गाड़ी बुला रही है

कहीं कहीं से हर चेहरा तुम जैसा लगता है

पिछले लगभग बीस वर्षों से अपने शहर से नाता टूट सा गया है।

कभी शहर की गलियों में ऐसे ही घूमने निकल जाओ तो समय जैसे ठहर सा जाता है। आता जाता हर शख़्स जाना पहचाना लगता है। पिछली बार जब भोपाल गया था तो घर से निकलना बहुत ज़्यादा तो नहीं हुआ लेकिन जब कहीं जाना हुआ हर शक्ल कुछ जानी पहचानी सी लगी। एक दो को तो बस नाम लेकर पुकारने ही वाला था। बस ज़ुबान पर नाम आते आते रुक गया।

कुछ को तो मैने आंखों से ओझल होने तक देखा। इस उम्मीद में की शायद वो दिलवाले दुल्हनियां की काजोल की तरह पलट कर शाहरुख ख़ान को देख लें। अब यहां मामला गड़बड़ हो गया। मतलब ये उम्मीद थोड़ी ज़्यादा हो गई थी। खुद की काया दो राज के बराबर हो गई होगी लेकिन उम्मीद ये की कोई काजोल हमको पहचान ले। वैसे सामने वाले भी अब सिमरन कहां।

इसके पहले की बात बिगड़े, ये बता देना उचित होगा परिचित सिर्फ़ महिला नहीं बल्कि पुरुष भी लग रहे थे। पिछले लगभग बीस वर्षों से अपने शहर से नाता टूट सा गया है। हर बार जाना होता है तो कुछ कड़ी ढूंढते रहते हैं। इसी तलाश में समय निकल जाता है और वहां से मायानगरी वापस। यहां वो कड़ियां कभी बनी ही नहीं, या ये कहूं की मैंने इसमें कभी कोई रुचि नहीं दिखाई।

विदेश में जो लोग जाकर बसते हैं उनकी मनस्थिति क्या होती है? जब ये निश्चित हो जाता है अब यही शहर, देश उनका रहेगा तब उनके लिए कितना आसान या मुश्किल होता है? क्या जब कभी वो देस वापस आते हैं तो कुछ पहचाने हुए चेहरे खोजते रहते हैं? क्या अपने नए देस में वो जाना पहचाना ढूंढ़ते हैं?

क्या पता हम में है कहानी या हैं कहानी में हम…

chalkboard, story, blogging, believe, blackboard, chalk, challenge, concept, font, handwritten, past, history, phrase, question, script, text, what, writing, yourself, blue writing, blue question, blue history, blue blog, blue blackboard, story, story, story, story, story

अच्छे विचार से दिन की शुरुआत

स्कूल के समय एक चलन था रोज़ाना एक सुविचार सबके साथ साझा करना। कई बार ये पूरे स्कूल के साथ होता तो कभी आपकी कक्षा के सहपाठियों के साथ। इससे इतर एक और काम करते – इन अच्छे विचारों को लिख कर कक्षा में टांगने का काम करते। स्कूल में एक स्थान भी नियत था जहां रोज़ ऐसा ही कोई सुविचार बोर्ड पर लिखा होता जो आने-जाने वाले सभी को दिखाई देता। इसको पढ़ना भी अच्छा लगता और देखना भी।

वैसे ये सुविचार वाला विचार ही कमाल का है। अब तो वॉट्सएप पर ख़ूब सारे ग्रुप हैं जो अलग अलग तरह के सुविचार शेयर करते हैं। कुछ बहुत ही ज़्यादा गहरे सुविचार भी होते हैं और कुछ मज़ेदार। कुछ संगीत के साथ भी होते हैं। मतलब हर तरह के विकल्प होते हैं। ज्यादातर ये संदेश एक ग्रुप से दूसरे ग्रुप में प्रेषित करे जाते हैं। कई लोग थोड़ी ज़्यादा मेहनत करते हैं और इसको अपना स्टेटस भी बना देते हैं।

पिछले दिनों दिवाली के उपलक्ष्य में भोपाल जाना हुआ। मुंबई से जब निकलते हैं तो ढेर सारे प्रोग्राम बनते हैं। इनसे मिलेंगे, उनसे बात करेंगे। कुछ खाने पीने का कार्यक्रम भी बन जाता है। लेकिन घर पहुंच कर सब कार्यक्रम धरे के धरे रह जाते हैं। इसके पीछे दो मुख्य कारण रहते हैं। एक तो घर में ही कुछ न कुछ काम चलते रहते हैं और दूसरा घर पर माता पिता के साथ समय बिताने की इच्छा। कहीं जाना होता तो प्रयास रहता सब लोग साथ में ही जायें। बाक़ी फ़िर त्यौहार के चलते कुछ न कुछ काम लगा ही रहता।

