रास्ते में एक आदमी गिरा हुआ था। उसकी साईकल उठा कर वो हमारे घर आये थे। लोगों ने बताया सड़क पर भागते हुये के लोग गिर पड़े और फ़िर वहीं उनके प्राण निकल गए।

उन दिनों 24 घंटे के चैनल नहीं हुआ करते थे। टीवी 1982 के एशियन गेम्स में आ गया था लेकिन प्रसारण का समय बहुत ही सीमित था। इसलिये जानकारी के लिये बचता सिर्फ रेडियो और अखबार।

अफवाहों का बाज़ार भी गर्म की गैस फ़िर से रिस सकती है। अनिश्चितता के माहौल के चलते घर के लिये राशन लेने पापा-मम्मी बाज़ार गये थे जहां भगदड़ मच गई। किसी ने बोल दिया फिर से गैस रिस रही है और सामने चौराहे तक आ गयी है। सबका भागना शुरू। सब्जी-फल के ठेले वाला ऐसे ही भाग खड़ा हुआ।

इस हादसे के बारे में आने वाले सालों में कभी मैं भी लिखूंगा इसका कोई इल्म नहीं था। जब भोपाल में नौकरी करना शुरू किया तो भोपाल गैस कांड भी कवर किया। लेकिन धीरे धीरे गैस पीड़ित और उनकी समस्याएं सालाना याद करने वाला एक मौका हो गईं।

कई लोगों ने अगर सही में उनके लिये काम किया तो अधिकतर ने इसमें अपना फायदा देखा। सरकारें आईं और गईं लेकिन गैस पीड़ितों के साथ न्याय नहीं हुआ। ये ज़रूर हुआ कि भोपाल में रहने वाले उन कई लोगों को सरकार से पैसा मिला जो इस हादसे से अछूते रहे।

लेकिन जिस तरीके से सरकार ने यूनियन कार्बाइड से हाथ मिलाया उससे ये बात तो साबित हो गयी कि भारत में जान की कोई कीमत नहीं। आज भी हालात बदले नहीं हैं। भोपाल अगर सबसे बड़ी औद्योगिक दुर्घटना थी तो अपने आसपास देखिये। महानगर ही नहीं छोटे शहर भी विकास की बलि चढ़ रहे है। अगर समय रहते नहीं चेते तो पूरा भारत ही भोपाल बन जायेगा…बहुत जल्दी।

पिता-पुत्र का सम्बंध इतना अलग क्यों होता है?

आज की इस पोस्ट के प्रेरणास्रोत हैं आनन्द श्रीवास्तव। इलाहाबाद निवासी आनन्द से फ़ेसबुक पर ही दोस्ती हुई है। पिछले दिनों इन्होंने एक पोस्ट शेयर करी अपने पिताजी के बारे में। बीते समय को याद करते हुए आनन्द ने लिखा की कैसे उन्होंने पिताजी को गले लगाने का अपना प्रण पूरा किया और ये पूछा भी की क्यों बेटे अपने पिता से ऐसे दूर रहते हैं। माता, भाई, बहन सबसे तो हम अपना स्नेह दिखा देते हैं लेकिन बड़े होने के बाद पिता-पुत्र के बीच कुछ हो जाता है और दोनों ही पक्ष इसके लिये ज़िम्मेदार हैं। पिता अपनी बेटियों पर तो लाड़ बरसाते हैं लेकिन पुत्रों पर इतने खुले तौर पर नहीं।

पापा और मैं

आनन्द की पोस्ट पढ़ने के बाद मैं पिताजी और अपने रिश्ते के बारे में सोचने लगा जो बहुत से कारणों से अलग रहा और इसका पूरा पूरा श्रेय उनको ही जाता है। मेरा फिल्मों, किताबों और संगीत के शौक उन्ही की देन है। लेकिन उनकी और कई अच्छी आदतें मैं नही अपना पाया।

पूरे ख़ानदान में पिताजी सबसे ज़्यादा स्टाइलिश माने जाते हैं जिन्हें पहनने ओढ़ने के साथ खाने पीने, घूमने फिरने और खेलने का बेहद शौक़। अपनी बहनों को कार में बिठाकर घुमाना हो या इंदौर की बेकरी पर कुछ खाना हो – सबके लिए पिताजी हाज़िर। अच्छे कपड़ों की ज़रूरत हो तो उनके भाई पिताजी की अलमारी पर ही धावा बोलते।

अपने स्वभाव के चलते पापा सभी रिश्तेदारों से भी नियमित संपर्क में रहते हैं। हम लोगों को भी समझाते रहते हैं कि कोई शहर में हो तो उससे मिलो। इस डिपार्टमेंट में मुझे बहुत काम करने की गुंजाइश है।

स्क्रीन पर पिता-पुत्र

अगर फिल्में समाज का आईना होती हैं तो समाज में पिता पुत्र के रिश्ते भी कुछ ऐसे ही होते होंगे। पिता पुत्र के दोस्त होने की बात तो करते हैं लेकिन असल में ऐसा होता नहीं है। पुराने समय के समाज में पिता का अपनी संतानों से इतना ज़्यादा संपर्क ही नहीं रहता था। ठीक वैसा ही जैसा काजोल और अमरीश पुरी का था दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे फ़िल्म में। दोनों के बीच एक दूरी रहती और जितनी बात होती वो पूरे अदब के साथ और एक बार फ़रमान जारी हो गया तो अगली फ्लाइट से सीधे पंजाब।

मुझे याद आयी फ़िल्म क़यामत से क़यामत तक जो कई बार देखी है। ये फ़िल्म कई मायनों में यादगार है। फ़िर चाहे वो इसके गाने हों या कलाकार या लव स्टोरी का नया अंदाज़। लेकिन एक और चीज़ जो मुझे बहुत अच्छी लगी फ़िल्म में वो थी पिता-पुत्र का रिश्ता। इसके पहले की और इसके बाद कि भी कई फिल्मों में पिता और बच्चों के बीच रिश्ते में एक दूरी है।

फ़िल्म में आमिर खान जूही चावला की सगाई से लौटते हैं और गुस्से से भरे उनके पिता दिलीप ताहिल उनका इंतज़ार कर रहे हैं। घर के सभी सदस्य डरे हैं कि कहीं वो अपने बेटे की पिटाई न कर दें। लेकिन टूटे हुये आमिर को देख वो उसे गले लगा लेते हैं और रोते हुये अपने बेटे से कहते हैं बाद में बात करेंगे।

मॉडर्न पिता-पुत्र

मैंने अपने आसपास अनुपम खेर और शाहरुख खान फ़िल्म दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे वाले पिता पुत्र देखे हैं जो साथ बैठ सिगरेट, शराब साथ में पीते हैं। क्या वाकई में वो दोस्त हैं या ये दोस्ताना सिर्फ इस काम तक ही सीमित है? इसका जवाब शायद उनके पास होगा। मैं तो सिर्फ उम्मीद कर रहा हूँ कि अपने गुस्से की तरह वो अपने प्यार का भी इज़हार करते होंगे। इस पोस्ट को पढ़ने वाले सभी पिता पुत्र से ही नहीं सभी से निवेदन – अगर प्यार करते हैं तो दिखाने से परहेज़ क्यों। वो अंग्रेज़ी में कहते हैं ना – If you love somebody show it. तो बस गले लगाइये और गले लगिये और प्यार बांटते रहिये।

आनंद श्रीवास्तव की फेसबुक पोस्ट की लिंक।

जब रविवार सचमुच होता था एक ख़ास दिन – 2

दरअसल जो पोस्ट मैंने पहले लिखी थी उसकी पृष्ठभूमि बता दूँ। उस रविवार की सुबह याद रह गया तो सुबह से रंगोली कार्यक्रम देखा। वैसे तो मुझे इसकी ज़रूरत नहीं लगती क्योंकि मुझे लगता है मेरी पीढ़ी वाले और उसके बाद वाले भी जानते ही होंगे मैं किस रंगोली की बात कर रहा हूँ। फिर भी, ये एक कार्यक्रम है जो दूरदर्शन पर हर रविवार सुबह आता है और कुछ बहुत ही अच्छे गाने देखने और सुनने को मिलते हैं।

चाय की प्याली, अखबार, रंगोली और परिवार के सभी सदस्य – कभी ऐसी भी रविवार की सुबह हुआ करती थीं। आँख मलते हुए टीवी के सामने जा बैठते। पुरानी, नई फिल्मों के गाने देखते सुनते चाय भी हो जाती और आलस भी। उसके बाद का कार्यक्रम ठीक वैसे ही जैसा मैंने पिछली बार बताया था। जब पानी की किल्लत शुरू हुई तो रंगोली शुरू होने के पहले गाडी धुलाई का कार्यक्रम सम्पन्न हो जाता था। क्योंकि उनदिनों आज की तरह न तो म्यूजिक चैनल होते थे और न ही यूट्यूब की जब मन चाहा तो देख लिया। लेकिन उस सस्पेंस का अपना मज़ा है।

ठीक वैसा जैसा इस हफ़्ते मैंने और श्रीमती जी ने लिया। उनके पसन्दीदा एक्टर या गायक का गाना आया तो साथ में गुनगुना लेतीं और मुझे चिढ़ातीं। लेकिन अगले गाने पर मेरी बारी होती ये सब करने की। बचपन में हम भाई बहन के बीच भी कुछ ऐसा ही था। अपने पसन्दीदा गाने के आने पर मानो पर लग जाते। लेकिन बाकी गाने भी सुनते। शायद इसका ये फायदा हुआ कि पुराने गाने भी पसंद आने लगे। 90s के गाने तो हैं ही अच्छे लेकिन 60-70 के दशक के गाने भी उतने नहीं तो भी ठीक ठाक पसंद थे। अब चूंकि जो टीवी पर दिखाया जायेगा वही देखने को मिलेगा तो कोई विकल्प भी नहीं था। इंतज़ार रहता था रंगोली का, रविवार के ख़ास कार्यक्रम का। महाभारत, रामायण और भारत एक खोज जैसे कार्यक्रम सचमुच पूरे देश का रविवार ख़ास बनाते थे।

आजकल बहुत से घरों में दो या इससे अधिक टीवी रखने का चलन है। सब अपने अपने कमरे में बैठ क्या देखते हैं तो पता नहीं चलता किसको क्या पसंद है। अपनी पसंद का कुछ देखना सुनना हो तो अपने कमरे के टीवी में देख लेते हैं। रही सही कसर इस मोबाइल ने पूरी करदी। अब रविवार को टीवी देखना एक पारिवारिक कार्यक्रम नहीं रह गया है। लेकिन कार्यक्रम वैसे ज़रूर हैं (सिर्फ दूरदर्शन पर)।

ये अलग अलग पसन्द को लेकर अब हमारे घर में भी बहस होने लगी है। बच्चे बड़े हो रहे हैं और अब उन्हें इस समय के गाने पसंद हैं और मैं और श्रीमती जी पुराने हो चले हैं। कार से कोई यात्रा करो तो ये एक बड़ा मुद्दा बन जाता है। बादशाह और हनी सिंह के बेतुके बोल के आगे कहाँ साहिर लुधियानवी और मजरूह सुल्तानपुरी चलेंगे। इसलिए पहले से ही सबके टाइम स्लॉट दे दिये जाते हैं। वो हमारी पसंद सुनें और हम उनकी। ये अलग बात है की अपने गाने वो पुरे जोश के साथ सुनते हैं और हमारे टाइम पर वो सोना पसंद करते हैं।

जब हम भोपाल से कश्मीर गये तो गानों की खूब तैयारी करी थी। सीडी पर नये, पुराने, गाने, भजन, गज़ल सब लेकर रवाना हुये इस यात्रा पर। रविवार की रंगोली के जैसे ये यात्रा कई मायनों में ख़ास थी और वैसा ही सस्पेंस भी की आगे क्या है। मतलब एडवेंचर की हद कर दी थी पापा और मैंने। पूरा परिवार कार में भर कर निकले थे बिल्कुल ही अनजान रास्ते पर।

जब तक भोपाल और उसके आसपास चलते रहे तो लगता सब तो पता है। अनजानी राहों पर चलके ही आप जानते हैं अपने बारे में कुछ नया। अपने आसपास के बारे में और लोगों के बारे में। आपके व्यक्तित्व में आता है एक अलग ही निखार क्योंकि वो अनुभव आपको बहुत कुछ सीखा और बात जाता है। इस बार चलिए कुछ नया करते हैं श्रेणी में अपने आसपास (१०० किलोमीटर) के अन्दर जाएँ एक बिलकुल नए रस्ते पर, जहाँ आप पहले नहीं गए हों। शर्त ये की अपना गूगल मैप्स इस्तेमाल न करें बल्कि लोगों से पूछे रास्ता और उस इलाके में क्या ख़ास है।

जब रविवार सचमुच होता था एक ख़ास दिन

जब हम पढ़ रहे थे तब दूसरे और चौथे शनिवार स्कूल की छुट्टी रहती थी। पिताजी का साप्ताहिक अवकाश रविवार को ही होता था। मतलब रविवार का केवल एक दिन मिलता था जब सब घर पर साथ में रहते थे। लेकिन उन दिनों रविवार का मतलब हुआ करता था ढेर सारा काम। गाड़ियों – स्कूटर, सायकल और हमारी रामप्यारी अर्थात ऑस्टिन – की धुलाई एक ऐसा काम होता था जिसका हम सब इंतज़ार करते थे।

पिताजी ने हमेशा गाड़ी का खयाल रखना सिखाया। हमारे पास था भी एंटीक पीस जिसका रखरखाव प्यार से ही संभव था। गाड़ी चलाने से पहले गाड़ी से दोस्ती का कांसेप्ट। उसको जानिये, उसके मिज़ाज को पहचानिये। गाड़ी तो आप चला ही लेंगे एक दिन लेकिन गाड़ी को समझिये। इसकी शुरुआत होती है जब आप गाड़ी साफ करना शुरू करते हैं। एक रिश्ता सा बन जाता है। ये सब आज लिखने में बड़ा आसान लग रहा है। लेकिन उन दिनों तो लगता था बस गाड़ी चलाने को मिल जाये किसी तरह।

गाड़ी से ये रिश्ते का एहसास मुझे दीवाली पर भोपाल में हुआ। चूंकि कार से ये सफ़र तय किया था तो गाड़ी की सफ़ाई होनी थी। उस दिन जब गाड़ी धो रहा था तब मुझे ध्यान आया कि एक साल से आयी गाड़ी की मैंने ऐसे सफाई करी ही नहीं थी। मतलब करीब से जानने की कोशिश ही नहीं करी। कभी कभार ऐसे ही कपड़े से सफ़ाई कर दी। नहीं तो बस बैठो और निकल पड़ो। कभी कुछ ज़रूरत पड़ जाये तो फ़ोन करदो और काम हो जायेगा।

जब तक नैनो रही साथ में तो उसके साथ ऐसा बर्ताव नहीं किया। लेकिन नई गाड़ी आते ही दिल्ली निकल गये इसलिये गाड़ी चलाने का भी कम अवसर मिला। लेकिन दिल्ली में भी गाड़ी को बहुत याद ज़रूर करता और इसका दुख भी रहता कि नई गाड़ी खड़ी रहती है। यहां आकर उसको थोड़ा बहुत चला कर उस प्यार की खानापूर्ति हो जाती। बस उसको पार्किंग में देख कर खुश हो लेते। श्रीमती जी की लाख ज़िद के बाद भी अभी उन्हें इससे दूर रखने में सफल हूँ। लेकिन जब कार से लंबी यात्रा करनी हो तब लगता है उन्हें भी कार चलाना आ जाये तो कितना अच्छा हो। हम लोगों को कार से घुमने का शौक भी विरासत में मिला है। जिससे याद आया – मैंने आपसे मेरी अभी तक कि सबसे अनोखी कार यात्रा जो थी झीलों की नगरी भोपाल से धरती पर स्वर्ग कश्मीर के बीच – उसके बारे कुछ बताया नहीं है। फिलहाल उसकी सिर्फ एक झलक नीचे। दस साल पुरानी बात है लेकिन यादें ताज़ा हैं।

अगर हम गाड़ी की जगह इन्सान और अपने रिश्ते रखें तो? हम कितना उनको सहेज कर रखते है? क्या वैसे ही जैसे कभी कभार गाड़ी के ऊपर जमी धूल साफ करते हैं वैसे ही अपने रिश्तों के साथ करते हैं? या फिर हमने उनके रखरखाव की ज़िम्मेदारी एक कार साफ करने वाले के जैसे अपने लिये खास मौके छोड़ दिये हैं? समझें क्या कहा जा रहा है बिना कुछ बोले।

पिताजी और ऑस्टीन के बारे में अक्सर लोग कहते कि वो उनसे बात करती हैं। कई बार लगता कि ये सच भी है क्योंकि जब ऑस्टीन किसी से न चल पाती तब पिताजी की एंट्री होती जैसे फिल्मों में हीरो की होती है और कुछ मिनटों में ऑस्टीन भोपाल की सड़कों पर दौड़ रही होती। क्यों न हम भी अपने रिश्ते बनायें कुछ इसी तरह से।

चलिये नया कुछ करते हैं कि श्रेणी में आज अपना फ़ोन उठाइये और किन्ही तीन लोगों को फ़ोन लगायें। कोई पुराने मिलने वाले पारिवारिक मित्र, कोई पुराना दोस्त या रिश्तेदार। शर्त ये की आपका उनसे पिछले तीन महीनों में किसी भी तरह से कोई संपर्क नहीं हुआ हो। जैसा कि उस विज्ञापन में कहते हैं, बात करने से बात बनती है तो बस बात करिये और रिश्तों पर पड़ी धूल को साफ करिये। सिर्फ अपनी कार ही नहीं अपने रिश्तों को भी चमकाते रहिए। बस थोडा समय दीजिये।

चलिये शुरू करते हैं कुछ नया

दिल्ली का छूटना कई मायनों में बहुत दुखद रहा लेकिन मैं इस बात को लेकर ही खुश हो लेता हूँ कि मैंने लिखना शुरू किया। वो भी हिंदी में।

मेरा पूरा पत्रकारिता का करियर अंग्रेज़ी को समर्पित रहा है। जब भी कभी लिखने का प्रयास किया तो अंग्रेज़ी में ही किया। उसपर ये बहाना बनाना भी सीख लिया कि मेरे विचार भी अंग्रेज़ी में ही आते हैं और इसलिए उनको हिंदी में लिखना थोड़ा मुश्किल होता है।

अपने इस दकियानूसी तर्क पर कभी ज़्यादा सोचा नहीं क्यूंकि अंग्रेज़ी में ही लिखते रहे। लेकिन जब हिंदी में लिखना शुरू किया तब लगा कि मैं अपने को इस भाषा में ज़्यादा अच्छे से व्यक्त कर सकता हूँ। अटकता अभी भी हूँ और पहला शब्द दिमाग़ में अंग्रेज़ी का ही आता है। लेकिन शरीर के ऊपरी हिस्से में मौजूद चीज़ को कष्ट देते हैं तो कुछ हल मिल ही जाता है।

टीम के एक सदस्य जो भोपाल से ही आते थे, उनको अंग्रेज़ी का भूत सवार था। उनका ये मानना है कि अंग्रेज़ी जानने वालों को ही ज़्यादा तवज्जों मिलती है। हमारे देश के अधिकारीगण भी उन्हीं लोगों की सुनवाई करते हैं जो इस का ज्ञान रखते हों। मैं इससे बिल्कुल इत्तेफाक नहीं रखता लेकिन उनको इसका विश्वास दिला नहीं पाया।

अच्छा मेरी भी अंग्रेज़ी जिसका मुझे अच्छे होने का गुमान है, लेकिन असल में है नहीं, वो भी बहुत ख़राब थी। उसको सुधारने का और मुझे इस लायक बनाने का मैं ठीक ठाक लिख सकूँ, पूरा श्रेय जाता है तनवानी सर को। उन्होंने बहुत धैर्य के साथ मुझे इस भाषा के दावपेंच समझाये। बात फिर वहीं पर वापस। आपके शिक्षक कैसे हैं। अच्छा पढ़ाने वाले मिल जायें तो पढ़ने वाले अच्छे हो ही जाते हैं।

मैंने पहले भी इसका जिक्र किया है और आज फ़िर कर रहा हूँ। घर में पढ़ने लिखने की भरपूर सामग्री थी और इसका कैसा इस्तेमाल हो वो व्यक्ति विशेष पर निर्भर करता है। अख़बार पढ़ने की आदत धीरे धीरे बनी। शुरुआत में सब बक़वास लगता। फिर रुचि बढ़ने लगी। उनदिनों नईदुनिया के लिये मेहरुनिस्सा परवेज़ साहिबा लिखती थीं और मुझे उनके कॉलम पढ़ने में काफी आनन्द आता। उनसे तो नहीं लेकिन उनके आईएएस पति से कई बार मिलना हुआ। कई बार सोचा कि एक बार उनके बारे में भी पूछलूँ लेकिन संकोच कर गया।

इंटरव्यू के लिये कई बार ऐसे ऐसे नमूने मिले जो सपना पत्रकार बनने का रखते हैं लेकिन अख़बार पढ़ने से तौबा है। लेकिन दिल्ली में कई पढ़ने के शौक़ीन युवा साथी मिले। इनसे मिल के इसलिये अच्छा लगता है क्योंकि वो मुझसे कुछ ज़्यादा जानते हैं। जैसे आदित्य काफी शायरों को पढ़ चुके हैं और मैं उनसे पूछ लेता हूँ इनदिनों कौन अच्छा लिख रहा है। इतनी बडी इंटरनेट क्रांति के बावज़ूद बहुत से लेखकों से हमारा परिचय नहीं हो पाता। जो चल गया बस उसके पीछे सब चल देते हैं। इसके लिये हम सब को ये प्रयास करना चाहिये कि अगर कुछ अच्छा पढ़ने को मिले तो उसको अपने जान पहचान वालों के साथ साझा करें। तो अब आप कमेंट कर बतायें अपनी प्रिय तीन किताबें, उनके लेखक और क्या खास है उसमें।

इंतज़ार

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ये जो रात बैठ करता हूँ,
मैं कल का इंतज़ार,
क्या तुम भी अपना दिन,
ऐसे ही कर देती हो हवाले मेरे।

ये जो अपने गानों की प्लेलिस्ट में
तुम्हारा गीत सुनता हूँ बेसुध,
क्या कोई ग़ज़ल सुन
गुनगुना लिया करती हो तुम भी मुझे।

ये जो किताबों के पन्नो के बीच
मिल जाते हैं तुम्हारे अंश,
क्या तुम्हारी चादर की सिलवटों में
मिल जाता हूँ मैं भी तुम्हें।

ये जो शुरु हुए हैं सिलसिले,
कहीं न पहुंचने वाली मुलाक़ातों के,
क्या तुम भी इस सफ़र पर,
हमसफर बनी हो सिर्फ मेरे ही लिए।

सफ़र

Man relaxing in car, scenic road trip in summer. Feet out window, enjoying countryside.