बहरहाल दिवाली पर सब इक्कठा हुए और सबने त्यौहार अच्छे से मनाया। इसी दौरान शायद मैंने फेसबुक पर एक पोस्ट पढ़ी जिसमें कहा गया क्या अब ड्राइंग रूम को हटाने का समय आ गया है। तर्क ये दिया गया की अब सब सोशल मीडिया पर ही त्यौहार की शुभकामनायें दे देते हैं। घर पर आना जाना अब उतना नहीं होता। मैंने जब ये पोस्ट पढ़ी थी तब इसके बारे में इतना सोच विचार नहीं किया था।

लेकिन कुछ दिनों के बाद वही फेसबुक वाली पोस्ट फ़िर से दिखाई दी। ऐसा अक्सर होता है सोशल मीडिया पर कोई पोस्ट देखी – पढ़ी और कुछ दिनों बाद अलग अलग वॉट्सएप ग्रुप में इसका आदान प्रदान चल रहा होता है। जिसकी ये पोस्ट होती है उनका नाम सब जगह से गायब होता है। वैसा ही कुछ इस पोस्ट के साथ भी हुआ। मुझे बिल्कुल नहीं पता इसके मूल रचनाकर कौन हैं।

वापस आते हैं पोस्ट में व्यक्त किए गए विचार के पास। तो पोस्ट का सार जैसा मैंने पहले बताया ड्राइंग रूम की अब क्या ज़रूरत जब सब मिलना मिलाना सोशल मीडिया पर ही हो रहा है। इस पोस्ट पर बहुत से लोगों ने अपने विचार रखे। ज्यादातर लोग इससे सहमत दिखे। कुछ ने इसको कोविड और उसके बाद मोबाइल पर इस कम मिलने का दोष मढ़ा। कुछ समझदार लोगों ने बाकी सबसे पूछ लिया आप कितने लोगों से मिलने गए थे जो आपके यहां लोगों के नहीं आने पर इतने व्यथित हो रहे हैं?

लोगों की टीका टिप्पणी ने मुझे भी सोचने पर मजबूर कर दिया। बाकी लोगों से पूछने से पहले अपने गिरेबान में झांकना चाहिए। मुझे तो अपना ड्राइंग रूम लगभग हर दिन मेहमानों से भरा दिखा। कुछ ड्राइंग रूम की शोभा मैंने अपने बेडौल शरीर से बढ़ाई। इस बात से सहमत हूं की अब आना जाना कम हो गया है। लेकिन परिवार के सभी सदस्यों ने ये प्रयास किया की जहां जाना ज़रूरी है वहां कोई न कोई जाये। जैसे जहां मेरा जाना किसी भी कारण से नहीं हो पाया तो मेरे अनुज ने ये काम कर दिया। जहां हम दोनों का जाना नहीं हो पाया वहां अगली पीढ़ी को ज़िम्मेदारी दे दी। कुल मिलाकर मिल बांटकर सबसे मिलने का प्रयास किया गया। कुछेक ऐसे भी न्योते थे जिनको किसी भी तरह से अस्वीकार ही करना था और ऐसा बहुत अच्छे से किया। लेकिन हर बार से इस बार ज़्यादा लोगों से अलग अलग जगह पर मुलाक़ात हुई, ये भी सच है। कई पुराने लोगों से इसलिए मिलना नहीं हुआ क्योंकि वो या तो शहर मैं नहीं थे या व्यस्त थे। लेकिन कुछ नए लोगों से भी मिलना हुआ।

बहुत से लोगों से फोन से बात भी नहीं हुई न ही किसी वीडियो कॉल पर। बस दीवाली की शुभेच्छा का आदान प्रदान हुआ। जब परिवार में हम बच्चे लोग ही थे तब माता पिता के लिए सबको साथ लेकर जाना शायद ज़्यादा मुश्किल नहीं होता होगा। अब बच्चों के बच्चे हो गए हैं तो सबको साथ में लेकर जाना एक बड़ा काम हो जाता है। और यहीं से मुझे याद आते हैं वो पिताजी के सरकारी घर वाले दिन। जब दो बेडरूम एक गुसलखाने वाले घर में सब आराम से तैयार भी हो जाते थे और मिलना जुलना भी हो जाता था।

हमारे घर में शुरू से लोगों का ख़ूब आना जाना रहा है। मतलब घर के दरवाज़े पर कभी किसी रिश्तेदार की गाड़ी या कभी किसी के दोस्त की गाड़ी या साइकिल खड़ी रहती। मोहल्ले में हमारा घर जाना जाता था वही जिनके यहां बहुत लोग आते हैं’। हम लोगों को भी इस माहौल से कोई परेशानी नहीं थी। अलबत्ता कुछ करीबी रिश्तेदारों को इससे बड़ी आपत्ति थी।

श्रीमती जी की सखी के भांजे से मुलाक़ात हो गई जब ड्राइंग रूम में भाईदूज के टीके का काम चल रहा था। ये मिलने मिलाने के मामले में श्रीमती जी बहुत आगे हैं। मुंबई में अपनी प्रिय सखी से वो महीनों नहीं मिल पाती हैं लेकीन भोपाल के एक हफ़्ते के प्रवास में वो रिश्तेदार, अड़ोसी पड़ोसी सभी से मिलने के बाद अपनी स्कूल की सखियों से भी मिलने का कार्यक्रम बना लेती हैं। ये सब मिलने मिलाने के बाद जब मुंबई वापस पहुंचे तो लगा इतने दिन दौड़ते भागते ही निकल गए। उसपर किसी से किसी कारण से मिलना नहीं हो पाया तो वो ड्राइंग रूम ही हटाने का विचार कर रहे हैं। वैसे ये पूरी तरह आपका निर्णय होना चाहिए। लेकिन अगर कुछ समय पश्चात लोगों का आना हुआ तो उनको कहां बैठाईएगा इस पर भी विचार कर लेते तो अच्छा होता।

बात ये नहीं है की कोई मिलना नहीं चाहता। बस समय के साथ मिलने जुलने वालों की संख्या बढ़ जाती है। समधियाने जुड़ जाते हैं, सहकर्मी बढ़ जाते हैं, आप किसी पर निर्भर हो जाते हैं किसी के यहां जाने के लिए और कई बार आप तैयार होते हैं जाने के लिए और कोई आपके यहां मिलने आ जाता है। जैसे त्यौहार वाले दिन आप भी कहीं निकल नहीं पाते, वैसी ही मजबूरी किसी और के साथ भी तो हो सकती है। जब आपको समय मिले तो आप मिलने निकल जाएँ और जब उनको समय मिलेगा तो वो आपके ड्राइंग रूम की शोभा बढ़ाएंगे। और ये मिलने के लिए त्यौहार का इंतजार क्यूं? जब अपने प्रियजन, इष्ट मित्रों से मिलें वही एक त्यौहार है।

आप सभी को दीवाली एवं नव वर्ष की ढ़ेरों शुभकामनायें।

जन्मदिन तुम्हारा, मिलेंगे लड्डू हमको

A nostalgic collection of vintage photos in an old wooden box.

जन्मदिन हो और मिठाई न हो तो कुछ अधूरा सा लगता है।

प्यारी पम्मी,

सालगिरह मुबारक। पहले तो सोचा जो दो साल पहले तुम्हारे पहले जन्मदिन पर (मतलब तुम्हारे नहीं होने के बाद) जो लिखा था उसी से काम चला लेते हैं। फ़िर सोचा अब ये कोई नया सोनी का मंहगा म्यूजिक सिस्टम तो है नहीं जो नया लिख दिया तो तुम गुस्सा हो जाओगी और लड़ाई करने लगोगी। लेकिन फ़िर मेरी पसंदीदा जूही जी का QSQT का डायलॉग याद आ गया। क्या ऐसा हो सकता है। और आमिर ख़ान का जवाब \’नहीं\’। तो बस ये नई ताज़ा जन्मदिन की ढ़ेरों शुभकामनायें तुम्हारे लिए।

जब हम लोग पापा का सरकारी घर छोड़कर अपने घर में शिफ्ट हुए थे तब उस घर में पहला जन्मदिन तुम्हारा ही मनाया था। ये अलग बात है की 27 के बाद 28 आती है और नये घर में जाने के बाद दूसरे ही दिन तुम्हारा हैप्पी बर्थडे था। बस कह रहे हैं।

वैसे इस साल दिवाली में जब सब उसी घर में इकट्ठा हुए तो कोरम पूरा तो था लेकिन अब हमेशा के लिए अधूरा ही रहेगा। कोरम का कैरम से कोई लेना नहीं। बस बता रहे हैं। तुम सोचो कैरम के चार खिलाड़ियों की बात कर रहे हैं। वैसे कैरम से याद आया हम चारों ने कैरम साथ में कम ही खेला है या कभी खेला ही नहीं। ज्यादातर तो ताश ही खेलते थे। बस तीन पत्ती नहीं खेली, क्लब इस्टाइल में। 