चलो चलें आज एक ऐसे सफ़र पर 
जिसकी मंज़िल न हो हमें पता,
मील का पत्थर हो मैप हमारा,
और आँखें ही नापें रास्ता।

चलो चले आज उन गलियों में,
जहाँ सेल्फी खींचे आंखों से,
और रखें पलकों के फोल्डर में,
बस रहें सामने और छिपे भी हों।

चलो चलें आज उन गलियों में,
जहाँ फिल्मी हो लोकेशन,
दिल कहे पैकअप पर आँखें कहें एक्शन,
बस रहें सामने और खोये हुए भी हों।

चलो चलें आज उन गलियों में,
जहाँ याद नहीं मिले हों कभी,
लेकिन मिलते रहें हों हमेेशा,
बस रहे सामने और अनजाने भी।

चलो चलें आज उन गलियों में,
जहाँ तुम्हारा आँचल छुये तो मुझे,
लेकिन सिरहन हो दो जिस्मों में, 
बस रहें सामने और समेटते रहें दामन।

काली कार की ढेर सारी रंगबिरंगी यादें

ऑफ़िस में एक नई कार आयी थी टेस्ट ड्राइव के लिए। टीम के सदस्य बता रहे थे कि कैसे उन्होंने कार चलाना सीखा। सुवासित ने बताया कि कैसे वो जब मारुती 800 सीख रहे थे तो चप्पल उतारकर गाड़ी चलाते थे की गलती से कहीं पैर ब्रेक के बजाए एक्सीलेटर पर स्लीप न हो जाये। प्रतीक्षा ने बताया कि उनको सीखने के दौरान डाँट पड़ी तो उन्होंने सीखना ही छोड़ दिया।

हमारे परिवार में एक विंटेज कार है। ऑस्टिन 10 जिसे मैं बचपन से देखता आ रहा हूँ। मेरा कार चलाना सीखना उसी पर हुआ। काले रंग की कार के चलते हमारा घर काली कार वाला घर के नाम से जाना जाता था। जब सीख रहा था तब सिर्फ ऑस्टिन में ही फ्लोर गियर थे। बाकी सभी गाड़ियों में स्टीयरिंग से लगे हुए गियर थे। तब लगता था इसी गाड़ी में गियर अलग क्यूँ हैं। आज सभी गाड़ियों में फ्लोर गियर देख कर लगता है ऑस्टिन ने अच्छी तैयारी करवा दी थी।

बहरहाल, गाड़ी सीखते समय पिताजी से काफी मार खाई। गियर और स्टेयरिंग का तालमेल बिठाना एक अलग ही काम लगता था। आजकल के पॉवर स्टेयरिंग के जैसे आराम से घूमने वाले स्टेयरिंग बहुत बाद में चलाने को मिले। ऑस्टिन का स्टेयरिंग बहुत ही मुश्किल से चलता था शुरुआत में। पूरी ताकत लग जाती गाड़ी घुमाने में।

जब पिताजी घर पर नहीं तो सामने जो छोटी सी जगह थी उसमें गाड़ी घुमाते। कई बार दीवार या गैरेज से कार टकराई। लेकिन ऑस्टिन की बॉडी मतलब लोहा। मजाल है एक ख़रोंच भी आये। जब कभी गाड़ी रोड पर निकलती तो नये ज़माने की नाज़ुक कारों के लिए डर लगता की कहीं ऑस्टिन से टकराकर वो चकनाचूर न हो जाएं।

एक बार देर रात परिवार के सदस्य और कुछ मेहमान कहीं से लौट रहे थे। सुनसान सड़क पर ज़ोर से आवाज़ हुई जैसे कुछ बड़ी सी चीज कहीं गिरी हो। पापा ने कार रोकी देखने के लिए। लेकिन रोड खाली। कहीं किसी जीव जंतु का नामोनिशान नहीं। ऑस्टिन स्टार्ट करी लेकिन कार आगे नहीं बढ़े। उतरकर देखा तो ड्राइवर साइड का जो बाहर निकला हुआ टायर का कवर था वो अंदर धंसा हुआ था। लोहे की बॉडी वाली ऑस्टिन के साथ क्या हुआ था ये एक सस्पेंस अभी भी बरकरार है। जब ये ठीक हो रही थी तो मेकैनिक भी परेशान की ये हुआ कैसे। उनका ये मानना था कि ज़रूर किसी खंबे से टकरा गई होगी।

आजकल की गाड़ियों के बॉंनेट खोलें तो समझ में नहीं आता कहाँ क्या है। अगर गाड़ी कहीं खड़ी हो जाये तो आपके पास हेल्पलाइन को फोन करने के अलावा और कोई चारा ही नहीं बचता। लेकिन ऑस्टिन के इंजन जैसा बिल्कुल सिंपल सा इंजन मैंने आजतक नहीं देखा। गाड़ी कहीं खड़ी हो जाये तो आप कोशिश कर सुधारकर आगे चल सकते हैं।

ऑस्टिन में अनुज की बिदाई

ऑस्टिन के साथ बहुत सारी यादें हैं। बहुत ही मज़ेदार भी। जैसे जब हम कहीं से लौट रहे थे तो स्टेयरिंग जाम हो गया। गाड़ी मोड़ रहे थे उल्टे हाथ की तरफ लेकिन गाड़ी सीधे चली जा रही थी। या जब हमारी गाड़ी के बगल से किसी गाड़ी का एक टायर निकला। सब बोले अरे देखो ये क्या है। वो तो जब ऑस्टिन का पिछला हिस्सा तिरछा हुआ तो समझ में आया कि ये तो अपनी कार का टायर निकल गया है।

आखरी बार ऑस्टिन चलाने की याद है जब छोटे भाई की शादी की बिदाई हुई। दोनों भाई अपनी पत्नी के साथ ऑस्टिन का आनद ले रहे थे कि पेट्रोल खत्म हो गए। शेरवानी पहने दूल्हे राजा गए थे पेट्रोल लाने। लोगों ने बहुत दिए लेकिन ऑस्टिन ने कभी धोका नहीं दिया।

आज भी जब कभी गाड़ी चलाते हैं तो काली कार की याद आ ही जाती है।

जीवन सिर्फ सीखना और सिखाना है

मैंने अपना पत्रकारिता में करियर अंग्रेज़ी में शुरू किया और उसी में आगे बढ़ा। हिंदी प्रदेश का होने के कारण हिंदी समझने में कोई परेशानी नही होती है और ख़बर हिंदी में हो तो उसको अंग्रेजी में बनाने में भी कोई दिक्कत नहीं। इन सभी बातों का फायदा मिला और वो भी कैसे।

नासिर भाई ने अगर लिखना सिखाया तो दैनिक भास्कर के मेरे सीनियर और अब अज़ीज दोस्त विनोद तिवारी ने सरकारी दफ्तरों, अफसरों से ख़बर कैसे निकाली जाये ये सिखाया। विनोद के साथ भोपाल में नगर निगम और सचिवालय दोनों कवर कर मैंने बहुत कुछ सीखा। उन दिनों मैं प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहा था लेकिन विनोद ने एक दिन चाय पीते हुये एलान कर दिया था कि मुझे पत्रकारिता का कीड़ा लग चुका है और मैं अब यहीं रहूँगा।

हिंदी के पाठक उस समय भी अंग्रेजी से ज़्यादा हुआ करते थे लेकिन मुझे अंग्रेज़ी में लिखना ही आसान लगता। उस समय ये नहीं मालूम था कि पन्द्रह साल बाद मैं भी हिंदी में अपना सफ़र शुरू करूंगा। थोड़ा अजीब भी लगता क्योंकि मेरे नाना हिंदी के लेखक थे और पिताजी भी हिंदी में कवितायें लिखते थे।

इंडिया.कॉम को जब हमने हिंदी में शुरू करने की सोची तो मेरे बॉस संदीप अमर ने पूछा कौन करेगा। मैंने हामी भर दी जबकि इससे पहले सारा काम सिर्फ और सिर्फ अंग्रेज़ी में ही किया था। लेकिन \”एक बार मैंने कमिटमेंट कर दी तो उसके बाद मैं अपने आप की भी नहीं सुनता\” की तर्ज़ पर मुंबई में लिखने वालों को ढूंढना शुरू किया। इसमें मुझे मिले अब्दुल कादिर। वो आये तो थे अंग्रेज़ी के लिये लेकिन वहाँ कोई जगह नहीं थी और उन्हें जहाँ वो उस समय काम कर रहे थे वो छोड़नी था। समस्या सिर्फ इतनी सी थी कि उन्होंने हिंदी में कभी लिखा नहीं था। लेकिन उन्होंने इसको एक चुनौती की तरह लिया और बेहतरीन काम किया और आज वो हिंदी टीम के लीड हैं।

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आगे टीम में और लोगों की ज़रूरत थी तो कहीं से अल्ताफ़ शेख़ का नाम आया। अल्ताफ़ ने डिजिटल में काम नहीं किया था और हिंदी में लिखने में थोड़े कच्चे थे। शुरुआती दिनों में उनके साथ मेहनत करी और उसके बाद एक बार जब उन्हें इस पूरे खेल के नियम समझ में आ गए तो उन्होंने उसमें न केवल महारत हासिल कर की बल्कि उन्होंने अपना एक अलग स्थान बना लिया। हाँ शुरू के दिनों में अल्ताफ़ ने बहुत परेशान किया और शायद ही कोई ऐसा दिन जाता जब अल्ताफ़ पुराण न हो। लेकिन उनकी मेहनत में कोई कमी कभी नहीं आई और नतीजा सबके सामने है। इनके किस्सों की अलग पोस्ट बनती है!

अल्ताफ़ इन दिनों एक मनोरंजन वेबसाइट के कंटेंट हेड हैं और आये दिन फिल्मस्टार्स के साथ अपनी फोटो फेसबुक पर साझा करते रहते हैं। आज वो जिस मुकाम पर हैं उन्हें देख कर अच्छा लगता है। उनके चाहने वाले उन्हें लातूर का शाहरुख कहते हैं। लेकिन जिस तरह एक ही शाहरुख खान हैं वैसे ही एक ही अल्ताफ़ हैं। सबसे अलग, सबसे जुदा। जन्मदिन की ढेरों शुभकामनायें। हिंदी के टीम के बारे में विस्तार से फिर कभी।

दिवाली के बहाने कुछ अन्दर की, कुछ बाहर की सफाई

बीते दिनों दीवाली पर घर जाना हुआ। चूंकि इन दिनों समय ही समय है तो ज़्यादा आनन्द लिया भोपाल यात्रा का। अब चालीस पार हो गए हैं तो हमारे समय में लिखना अटपटा नहीं लगता। जब हम पिताजी को मिले सरकारी मकान में रहते थे तो हर साल दीवाली के पहले घर में सरकार की तरफ से रंगरोगन करवाया जाता था।

उस समय स्कूलों की दीवाली की छुट्टियां दशहरे से शुरू होती थीं और दीवाली तक चलती थीं। तो इस रंगरोगन या पुताई के कार्यक्रम के समय हम चारों भाई बहन घर पर रहते थे। जिस दिन ये काम होना होता था उस दिन सुबह से माँ रसोई में खाने की तैयारी करतीं और हम लोग सामान बाहर निकालने का काम। कुछ बडी अलमारियों को छोड़ कर बाकी पूरा सामान घर के बाहर। किताबों को धूप दिखाई जाती। चूंकि इसके ठीक बाद सर्दियों का आगमन होता तो गर्म कपड़े भी बाहर धूप में रखे जाते।

इस सालाना कार्यक्रम में बहुत सी सफाई हो जाती। रंगरोगन तो एक दिन में हो जाता लेकिन सामान जमाने का कार्यक्रम अगले कुछ दिनों तक चलता। कुछ सालों बाद सरकार जागी तो ये कार्यक्रम दो साल में एक बार होने लगा और जब हमने वो मकान छोड़ा तो सरकार ने इसका आधा पैसा रहवासियों से वसूलना शुरू कर दिया था।

अपने आसपास सरकारी घर ही थे और बहुत थोड़े से लोग थे जिनके खुद के मकान थे तो ये पता नहीं चलता था उनके यहाँ रंगरोगन का अंतराल क्या है। वो तो जब दिल्ली, मुम्बई में रहने आये तो पता चला कि ये पाँच साल में या उससे अधिक समय में होता है।

पिताजी की सेवानिवृत्त के बाद अपने मकान में रहने लगे तो सालाना रंगरोगन का कार्यक्रम पूरे घर का तो नहीं बस भगवान घर तक सीमित हो गया है। चूँकि पहुंचते ही एन दीवाली के पहले हैं तो माता-पिता सफ़ाई वगैरह करवा के रखते हैं। उसपर पिताजी की हिदायत उनके किसी समान को उसकी जगह से हिलाया न जाये। हाँ, दीवाली की सफाई ज़रूर होती है लेकिन उतनी व्यापक स्तर पर नहीं जब आप घर पेंट करवा रहे हों। सामान सब वहीं रखे रहते हैं और हम बस उसके आसपास सफाई कर आगे बढ़ जाते हैं।

सरकारी घर में कुछेक बार तो ऐसा भी हुआ कि हम लोग सुबह से सामान बाहर निकाल कर तैयार और पता चला काम करने वाले उस दिन छुट्टी पर हैं। इन दिनों भारत के क्रिकेट मैच भी चलते थे तो टीवी को उसकी जगह से हिलाया नहीं जाता। घर में पेंट हो रहा है और मैच का आनंद भी लिया जा रहा है। जितने भी बल्ब और ट्यूबलाइट लगे होते उन्हें अच्छे से धो कर लगाया जाता। नये रंगे कमरे की चमक साफ किये बल्ब की रोशनी में कुछ और ही होती। आजकल त्योहार मनाने का तरीका बदल गया है। होता सब कुछ वही है लेकिन लगता है कुछ कमी है।

सोचिये अगर हम हर साल कुछ दिन निकाल कर अपने अंदर की ईर्ष्या, द्वेष, भय, अभिमान और अहंकार की भी सफ़ाई कर लें तो न सिर्फ हमारे संबधों में बल्कि स्वयं हमारे व्यकितत्व में भी कितनी ख़ालिस चमक आ जायेगी।

क्या सोचते हैं लोग आपके बारे में

पिछले दिनों रिलीज़ हुई फ़िल्म ठग्स ऑफ हिन्दोस्तां बॉक्सऑफिस पर ढ़ेर हो गयी। और ऐसी ढ़ेर की अब उसकी मिसाल दी जायेगी। लेकिन इस फ़िल्म की विफलता दरअसल एक बहुत बड़ी सीख दे गई जो है तो बहुत पुरानी लेकिन आज भी उतनी सही।

कान के कच्चे कहावत आपने सुनी होगी। लोग आपके बारे में क्या सोचते हैं। हम अपने जीवन का एक बहुत लंबा समय इसी सोच में लगा देते हैं। मसलन मैंने अगर अच्छे कपड़े पहने हैं और अगर मुझे एक भी वाह वाह नहीं मिली या मेरी किसी पोस्ट को किसी ने पसन्द नहीं किया तो मैं दुखी। दुखी इसलिए कि सामने वाले ने मेरे प्रयास को सराहा नहीं।

ऐसा इसलिये की हम शुरू से ही ऐसी सोच बना लेते हैं कि अगर कोई तारीफ़ करे, वो भले ही झूठी हो, तभी सब अच्छा है। हमारे आसपास ऐसा ही माहौल रहता है। इसका ये मतलब कतई न निकालें की किसी की झूठी तारीफ़ न करें। पतियों के लिए फ़िर तो जीना मुश्किल हो जायेगा।

हम चाहते हैं कि समाज या उसमे रहने वाले लोग हमें अपनाये लेकिन उनकी शर्तों पर। और हम हर बार ये शर्त मान लेते हैं बिना किसी सवाल के। इस पूरे प्रकरण से मुझे कोई परेशानी नहीं। लेकिन तब परेशान हो जाता हूँ जब हम अपने काम दूसरे लोगों के हिसाब से करने लगते हैं क्योंकि उसके करने से सब खुश होते हैं और हम भी उसमे ही अपनी खुशी तलाशते हैं।

आप में से कितने लोगों ने ठग्स ऑफ हिन्दोस्तां सिनेमाघरों में जाकर देखी और फ़िर अपनी राय बनाई? जितने लोगों से मुझे फ़िल्म के बारे में सुनने को मिला वो ठीक ठाक ही था। लेकिन जिस तरह का कैंपेन फ़िल्म के खिलाफ चलाया गया लगा उससे बुरी फ़िल्म तो बनी ही नहीं है। लेकिन लोग अपने मिशन में कामयाब रहे – फ़िल्म के ख़िलाफ़ धारणा बनाने में।

मतलब ये की फ़िल्म देखी हो या नहीं बस बोल दो खराब है। कुछ वैसा ही जैसा लोगों के साथ होता है। इसका सबसे अच्छा उदाहरण है फ़िल्म मिली। अमिताभ बच्चन और जया भादुड़ी की फ़िल्म में पूरी सोसाइटी अमिताभ बच्चन की एक नेगेटिव इमेज बनाने की कोशिश करती है। इसमें सभी बढ़चढ़ कर हिस्सा लेते हैं लेकिन असल में अमिताभ बच्चन कैसे हैं ये सिर्फ मिली को उनसे मिलने के बाद पता चलता है।

कुछ वैसा ही हमारे साथ होता है और हम भी बाकी लोगों के साथ इस कर्मकांड में जाने अनजाने इसका हिस्सा बन जाते हैं। लेकिन अगर हम यही सोचते रहे तो अपना काम कैसे कर पायेंगे? हम अक्सर सही करने के बजाये वो कर बैठते हैं जिसको लोगों की सहमति प्राप्त हो।

मुम्बई जैसी कोई दूसरी जगह नहीं

मुम्बई-पुणे की पहली यात्रा के बारे में पहले बता चुका हूँ। जब दूसरी बार इसको कार्यस्थल बनाने का मौका मिला तो बिना कोई मौका गवाएँ मैंने हामी भर दी। एक बार भोपाल छुटा तो फिर सब जगह बराबर ही थीं। जुलाई 2000 में PTI ने मुंबई तबादला कर दिया और थोड़ा सा सामान और ढेर सारी यादों के साथ मायानगरी के लिये प्रस्थान कर दिया।

जो भी कोई मुम्बई आ चुका या रह चुका है वो ये समझेगा की मुम्बई जैसी कोई दूसरी जगह नहीं। आप शिकायत करते करते भी इसके तौर तरीके अपना लेते हैं और इसका एहसास आपको तब होता है जब आप कहीं और जाते हैं। मसलन यहाँ सुबह सब के लिये जल्दी होती है और दुकाने भी जल्दी खुल जाती हैं। कुछ दिनों बाद भोपाल गया तो लगा वहां सब चीज़ें स्लो मोशन में चल रहीं हैं।

मुम्बई पर वापस आते हैं। PTI ने चेम्बूर में एक फ्लैट को गेस्ट हाउस का नाम दे दिया था लेकिन ऐसी कोई सहूलियतें नहीं दिन थी। खाने का इंतज़ाम आपकी ज़िम्मेदारी थी। जल्द ही यहां कुछ नए प्राणी आने वाले थे और एक नीरस सा गेस्ट हाउस एक हंगामे वाली जगह बनने वाली थी।

मुम्बई लोकल में घुसना एक कला है जो आप धीरे धीरे सीख लेते हैं या यूँ कहें रोज़ रोज़ की धक्कामुक्की आपको सीखा देती हैं। शुरुआती हफ्ता थोड़ा समझने में गया। लेकिन फिर कौन सा डिब्बा पकड़ना है से लेकर कौन सी लोकल पकड़नी है सब सीखते गये। चेम्बूर के पास ही है तिलक नगर स्टेशन जिसने मुझे फिर से भोपाल से जोड़े रखा।

चेम्बूर में एक रेस्टॉरेंट है जहां प्रसिद्ध कलाकार, निर्माता, निर्देशक राज कपुर जी आते थे। एकाध बार खुद खा कर अपने आप को काफी गौरान्वित महसूस करने लगें लेकिन फिर ये भी सोचा कि आखिर ऐसा खास क्या हैं यहां के खाने में। लेकिन कोई मुम्बई आता तो उसको ज़रूर लेके जाते। इस उम्मीद पर की शायद वो बताएं। लेकिन सभी मेरे खयाल से मुझ जैसा ही रियेक्ट कर रहे थे।

PTI मुम्बई में काफी बदलाव हो रहे थे जब हमारा तबादला यहाँ किया गया। यह एक अलग चुनौती थी जिसका सामना करने के अलावा और कोई चारा नही था। लेकिन यहां के डेस्क और रिपोर्टिंग स्टाफ के सदस्यों ने बहुत ध्यान रखा। और ये इसका ही नतीजा है आज भी इन सभी से संपर्क बना हुआ है।

मुम्बई की बारिश का तब तक सिर्फ सिनेमा के पर्दे पर देख कर आनंद ही लिया था। उसके कहर को झेला नहीं था। लेकिंन वो दिन भी जल्दी आ गया जब ज़ोरदार बारिश के चलते मुम्बई ठप्प हो गयी थी। कैसे सामना किया इसका?

जीवन एक गीत है तो कोरस है अनुभव

एक बार फिर मुम्बई। आज कार में सफ़र करते समय रेडियो पर ज़माने को दिखाना है फ़िल्म का गाना दिल लेना खेल है दिलदार का चल रहा था। इस गाने के बीच में कुछ कोरस गाता है जिसका कोई मतलब इतने वर्षों मे समझ ही नहीँ आया। ये कोई अकेला गाना नहीं है जिसमे ऐसा कुछ है। आर डी बर्मन के बहुत से ऐसे गाने हैं जिनमे ऐसा कुछ सुनने के लिए अक्सर मिलता है। इसमें कितना योगदान RDB का हैं और कितना फ़िल्म से जुड़े अन्य लोगों का ये शोध का विषय हो सकता है। लेकिन ये कहना कि इस उटपटांग कोरस को सिर्फ RDB ने ही इस्तेमाल किया है तो गलत होगा।

हमारे जीवन में भी कुछ ऐसा ही होता है। सब एक सुर, ताल में बँधे चलते रहते हैं और अचानक एक अलग सा कोरस शुरू हो जाता है जिसका कोई मतलब समझ में तो नहीं आता। लेकिन ये कोरस गाने में इस तरह से गुंथा जाता है कि आपको वो गाने से अलग नहीं लगता। जीवन में ये कोरस को आप अनुभव कह सकते हैं। अच्छे और बुरे सभी अनुभव हमारी इस यात्रा को यादगार बना देते हैं।

अब ये आप पर निर्भर है कि आप उस कोरस को अलग से निकाल कर उसका सुक्ष्म परीक्षण कर किसी निष्कर्ष पर पहुंचना चाहते हैं या उसको गुनगुनाते हुए अपने गाने पर वापस आना चाहते हैं। कई बार हम लोग गाना भूल कोरस पर ही अपना ध्यान रखते हैं।

अगर हम किशोर कुमार के गाये हुए फ़िल्म शालीमार के गीत हम बेवफा हरगिज़ न थे कभी सुने तो ये बात औऱ अच्छे से समझ सकते हैं। गाना दिल टूटने की दास्तां बयाँ कर रहा है और उसका कोरस उतना ही ज़्यादा मज़ेदार। कभी फुरसत में सुनियेगा। अब अगर मैं इसके बाकी बैकग्राउंड को ध्यान में रखूं तो गाने का सारा मज़ा किरकिरा हो जाता है।

वैसे आजकल के ज़्यादातर गाने बिना किसी मतलब के ही होतें है। क्या यही कारण है कि आज भी लोग उन पुराने गीतों को पसंद करते हैं या रीमिक्स कर बिगाड़ देते हैं?

वो शाम कुछ अजीब थी, ये शाम भी अजीब है

आज से ठीक एक महीने पहले दिल्ली से जब ट्रेन में बैठा था तो वो शाम भी कुछ अजीब थी और आज की ये शाम भी कुछ उस शाम जैसी ही है। 29 सितंबर को जब मैं हज़रत निज़ामुद्दीन स्टेशन पर अपनी ट्रैन की ओर कदम बढ़ा रहा तो जो समान दिख नहीं रहा था उसका बोझ सबसे ज़्यादा था और वो थीं अनगिनत यादें। समेटना भी मुश्किल और सहेज कर रखना भी मुश्किल।

दिल्ली और 15 नवंबर से शुरू हुई नई पारी।का अंत होने जा रहा था। लेकिन ये बीता समय कमाल का था। कुछ नए प्रतिभावान टीम के सदस्यों के साथ काम करने का मौका मिला। हमारी नई शुरुआत को सराहा गया, गलतियों को बताया गया और जोश एवं उल्लास के साथ कुछ अच्छा और अलग करने का निरंतर प्रयास किया।

इस पूरे प्रवास की सबसे बड़ी उपलब्धि थी कलम में सुखी हुई स्याही को बदलने की और फिर से लिखने की। हालांकि ये प्रक्रिया की शुरुआत काफी अच्छी रही लेकिन जैसे जैसे काम तेजी पकड़ने लगा लिखना कम होता गया। प्रयास होगा कि इसे पुनर्जीवित कर निरंतरता कायम रहे।

नाम और उसमें छिपे धर्म को तलाशती दुनिया

मेरे नाम को लेकर मुझे सिर्फ परीक्षा के समय छोड़कर कभी कोई परेशानी नहीं हुई। परीक्षा में इसलिए कि मेरा नंबर पहले 10 में आता ही था और परीक्षक के लिए मैं जैसे उसकी प्रार्थना का उत्तर था। अलबत्ता लोगों को ज़रूर हैरानी होती की असीम नाम होते हुए भी मैं कड़ा, अंगूठी और कलावा बाँधे रहता था।

जब कभी किसी को मेरे मन्दिर या मस्जिद जाने का ख़याल आता तो पूछ लेते नाम का मतलब। मैं उन्हें कभी आसमान का हवाला देता जो असीमित है या जुआ खेलने की उस टेबल का जिसमे पैसे लगाने की कोई सीमा नहीं होती या फिर शादी के कार्ड का हवाला देता जहाँ अकसर मेरा ज़िक्र होता – परमात्मा की असीम कृपा से …। चूंकि अधिकतर ऐसे संशय अच्छे पढ़े लिखे लोगों की तरफ से व्यक्त किये जाते तो थोड़ी निराशा भी होती।

अच्छा मज़ेदार बात ये की दोनो तरफ के लोग मुझे अपनी बिरादरी का मानते। जब नौकरी के लिये एक संस्था जॉइन करी तो वहां के एक वरिष्ठ पत्रकार ने भी पूछ ही लिया – मौलाना हो क्या। चूँकि वसीम और असीम में खासा अंतर नाही दिखाई और सुनाई देता है, तो मेरी ये मुश्किल ताउम्र रहने वाली है। मेरे से ज़्यादा उनकी जो मेरे नाम के पीछे छिपे मेरे धर्म को ढूंढना चाहते हैं। अब अंगूठी, कड़ा पहनना छोड़ दिया तो मुश्किल और बढ़ जाती है।

ऐसे ही लोगों की परेशान बढ़ाने के लिये मैं अक्सर अपना पहला नाम ही इस्तेमाल करता हूँ। पिछले दिनों ऑफिस जाने के लिये गाड़ी में बैठने लगा तो ड्राइवर दुआ सलाम करने लगा। मैंने भी शुक्रिया कहते हुए उसका वहम बनाये रखा।

जब शादी की बात हुई और तय हुई तो मुझे तो अपने नाम को लेकर कोई सफाई नहीं देनी पड़ी लेकिन मेरी होने वाली जीवनसंगिनी की सहेलियों को बड़ा आश्चर्य हुआ कि उनकी शादी असीम नाम के व्यक्ति से हो रही है। उनसे पूछा गया की लव मैरिज कर रही हो। ये सवाल उनसे आज भी पूछा जाता है।

आसीम, अशीम, आशिम या असीम किसी भी नाम से बुलायें लेकिन मेरे नाम के पीछे कुछ ढूंढने की कोशिश मत करें।

Lalitha Vaidyanathan: The Many Facets of Annapoorna

Shifting to a new city brings it\’s own set of challenges. But when you are young and single living out of a suitcase is easy. A child\’s play if you continue to manage this with wife, kids the works. When Ranvijay Yadav and I were transferred from Delhi to Mumbai, I had no clue it eventually would become my karmabhoomi.

Soon after landing it was Hiral Vora\’s mother who treated us to awesome breakfast at her place. Hiral’s mother passed away recently and I will always have fond memory of her treating us to lip smacking Gujarati food.

The PTI guesthouse in Chembur was a two bedroom setup. With neither Ranvijay nor me remotely interested in cooking the kitchen was of no use. Or so we thought till we met our colleague Lalitha Vaidyanathan who had other plans.

She gave us her utensils and electric rice cooker to atleast cook something in case of emergency. We used them for couple of years when Samod Sarngan, Rahul Tawade and gang arrived. I will save the kitchen tales for some other day.

A science reporter of repute, Lalitha would always always have something to eat for the team members. The fluffy idlis won hands down. I don\’t remember how many times we had her tiffin while she ate something else.

When my younger sister Yashasvita was diagnosed with cancer in 2007, I had just started my second stint with PTI and I asked her for help. Lalitha not only ensured that no one less than the then Tata Memorial Hospital director Dr Dinshaw examined my sister but she also chased them for the report as it was a complicated case with my sister in advanced stage of pregnancy. So much so that when we visited hospital again the doctors requested to please ask Lalitha not to call the director for reports.

Though I am much junior to her, over the years we have become friends and we start from where we left last time. Lalitha would be after my life to write stories and I would promise but forget about it the moment she left.

Today as she celebrates her birthday, I thought what better way to wish her other than writing about her. She has so many inspiring stories to share and she still continues to be keen learner.

Many happy returns of the day doc.

दिल्ली के मौसम के मिज़ाज़ और कुल्फी की मीठी यादें

जब नवंबर में दिल्ली आया था तो यहाँ की सर्दी को लेकर थोड़ा सा चिंतित था। दिल्ली में पहले भी रह चुका था और उससे पहले भोपाल में था तो सर्दियों से परिचय काफी पुराना था और सच कहिए तो बारिश के बाद मुझे सर्दियां बहुत पसंद हैं। गर्मियों से ऐसी कोई नाराज़गी भी नहीं है लेकिन \’खाते पीते\’ घर से हैं तो शरीर गर्मी कम बर्दाश्त कर पाता है।

बहरहाल, सर्दियों की उस समय शुरुआत ही थी और एक दो दिन छोड़ दें तो पूरी सर्दी दिल्ली की सर्दी का इंतज़ार करते गुज़र गयी। जब मार्च खत्म होने को था तो मेरी सहयोगी प्रतीक्षा ने कहा आप गर्मी का इंतज़ार करिये। आपकी हालत खराब हो जायेगी। पंद्रह साल से मुंबई की उमस भरी गर्मी झेली थी और उससे पहले भोपाल की, तो लगा इसमे क्या है।

खैर जैसे जैसे गर्मी बढ़ती गयी प्रतीक्षा की बात सच होती गयी। उसपर सोने पर सुहागा वो घर जिसमें इन दिनों रह रहे हैं। वो है टॉप फ्लोर पर और पंखा चलाइये तो सही में आग बरसती है।

मुम्बई की उमसी गर्मी को छोड़ दें तो भोपाल की गर्मियों की यादें बड़ी ही मीठी हैं। सभी बुआओं का बच्चों समेत भोपाल आना होता और पूरी मंडली की धमाचौकड़ी चलती रहती। गर्मी उन दिनों भी रहती थी लेकिन पंखे से ही काम चलता था।

पहला कूलर जो गुलमर्ग नाम से था वाकई में बहुत ठंडक देता था। उस सेकंड हैंड कूलर की दो खास बातें और थीं। एक तो वो कभी कभार पानी भी फेंकने लगता लेकिन गर्मी थी तो कोई शिकायत नहीं करता। दूसरी बात थी उसकी बॉडी। आजकल तो सब फाइबर का है। गुलमर्ग की बॉडी खालिस लोहे की। चलते में हाथ लग जाये तो बस बदन नाच उठे। लेकिन तब भी एक कूलर में ही गर्मी कट जाती थी।

जो मीठी यादें कहा उसका एक और कारण है। कुल्फी। ठेले की कुल्फी जो भरी दोपहरी में खाई जाए। शुरू में फ्रिज तो था नहीं इसलिए खरीदो और खाओ। मस्ताना कुल्फी के नाम से वो ठेले वाला जब घंटी बजाता हुआ आता हम लोग दरवाज़े के बाहर। वैसी कुल्फी का स्वाद आज भी नहीं मिला। जब फ्रिज आया तो शाम के लिये कुल्फी रखी जाने लगीं। अब ये जगह आइस्क्रीम ने ले ली है।

प्रतीक्षा ने पहले से डरा रखा है कि जून और खराब होगा। लेकिन मुम्बई में तब तक बारिश शुरू हो चुकी होगी। इस बार मुम्बई की बारिश में भीगने का मौका कब मिलता है इसका इंतज़ार रहेगा।

माई-बाप संस्कृति के मारे ये नेता बेचारे

आमिर खान की जो जीता वही सिकंदर एक यादगार फ़िल्म है और इसके कई कारण भी है। पहले तो खुद आमिर खान। फिर फ़िल्म के गाने जो एक पीढ़ी के बाद अब दूसरी पीढ़ी की पसंद बन गए हैं। मगर उससे भी जो अच्छी बात उस फिल्म में थी वो थी भारत में व्याप्त माई बाप की संस्कृति का चित्रण।

आज जब बीजेपी के सांसद महोदय ट्रैन किस टाइम पर कहाँ आये इसका निर्देश देते हुए देखे गए तो मुझे इस फ़िल्म की याद आ गयी। आमिर खान जो एक बहुत अच्छे स्कूल में नहीं पढ़ते हैं पूजा बेदी को ये झूठ बोलकर की वो सबसे अच्छे स्कूल के छात्र हैं, अपने प्रेमजाल में फंसना चाहते हैं। ऐसा होता नहीं है और पोल खुलने पर पूजा बेदी उन्हें छोड़ एक बड़े घर के लड़के के साथ हो लेती हैं।

फ़िल्म में एक सीन है जिसमे आमिर खान आयशा झुलका के वर्कशॉप से गाड़ी लेकर भाग जाते हैं और रास्ते में उन्हें पूजा बेदी मिल जाती हैं। उनके दोस्त उन्हें पूजा बेदी के साथ देख उन्हें अन्नदाता मानते हुए कुछ बख्शीश मांग लेते हैं। आमिर खान भी एक रईस आदमी की तरह बर्ताव करते हैं और कुछ पैसे दे देते हैं।

अब आप ये सोच रहे होंगे कि आज मैं क्यों इस फ़िल्म के सीन बता रहा हूँ। दरसअल मैंने दिल्ली के बड़े बड़े बंगले देखे। जिसमे अलग अलग ओहदे पर बैठे हुए मंत्री व अधिकारी रहते हैं। उन मंत्री महोदय का भी बड़ा सा बंगला देखा जिन्होंने पिछले दिनों कहा कि वो भारतीय नौसेना के अधिकारियों को मुम्बई के पॉश इलाके में ज़मीन नहीं देंगे। किसी ने टिप्पणी करी की फिर मंत्रियों को भी वसई विरार जो कि मुम्बई से काफी दूर हैं, वहां जा कर रहें। यह संभव तो नहीं है क्योंकि राज नेताओं को सिर्फ जनता का सेवक होने का मौका मिलना चाहिए। असल में तो वो अपनी ही रोटियाँ सेकते रहते हैं।

दिल्ली के बंगलों को देख कर यही खयाल आया कि इतने बड़े बड़े ये बंगले जनता के सेवकों के लिये क्यों? कई बंगले तो इतने बड़े लगे कि भारत के कई छोटे छोटे गांव के गाँव उनमे रह सकते हैं। यह अलग बात है कि असली भारत के यह नागरिक कभी ऐसे घरों का आंनद नहीं ले पायेंगे।

लेकिन आज सांसद महोदय ने ये साबित कर दिया कि माई बाप संस्कृति भारत से कहीं नहीं जाने वाली। हम और आप उनके लिए घंटों गर्मी में रास्ता देने के लिए खड़े रहें वो अपनी एयरकंडीशनर वाली गाड़ी से फुर्र हो जायेंगे।

अपूर्व से यादगार मुलाक़ात – पहली और आखिरी

अपूर्व (मनु) से मुलाक़त उनका बारे में काफी किस्से सुनने के बहुत समय बाद हुई। और वो जो मुलाक़ात हुई वो यादगार बन गयी। मनु हमारी पीढ़ी के पहले सैनिक अधिकारी थे। मतलब जिनसे मेरा साक्षात मिलना हुआ। सुनते तो कइयों के बारे में थे कि वो ऑफिसर हैं लेकिन मिलना मनु से हुआ। शायद मनु ही परिवार के कई और बच्चों की प्रेरणा के स्त्रोत भी बने।

मनु जब पहली बार हमारे यहां आए थे तो उनकी बुआ की बेटी का तिलक लेके। भाइयों की फौज भोपाल में इकट्ठा हमारे ही घर हुई थी। हम सब तिलक लेकर गए और कार्यक्रम खत्म कर घर लौट रहे थे। उस रात बहुत तेज़ बारिश हो रही थी और हम सब बड़े चाचा की फ़िएट कार में घर लौट रहे थे।

आप में से जिनका कभी भोपाल जाना हुआ हो तो जानते होंगे कि भोपाल में सड़कें काफी उतार चढ़ाव वाली हैं। रात में बारिश काफी जोर से हो रही थी और सड़क पर पानी भरा हुआ था। सब लड़के मस्ती के मूड में और बारिश। बस गाड़ी दौड़ रही थी और ऐसे ही एक चढ़ाई के एन पहले रोड पर जमा हुए पानी से गाड़ी स्टाइल से निकाली गई। लेकिन ये क्या- चढ़ाई आधी ही चढ़ी थी कि गाड़ी बंद और लुढ़कने लगी वापस।

विवेक वर्मा जो आज भी ऑटो एक्सपर्ट हैं, काफी कोशिश करी की कार ज़िंदा हो जाये लेकिन सभी प्रयास असफल रहे। उन दिनों मोबाइल फ़ोन तो हुआ नहीं करते थे सो मदद कैसे मंगायी जाए इस पर विचार चल रहा था। सभी भाई जो तिलक के लिए तैयार होकर निकले थे कुछ देर में सड़क पर भीगते हुए कार को धक्का लगाते हुए वापस घर पहुंचे। वहाँ सबकी अच्छी ‘खातिरदारी’ हुई।

लेकिन इन सबके बाद भी मनु की आंखों में नींद नहीं। उन दिनों फुटबॉल वर्ल्डकप चल रहा था और मनु को देखना था मैच। बस चाय के साथ मनु मैच देखकर सोए। ये मेरी मनु से पहली मुलाक़ात थी। बीच में मनु की पोस्टिंग के बारे में सुनता रहता लेकिन मिलना नही हुआ।

जब माँ ने कल बताया कि मस्तिष्क ज्वर के कारण मनु नही रहा तो एक धक्का सा लगा और उस रात का वाकया फिर से आँखों के सामने आ गया। अब तुम उस और धमाल करोगे मनु, इसी विश्वास के साथ।

जीवन की सीख: रास्ते खुद ढूँढोगे तो कभी भटकोगे नहीं

फिल्मों में पुलिस कब से देख रहे याद नहीं। लेकिन पहली बार एकदम नज़दीक से पुलिस अफ़सर को देखा था तब मैं बहुत छोटा था। शायद भिलाई शहर था। ख़ैर उस समय ज़्यादा कुछ समझ में भी नहीं आता था। बस यही दिखता की सब सैल्यूट करते हैं।

जब थोड़े बड़े हुए तो पता चला वो जो पुलिस की वर्दी में हैं वो इन दिनों विदेश में हैं किसी केस के सिलसिले में। लौटने पर घर की बेटियों के लिए कुछ न कुछ अवश्य लाते। बीच में कई बार उनके यहां जाने का और रुकने का मौका मिला। जब छोटे शहर में पोस्टिंग थी तो बड़े बंगले मिलते। दिल्ली, जहां उन्होंने अपना सबसे अधिक समय बिताया, वहां आर के पुरम में रहते थे फिर बाद में मोती बाग़ इलाके में घर मिला।

इन मुलाक़ातों में ज़्यादा बातचीत नहीं होती। वो जितना पूछते उतने का ही जवाब। पढ़ाई में वैसे ही फ़िसड्डी तो बचते रहते कहीं उस से संबंधित कोई सवाल न पूछ लें। वो तो जब बारहवीं के बाद कुछ परीक्षा देने दिल्ली आये तब बचने का कोई उपाय ही नहीं था।

एक दिन सुबह तैयार होकर बोले चलो अपना एग्जाम सेन्टर देख लो कहाँ जाना है। लेकिन वहां से घर अपने आप आना पड़ेगा। दिल्ली के बारे में पता कुछ नहीं था और डर भी लगता था। मुझे कुछ सूझ ही नहीं रहा था और आँख से आँसू निकल पड़े। तब मुझे एक सीख उन्होंने दी – रास्ते खुद ढूँढोगे तो कभी भुलोगे नहीं।