ये कहना ग़लत होगा तुम्हारी याद आती है। याद तो उनकी आती है जिन्हे भूल जाते हैं। तुम्हारा ज़िक्र तो बस ऐसे ही होता रहता है। कभी गाना देखलो तो तुम्हारी बात निकल पड़ती है, कोई उटपटांग नाम सुनो तो ये सोचने लगते हैं तुम्हारी इस पर क्या प्रतिक्रिया होगी। कभी किसी जानने वाले की ताज़ातरीन हरक़त के बारे में कुछ बात होती है तो तुम्हारा क्या कहना होगा इस पर भी बात कर लेते हैं।

दो साल। 365*2। पता है तुम्हारा गणित मुझसे बेहतर है और मेरे पास होने के लाले पड़े रहते थे। लेकिन इसका जवाब तुम्हारा गलत होगा। ये महज़ 730 दिन की बात नहीं है। हर चीज़ गणित नहीं होती, गुणा भाग नहीं होती। ज़िंदगी इससे कहीं ऊपर है। और अब तुम्हारे पास तो टॉप फ्लोर से देखने का विकल्प भी है। वैसे नीचे से भी इतना कुछ बुरा नहीं दिखता है। हाँ दिल्ली में प्रदूषण कुछ ज़्यादा हो गया है।

गिरते संभलते हम लोग फ़िर से चल तो पड़े हैं, लेकिन मुड़ मुड़ के देखते रहते हैं। नादिरा और राज कपूर के पहले धीरे धीरे और बाद में थोड़ी तेज़ी में समझाने के बाद भी। वैसे इन दिनों गानों को बिगाड़ने का काम ज़ोरशोर से चल रहा है। कल ही मैंने \’आप जैसा कोई\’ का नया बिगड़ा हुआ रूप देखा। लेकिन 1980 की ज़ीनत अमान आज की नचनियों से मीलों आगे हैं। इस नए गाने के बजाय सिगरेट फूंकते फिरोज़ ख़ान को देखना ज़्यादा मज़ेदार है।

बचपन में एक गाना सुनते थे। जन्मदिन तुम्हारा मिलेंगे लड्डू हमको तो बस तुम्हारे जन्मदिन पर भी मुंह मीठा कर लिया। ज्यादा नहीं बस थोड़ा सा। बाक़ी खट्टी मीठी पुरानी यादों का अंबार है जिससे काम चल ही रहा है। शायद इसलिए शुगर कंट्रोल में आ रही है। बस ये कमबख्त वज़न का मुझसे इश्क कम हो जाये तो बात है। किसी ने सच ही कहा है इश्क़ और मुश्क छुपाए नहीं छुपते। और अपना तो ऐसे दिख रहा बायगॉड की क्या बताएं।

एक बार पुनः ढेर सारी बधाई। तुम जहां हो खुश रहो। सिर्फ़ तुम्हारा

मोटू डार्लिंग

गाजर का हलवा

Delicious Gajorer Halwa served with almonds on a vibrant background. Perfect for Indian cuisine themed photography.

पिछले दिनों भोपाल से वापसी के समय स्टेशन पर ट्रेन का इंतज़ार कर रहे थे। एक सज्जन सामने प्रकट हो गए। मुझे बिल्कुल जाने पहचाने नहीं लगे लेकिन वो साहब ने बात शुरू कर दी। मुझे लगा शायद वो मुझे पहचान गए हैं और थोड़ी देर में किसी परिचित के ज़िक्र से मुझे उनका नाम याद आ जायेगा।

पहला सवाल था आपकी ट्रेन आने वाली है क्या। ट्रेन आने में समय था तो उनको बता दिया थोड़ी लेट चल रही है। मुझे लगा शायद वो भी उसी गाड़ी से यात्रा कर रहे होंगे। लेकिन उनके पास कुछ सामान भी नहीं था। बाकी लोगों की तरह मैं मोबाइल में गुम नहीं था और शायद यही गलती मुझे आगे भारी पड़ने वाली थी।

इसके बाद वो मुद्दे की बात पर आ गए। पतलून की जेब से कुछ रुपए निकाले और कहने लगे बस इतने पैसे हैं कुछ कम हैं। उन्हें इंदौर जाना था लेकिन किराये के पैसे नहीं थे। मुझसे उन्होंने कहा की क्या मैं उनकी कोई मदद कर सकता हूं।