ऐसे ही बहुत सी अनगिनत यादें हैं पूज्यनीय मामाजी की। उनका पूरा जीवन ही एक सीख है। पुलिस के सबसे बड़े ओहदे पर रहते हुए भी एकदम सादा जीवन। पढ़ने के बेहद शौक़ीन और भाषाओं के ज्ञानी। इसकी संभावना कम ही थी की आप उनसे मिलें और प्रभावित न हों। ये मेरे लिये निश्चित ही बहुत बड़े सौभाग्य की बात है कि उनको इतने करीब से जानने का मौका मिला। पिछले दिनों फ़िल्म रेड देखी तो उनकी बड़ी याद आयी। कुछ ऐसे ही थे मेरे मामाजी। परिवार में दोनों छोर के सरकारी अफ़सर देखे। एक तो मामाजी जैसे और दूसरे जो बड़े बडे घपले कर पैसे खा कर भी 56 इंच का सीना चौड़ा कर सामने रहते।

उनके व्यक्तित्व के बारे में, मेरे पत्रकारिता करियर में उनका योगदान और मज़ेदार किस्सा कैसे वो मेरे मामा बने फिर कभी। आज उनकी पुण्यतिथि पर सादर नमन।

आध्यात्म और विपासना की ओर

अध्यात्म में रुचि का कोई खास कारण तो याद नहीं पड़ता लेकिन पढ़ने के शौक़ ने थोड़ी बहुत जिज्ञासा जगाई। परिवार के लोग अलग अलग धर्म गुरुओं को मानते हैं और कहीं न कहीं उसका भी असर पड़ा। लेकिन घर में माहौल कुछ ऐसा नहीं था कि कोई किसी धर्म गुरु का ही पालन करे। इसलिए मैंने जब एक धर्म गुरु के प्रति अपनी रुचि दिखाई तो ऐसा माना गया कि हम भी मानने लगेंगे उन्हें। लेकिन ऐसा कुछ हुआ नहीं।

टीवी पर तो जैसे इन गुरुओं की बाढ़ सी आ गयी है। सुबह अगर आप सबको सुनने बैठ जाएं तो बाकी सभी काम छूट जाएं। विपासना के बारे में पहली बार PTI के मेरे सहयोगी रणविजय सिंह यादव से सुना था। इनके इगतपुरी सेन्टर के बारे में सुना था और वहीं जाने की इच्छा भी थी। लेकिन कोर्स हमेशा ही भरा रहता। पिछले वर्ष मुझे ये कोर्स संस्था द्वारा संचालित नवी मुम्बई के केंद्र में करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।

मुझे ये तो पता था कि ये मुश्किल होगा। दस दिन बिना किसी से बात किये, बाहरी दुनिया से कोई संपर्क नहीं, कुछ लिखना पढ़ना नहीं बस ध्यान करना। और खानपान भी एकदम सादा और शाम 6 बजे के बाद कुछ खाने को नहीं।
लेकिन वो दस दिन कमाल के थे। आपके आस पास लोग थे लेकिन आप उनसे बात नहीं कर सकते। किसी चीज़ की ज़रूरत हो तो कागज़ की पर्ची पर लिख दें। और जिस मोबाइल पर ये पोस्ट लिख रहा हूँ वही जिसपर जाने अनजाने हर पाँच मिनट में नज़र पड़ ही जाती है और फ़िर अगले 15 मिनट कुछ भी देखते हुए बीत जाते हैं, उसके बिना रहने का अनुभव।

आज भी उन दस दिनों के बारे में सोचता हूँ तो लगता है वो किसी और जन्म की बात है। उस कोर्स का कितना फ़ायदा हुआ? मैं एक बार फिर से उन दस दिनों की राह देख रहा हूँ। शायद यही उस कोर्स की सबसे बड़ी उपलब्धि है। अगर आपको कभी मौका मिले तो ज़रूर जाएं और दस दिन दीजिये अपने आपको।

उम्र के अलग अलग पड़ाव के अलग अलग दोस्त

बीते 14 फरवरी को ऑफिस में टीम के सदस्य ऐसे ही सबको गाने समर्पित कर रहे थे। किसी ने आयुष्मान खुराना और परिणीति चोपड़ा पर फिल्माया गया गाना माना कि हम यार नहीं ये तय है कि प्यार नहीं की फ़सरमेश करी। ये गाना पहले भी कई बार सुना था लेकिन उस दिन जब इसको सुना तो याद आये यार दोस्त।

कहते नही हैं ना कि दोस्त खास होते हैं क्योंकि बाकी रिश्तेदारों की तरह वो आपको विरासत में नहीं मिलते। उन्हें आप चुनते हैं। स्कूल के दोस्त, कॉलेज के दोस्त ऑफिस के दोस्त और वो आस पड़ोस वाले दोस्त जिनके साथ आप बड़े हुए हैं। इनमे से सबके साथ आपकी ट्यूनिंग अलग अलग होती है।

मैं ये मानता हूँ कि आपके दोस्त तो कई होते हैं लेकिन एक या दो ही ऐसे दोस्त होते हैं जो कि आपको समझते हैं और जिनसे आप कोई भी बात बिना झिझक कर सकते हैं। वो सभी बातें जो आप अपने बाकी सभी दोस्तों से नहीं कर सकते या परिवार के भी किसी सदस्य से नहीं। अंग्रेज़ी में इन्हें 3 AM दोस्त कहते हैं। मतलब आपको उन्हें रात के 3 बजे अगर फ़ोन करना हो तो सोचे नहीं और बस फ़ोन करदें। और दुसरी ओर जो व्यक्ति है वो भी ये ना सोचे कि क्या 3 बजे फ़ोन कोई फ़ोन करता है।

कॉलेज के दिनों में जय कृष्णन मुझे मिले और हमने कॉलेज के अपने छोटे से साथ का बहुत आनंद लिया। क्लास में बैठकर टेबल पीट पीट कर गाने गाना और फिल्में देखना। बहुत ही यादगार रहा जब तक जय ग्वालियर में होटल मैनेजमेंट पढ़ने नहीं चले गए। उसके पहले बीएचईएल की टाउनशिप में जय जहाँ रहते थे, उनके माध्यम से मेरी मुलाकात हुई सलिल से।

जय तो चले गए लेकिन सलिल से मेरी दोस्ती बढ़ती गयी क्योंकि हम लोग एक ही कॉलेज में थे जिसका पता मुझे बाद में चला। ज़्यादा किसी से बात नहीं करते थे लेकिन मेरी उनकी फ्रीक्वेंसी मैच कर ही गयी।

सलिल वही शख्स हैं जिनके बारे मैंने पहले एक बार लिखा था। जिन्हें मैंने भोपाल स्टेशन टाइम बेटाइम बुला कर परेशान किया और सलिल ने दोस्ती का फर्ज निभाते हुए और निश्चित रूप से घरवालों से डाँट खाते हुए ये फ़र्ज़ बखूबी निभाया। आज उनके जन्मदिन पर ढेरों बधाइयाँ और शुभकाननाएँ। और ये गाना भी उनके ही लिये।

एसिड हमले की शिकार लक्ष्मी से एक मुलाक़ात

महिला दिवस पर एसिड अटैक पीड़िता लक्ष्मी से मुलाक़ात हुई तो उन्होंने इस दर्दनाक घटना के बाद परिवार से मिले सहयोग और कैसे उनके माता पिता ने उनको प्रेरित किया कि वो एक आम ज़िन्दगी जी सकें इस बारे में बताया। उस समय जब लक्ष्मी अपने भविष्य के सपने बुनने में लगी हुई थीं तब किसी ने उनके इंकार का ऐसा बदला लिया। लेकिन माता पिता ने उनके साथ खड़े होकर, कंधे से कंधा मिलाकर इस लड़ाई में उनका साथ दिया।

माता-पिता की हमारे जीवन में एक खास जगह होती है। हमारे पहले शिक्षक और आगे दोस्त भी बन जाते हैं। हाँ पहले बच्चों और पिता के बीच संवाद कम होता था तो ऐसे दोस्ती नहीं हो पाती थी। लेकिन धीरे धीरे ये दूरियां भी कम हुई और अब दोनों अच्छे दोस्त बनते हैं या बनने की कोशिश करते हैं।

माता पिता किस परेशानी का सामना करते हैं अपने बच्चों को अपने से बेहतर ज़िन्दगी देने के लिए इसका एक साक्षात उदाहरण पिछले दिन देखने को मिला। एयरपोर्ट से घर जिस टैक्सी में आ रहे थे उसके ड्राइवर राजकुमार ने थोड़ी देर चलने के बाद पूछा कि अगर मैं आपको बीच में कहीं उतार दूँ तो चलेगा। टैक्सी ड्राइवर कभी ईंधन भरवाने के लिए बोलते हैं लेकिन बीच में उतारे जाने का प्रस्ताव पहली बार आया था। राजकुमार इस बीच दो तीन बार पानी पी चुके थे। बीच बीच में धीमी आवाज़ में फ़ोन पर बात भी कर रहे थे।

जब पूछा तो उन्होंने बताया उनकी चार वर्ष की बिटिया एक घंटे से नहीं मिल रही थी। जब मैंने ये सुना तो समझ नहीं आया कि उनसे क्या कहूँ। बोला तो सब ठीक होगा, कहीं खेल रही होगी। लेकिन बीते दिनों ऐसी घटनाएँ हुई हैं कि एक डर भी था। फिर भी मैंने उनसे बात करने की कोशिश जारी रखी। राजकुमार घबराये हुए थे। उनकी जगह मैं होता और अगर दूर होता तो पता नहीं कैसे बर्ताव करता। लेकिन राजकुमार की ड्राइविंग बढ़िया चलती रही।

मानखुर्द से वाशी की तरफ चलते हुए उन्होंने ये बताया था। तय हुआ मुझे वाशी उतार कर वो अपने घर चले जायेंगे। वाशी नाके के ऐन पहले फ़ोन आया और राजकुमार धीरे धीरे बात करते रहे। जब हम आगे बढ़े तो जहाँ मुझे उतारना था उस रास्ते से आगे निकल गए। मैंने उन्हें बोला तो उनका मुस्कुराता हुआ चेहरा ही मेरा जवाब था। बिटिया मिल गयी है। कहीं खेल रही थी। सब ठीक है।

लक्ष्मी के शब्दों में – हमारे माता पिता का जीवन ही हम सबके लिए बहुत बड़ी प्रेरणा है। बशर्ते हम उसके बारे में जाने और उनसे सीखें। राजकुमार की बिटिया की तरह शायद हम भी कितनी ही रातों या दिनों के बारे में अनजान रहते हैं जब घरवालों पर हमारी हरकतों के चलते पता नहीं क्या बीतती है। पूछेंगे तो पता चलेगा।

होली के नमूने और नमूनों की होली

होली हमारे घर में बड़ी ज़ोर शोर से मनाई जाती है। जब छोटे थे तब कोई भी माँ को रंग लगता तो बहुत रोना गाना होता था। भले ही लगाने वाले घर के जान पहचान वाले ही हों लेकिन उस समय जो झूमाझटकी होती उसे देख बड़ा गुस्सा आता। फिर सभी लोग किसी को उठा कर पानी की टंकी में डाल देते। धीरे धीरे समझ आया कि होली ऐसे ही खेली जाती है।

परिवार में त्यौहार बंटे हुए थे। होली हमारे घर ही होती थी। शायद इसका एक और कारण खेलने के लिए खुली जगह थी। परिवार में बहुत से जोड़ों की पहली होली हमारे घर पर ही खेली गई। जो नई बहू आती उन्हें अंदाज़ भी नहीं होता कि होली वाले दिन क्या होने वाला है।

इसकी शुरुआत होली जलने वाली रात से शुरू होती है। पूरा परिवार एक जगह इकट्ठा होता है और खाने पीने के बाद घर के बड़े सबका टीका कर रंग डालते हैं। इस पूरी रस्म का यही मतलब है कि आपको होली खेलने की अनुमति है। होली खेलने का एक दौर उसी समय हो जाता है। लेकिन अपने सारे चुनिंदा रंग, पेंट और न जाने क्या क्या, निकलता है अगले दिन। मैंने फ़ोटो कॉपी मशीन कि इंक से लेकर आलता तक सबका इस्तेमाल होते हुए देखा है।

रंगों से परे होली की जो दूसरी याद है वो है इस अवसर पर बनने वाले तरह तरह के पकवान। इस लिस्ट में चीज़े जुड़ती ही जाती हैं। और एक बार कुछ शुरू हुआ तो अगले साल पूछा जाता वो फलानी चीज़ इस बार नहीं है क्या? माँ के जिम्मे ही ये सारी चीज़ें बनाने का काम रहता। हम भाई बहन उनकी मदद कर देते।

जो गुजिया वो बनाती हैं उसका मसाला कुछ अलग ही होता हैं। लेकिन एक दो बार ऐसा हुआ कि मसाला पहले तैयार हो गया और जब गुजिया बनाने का समय आया तब तक वो मसाला खत्म हो गया। तबसे गुजिया सबसे आखिर में बनती हैं और रात में ये कार्यक्रम होता है जब सब सोने की तैयारी कर रहे होते हैं ताकि कुछ बचा रहे मिलने वालों के लिये।

होली की यादें भी बड़ी मज़ेदार। जैसे एक बार मैं किसी के ऊपर पानी डालने जा रहा था लेकिन फर्श पर फिसला और सारा पानी खुद के ऊपर। और वो कपड़े फाड़ होली। खेलते खेलते ये कब हुआ पता नहीं लेकिन उसी हालत में शहर घूमते रहे। और वो किसी गाने पर अजीब अजीब से नाचना।

जब 1 मार्च को ऑफिस से मुम्बई आने के लिये निकला था तो थोड़ा बहुत रंग गुलाल खेला था टीम के साथ। लेकिन उसके बाद जो धमाल हुआ है उसका नमूना घर पहुंच कर देखा। क्या करें। होली होती ही नमूना बनने के लिए। #असीमित #भोपाल #दिल्ली #मुम्बई#होली

परीक्षा की घड़ी और सालाना मिलने वाले दोस्त

कॉलेज में अटेंडेंस को लेकर ज़्यादा मुश्किल नहीं हुआ करती थी उन दिनों। इसलिये जब परीक्षा का समय आता तब पता चलता कि अरे क्लास में इतने सारे लोग हैं। नहीं तो नियमित रूप से कॉलेज की शक्ल देखने और दिखाने वाले कुछ गिने चुने ही रहते।

ऐसे ही सालाना मिलने वाले एक थे विजय नारायण। उनसे मुलाकात परीक्षा के समय ही होती थी। विजय कंप्यूटर का कोई कोर्स भी कर रहे थे और उनका घूमना फिरना भी काफी था। ग्रेजुएशन के समय विजय से इतनी ज्यादा बातचीत नहीं थी। हाँ उन्हें कुछ नोट्स वग़ैरह चाहिये होते तो मिल जाते थे।

जब पत्रकारिता का रुख किया तब लगा कि लिखने का काम किया जा सकता है। ऐसा इसलिये क्योंकि परीक्षा में जहां बाकी सब के लिए 22 पेज की कॉपी भरना मुश्किल होता था मैं उसके ऊपर 4-5 सप्लीमेंट्री शीट भी भर देता। बाहर निकल के सभी का एक ही सवाल रहता कि मैंने लिखा क्या है। खैर, जब रिजल्ट आता तो पता चलता कि मेरी मेहनत बेकार ही गयी। लेकिन मुझे किसीने बताया था कि कॉपी का वज़न मायने रखता है।

पाँच साल की कॉलेज की पढ़ाई में मैंने ये बात पूरी तरह फॉलो करी। हालांकि नंबर एक अलग ही कहानी कहते थे। बहरहाल विजय से घनिष्ठता फाइनल में आते आते हो गयी और परीक्षा की तैयारी साथ में करने लगे। हम सभी बाकी गतिविधियों में इतने व्यस्त रहते की साल कब निकलता पता ही नहीं चलता। और सिर पर जब परीक्षा आती तब सिलेबस की सुध ली जाती।

परीक्षा की तैयारी का रूटीन भी बिल्कुल फिक्स्ड। सोमवार की सुबह 7 बजे के पेपर की तैयारी रविवार शाम से होगी। सुबह 5.30 बजे तक पढ़ाई और उसके बाद जो होगा देखा जायेगा के इरादे के साथ कॉलेज पहुँच जाते। उसमे पहले पढ़ाई की कोई बात करना मानो घोर पाप था। लेकिन कॉलेज बिना अटके पास किया ऐसे ही पढ़ाई करके।

2007 ने सिखाया लड़ना ज़िन्दगी से और कैंसर से

साल 2007 ने सही मायनों में पूरी ज़िन्दगी बदल के रख दी। इसकी शुरुआत हुई थी अप्रैल के महीने में जब PTI से मुझे वापस मुम्बई के लिए बुलावा आया। सभी बातें मन के हिसाब से सही थीं तो एक बार फ़िर भोपाल को अलविदा कहने का समय आ चुका था। इस बार सीधे मुम्बई की ओर। जून में PTI जॉइन किया तब नहीं पता था कि एक महीने में क्या कुछ होने वाला है।

जब आपके सामने कोई विपत्ति आती है तो उस समय लगता है इससे बड़ी बात क्या हो सकती है। लेकिन जब आप उससे बाहर निकलकर कोई दूसरी विपत्ति का सामना करते हैं तब फिर यही लगता है – इससे बडी/बुरी/दुखद बात कुछ नहीं हो सकती। ये एक प्रक्रिया है जो चलती रहती है।

कैंसर के बारे में सुना था। परिवार में मौसी को था लेकिन ज़्यादा मालूम नहीं था क्योंकि उनका निधन तभी हो गया था जब मैं छोटा था। बाकी जो इस बीमारी का डर था उसका पूरा श्रेय हिंदी फिल्मों को जाता है। कुल मिलाकर कैंसर का मतलब मौत ही समझ आया था।

छोटी बहन यशस्विता दोबारा माँ बनने जा रही थी। ये खुशखबरी मई में आई थी। जुलाई आते आते ये खुशी मायूसी में तब्दील हो गई। उनके शरीर में कैंसर पनप रहा था और इसकी पुष्टि टेस्ट के माध्यम से हो गई थी। दिल्ली के डॉक्टर्स ने तो अगले ही दिन एबॉर्शन करवा कर कैंसर के इलाज की समझाईश दी।

भोपाल से मुम्बई आने का कोई प्लान नहीं था। 2005 में जब मुम्बई छोड़ा था तो नही पता था 2007 में वापसी होगी। जो मैंने 2017 में दिल्ली आकर पहली पोस्ट लिखी थी उसमें कहा था ये जीवन एक चक्र है। आज फिर वही बात दोहराता हूँ। जो होता है उसके पीछे कोई न कोई कारण होता है। कई बार कारण जल्द पता चल जाते हैं कई बार समय लग जाता है।

दिल्ली के डॉक्टर्स के ऐसा कहने के बाद ये निर्णय लिया कि मुम्बई के टाटा हॉस्पिटल में भी एक बार दिखाया जाये और फिर कोई निर्णय लिया जाए। इस उम्मीद के साथ कि शायद पहले टेस्ट की रिपोर्ट गलत हो, यशस्विता, बहनोई विशाल और भांजी आरुषि मुम्बई आ गए। मेरी उस समय की PTI की सहकर्मी ललिता वैद्यनाथन ने टाटा हॉस्पिटल में बात कर जल्दी मिलने का समय दिलवाया। लेकिन टाटा के डॉक्टर्स ने भी शरीर में कैंसर की मौजूदगी कन्फर्म करी।

जो पूरा समय एक होने वाली माँ के लिए खुशी खुशी बीतना चाहिए था उसकी जगह चिंता और निराशा ने ले ली थी। सभी एक दूसरे को हिम्मत दे रहे थे। लेकिन चिंता सभी के लिये ये थी कि आगे क्या होगा। इस पूरे समय यशस्विता जो शायद हम सबसे कमज़ोर स्थिति में थीं दरअसल हम सबको हिम्मत दे रही थीं। एक या दो बार ही मेरे सामने मैंने उन्हें कमज़ोर पाया। नहीं तो उनके लड़ने के जज़्बे से हम सबको हिम्मत मिल रही थी।

आज विश्व कैंसर दिवस पर सलाम है टाटा हॉस्पिटल के डॉक्टर्स को जो मरीज़ो की इस लड़ाई में हर संभव सहायता देते है और सलाम है यशस्विता जिन्होंने कैंसर से लड़ते हुए एक पुत्र को जन्म दिया और आज इस बीमारी से लड़ने की प्रेरणा बन गयी हैं।

हमारा जीवन और इन्टरनेट की क्रांति

मुम्बई में अगर आपके रहने और खाने का बंदोबस्त है तो इस शहर में रहना बहुत आसान है। रहने का बंदोबस्त PTI ने कर दिया था और खाने का हमने खुद। इस वजह से कुछ पैसा बचा और जब थोड़ा बहुत पैसा इकट्ठा कर लिया तो सोचा मोबाईल लिया जाए।

आज के जैसे उन दिनों फ़्री काल जैसी कोई चीज़ नहीं हुआ करती थी। और आपको दोनो इनकमिंग और आउटगोइंग दोनो के लिए पैसा देना पड़ता था। लेकिन मुझे टेक्नोलॉजी में शुरू से ही बडी रुचि रही है। इसलिए ये खर्चा कम और निवेश ज़्यादा लगा।

उसके बाद से तो जैसे रिलायंस ने मोबाइल क्रांति ले आया अपने धीरूभाई अंबानी ऑफर से। परिवार में सबने ये फ़ोन लिया और दिलवाया भी ये सोच कर की पैसा कम खर्च होगा। लेकिन उन्ही दिनों मेरी सगाई हुई थी तो बातों का सिलसिला काफी लंबा चला करता था। नतीज़न पैसे बचने की कोई उम्मीद सबने छोड़ दी थी सिवाय रिलायंस के। उन्हें तो मेरे जैसों ने ही खूब बिज़नेस कराया।

वो जो उठा पटक वाली बात मैंने एक पोस्ट में कही थी वो आज के इंटरनेट के बारे में थी। कंप्यूटर से मेरा साक्षात्कार बड़ी जल्दी हो गया था। जहां बाकी लोगों की तरह में भी उसमे पहले खेल खेलता था मेरा प्रयास यह रहता था कि कुछ और सीखने को मिल जाये। उस समय फ्लॉपी हुआ करती थी तो कुछ तिकड़म कर एक संस्थान का मासिक तनख्वाह का प्रोग्राम बना दिया।

उसके बाद आगमन हुआ इंटरनेट का। ये तो तय था ये कुछ बड़ा बदलाव लाएगा लेकिन कितना बड़ा इसका अंदाज़ा नहीं था। हाँ अपने उस समय के दोस्तों से मैं भी ये ज़रूर कहता कि एकदिन देखना सब ऑनलाइन मिलेगा। न अमेजान और न ही फ्लिपकार्ट के बारे में कुछ मालूम था। ये भी नहीं मालूम था कि एक दिन इसमें मेरा करियर बनेगा।

एक बड़ा तबका आज व्हाट्सएप और वीडियो देखने की क्षमता को ही इंटरनेट की बड़ी सफलता मानता है। लेकिन सही मायने में इसे इंटरनेट की जीत तब माना जायेगा जब उन लोगों के जीवन में एक ऐसा परिवर्तन लाए जिसकी कल्पना भी करना मुश्किल हो।

मुझे समय समय पर इस दिशा में कुछ करने का फितूर चढ़ता है और फिर वापस वही ढ़र्रे वाली ज़िन्दगी पर। हमको इस इंतज़ार का कुछ तो सिला मिले…

ज़िन्दगी का आनंद लें बेशक, बेफिक्र, बिंदास

फ़िल्म इंगलिश-विंगलिश में श्रीदेवी पहली बार अकेले विदेश यात्रा पर अपनी बहन के पास अमेरिका जाने के लिये हवाई जहाज से सफ़र कर रही होती हैं। अमिताभ बच्चन, जो उनके सहयात्री होते हैं उनसे पूछते हैं कि क्या वो पहली बार जा रहीं हैं और बातों बातों में एक अच्छी समझाईश उन्हें और हम सबको दे देते हैं।

\”पहली बार एक ही बार आता है। उसका भरपूर आनद लें। बेशक, बेफिक्र, बिंदास\”।

हम भी अपनी बहुत सारी पहली बातें याद रह जाती हैं। क्योंकि पहली बार की बात ही कुछ और होती है। ज़्यादातर ये मोहब्बत तक ही सीमित नहीं होती हैं। हाँ उसको याद रखने के बहुत सारे कारण हो सकते हैं। जैसे मुझे अपनी पहली तनख्वाह याद है और मैंने उसे कैसे खर्च किया ये भी।

ठीक उसी तरह मुझे हमेशा याद रहेंगे अपने पहले बॉस नासिर क़माल साहब। पत्रकारिता से दूर दूर तक मेरा कोई लेना देना नहीं था। इसकी जो भी समझ आयी वो उन्ही की देन है। चूंकि ये मेरी पहली नौकरी थी और अनुभव बिल्कुल भी नहीं था तो उनके लिए और भी मुश्किल रहा होगा। लेकिन उन्होंने एक बार भी ऊँची आवाज़ में बात नहीं करी और न मेरी लिखी कॉपी को कचरे के डब्बे में डाला।

उन दिनों टाइपराइटर पर लिखना होता था। वो उसी पर एडिट कर कॉपी को पढ़ने लायक बनातेे। वो खुद भी कमाल के लेखक। भोपाल के बारे में ऐसी रोचक कहानियाँ थीं उनके पास जिसका कोई अंत नहीं। कब वो बॉस से दोस्त बन गए पता नहीं चला। उनके जैसे सादगी से जीवन जीने वाले बहुत कम लोग देखें हैं।

भोपाल छुटा लेकिन हम हमेशा संपर्क में रहे। वो कुछ दिनों के लिये बैंगलोर भी गए लेकिन पत्रों का सिलसिला जारी रहा। बीच में एक ऐसा भी दौर आया कि मैंने पत्रकारिता छोड़ने का मन बना लिया और नासिर भाई को बताया। उन्होंने एक अच्छा ख़ासा ईमेल मुझे लिख कर समझाया और अपने निर्णय के बारे में पुनः विचार करने के लिये कहा।

आज उनका जन्मदिन है लेकिन वो मेरी बधाई स्वीकार करने के लिए हमारे साथ नहीं हैं। वो अपने जन्मदिन को लेकर भी थोड़े परेशान रहते। कहते सब लोग गांधीजी की पुण्यतिथि मना रहे हैं तो मैं कैसे अपना बर्थडे मनाऊं।

मुझे इस बात का हमेशा मलाल रहेगा कि उनसे मुलाकात नहीं हो पाई। लेकिन साथ ही इसका फक्र भी रहेगा कि उन्होंने मुझ जैसे को भी लिखना सीखा ही दिया। मेरी खुशनसीबी की नासिर भाई मुझे मेरे पहले बॉस के रूप में मिले।

जिस तरह अच्छी टीम बनती नहीं बन जाती है उसी तरह अच्छे बॉस मिलते नहीं मिल जाते हैं।

पद्मावत भव्य लेकिन एक जिस्म जिसमें जान नहीं

पिछले साल इन्हीं दिनों करणी सेना और उनके सदस्यों ने पद्मावती को लेकर हंगामा शुरू किया था। इतिहास में या रानी पद्मावती के बारे में बहुत ज़्यादा तब।भी नहीं मालूम था। बस इतना जानते थे कि ख़िलजी उनको देखना चाहते थे और पद्मावती ने अपने आप को आग के हवाले कर दिया था।

दिसंबर 2017 से जनवरी 2018 के बीच पद्मावती पद्मावत हो गयी और दीपिका पादुकोण की कमर को स्पेशल इफ़ेक्ट के साथ ढांक दिया गया। मेरा इतिहास की इस घटना के बारे में ज्ञान में इतने दिनों में कोई ज़्यादा इज़ाफ़ा नहीं हुआ। यूं कहें कि किया नहीं। बहरहाल, ये पोस्ट फ़िल्म के बारे में हैं तो उस पर वापस आते हैं।

फ़िल्म ख़िलजी से शुरू होती है और पद्मावती और रतन सिंह बाद में आते हैं। संजय लीला भंसाली अपनी फिल्मों की भव्यता के लिए जाने जाते हैं और पद्मावत उसी श्रृंखला की एक और कड़ी है। शायद यही उसकी सबसे बड़ी कमज़ोरी भी है। कहीं न कहीं क़िरदार भव्यता के चक्कर में पीछे छूट जाते हैं। ये फ़िल्म के लेखन की सबसे बड़ी विफलता कही जा सकती है।

इस फ़िल्म में भंसाली संगीत में भी कहीं चूक ही गये। घूमर देखने में अच्छा होने के कारण याद रह जाता है लेकिन बाकी गाने याद भी नहीं रह पाते। ये वही भंसाली हैं जिनकी ख़ामोशी और हम दिल दे चुके सनम के गाने आज भी पसंद किये जाते हैं।

बात करें अदाकारी की तो रनबीर सिंह सबको याद रह जाते हैं। लेकिन सही कहें तो इस किरदार में जिस पागलपन की ज़रूरत थी वैसे वो असल ज़िंदगी में हैं। दीपिका को रानी पद्मावती के जैसा सुंदर होना था लेकिन वो वैसी अलौकिक सुंदरता की धनी नहीं दिखती हैं। शाहिद कपूर रतन सिंह के रूप में थोड़े से छोटे लगते हैं।
अगर कोई मुझसे इसके लिए नाम सुझाने के लिए कहता तो मेरे लिए हृतिक रोशन होते रतन सिंह, रणबीर कपूर होते ख़िलजी और ऐश्वर्या राय बच्चन होतीं पद्मावती।

कुशल नेतृत्व आपके जीवन की राह बदल सकता है

फ़िल्म कयामत से कयामत तक में जूही चावला गुंडों से पीछा छुड़ाते हुए जंगल में गुम जाती हैं और जैसा कि फिल्मों में होता है उसी जंगल में आमिर खान अपने दोस्तों से बिछड़ जाते हैं। बात करते हुए जूही चावला बड़ी मासूमियत से आमिर खान कहती हैं “हम पर आप का बहुत अच्छा इम्प्रेशन पड़ा है”।

अपने इस छोटे से जीवन में ऐसे कितने लोग हैं जिनके लिए हम ये कह सकते हैं? हम बहुत से लोगों से मिलते जुलते हैं लेकिन उनमें से बहुत कम लोग आप के ऊपर अपनी छाप छोड़ जाते हैं।

कार्य के क्षेत्र में आपको ऐसे लोग मिलें तो इससे अच्छी बात क्या हो सकती है। ऐसे बॉस कम ही मिलते हैं जिन्हें आप याद तो करते हों लेकिन इसलिये क्योंकि आपको उनके साथ काम करने में आनंद आया। इसलिये नहीं कि उन्होंने आपको बहुत परेशान किया और जीना मुश्किल कर दिया – जैसा कि अक्सर लोग याद किया करते हैं।

जब मैंने 2010 में डिजिटल जर्नलिज्म में वापस कदम रखा तो ये सफ़र और इसमें जुड़ने वाले साथीयों का कुछ अता पता नहीं था। लेकिन कुछ ही महीनों में जिस कम्पनी के लिए काम कर रहा था उसमें कुछ बदलाव होना शुरू हुए और फिर एक दिन सीनियर मैनेजमेंट में बड़े बदलाव के तहत एक नए शख्स ने हमारे COO के रूप में जॉइन किया।

डिजिटल जर्नलिज्म उन दिनों बढ़ना शुरू हुआ था और ये एक बहुत ही अच्छा समय था इससे जुड़े लोगों के लिये। लेकिन ये जो बदलाव हुए कंपनी में इससे थोड़ी अनिश्चितता का दौर रहा। लेकिन अगर कुशल नेतृत्व के हाथों में कमान हो तो नौका पार हो ही जाती है।

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कुछ ऐसा ही रहा Sandeep Amar का उस कंपनी और मेरे जीवन में आने का असर। ऐसे बहुत से मौके आते हैं जब आप को पता नहीं होता कि ये किया जा सकता है लेकिन आप के आस पास के लोगों का विश्वास आपका साथी बनता है और आप कुछ ऐसा कर गुज़रते हैं जिसकी मिसाल दी जाती है। ठीक वैसे ही जैसे दंगल के क्लाइमेक्स में आमिर खान अपनी बेटी को समझा रहे होतें हैं। गोल्ड मेडलिस्ट की मिसाल दी जाती है।

बहुमुखी प्रतिभा के धनी संदीप से आप किसी भी विषय पर बात करलें आप को निराशा नहीं होगी। ओशो से लेकर सनी लियोन सभी पर कुछ कहने के लिये है। उनसे झगड़े भी बहुत हुए, कहा सुनी भी लेकिन फिर एक दोस्त की तरह बात फिर से शुरू। अगर आज मेरी डिजिटल जर्नलिज्म की समझ बढ़ी है तो इसका एक बहुत बड़ा श्रेय संदीप को ही जाता है। काम से अलग उनके साथ न्यूयॉर्क की यादगार ट्रिप आज भी यूँही एक मुस्कुराहट ले आती है।

संदीप मेरे फेसबुक पोस्ट लिखने से बहुत ज़्यादा खुश नहीं हैं लेकिन अगर आज मैं ये पोस्ट लिखकर उन्हें जन्मदिन की बधाई नहीं देता तो कुछ अधूरा सा लगता। जन्मदिन मुबारक संदीप सर।
और टैक्सी में ये गाना सुनते हुए क्या करें क्या न करें ये कैसी मुश्किल हाय, नमस्ते मुम्बई।

हमारी धारणाएं और सच

तुम्हारी सुलु देखने का मौका मुझे पिछले हफ्ते ही मिला। जब फ़िल्म रिलीज़ हुई थी तब देखने का प्रोग्राम किसी न किसी कारण से मुल्तवी होता रहा और फ़िल्म सिनेमा हॉल से उतर गई। फ़िल्म बहुत से कारणों से अच्छी लगी।

जो सबसे अच्छी बात लगी वो थी हम कैसे धारणाएँ बना लेते हैं। लोगों के बारे में, उनके काम के बारे में। अक्सर ये धारणाएँ गलत ही होती हैं क्योंकि हम अपनी धारणा सुनी सुनाई बातों के आधार पर बनाते हैं। किसी ने कह दिया कि फलां व्यक्ति तो बहुत बुरा है। बस हम ये मान बैठते हैं कि वो व्यक्ति वाकई में बुरा है। हमारा अपना व्यक्तिगत अनुभव कुछ नहीं है लेकिन हमने सुना और मान लिया।

फ़िल्म में विद्या बालन के किरदार को एक रेडियो जॉकी का काम मिल जाता है और वो देर रात का शो होता है। उनको सुनने वाले मर्द उनकी आवाज़ और अदा पर फ़िदा। चूँकि उनको सुनने वाले उटपटांग बाते करते हैं, सुलु के परिवार वालों को ये बात बिल्कुल नागवार गुज़रती है। उनका ये मानना है कि ये काम अच्छे घर की औरतें नहीं करतीं। लेकिन सुलु ने ऐसा कोई काम किया ही नहीं जिससे उनके परिवार को शर्मिंदा होना पड़े। लेकिन ये धारणा की ये काम बुरा है ये बात घर कर गयी है।

जैसे फ़िल्म इंडस्ट्री को हमेशा से ही एक बुरी जगह बोला गया है। लेकिन क्या ये उन सभी बाकी काम करने की जगह से वाकई में बुरी है? क्या और काम करने की जगहों पर वो सब नहीं होता जिसके लिए फ़िल्म इंडस्ट्री बदनाम है? क्या बाकी जगहों पर औरतों के साथ कोई अनहोनी घटना नहीं होती हैं? लेकिन फ़िल्म इंडस्ट्री के बारे में ये धारणा बन गयी है।

इसका एक कारण ये भी है कि फ़िल्म इंडस्ट्री और उनसे जुड़े लोगों के बारे में लिखा बहुत जाता है। लेकिन ये बातें सभी इंडस्ट्री के लिए उतनी ही सच और सही हैं। अगर हम अपने अनुभव के आधार पर भी किसी के बारे में कोई धारणा बनाते हैं तो भी वो सिर्फ हमारे ही लिए होना चाहिए। लेकिन हमारे आस पास के लोग भी हमारे इन विचारों से प्रभावित हो कर अपनी धारणा बना लेते हैं।

जैसे आमिर खान के बारे में ये कहा जाता है कि वो बहुत ज़्यादा हस्तक्षेप करते हैं और अपनी फिल्मों को डायरेक्ट भी करते हैं। अगर ये सही है तो विद्धु विनोद चोपड़ा जैसे निर्देशक उनके साथ दो फिल्में करते? आपने अगर नहीं देखी है तो ज़रूर देखें तुम्हारी सुलु।

दुनिया समझ रही थी कि वो नाराज़ मुझ से है,
लेकिन वो जब मिला तो मुझे सोचना पड़ा

चाय पर चर्चा कोई जुमला नहीं है

दिल्ली में इन दिनों कड़ाके की ठंड पड़ रही है। चूंकि मेरा इस ठिठुरती ठंड से सामना पूरे 15 साल के लंबे अरसे बाद हो रहा है तो और भी ज़्यादा मज़ा आ रहा है। ऐसी ठंड में अगर कोई आग जलाकर बैठा हो तो उसके इर्दगिर्द बैठने का आनंद कुछ और ही होता है। उसमें अगर आप एक कप गरमागरम कप अदरक की चाय और जोड़ दें तो ठंड का मज़ा कई गुना बढ़ जाता है।

चाय पीने के सबने अपने अपने तरीके होते हैं। कुछ लोग बिलकुल गरमागरम पतीली से निकली हुई चाय पसंद करतेे हैं तो कुछ उसको ठंडा कर पीना। दिल्ली के जिस इलाके में मैं इन दिनों रहता हूँ वहाँ कुल्हड़ में चाय पिलाने वाले कई ठिकाने हैं। सबका अपना अपना स्वाद है। हाँ वैसे सौंधी सौंधी खुशबू वाले कुल्हड़ नही हैं।

आजकल तो अजीबोगरीब चाय पिलाने वाले ठिकाने भी खुले हुए हैं जो पता नहीं कितनी ही विचित्र तरह की चाय पिलाते हैं। लेकिन जो स्वाद टपरी चाय का होता है वैसा कहीं नहीं। जब मुम्बई PTI में नाईट शिफ्ट हुआ करती थी तो अक्सर रात की आखिरी लोकल छूट जाती थी और रात ऑफिस में ही गुज़ारनी पड़ती थी।

मुझे शुरू से आफिस में सोना पसंद नहीं था। बस दो कुर्सी जोड़कर आराम से सुबह 4 बजने का इंतज़ार करते और पहली लोकल से चेम्बूर वापस। जिस समय मेरी घर वापसी होती उस समय बहुत से लोगों के दिन की शुरुआत हो रही होती। चेम्बूर स्टेशन के बाहर एक चाय बनाने वाला सुबह सुबह कमाल की चाय पिलाता। जब भी नाईट शिफ्ट से वापस आता तो उसके पास कभी एक तो कभी दो कप चाय पीकर फ्लैट पर वापस आता।

दिल्ली की सर्दियों में उसकी वो अदरक की कड़क चाय की आज ऐसे ही याद आ गयी। आपकी आदतें कैसे बदलती हैं चाय इसका अच्छा उदाहरण है। जैसे मेरी चाय का स्वाद मेरी पत्नी अब बखूबी समझ गयी है और मुझे भी कुछ उनके हाथ की चाय की ऐसी आदत लग गयी है कि कहीं बाहर जाते हैं तो वो जुगाड़ कर किचन से मेरी पसंद की प्याली मुझ तक पहुंचा देती हैं।

अगर आपने इंग्लिश विंग्लिश देखी हो तो उसमें श्रीदेवी अपनी चाय की प्याली और अखबार से सुबह की शुरुआत करती हैं। बहुत से घरों में ऐसा ही होता है। मैं ऐसे जोड़ों को जानता हूँ जो सुबह की पहली चाय का आनंद अखबार के पीछे नहीं बल्कि साथ में बैठ कर बातचीत कर लेते हैं। अगर चाय का प्याला हो और बातचीत न हो तो चाय का स्वाद कुछ कम हो जाता है। जैसे उस शनिवार की रात जनार्दन, आदित्य और मेरी बातचीत जो शुरू हुई चाय के प्याले पर और खत्म हुई गाजर के हलवे के साथ। चाय पर चर्चा कोई जुमला नहीं है!!!

समस्या हैं तो हल निश्चित रूप से होगा

पिछले दिनों जब सोनाक्षी सिन्हा और सिद्धार्थ मल्होत्रा की इत्तेफ़ाक़ रिलीज़ होने वाली थी तब शाहरुख खान और करन जौहर ने वीडियो पर ये अपील करी थी दर्शकों से की वो फ़िल्म का सस्पेंस नहीं बताएं। बात सही भी है। अगर सस्पेंस ही खत्म हो जाये तो फ़िल्म देखने का सारा मज़ा ही किरकिरा हो जाता है।

ठीक वैसे ही जैसे हमें अपने जीवन के सस्पेंस पता चल जाये तो क्या मज़ा आयेगा। कुछ भी हो अच्छा या बुरा, सही या गलत उसके होने का अपना एक अलग ही स्थान होता है अपने अनुभव की लिस्ट में।

खैर इत्तेफ़ाक़ की अपील से मुझे पिताजी द्वारा सुनाया गया एक किस्सा याद आया। वो भी उनके समय की बेहतरीन सस्पेंस फ़िल्म वो कौन थी से जुड़ा हुआ है। आज के व्हाट्सएप उस समय तो थे नहीं तो सस्पेंस कैसे बताया जाए? कॉलेज का नोटिस बोर्ड जो हम कभी कभार ही देखा करते हैं उसकी मदद ली गयी और किसी शख़्स ने वहां एक कागज लगा दिया जिसपर सिर्फ इतना लिखा था – भाईयों खूनी रमेश था। अब आप जाइये और वो कौन थी के गानों का आनंद लीजिये क्योंकि बाकी कहानी और उसके अंत में आपको अब कोई रुचि नहीं रहेगी।

कॉलेज के नोटिस बोर्ड से संबंधित एक घटना मेरे साथ भी हो गयी। MA प्रीवियस के इम्तिहान थे। साथ में नौकरी भी कर रहे थे। दूसरे पेपर के दिन तैयार होकर कॉलेज पहुँचे और अपना रूम तलाशने लगे जहां बैठकर पेपर लिखना था। लेकिन बोर्ड पर इस पेपर का कोई जिक्र ही नहीं। ऐसी कोई खबर भी नहीं थी कि पेपर आगे बढ़ गया हो।

किसी प्रोफेसर से पूछा तो पता चला पेपर तो दो दिन पहले ही हो चुका है। अब क्या करें? पिताजी की डाँट से बचने का कोई उपाय ही नहीं था। घर पहुँचे तो वहां पहले से ही किसी बात को लेकर हंगामा मचा हुआ था। मुझे एक घंटे में वापस देख सभी अचरज में थे। मेरे पुराने पढ़ाई के रिकॉर्ड से सभी वाकिफ भी थे। जैसे तैसे हिम्मत कर बता दिया कि आज होने वाला पेपर तो हो चुका है। उसके बाद अच्छा सा एक डोज़ मिला। समस्या का हल ढूंढा गया और मेरे अख़बार के सहयोगी की मदद से इसको सुलझाया गया।

एक गुरु मंत्र और मिल गया: समस्या हैं तो हल निश्चित रूप से होगा। बस थोड़े धैर्य के साथ ढूँढे। मिलेगा ज़रूर।

गुलज़ार से ग़ालिब तक

जो ये लंबे लंबे अंतराल के बाद लिखना हो रहा है उसका सबसे बड़ा कष्ट ये हो रहा है कि जब लिखने बैठो तो समझ नहीं आता कहाँ से शुरू करें। आज बात ग़ालिब और गुलज़ार साब की।

संगीत तो जैसे हमारे घर में एक सदस्य की तरह था। उन दिनों रेडियो ही एकमात्र ज़रिया था। और सारे घर ने अपना पूरा रूटीन भी उसके ही इर्दगिर्द बना लिया था। वैसे उस ज़माने में टेप भी हुआ करता था लेकिन बहुत से कारणों के चलते हमारे घर पर इसका आगमन हुआ बहुत समय के बाद। उन दिनों घर में किसी नई खरीदी का बड़ा शोर शराबा रहता था। तो जब वो फिलिप्स का two-in-one आया तो एक जश्न का माहौल था।

ग़ालिब से मुलाक़ात भी रेडियो के ज़रिए हुई। फ़िल्म थी मिर्ज़ा ग़ालिब और प्रोग्राम था भारत भूषण जी के बारे में। सिर्फ ये ना थी हमारी किस्मत याद रहा। लेकिन ग़ालिब से जो असल मुलाकात हुई वो गुलज़ार साब के बनाये मिर्ज़ा ग़ालिब, नसीरुद्दीन शाह द्वारा निभाया गया किरदार और जगजीत सिंह के संगीत के साथ। बस उसके बाद ग़ालिब के दीवाने हुए और होकर रह गए। सुने और भी कई शायर लेकिन ग़ालिब के आगे कोई और जँचा नहीं। या यूं कहें कि हमारी हालत का बयाँ ग़ालिब से अच्छा और कोई नहीं कर सका।

कई बार सोचता हूँ कि अगर गुलज़ार साब ये सीरियल नहीं बनाते तो क्या ग़ालिब से मिलना न हो पाता। ठीक वैसे ही जैसे कल जनार्दन और आदित्य से बात हो रही थी और हम तीनों अपने जीवन में अभी तक कि यात्रा को साझा कर रहे थे। आदित्य ने बताया कि उनके पास दो जगह से नौकरी के आफर थे और उनमें से एक PTI का था लेकिन उन्होंने दूसरा ऑफर लिया और इस तरह से उनसे मिलना हुआ।

जनार्दन से भी काफी समय पहले बात हुई थी लेकिन उस समय बात बनी नहीं। लेकिन अंततः वो साथ में जुड़ ही गये। शायद ग़ालिब से मुलाक़ात भी कुछ ऐसे ही होती। कोई और ज़रिया बनता और हमारी मुलाकात करवा ही देता। जैसे मैत्री ने करवाई थी मोहम्मद उज़ैर से। अगर गुलज़ार साब का शुक्रगुजार रहूंगा ग़ालिब से मिलवाने के लिये, मैत्री का रहूंगा मोहम्मद से मिलवाने के किये।

मोहम्मद बहुत ही कमाल के शख्स हैं और ये मैं इसलये नहीं कह रहा कि उन्होंने पिछली पोस्ट पढ़ कर मेरी तुलना प्रेमचंद और दिनकर से करी थी। फिल्मों को छोड़कर बाकी लगभग सभी विषयों की अच्छी समझ और पकड़। लेकिन जब प्रत्युषा बनर्जी ने अपने जीवन का अंत कर लिया तो मोहम्मद ही थे जिन्होंने फटाफट स्टोरीज़ लिखी थी। मुझे किसी मुद्दे के बारे में कुछ पता करना होता तो मोहम्मद ही मुझे बचाते। अब वो एक नई जगह अपने हुनर का जादू बिखेरेंगे।

ठीक वैसे ही जैसे रात के सन्नाटे में जगजीत सिंह अपनी आवाज़ में ग़ालिब का जादू बिखेर रहे हैं।

देखिए पाते हैं उश्शाक़ बुतों से क्या फ़ैज़
इक ब्राह्मण ने कहा है कि ये साल अच्छा है।

हमें ऐसे ही गुलज़ार मिलते रहें और ज़िन्दगी ऐसे ही गुलज़ार करते रहें।

असीमित संभावनाओं से भरा हुआ हो २०१८

जब आप कोई काम रोज़ कर रहे हों और अचानक वो बंद करदें तो फिर से शुरुआत करने में थोड़ी मुश्किल ज़रूर होती है। मेरी हालत उस बहु जैसी है जो कुछ दिनों के लिए मायके होकर आयी है और ससुराल लौटने पर वही दिनचर्या उसका इंतज़ार कर रही है। लेकिन अच्छी बात ये है कि आज साल का लेखा जोखा लिया जा रहा है और इसी वजह से मेरे लिए यादों के इस काफ़िले को आगे बढ़ाना थोड़ा आसान हो गया है।

1 जनवरी 2017 के बाद इस साल जो बहुत कुछ घटित हुआ इसका न तो कोई अनुमान था न कोई भनक। कुछ बहुत अच्छी बातें हुईं इस साल। जो कुछ मन माफिक नहीं हुआ उसको मैं इसलिए बहुत ज़्यादा महत्व नहीं दे रहा क्योंकि इस साल बहुत लंबे अंतराल के बाद मैंने लिखना शुरू किया। मेरे लिए इससे बड़ी उपलब्धि कोई नहीं है। और ये इस साल की ही नहीं पिछले कई वर्षों की उपलब्धि कहूँगा।

ये की मैं ये पोस्ट मुंबई में नहीं बल्कि दिल्ली में बैठ कर लिखूंगा इसके बारे में दूर दूर तक कुछ नहीं मालूम था। आज जब ये लिख रहा था तो ये खयाल आया कि अगर ये मालूम होता तो क्या मैं कोई जोड़ तोड़ करके मुम्बई में ही बना रहता और दिल्ली के इस सफ़र पर निकलता ही नहीं। शायद कुछ नहीं करता क्योंकि अगर यहां नहीं आता तो कलम पर लगे बादल छंट नहीं पाते और विचारों का ये कारवाँ भटकता ही रहता। ये नहीं कि इसको मंज़िल मिल गयी है, लेकिन एक राह मिली जो भटकते मुसाफिर के लिये किसी मंज़िल से कम नहीं है।

पीछे मुड़ के देखता हूँ तो हर साल की तरह ये साल भी उतार चढ़ाव से भरा हुआ था। और सच मानिये तो अगर ये उतार चढ़ाव न हों तो जीवन कितना नीरस हो जाये। जो कुछ भी घटित हुआ मन माफ़िक या विपरीत, कुछ सीखा कर ही गया। हाँ इस साल बहुत नए लोगों से मिलना हुआ। कुछ बिल्कुल नए और कुछ पुराने ही थे जो नए लिबास में सामने आए। वैसे मुझे ये मिलने जुलने से थोड़ा परहेज़ ही है क्योंकि अक्सर मैं सच बोल कर सामने वाले को शर्मिंदा कर देता हूँ और बाद में खुद को कोसता हूँ कि क्यों अपनी ज़बान को लगाम नहीं दी।

वैसे ऐसी ही समझाईश मुझे फेसबुक पर लिखने के लिए भी मिली। क्यों मैं गड़े मुर्दे उखाड़ रहा हूँ। क्यों मैं चंद लोगों की लाइक के लिए ये सब कर रहा हूँ। हाँ ये सच है लिखने के बाद देखता हूँ कि प्रतिक्रिया क्या आयी लेकिन उसके लिए लिखता नहीं हूँ।

तो बस इसी एक प्रण के साथ कि इस वर्ष कलम को और ताक़त मिले और बहुत सी उन बातों के बारे में लिख सकूँ जो बताई जाना जरूरी हैं, आप सभी को नूतन वर्ष की ढेरों शुभकामनाएं। हम सभी के लिए है 2018 कें 365 दिन जो भरे हुए हैं असीमित संभावनाओं से।

घर जाने की बात ही कुछ और

उस दिन जब शाम को एयरपोर्ट के लिए निकल रहा था तो टीम की एक मेम्बर बोलीं देखिए चेहरे की रौनक। लगता है घर जा रहे हैं। पता नहीं ऐसा क्या हो जाता है जब घर जाने का मौका आता है एक अलग ही उत्साह। जब PTI से दौड़ते भागते ट्रेन पकड़ता था 18 साल पहले तब भी और आज जब ट्रैफिक जाम से लड़ते हुए टैक्सी से एयरपोर्ट जाता हूँ तब भी।

दरअसल ये कहना ये खुशी घर जाने के कारण है सही नहीं है। घर तो यहाँ भी है दिल्ली में जिसमे मैं इन दिनों सोने जाता हूँ। ये असल में घरवाले हैं जो घर को रहने लायक बनाते हैं। फिर हम चाहे 2 कमरे के फ्लैट में हों या एक बड़े बंगले में।

वैसे बंगले में रहा नहीं हूँ तो इसलिए ज़्यादा नहीं जानता वहां रहना कैसा होता है। पला बढ़ा सरकारी घर में जो बहुत बड़े तो नहीं थे लेकिन उसमें रहते हुए ही परिवार की कई शादीयाँ हुई। मेहमानों से घर भरा हुआ है लेकिन सब मज़े में और आराम से। आज जब शादी में जाना होता है तो सबके अलग अलग कमरे हैं और सब किसी रस्म के दौरान या खाने पीने के समय मिल जाते हैं। खैर इस पर कभी और।

एक परिचित को किसी ने अपना नया घर देखने के लिए बुलाया। उन्हें बोला गया उस घर में अलग क्या होगा। ऐसी ही दीवारें होंगी, ऐसे ही खिड़की दरवाज़े होंगे। कोई ज़रूरत नहीं जाने की। अब ये बात भले ही मज़ाक कही हो लेकिन है तो सच। ईंट पत्थर की दीवारें होती हैं। घर तो घरवालों से बनता है। आप आलीशान घर में चले जाइये। सारी सुख सुविधाओं से लैस। लेकिन सुकून दूर दूर तक नहीं। और एक कमरे का घर आपको इतनी शांति देता है।

एक समय था जब ये गूगल देवी आपको अपने या किसी और के घर का रास्ता नहीं बता रही होतीं थी। तब घर ढूँढने के अलग मज़े थे। पता पूछते हुये कुछ ऐसे ही बातचीत हो जाती और चाय पीते पिलाते आप के नए दोस्त बन जाते। अब गूगल देवी तो आपको घर के बाहर तक छोड़ती हैं तो ऐसी चाय का मौका नहीं मिलता।

अगर मैं ये कहूँ की इस बहाने लड़की भी देख ली जाती थी तो? किसी का घर ढूँढने के बहाने लड़की देखी भी गयी और शादी पक्की भी हुई। परिवार में किसी की शादी की बात चल रही थी लेकिन लड़के ने ये ज़िम्मेदारी अपने परिजनों को दी। चूँकि बार बार लड़की के घर जाने पर ऐतराज़ था तो पता पूछने के तरीके को आज़माया गया। हाँ ये सुनिश्चित किया गया कि लड़की की फ़ोटो ध्यान से देखकर जाएँ जिससे कोई गड़बड़ न हो। आखिर ज़िन्दगी भर की बात है।

ऐसा कहते हैं मोबाइल ने दूरियों को मिटा दिया है। लेकिन जो मज़ा आमने सामने बैठ कर गप्प गोष्ठी करने में है वो वीडियो चैट में कहाँ। शायद उस दिन चेहरे की रौनक यहीं बयान कर रही थी।

बस एक घर की तलाश है

दिल्ली आए हुए जल्द ही एक महीना हो जाएगा और शुरुआत हो गयी है एक घर की तलाश। जब मैं पहली बार दिल्ली और उसके बाद मुम्बई गया तो दोनों जगह PTI के गेस्ट हाउस में रहने का इंतज़ाम था। मुम्बई में घर ढूंढ़ने की नौबत काफी समय बाद आई। अब यहाँ पर समय कम है और दिल्ली की ठंड में रहने का ठिकाना ढूंढना है। वैसे मोबाइल ने बहुत सारी चीज़ें आसान कर दी हैं। जैसे घर की आप अपनी जरूरत को किसी वेबसाइट पर पोस्ट कर दें उसके बाद फोन पर फोन का जवाब देने के लिये तैयार हो जायें।

महानगरों में घर मिलना कोई मुश्किल नहीं है। बस आपके आफिस के पास ही नहीं मिलता। खुशनसीब हैं वो जिन्हें इन दौड़ते भागते शहरों में ऑफिस के पास रहने का ठिकाना मिल जाता है। मेरी तालाश भी कुछ ऐसी ही है। जब तक आप को एक जगह से दूसरी जगह नहीं जाना हो तब तक इस पूरे मामले का सिरदर्द समझ में नहीं आता है।

घर अच्छा हो, सोसाइटी अच्छी हो, सभी चीजें आसपास हो, बिजली पानी की सुविधा हो। हमारे बहुत सारे मापदंड होते हैं जिनका की हमें अंदाज़ा भी नहीं होता जब तक हम या तो अपने रहने की या काम करने की जगह नहीं बदलते। मुम्बई में तो हालत ऐसी है कि अगर वर वधु अलग अलग ट्रैन लाइन्स पर रहते है तो रिश्ता ही नहीं करते। ये सब मैंने सुना तो था लेकिन ऐसे कई उदाहरण देखने को मिले उसके बाद लगा कि सचमुच् ऐसा ही है।

ऐसे में सवाल उठता है कि क्या मुम्बई के लड़के, लडक़ी दूसरे शहर में शादी ही नहीं करते? और कभी शादी के बाद वेस्टर्न लाइन से सेंट्रल लाइन शिफ्ट होना पड़े तो क्या वकीलों की सेवाएँ ली जाएंगी?

इतने दिन हो गए दिल्ली में लेकिन मुलाकात किसी से भी नहीं हो पाई है। हर हफ्ते हज़रत निज़ामुद्दीन पहुँच जाते हैं और फ़िर निकल पड़ते हैं एक और यात्रा पर। इन यात्राओं के अपने मज़े हैं और अपना एक सुररूर बिल्कुल वैसा जैसा मुझे महसूस हुआ जब मुम्बई में हमारी नज़रें पहली बार मिली थीं। भोपाल से दिल्ली फिर मुम्बई लगता है जैसे इस दिल का सफ़र अभी बहुत बाकी हैं।

भोपाल के प्रति मेरा प्यार

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मैंने सिर्फ शहर बदला था और मेरा भोपाल के प्रति मेरा प्यार और गहरा हो रहा था। परिवार और दोस्त सब वहीं थे इसलिये जब भी मौका मिलता भोपाल की तरफ़ दौड़ पड़ता। ऐसा अमूमन हर महीने ही होता था। आजकल की ईमेल जनता के लिए ये बड़े अचरज की बात होगी कि उन दिनों हम एक दूसरे को पत्र लिखा करते थे।

कुछ पत्र लंबे होते थे जो 3-4 पेज के होते थे और ज़्यादातर अंतर्देशीय पत्र हुआ करते थे। आज भी उन संभाल के रखे पत्रों के साथ कभी कभार एक यादों की यात्रा पर निकल पड़ते हैं। कभी हंसी आती है उन बातों पर जो अब बचकानी लगती हैं तो कभी उन कागज़ पर उमड़े हुए जज़्बात आंखे नम कर जाते हैं।

ये पत्रों का सिलसिला जो दिल्ली से शुरू हुआ था वो मुम्बई में भी चलता रहा। हाँ मुम्बई में पत्रों को पहुंचने में समय लगता था। फ़ोन ज़्यादातर अभी भी लैंडलाइन ही हुआ करते थे। लेकिन पत्रों का मज़ा उन फ़ोन कॉल्स में कहां जब आपकी नजर सिर्फ डिस्प्ले स्क्रीन पर बढ़ते हुए पैसे की तरफ रहती थी।

PTI गेस्टहाउस में एक फ़ोन दे रखा था और बहुत तेज़ आँधी बारिश के बाद भी वो काम कर रहा था। नहीं मैं उसको हर घंटे चेक नहीं कर रहा था बल्कि सुबह सुबह फ़ोन आ गया। बारिश के चलते कोई नहीं आया है आप दोनों फौरन पहुँचे। यहाँ दूसरे शख्स हैं रणविजय सिंह यादव। इनके बारे में फ़िर कभी। इसके पहले की ये बताया जाए कि यही मजबूरी हमारी भी है, बताया गया बस चल रही है और उससे आप ऑफिस पहुंच सकते हैं।

एजेंसी में काम कभी रुकता नहीं है और आपको अपने उपभोक्ताओं को समाचार देना है। बस यही एकमात्र उद्देश्य रहता है। चेंबूर में घर के नीचे से ही बस मिलती थी तो तैयार होकर पहुँच गए बेस्ट के इंतज़ार में। बस आयी औऱ उसमे बैठ गए। ये पता था समय लगेगा लेकिन कितना ये नहीं पता था।

आगे जो नज़ारा देखा वो काफी डरावना ही था। प्रियदर्शिनी पार्क के कुछ पहले पानी जमा था और ड्राइवर काफी सावधानी पूर्वक चलाते हुए जा रहा था। थोड़ी देर में पानी बस की सीढ़ियों तक पहुँच गया था। ये सब पहले देखा नहीं था हाँ एक बार भोपाल में ऐसी ही बरसात में कार पानी में चलाई थी और वो बीच रोड पर बंद हो गयी थी। गनीमत है मुम्बई में दिन था लेकिन अगर ये बस भी बंद हो गयी तो?

खैर सही सलामत आफिस पहुँच गए जहां ढेर सारा काम हमारा इंतज़ार कर रहा था। कितने दिन तक ऑफिस में ही रहे इसकी कुछ याद नहीं लेकिन मुंबई की बारिश के बारे मे अब नज़रिया बदल गया था। लेकिन आज भी ये मानता हूँ कि दिल्ली की सर्द सुबह और मुम्बई की बारिश का कोई मुकाबला नहीं है।

इतने सालों से मुम्बई की बारिश का आनंद लिया है अब है समय दिल्ली की सर्दियों का लुत्फ उठाने का।

पत्रकारिता के सफर की शुरुआत

दिल्ली से जो मेरा पत्रकारिता का सफर शुरू हुआ था उसकी नींव भोपाल में पड़ी थी। कॉलेज करने के बाद PG करने का मन तो नहीं था लेकिन LLB नहीं कर पाने की वजह से MA में दाखिला ले लिया। लेकिन दो घंटे के कॉलेज के बाद समय ही समय होता था। संयोगवश वहीं से प्रकाशित दैनिक में आवयश्कता थी और मैंने अर्ज़ी भेज दी और चुन भी लिया गया।

जिस समय मैं इस फील्ड को समझ रहा था उस समय भी इसका आभास नहीं था कि एक दिन में इसे बतौर करियर अपनाऊंगा। उस समय इसका सिर्फ एक उद्देश्य था -समय का सदुपयोग। पता नहीं कैसे धीरे धीरे मुझे पत्रकारिता रास आने लगी और आज इतना लंबा सफर गुज़र गया जो लगता है जैसे कुछ दिन पुरानी बात ही हो।

डॉ सुरेश मेहरोत्रा मेरे संपादक थे और नासिर कमाल साहब सिटी चीफ। अगर आज मैं इस मुकाम पर हूँ तो इसका श्रेय इन दो महानुभाव को जाता है। मुझे अभी भी याद मेरी पहली बाइलाइन जो कि पहले पन्ने पर छपी थी। आज के जैसे उन दिनों बाइलाइन के लिए बड़े कठोर नियम हुआ करते थे। बाइलाइन का मतलब उस स्टोरी को किसने लिखा है।

पहली बाइलाइन स्टोरी वो भी फ्रंट पेज पर। खुशी का ठिकाना नहीं। स्टोरी थी मध्य रेल के अधिकारी के बारे में और उनके एक वक्तव्य को लेकर। स्टोरी छपी और दूसरे दिन मुझे ढूंढते हुए कुछ लोग पहुँचे। उनकी मंशा निश्चित रूप से मुझे अपने परिवार का दामाद बनाने की नहीं रही होगी और मैं खुश भी था और डरा हुआ भी। खैर उनसे आमना सामना तो नहीं हुआ लेकिन छपे हुए शब्दों का क्या असर होता है उसको देखा।

डॉ मेहरोत्रा ने हमेशा हर चीज़ के लिये प्रोत्साहित ही किया। नहीं तो इतनी जल्दी से विधानसभा पर कवरेज, मंत्रालय बीट आदि मिलना बहुत ही मुश्किल था।

नासिर कमाल साहब कब बॉस से दोस्त बन गए पता नहीं चला। मामू, नासिर भाई के नाम से हम सब उन्हैं प्यार बुलाते थे। उनके काम करने अंदाज एकदम अलग। ओर बिना किसी शोर शराबे के सारा काम आराम से हो जाया करता था। और भोपाल के इतिहास के उनके पास जो किस्से थे वो कभी किताब की शक्ल ले ही नहीं पाये।
आज अगर कोई मुझे अच्छे बॉस होने के श्रेय देता है तो मैं कृतज्ञता प्रकट करता हूं डॉ मेहरोत्रा और नासिर क़माल साहब के प्रति। और धन्यवाद देता हूँ उन सबको जिनके चलते मुझे ऐसे सुलझे व्यक्तित्व के धनी दो व्यक्ति मिल गए अपने शुरुआती में। #असीमित #भोपाल #दिल्ली

बड़े होकर भी बनाये रखें बचपना

बचपन से मुझे हवाई जहाज देखने और उनके बारे में जानकारी इकट्ठा करने का बड़ा शौक़ था। जो छोटे छोटे मॉडल होते थे उनको भी में उतनी ही कौतूहलता से देखता जितना कि एक सामने खड़े हुए विमान को। परिवार में दो रिश्तेदार विमान सेवा का उपयोग करते और जब भी संभव हो में एयरपोर्ट जाने की भरपूर कोशिश करता। जितना करीब से देखने को मिल जाये उतना ही मन आनंदित हो उठता।

आसमान में उड़ते हुए छोटे से हवाई जहाज को खोज निकलना एक मजेदार खेल है जो में आज भी खेलता हूँ। कहीं न कहीं हम जब बड़े हो जाते (उम्र में) तो हमारे व्यवहार में भी वो उम्र छलकने लगती है। लेकिन मेरा ऐसा मानना है कि हमें अपना बचपना बनाये रखना चाहिए।

आज जब मुम्बई से दिल्ली वापसी के लिए एयरपोर्ट पर बैठा फ्लाइट का इंतज़ार कर रहा था तो अपनी पहली फ्लाइट याद आ गयी जो मुम्बई के एयरपोर्ट से ही थी। मैं अपने जीवन में पहली बार प्लेन में चढ़ा 2003 के अक्टूबर महीने में। वो छोटी सी फ्लाइट एक समाज सेवी संस्था द्वारा आयोजित की गई थी ज़रूरतमंद बच्चों के लिए। मुम्बई से शुरू और मुम्बई पर खत्म।

पहली फ्लाइट होने के कारण तो याद है ही, लेकिन इसलिए भी याद है कि मुंबई की गर्मी में एयरपोर्ट के अंदर की ठंडक श्रीनगर का एहसास करा रही थी। मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ कि इतनी ठंड में कर्मचारी काम कैसे करते हैं। असलियत पता चली की मैं बहुत तेज़ बुखार से पीड़ित था और अगले कुछ दिन घर पर आराम कर गुज़ारे।

जब तक प्लेन में बैठे नहीं थे तब तक बड़ा आश्चर्य होता कि ये उड़ते कैसे हैं। रही सही कसर फिल्मों ने पूरी करदी। फिल्मों ने हमारी सोचने की शक्ति को भ्रष्ट कर दिया है। लेकिन आप आज अगर एयरपोर्ट जाएँगे तो देखेंगे समाज के हर तबके के लोग हवाई यात्रा का आनद ले रहे हैं।

लेकिन बर्ताव में ट्रेन या प्लेन के यात्रियों में कोई फर्क नहीं है। आज जब फ्लाइट लेट हुई तो यात्री एयरलाइन स्टाफ़ से लड़ने पहुंच गए और थोड़ी दिन बाद थक हार कर वापस पहुँच गए अपनी सीट पर। हाँ अब बहस थोड़ी अच्छे स्तर की होती है।
लेकिन उस बहस का क्या जिसके कोई मायने तो नहीं हैं लेकिन उसको करने में मज़ा भो बहुत आता है?

चन्दर, सुधा और गुनाहों का देवता

मोहब्बत का खयाल ही अपने आप में बहुत रोमांचित महसूस कराता है। अपने आसपास बहुत से लोगों को इस एहसास से गुज़रते हुए देखा और आज भी देख ही रहा हूँ। पर वैसी मोहब्बत कम ही देखने को मिली जैसी सुधा और चन्दर की थी। ये दो नाम भले ही एक कहनी के पात्र हों लेकिन मैंने इन्हें देखा है बहुत करीब से। कई बार तो लगता है मैं ही चन्दर हूँ लेकिन मेरी सुधा बदलती रही।

बचपन से घर में किताबों से भरी अलमारी अपने आसपास देखी हैं और उन्हें पढ़ा भी। घर का माहौल ऐसा था कि कोई न कोई मैगज़ीन आती रहती थी। अच्छी आदत ये पड़ गयी कि पढ़ने पर कोई रोक टोक नहीं थी। सभी लोग इसमे शामिल थे। मेरी इस आदत का पूरा श्रेय पिताजी को जाता है। किताबों के लिए कभी मना नहीं किया। हाँ ये ज़रूर है कि मैंने इतने मनसे कभी अपनी पढ़ाई की किताबों को भी नहीं पढ़ा जितना घर में फैली हुई इन किताबों को।

लोग कितना पढ़ने में तल्लीन रहते थे इसका भी एक किस्सा है। घर की सदस्य एक नॉवेल पढ़ने में मगन थीं कि अचानक कोई मेहमान आ गया। अब जैसा उन दिनों का चलन था उनसे बोला कि आप अंदर बैठकर पढलें कोई आया हुआ है। उन्होंने कान से ये बात सुनी और किताब पढ़ते हुए ही चलना शुरू कर दिया और धम्म से मेहमान के बगल में जा बैठीं। वो तो थोड़ी ऊंची आवाज़ उनके कानों में पड़ी तब उन्हें एहसास हुआ कि कुछ गलती हो गयी है।

किताबें आपको अपनी एक अलग दुनिया में ले जाती हैं। ऐसी ही एक किताब मुझे पढ़ने को मिली याद नहीं कब लेकिन छोड़ गई एक अमिट छाप। धर्मवीर भारती की गुनाहों का देवता। बहुत ही अद्भुत किताब है बावजूद इसके की पढ़के आपके आंसू बहने लगते हैं और कुछ दिनों तक आप पर इसका प्रभाव रहता है। लेकिन साथ रह जातें हैं इसके किरदार।

इस किताब के प्रति मेरा इतना प्यार शायद फ़ोन वाली घटना से प्रेरित होगा। लेकिन इसकी संभावना बहुत कम है क्योंकि एक मुलाकात से इसका फैसला करना कि आप एक दूसरे के लिये बने हैं थोड़ा मुश्किल लगता है। कॉलेज के दौरान कई दोस्तों को इस पचड़े में पड़ते देखा। लेकिन थोड़े दिन बाद पता चलता कि अब दोनों की ज़िंदगी में कोई और है। कुछ इसका अपवाद रहे और वो शादी के बंधन में बंध भी गए।

ऐसी ही एक कहानी थी एक मित्र जो अपने सबसे करीबी दोस्त के परिवार की सदस्य को अपना दिल दे बैठे। मुश्किल ये थी कि इज़हारे मोहब्बत करते तो दोस्ती टूटने का खतरा और उससे भी बड़ी समस्या ये की सामने वाला आपके बारे में क्या खयाल रखता है इसका कोई अतापता नहीं। उन्होंने दोस्ती के लिये प्यार कुर्बान कर दिया। लेकिन उनके टूटे हुए दिल की दास्तां मैंने कई शाम सुनी। कई बार सुना कि कैसे किसकी मुस्कुराहट का जादू होता है और कैसे कोई आंखों से छलकते हुये प्यार को नहीं देख पाता। कई बार लगा कि मैं ही यह बात बता दूँ। लेकिन उन्होंने रोक लिया औऱ बात हम दोनों के बीच ही रह गयी।

जब काम करना शुरू किया तो आफिस में ये किस्से काफी आम हो चुके थे। और सभी एक उम्र के थे तो इसलिए कुछ अटपटा भी नहीं लगता था। सबके किस्से सुनते सुनते एक दिन कानों तक बात पहुँची कोई और सुधा तुम्हे पसंद करती है।
क्या इस कहानी का अंत भी दुखद होगा या चन्दर को सुधा सदा के लिए मिल जायेगी ?

दिल संभल जा ज़रा

कल जब शान-ए-भोपाल से दिल्ली वापसी का सफर शुरू किया तो एक बार फिर दिल मायूस हुआ। भोपाल छोड़े हुए इतने साल हो गए लेकिन तब भी हर बार शहर छोड़ने का दुख रहता है। ऐसा नहीं है की मुम्बई ने अपनाया नहीं। मुम्बई ने तो कभी पराया समझा ही नहीं और ऐसे गले लगाया जैसे पता नहीं कब से एक दूसरे को जानते हैं।

कब मुम्बई मेरी और मैं मुम्बई का हो गया ये पता ही नहीं चला। ठीक वैसे ही जब ऐश्वर्या राय अपनी माँ से हम दिल दे चुके सनम में सलमान खान से प्यार कब हुआ, कैसे हुआ पूछने पर कहती है – पता ही नहीं चला। शायद इसलिए इसे मायानगरी कहते हैं।

लेकिन फ़ोन किया गया था और शुभकामनाएं इत्यादि बातें हुई ये पता चल गया था। हिंदी की कहावत काटो तो खून नहीं वाली हालत थी। चोरी पकड़ी गई थी और अब सज़ा की तैयारी थी। लेकिन जवानी का जोश ऐसा की जो करना है करलो। अब बात शादी तक पहुंच गई थी तो कुछ ज़्यादा सीरियस मामला लग रहा था। मतलब ट्रेलर बन रहा था और पिक्चर सिनेमा हॉल में लगने को तैयार।

अल्ताफ ने पूछा कि दिलवाले दुल्हनिया ले गए या देवदास बन गए। हुआ कुछ भी नहीं। ना तो दुल्हनिया लाये न देवदास बने। क्योंकि ये सारी मंज़िलें थोड़ी ऊपर थीं। हम तो बस इस मोहब्बतनुमा इमारत के दरवाजे पर दस्तक ही दे पाए थे की ये सब हो गया।

एनकाउंटर होने वाला था दोनो पक्ष के परिवार वालों का एक अलग शहर में और समझ में ये नहीं आ रहा था कि इससे निकला कैसे जाए। खैर हमारे बड़े बहुत समझदार निकले और ऐसी कोई नोबत आयी नहीं और दोनों पक्ष बहुत ही सौहार्दपूर्ण वातावरण में मिले। घटना का ज़िक्र नहीं हुआ और न ज़िक्र हुआ उस फिल्मी डायलॉग का – क्यूं न हम अपनी दोस्ती को रिश्तेदारी में बदल लें। वैसे परिवार में ऐसे विवाह हुए हैं लेकिन इस एपिसोड के काफी बाद।

इस पूरे समय दिमाग में सवाल यही था कि पता कैसे चला। उन दिनों लैंडलाईन हुआ करती थी और बड़े घरों में उसका एक्सटेंशन लगाया जाता था ताकि फ़ोन उठाने के लिए दौड़ भाग न करनी पड़े। उस रात दौड़ भाग तो नहीं हुई बस मेरा फ़ोन ठीक वैसे ही सुना गया जैसे गोगा कपूर फ़िल्म कयामत से कयामत तक में आमिर खान और जूही चावला की बातें सुन लेते हैं। यहां बात किसने सुनी ये रहने देते हैं।

क्या इसके बाद सुधार गए या फिर दिल संभल जा ज़रा फिर मोहब्बत करने चला है तू वाला मामला रहा ?

पहले पहले प्यार का किस्सा

उम्र के अलग अलग पड़ाव पर हम अलग अलग तरह के जोखिम उठाते हैं। बचपन में जब चलना सीख रहे होते हैं तो बार गिर कर तब तक कोशिश करते हैं जब तक ठीक से चलना नहीं सीख लेते। आपको अपना साईकल सीखने का समय याद है? जब कोई पीछे से अपना हाँथ खींच लेता है और आपका संतुलन बिगड़ जाता है। मगर कोशिश जारी रहती है। जोखिम उठाने के ये तरीक़े आगे बदलते रहते हैं।

जवानी के ऐसे बहुत से जोखिम आपका जीवन बदल देते हैं। मसलन दोस्तों के साथ कुछ नए तजुर्बे। ये वो समय भी रहता है जब आप नए दोस्त/सखी बनाते है जो आपके जीवन पर्यन्त मित्र रहते हैं। और कुछ दिलों के मामले होते हैं जिस पर किसी का जोर नहीं। ग़ालिब ने कहा भी खूब है ये इश्क़ नहीं आसान।

जिस तूफान का ज़िक्र मैंने किया था वो दरअसल खुद का खड़ा किया हुआ था जिसकी नींव रखी गयी थी कुछ तीन महीने पहले। एक परिचित के घर के सदस्य का आगमन हुआ हमारे यहाँ और बस माहौल कुछ वैसा होगया जैसा शाहरुख खान के साथ होता है फ़िल्म मैं हूँ ना में जब भी वो सुष्मिता सेन को देखते हैं।

इसके बारे में बहुत आगे तक सोचा नहीं था। बस उस समय का आनंद ले रहे थे। सच माने तो ये आँख मिचौली का खेल किस राह पर चलेगा या खत्म होगा इसका कोई पता न था। बहरहाल इस खेल को विराम लग ही गया जब वो अपने घर वापस गये। अब इसमें तूफान जैसा तो कुछ दूर दूर तक दिखाई नहीं देता?

जवानी के जोश में अक्सर हम कुछ खून की गर्मी के चलते ऐसे काम कर बैठते हैं जो शांत बैठ कर सोचा जाए तो बहुत बचकाने लगते हैं। वैसे खून की गर्मी का उम्र से कोई लेना देना नहीं होता है। आप को कई अधेड़ भी मिल जायेंगे जो ऐसी हरकतें नियमित करते हैं। लेकिन जब आप जवान होते हैं तो सारा ज़माना आप का दुश्मन होता है और बस जो आपकी सुन ले और जो आप सुनना चाहते हैं वो कह दे वही दोस्त होता है। वो तो समय के साथ पता चलता है कौन दोस्त है और कौन दुश्मन।

जब यह आंखों की गुस्ताखियां चल रही थीं उस दौरान मैं भोपाल के अंग्रेज़ी दैनिक में बतौर रिपोर्टर काम कर रहा था। साथ में पढ़ाई भी कर रहा था। इन सबसे जो समय बचा था उसका कुछ बहुत अच्छा सदुपयोग हो रहा हो ऐसा नहीं था। लेकिन सब इससे बड़े प्रभावित थे। हाँ अगर वो पूछ लेते पिछले परीक्षा परिणाम के बारे में तो मेरी और अमोल पालेकर की हालत में ज़्यादा फर्क नहीं होता जब उत्पल दत्त के सामने पानी पीते हुए उनकी नकली मूँछ निकल जाती है। बेटा रामप्रसाद…

तो एक रात जाने क्या सूझी सोचा एक फ़ोन लगा लूँ। परीक्षा के लिए शुभकाननाएँ दी जाएं। एसटीडी पीसीओ ऑपरेट कर रहीं भाभीजी की मदद से फ़ोन तक तो बुला लिया और संदेश भी दे दिया। मिशन सफल ठीक वैसे ही जैसे अभय देओल और आएशा टाकिया सोचा न था में रहते हैं। हम और कुछ उम्मीद कर भी नहीं रहे थे। लेकिन सब आप के जैसी सोच वाले मिल जाएं तो पति-पत्नी के जोक्स का क्या होगा। और यही जोक मेरा इंतेज़ार कर रहा था भोपाल में।

मुंबई, पुणे के प्रवास से लौटते जैसे पैरों को पर लग गए थे। बर्ताव कुछ ऐसा जैसे कौन सा क़िला फतेह कर के आये हों। लेकिन गिरे भी उतनी ही ज़ोर से जब पता चला की फ़ोन की खबर घर तक पहुंच चुकी है और रिश्ते की बात भी छेड़ी जा चुकी है।
अब मुझे तैयारी करनी थी उस एनकाउंटर की जो कि कुछ दिनों बाद था लेकिन उसका होना तय था।

जीवन के सुखद हादसे

हम सभी के जीवन में जाने अनजाने ऐसे बहुत से सुखद हादसे होते हैं जो एक अमिट छाप छोड़ जाते हैं। अधिकतर जानने वाले इन दुखद घटना के ज़िम्मेदार होते हैं और अनजाने लोग सुखद यादों के पीछे। ऐसा मेरा अनुभव रहा है।

PTI के मुम्बई तबादले से पहले भी मेरा एक बार मुम्बई जाना हुआ था। उस समय मैं ग्रेजुएट होने वाला था और MBA के लिए तैयारी कर रहा था। नर्सी मोनजी कॉलेज के MBA का फॉर्म भरा और हिंदुस्तान पेट्रोलियम में कार्यरत निखिल दादा के भरोसे मुम्बई चल पड़े। वहाँ से सिम्बायोसिस की परीक्षा के लिए पुणे भी जाना था और बीच में शिरडी का भी प्रोग्राम बना लिया था। मुम्बई से आगे की ज़िम्मेदारी दादा ने लेली थी और मैं निश्चिन्त मुम्बई के लिए निकल पड़ा।

भोपाल से मुम्बई का ये सफर हमेशा याद रहेगा क्योंकि टिकट कन्फर्म नहीं हुआ लिहाज़ा जनरल कोच में सफर करना पड़ा। मैं पहली बार इस तरह की कोई यात्रा कर रहा था और सबने जितने भी तरीके से डराया जा सकता था, डराया। ख़ैर मायानगरी को अब तक सिनेमा के पर्दे पर ही देख था और साक्षात देखने का रोमांच ही कुछ और था। मुम्बई पहुँचे और निखिल दादा ने खूब घुमाया।

उन्ही दिनों मणिरत्नम की फ़िल्म बॉम्बे भी रिलीज़ हुई थी और दादा ने मुझे वो दिखाने का प्रस्ताव रखा। आज भी मुझे इस बात की बड़ी खुशी है कि मैंने फ़िल्म बॉम्बे मुम्बई में ही देखी। जिस समय ये सब अनुभव हो रहे थे इस बात का ज़रा भी इल्म नहीं था एक दिन मैं यहाँ वापस आऊंगा और अपने करियर का सबसे ज़्यादा समय यहां बिताऊँगा।
खैर मुम्बई से शिरडी और फिर वहां से पुणे पहुंच गए। शिर्डी में रुकना नहीं था और पुणे में रुकने का इंतज़ाम नहीं था। पुणे स्टेशन के आस पास के लॉज और धर्मशाला ने मुझे कमरा, जगह देने से मना कर दिया। ये बात है गुरुवार की और परीक्षा थी रविवार को। ये तीन दिन कहाँ बिताएं और कैसे बिताएं ये सोचते हुए मैं पुणे स्टेशन के बाहर बैठा हुआ था।

मायूसी तो बहुत थी। विचारों में खोया हुआ और आंखों मैं आँसू लिये हुए शायद किसी ने देखा। वो शख्स मेरे पास आया और पूछा क्या तकलीफ में हो? अब जैसा होता है घर वालों की सभी सीख याद आने लगीं। फिर भी पता नहीं क्या बात हुई मैं उनके साथ उनके स्कूटर पर बैठ गया और उनके घर पहुंच गया। भाई ने कहा मेरे रूम पर रुक जाओ। पता चला वो भी भोपाल से ही हैं और रूम पर और प्राणी मिले इस शहर के। बस फिर क्या था, जो शहर कुछ समय पहले कुछ अजीब से विचार जगा रहा था, वो अपना लगने लगा।

रविवार की पुणे से भोपाल वापसी भी कम यादगार नहीं रही। एक बार फ़िर टिकट कन्फर्म नहीं हुआ और झेलम एक्सप्रेस से भोपाल की यात्रा खड़े खड़े करी। चूंकि परीक्षा देके सीधे आ रहा था तो शर्ट की जेब में पेन रखा था। लेकिन मई की गर्मी में इंक लीक हो गयी और भोपाल पहुँचते पहुँचते पूरी शर्ट का रंग बदल गया था। लेकिन घर जा रहे थे करीब 10 दिन बाद तो इसके आगे सारे रंग फ़ीके।

इस बात को करीब बीस वर्ष हो चुके हैं। लेकिन उस शख्स का नाम याद नहीं। भोपाल में किस गली मुहल्ले में रहते हैं पता नहीं। बस याद है तो उनका मुझे अपने घर पर सिर्फ इंसानियत के नाते रखना। याद है कि किसी ने बिना कुछ सोचे मुझे तीन दिन का आश्रय दिया।

आज भी उनके प्रति सिर्फ कृतज्ञता है और कोशिश की अपने आसपास के माहौल से प्रभावित न होकर ऐसे ही किसी असीम की मदद किसी रूप में कर सकूं और वो किसी और कि और बस ये अच्छाइयों का चक्र चलता रहे।

भोपाल में एक तूफ़ान मेरा इंतज़ार कर रहा है इस बात से अनभिज्ञ मैं घर वापस जा रहा था।

जीवन एक चक्र है

जीवन एक चक्र है ऐसा सुना करते हैं लेकिन इसका एक साक्षात अनुभव पिछले दिनों हुआ। हालांकि इसका आभास तब हुआ जब मैं दिल्ली से भोपाल की ट्रेन यात्रा के लिए हज़रत निज़ामुद्दीन स्टेशन पर शान-ए-भोपाल में बैठा।

यही वो स्टेशन है जिससे मैंने न जाने कितनी बार भोपाल की यात्रा करी जब मैंने अपना पत्रकारिता का करियर PTI से शुरू किया था। उन दिनों हज़रत निज़ामुद्दीन से ये ट्रेन नहीं थी और मुझे दिन के अलग अलग समय अलग अलग ट्रेन से सफर करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। ऐसा इसलिए भी की PTI में शिफ्ट डयूटी हुआ करती है और समय अनुसार भोपाल की ट्रेन में चढ़ जाया करते थे। भोपाल के लिये ट्रेन की कोई कमी भी नहीं थी सो इतना कष्ट नहीं हुआ करता था। तनख्वाह इतनी ज्यादा नहीं हुआ करती थी सो सर्दी हो या गर्मी स्लीपर क्लास में ही सफर करते थे। कई बार ऐसे भी मौके आये की करंट टिकट लेकर जनरल कोच में दरवाज़े की सीढ़ियों पर बैठ कर भी सफर करना हुआ।

उन यात्राओं का बस एक ही आनंद होता था – घर जा रहें हैं तो सारे कष्ट माफ। और सच में सर्दी में ठिठुरते हुए या गर्मी में पसीना पोंछते हुए ये सफर बस यूं ही कट जाता था। मेरे उन दिनों के अभिन्न मित्र सलिल की ये डयूटी लगा रखी थी कि वो स्टेशन से मुझे घर पहुंचाए। और रात का कोई भी समय हो सलिल स्टेशन पर मौजूद l उन दिनों आज के जैसे मोबाइल फ़ोन तो हुआ करते थे लेकिन उनको रखना एक महँगा शौक हुआ करता था। तो सलिल तक संदेश पहुंचे कैसे? स्टेशन पहुँचकर टिकट खरीदने के बाद दूसरा काम हुआ करता था सलिल को एसटीडी पीसीओ से फ़ोन की साहब कब पधार रहे हैं।

एक बार कुछ ऐसा हुआ कि समय की कमी के चलते फ़ोन नहीं हो पाया। वो तो भला हो दूरसंचार विभाग का जिन्होंने प्लेटफार्म पर ये सुविधा उपलब्ध करा दी थी। बस फिर क्या जहां ट्रेन रुकी वहीं से फ़ोन और सवारी स्टेशन पर मौजूद। वैसे सलिल से ये सेवा मैंने मुम्बई से भी खूब कराई लेकिन उसके बारे में फिर कभी। फिलहाल चक्र पर वापस आते हैं।

PTI में रहते हुए ही तबादला मुम्बई हो गया और दिल्ली छूट गया। सच कहूँ तो दिल्ली छूटने का जितना ग़म नहीं था उससे कहीं ज़्यादा खुशी मायानगरी मुम्बई में काम करने की थी। फिल्मों का चस्का तो था ही उसपर मुम्बई में काम करने का मौका जैसे सोने पे सुहागा। दिल्ली बीच में कई बार काम के सिलसिले में आना हुआ लेकिन वो सभी प्रवास दौड़ते भागते ही निकल जाते।

जब नवंबर 15 को दिल्ली के हवाईअड्डे पर उतरा तो काफी मायूस था। मुम्बई छूटने का ग़म, परिवार से अलग रहने की तकलीफ और अपने खाने पीने का खुद इंतज़ाम करना बड़ा भारी लग रहा था। लेकिंन दिल्ली फिर से मेरी कर्मभूमि बनने वाली थी ऐसा मन बना लिया था।

वो तो जब आज रात ट्रेन में बैठा तो जैसे एक झटका लगा। इसी शहर से अपना सफर एक प्रशिक्षु पत्रकार के रूप में शुरू करने के बाद आज में एक संपादक के रूप में वापस आया हूँ। जो सारे अनुभव दिल्ली से शुरू हो कर मुम्बई तक पहुंचे और जो मैंने मुम्बई की विभिन्न संस्थाओं से ग्रहण किया, उन सभी को आज फिर से दिल्ली में अपनी नई टीम के साथ न सिर्फ साझा करने का मौका मिलेगा बल्कि बहुत कुछ उनसे सीखने का मौका भी। और इस सफर की शुरुआत इसी दिल्ली से हुई थी जहां 17 वर्षों के बाद मैं वापस आया हूँ। आभार दिल्ली

The Management Mantra

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You start your career as a junior team member and as you grow so does your profile. First you are reporting to someone and later you have people reporting to you. Not that your reporting changes, but the nature of reporting changes. From sharing the jobs you did you report the jobs you got done, targets achieved or missed.

As you climb the ladder you become more of a manager and less of a person who was hired for your basic set of skills. The transition is very critical as what made you a great team member may not make you a good manager.

Here I will share three things that make a great manager:

  1. Be informal: Formality is always there but the more informal you are with your team the chances of success are more. It could be simple things that you can discuss with your team other than work. As a thumbrule it has to be about something that interests them as well.
  2. Delegate: You climb the ladder because someone gave you that chance. Not its your turn to return the favour. Give your team members a chance to learn and grow. There are managers who are afraid they will be out of job if they assign work to people. But what they forget is with less work on their table they can focus on other things.
  3. Balance: Work-life balance is the most abused term. Does it really exist? How do you manage it? Well this article is result of that balance. I am able to write it as I am doing something I enjoy the most – writing. Dont take your work home. Easier said than done as technology makes it difficult to be off work. But make a choice and spend time with family and doing what you enjoy.

A good manager may not have the best of technical knowledge or domain expertise but he has good management skills. Now, the management schools do not make you the best manager because at the end of the day you are dealing with human beings with emotions. Getting work out of people is a task and you learn and improve your skills as people manager.

What is your management mantra? Share in the comments section.

Lootera Movie Review: Poetry In Motion

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Before we left home I had warned my kids not to expect their kind of regular bollywood masala. No item songs. No comedy.  I was expecting requests for toilet breaks/something to munch or some such excuse to leave the hall. But not only they waited patiently for the interval but after the movie ended they wanted to watch it again. This to me is the biggest victory of team Lootera.

My daughter loved the film especially Sonakshi and her simple style while the son wanted a revisit for that tiny winy action-chase sequence. There was a group of youngsters which came hoping something else and left half-way through disappointed. But I believe they remain a minority.

What makes Lootera exceptional is the treatment of the story. You feel it is slow. But never for a minute you want to leave the hall. The movie may not have something for the mango people. But if they can appreciate the masala (leave your brains behind kind of films) they can survive this 135 minutes of pure, unadulterated emotions of love, hate, betrayal and loneliness.

As Pakhi and Varun, Sonakshi and Ranveer, are completely in control and you get the feeling no one else could have done justice. Sonakshi can be pardoned for her earlier masala outings and she is here to stay. Her future releases will be eagerly awaited. It helps that her next release is going to be Once Upon A Time In Mumbai Dobaraa which is directed by Milan Luthria.

As for Vikramaditya Motwane: He is going to be in a different league after this. What makes his achievement more commendable is the impossible feat he has achieved with actors like Sonakshi and Ranveer. That perhaps is the biggest USP of the film.

The other two stars of the movie are its cinematography and music. They both complement each other so well that it becomes difficult to see them as two different components of a scene. Amit Trivedi once again proves his mettle with both the songs and the background score.

Lootera can be as commercial as any other movie and at the same time it has loads of Wow moments that makes it so different from the typical bollywood films. Go watch one of the finest love stories of the decade.

CWG – The Lost Opportunity

\"\"I am sure a certain Mr Modi must be smiling. Well make that two Modi’s. The first one: holidaying abroad away from the Commonwealth and IPL circus here will be smiling as the whole country and the Queen wonder what made them award the CWG 2010 to India and the second one for getting a reprieve after “the party with a difference” did the same thing as other parties and struck a deal with the ruling Congress party.

The CWG games were supposed to be India’s entry into the big league. But forget the entry. India is set to make a humiliating exit. Just what the organisers were doing for the past seven years is something worth RTIing. What is different between the first Modi and Mr Kalmadi?

Mr Modi has the enviable track record of organising one of the most successful events in the history of Indian sports. That proved that India can do it and also gave us the false hope that CWG too would repeat the success. \"\" And Mr Kalmadi is doing just the opposite. I am sure both made huge money but while delivered and how, the other has failed. The second Modi and Mr Kalmadi have a lot in common. But another post another time.

The Babu’s who run the country have been assigned the games as well. Going by my experience of their running the country for the past 37-years, I firmly believe this is a bad choice. Now these Babu’s work according to a system. And with every action of anybody remotely associated with CWG being scrutinised with a magnifying lens it will be all the more difficult for these guys to put the house in order. Not that I think they can.

Was wondering if any of the Modis could have done some justice to the event with their experience?

Comparison with China is something India should learn to live with. While the communist country used the Olympics to develop the infrastructure in the country, the thinktanks here thought it was best to have the event again in Delhi. Infact the games were a good chance for India to develop sports facilities in other parts of the country. But what have we done? We are going to have more stadiums in Delhi as if the crumbling remains of 1984 Asian Games were not enough. Now we have Delhi which already had good roads, metro, airport getting more of all these and more.

Seven years. Long enough to develop anything. The Delhi airport was ready in record 37 months (that is still not ready for use is another story). The leaders who have Delhi fixation can learn a lesson or two from their Chinese counterparts.

Imagine the same fund being used to develop facilities in a city like Bhopal (that is where I come from, so naturally but it could be any tier-II city) it would have done the city and state whole lot of good and who knows would have cost a little less and would have been ready fast. But…

Like scores of other Indians I take very little from these games. Why? Because that is how sports is treated in the country. Just what Mr Kalmadi and Co did.

The Twist

Now that BCCI has locked Lalit Modi as target, the coming days are going to be more fun. The underworld angle is really interesting. It also proves that whatever Modi had been saying all this while was true. But will we ever come to know the truth? Will those whose names are likely to come out, allow Modi to tell the truth?

What really bothers me (yes its true) is what Mr Modi has been waiting for. Here is the entire BCCI which has trained its guns on Modi and this guy is holidaying abroad. I am sure he still tweets (that is what got him into trouble) and has heard about emails and the works the modern technology has lined up. He surely can take help of that and share the stories with us.

The media will not miss a single second to record every single word Mr M says. I just wish the threat does not scare him like it does the macho bollywood heroes, and he stops short of naming the biggies who play the dirty game off the field.

Lets wait and watch.

Silence. Match in progress

Isn’t a wonder that all is calm and quiet on IPL and Lalit Modi’s front. Is it part of the agreement that the two parties have reached? Because the last I heard was the man saying he will expose all after the IPL is over.

Hello?? I am still waiting for the expose.

Otherwise also the 140 character man is silent. No Tweets. Same for Shashi Tharoor. Man the drama is missing. May be not in India but the T20 World Cup is on in West Indies (just in case you guys are catching up with lost sleep – the whole controversy will die a slow death), write something guys.

Just days after IPL watching T20 (I saw a few overs to see what do they do)\"T20was a shock. No cheer leaders no celebrities and no ad. What are these guys upto? I think Mr M should hire a jet pronto and give them a few lessons on how to run the show. What I liked about the matches was people enjoying the game with a glass of beer. Here the only person I think does that is RCB owner.

It really was a good sight to see the spectators not caged like its done in India. I am not sure about many things but this I am sure that we will never ever be able to watch the game like that. Why? Well once people start drinking who will be interested in the match?

India is finally gearing up for the Commonwealth Games. But it’s the controversy over the sports bodies that indicates that. The government did a good thing by revoking its order on fixing the tenure of the head. Like everything else this too is going to result in some drama.

I read that some politicians have been heading the bodies for 22 years. Now this is no mean task. I really would like some independent agency to investigate what this chap has been doing? Can his achievement be listed and also how the funds were used? Will any RTI activist please do the needful?

Please also find out what happened to the 140 character men. Where are they hiding?

The Game Is Not Over Yet

It will be curtains to IPL tamasha on field tonight. But the off field tamasha which took the spotlight away from the game will begin from tomorrow or may be soon after the finals end, according to news channels.

I am not a keen follower of the game but ever since Lalit Modi \"\"took to 140 words to tell the world what was wrong with Kochi, I was left with little choice. All the channels worth their airtime ad rates are reporting the IPL like nothing else matters in this country. Even the Parliament too has dropped everything else and are wasting precious public money.

I have heard really absurd queries in the past few days like why do we have ads between the balls when English Premier League (EPL) has completely dedicated match telecast. Well please study the format of the game.

The same set of people will go to any length to justify why do we have politicians everywhere? Is Sharad Pawar the only man left in the country to head the BCCI?

We, ok our dear politicians travel around the world to study the best practices adopted by various countries for toilets and transport. I am sure in the process they also manage to find out how and where to park their “hard earned” money. But has there been any study (undertaken by the sportsmen) to study how sports bodies function in other countries? Are they also controlled by politicians? What about EPL?

I am sure we have enough qualified professionals who can run IPL. This brings me back to the 140 character man. For the past three years he has delivered without fail exciting, world-class cricket to whoever likes that kind of tamasha. Now everybody is after him.

\"\"Like I said I am no big T20 cricket fan but this man has done a good job. May be he went a little overboard but he knows how to get the job done. And he could not have done it without the support of the bigwigs. Is it the bigwigs are not happy that IPL has now become synonymous with Modi? Is it that he did not share the goodies with them? Is this why they are giving cold shoulder to him?

May be, just may be his threat to reveal all after the IPL finals has worked with news of a compromise formula being worked out. S**, I was really looking forward to Monday morning and was also planning to start my day rather early and stay TWEETED to follow the 140 character man.  Will he spill the beans? Oh, Modi please do it. These guys will throw you out any case. Take them with you.

But is IPL really that big? Cricket sells in India and those who can are making big money out of it.

The tournament started on a wrong note with the controversy surrounding the Pakistan players and is ending on a more negative note.

When anything ends the next day is like a day off. May be for players but for Modi and all the media the game has just begun.

Playing with fire

My heart goes to the family members of the 34 persons killed in the Kolkata fire. The whole thing is so tragic. And yet we all will forget about it just as soon as news channels stop reporting it and newspapers stop writing about it. By Thursday/Friday the report was reduced to scroll on most of the news channels with updating the toll. This whole chalta hai attitude has to be blamed for this.

I am sure there are many such buildings spread across India. But they all lack proper fire fighting facilities. All the buildings in the Fort area in Mumbai are a tragedy in the making. But the problem is people sitting in Mumbai think why should we worry about something happening in Kolkata? Well you have a reason to worry when the caretaker of your building took money to have two more floors and also passed on some benefits to the authorities concerned to approve the changes.

Even the building in the Tuesday’s mishap had some structural changes which were later approved.

Chief Minister Buddhadeb Bhattacharjee admitted, \”The top two floors are illegal. We are investigating what the Kolkata Municipal Corporation\’s role was at that time, who is the owner of the building. The city has a coterie of illegal builders with whom the administration is involved”.

How come these changes approved. How come nobody saw the two floors come up all this while? It cannot be that they appeared from nowhere. Why the two floors were later legalised and on what grounds? Does it mean other buildings in the area can go for similar change? Just how much money was taken for this?

Remember what happened in Uphaar fire incident? Well even now people are waiting for justice. For the families of Stephen House victims the painful journey has just begun.

The IPL Tamasha

Lalit Modi did it again. He sure has learnt the idea of remaining in news. The cancellation of the IPL T20 bidding process at the last minute surely makes news and Mr Modi did wait for the last date.

I am sure the point which the interested parties wanted to amend could have been done earlier. To quote him “The new document will have some new conditions that the IPL governing council believes will benefit IPL and Indian cricket in the long term.”

So the clause earlier were not good for the team? Only Mr Modi knows!

http://epaper.timesofindia.com/Default/Scripting/ArticleWin.asp?From=Archive&Source=Page&Skin=TOINEW&BaseHref=TOIM/2010/03/09&PageLabel=22&EntityId=Ar02200&ViewMode=HTML&GZ=T

Best women centric movies

\"\"With the entire planet clebrating the Women’s Day I thought I should also join the celebrations!

But no dinners/lunch/gifts or shopping. Apologies to the women in my life!

Instead I will list movies, both Hindi as well as English, which had really good women centric script or the female cast left a lasting impression. The list is random. I love them all

1: Leading the list is of course Astitva: A very bold and unusual story. In bollywood bold means showing more flesh. But this offering from Mahesh Manjerakar and Tabu was bold in its content and the step Tabu who played the role of Aditi, takes after her husband “manages to estabilish” that he was not the real father of his son. Wonderful dialogues, this will always remain a favourite.

2: Phir Milenge: I catched the repeat telecast of the movie just last week. Again the movie is unusual as it talks about AIDS but not about the disease or how Shilpa Shetty got the virus. But what happens after people around her discover about her disease. Brilliant performance by Shilpa.

3: Erin Brokowich: Simply outstanding. The way the film opens we hav no clue where it wll end. But Julia Roberts takes us through the life of a single mother who  woks a prostitute and goes on to become a legal assistant.

4: Aakhir Kyun: Smita Patil in a really memorable role. Even Tina Munim managed to give good support to the principal cast. Add to this some really good songs popular even today.

5: Parineeta: That a movie on this theme can be made in 21st century??? Amazing performance and the good old Calcutta.

6: The Sound of Music: Maria makes me laugh and cry… Life and how to live it.

7: Charade: Saw is only last week. A mystery-comedy about a woman whose husband is dead and people think he has left her huge money which they claim is theirs.

8: Pinjar: A tragic love story about women during the Indo-Pak partition.

9: Jab We Met: Geet is again like girls today. Independent, modern and yet traditional. Hard not to smile even when Kareena and Shahid get cosy and uncomfortable… and Shahid says ho jata hai yaar kabhie kabhie…

10: Zubeidaa/Joggers Park/Silsila/Jaane Tu… yaa jane na/Pretty Woman/Abhiman/Lamhe/Chandni: All the movies had strong female roles and all were different. Far far from the conventional role we have been seeing. The women in these films had a mind of their own and did their own thing.

And the Oscar goes to Katherine… best director and best film.

Cope with Copenhagen

So the biggest meeting to discuss the challenges mother earth faces has ended as a no show. Of course Mr Obama and his team of publicists will over the course of next week continue to hammer inside the people what all the deal will do. But for countries like India and China and Brazil the outcome is nothing but a candy handed by the developed countries.

It is really strange that India should follow other countries even on issues like environment. Our needs and requirements are different from countries like China. But why should we follow China is something I have not yet understood.

It really is a matter of shame that even when it comes to policy decision India looks upto or follows other countries. Instead of announcing voluntary cuts India should have waited to gauge the mood of other countries before making its stand public.

And just how can people turn blind eye to the problems the country has been facing due to global warming?  How and what will we tell a farmer in a remote village in Madhya Pradesh that his problems are all due to US not agreeing to emission cuts. It is good game – pointing fingers at each other. But the blame game will not provide any solution that we desperately want.

But the same farmer will not be aware of the danger that awaits the developing countries like India. Maybe the unseasonal rainfall/hailstorm/drought affected him but he failed to understand why.

With Earth Summit over it is very unlikely the same people will worry about the environment again and continue doing their business as before.

The Tamasha Has Just Begun

With movies failing to entertain us, ok there have been very few in the past couple of months, its now the turn of politicians to take over. Well have they ever let the countrymen down? Like the prices in the country their entertainment graph too has been going up and up.

After the May parliamentary polls Lalu Yadav and company have been away from the centre stage. They do make appearance once in a while or the mandatory Holi, Chhath showcase. Thank God, the BJP leaders never denied us our daily dose of entertainment and they still continue to do so!

But nothing compared to what M/s Raj Thackeray and company are doing now. The first day of the Maharashtra Vidhan Sabha was just the trailer. The five years will be real treat for all of us. Suddenly the entertainment has shifted from the GECs to the news channels.

I just cannot stop drawing parallels between the two popular Raj’s everybody knows about. One is of course the man in news now and the other who made/still makes girls (now mothers and their daughters) go gaga- Shah Rukh Khan.

While SRK playing Raj Malhotra in Dilwale Dulhaniya Le Jayenge (DDLJ), opted for the tough path to get the love of his life, the other Raj of Maharashtra Navnirman Sena (MNS) has opted for a shortcut to achieve his goal. As we all know in the movie Shah Rukh in the end gets Kajol with her father asking her to go with SRK.

Strange. And we say reel imitating real life. How I wish at least just once the real life also learnt a lesson or two from the reel life. I am sure MNS leaders have done their homework and know what they are getting into.

We the pedestrians

\"GoLife is tough in Mumbai and a short walk to your destination only makes you realise the plight of the most neglected tribe: The Pedestrians. I too have been walking around for quite some time now but over the years it is becoming increasingly difficult to do so.

My first experience as a pedestrian made me wonder where was all the space that belonged to us, the pedestrians. But it was used for hawkers right under the nose and in front of the BMC officials. As a result you are forced to walk on road and during peak hours it really was some experience.

There also is a dedicated lane for BEST buses but no space for the pedestrians. Why in all these years the problem has been addressed is as easy or as difficult to answer if Congress has any future without the Gandhis?

Look around you. May be the road has recently been repaired. But will be repaired again. But the footpath which has some tiles missing or a manhole cover missing will remain like that for years to come.

The authorities concerned for reasons best known to them have turned a blind eye towards pedestrians.  We are adding more and more facilities for the car driver- flyovers, bridges etc. But have yet to see any step to improve the life of the pedestrian. The cyclists are the worst lot.

In the absence of efforts in this direction it looks difficult India will find a model to follow to address the problem of increasing traffic on its roads.

The Climate Change debate

Saturday and today both were devoted to number of programmes on climate change. While the debate on NDTV was informative but a bit boring the programme on IBN Live on Spiti in Himachal Pradesh was a good one.
Why I found the IBN programme 30 Minutes interesting because it focussed on a problem which needs less debate and more action. It was interesting to see how the local residents are tackling the problem and how they turn to God to find answers to their problem.
The NDTV debate was good but it had far too many panelists. And when you have so many people talking the objective is lost.
The one thing the media has to realise is that it plays a very big role in informing people. But in recent past except education campaign by a leading private bank, none have taken up the task to inform their readers about the issues we have. It is a shame that the media has started taking sides. There is less of free and fair reporting and also the fact that issues that needs debate are overlooked or downplayed.