मैंने कहा मेरे पास पैसे नहीं है। वो सज्जन कहने लगे आप जितने पैसे देंगे उसके दुगने मैं आपको किसी एप्प के ज़रिए भेज दूंगा। मैने उन्हें कहा मैं दरअसल अपने साथ पैसे नहीं रखता। सारा लेनदेन मोबाईल के ज़रिए ही होता है (ये सौ आने सच बात है)।

मुझे ऊपर से नीचे तक देखने के बाद बोले आप तो मेरे पिता की उमर के हैं। देखिये आपके पास इतने पैसे तो रखे ही होंगे। मुझे अभी तक जो भी थोड़ी बहुत संवेदना उनके लिए थी वो हवा हो चुकी थी। वो स्वयं मुझसे कोई बहुत ज़्यादा छोटे नहीं दिख रहे थे और उन्होंने चंद रुपयों के लिए मुझे अपने पितातुल्य कह दिया था। मैंने उन्हें सलाह दी आपको जो रकम चाहिए वो या तो रेलवे के पुलिसकर्मी या जो आसपास होटल हैं वहां से ले लें। शायद वो आज़मा चुके थे और बात कुछ बनी नहीं थी।

उन्हें लगा (ऐसा मुझे लगा) शायद उनकी पिता की उम्र वाली बात से मैं आहत हो गया था। उन्होंने अगले ही पल कहा आप तो कॉलेज में पढ़ने वाले लगते हैं। कौन से कॉलेज से पढ़ाई करी है। अब मुझे उनकी बातों में रत्तीभर भी रुचि नहीं थी। आसपास खड़े बाकी यात्री भी देख रहे थे ये बात कहां खत्म होती है।

मैने भोपाल के किसी कॉलेज का नाम लिया। कहा वहां से पढ़ाई करी है। लगा अब बात खत्म। लेकिन सज्जन व्यक्ति कहां रुकने वाले थे। उन्होंने अपना बटुआ निकाला और दिखाया। इसके साथ जो उन्होंने कहा वो सुनकर हंसी भी आई और आश्चर्य भी।

उन्होंने बताया उनका उनकी पत्नी से किसी बात पर झगड़ा हो गया था। पत्नी ने बटुए से सारा पैसा निकाल लिया था और उन्हें घर से बाहर निकाल दिया था। तो महाशय ने सोचा क्यूं ना इसी बहाने दोस्तों से इंदौर मिलकर आया जाए। तब तक उनकी पत्नी का गुस्सा भी शांत हो जायेगा।

ये सब बताते हुए उनके मुख से एक बार फ़िर से वही आहत करने वाली बात निकल गई। वो बोले वो आपकी बहू ने…

अभी कुछ दो महीने बाद धरती पर प्रकट हुए पचास वर्ष हो जायेंगे। लेकिन बहु के आने में समय है। मुझे अब उस व्यक्ति से ज़्यादा अपनी काया की चिंता हो रही थी। अंकल तक तो ठीक था। ये कुछ ज़्यादा हो गया था। ये बात सही है पिछले दिनों कुछ वज़न बढ़ा है। लेकिन आज लग रहा है वो कुछ ज़्यादा ही बढ़ गया है। माँ के दो दिन पहले वज़न कम होने की बात की सारी ख़ुशी किसी कोने में दुबक गई थी।

इस पूरे वाक्ये में जो एक बात जिससे मुझे थोड़ी राहत मिली वो ये थी की सज्जन भोपाल की बढ़ती हुई सर्दी से बचने के लिए मदिरा का सेवन किये हुए थे। शायद वो अपना चश्मा भी घर पर ही छोड़ आये थे! (ऐसा सोचने में कोई नुकसान भी तो नहीं है)।

थोड़ी देर में गाड़ी आई उससे अपनी वापसी प्रारंभ करी। उन सज्जन को आईना दिखाने के लिए धन्यवाद। भले ही उन्होंने जो कहा वो नशे की हालत में कहा। लेकिन बात लग चुकी है और इस साल की सर्दियों का पहला गाजर का हलवा खा कर इसको भूलने का प्रयास जारी है। जब खत्म होगा तब हलवे से बढ़े वज़न को कम करने के बारे में सोचा जायेगा। आप भी मौसम का आनंद लीजिए।

रविवारीय: मेरी नज़र से देखो तो यारों, की मेरी मंज़िल है कहाँ

A close-up image of a graduate holding a diploma tied with a red ribbon, symbolizing achievement and success.

जनवरी की सर्दी जाते जाते औऱ गर्मी के बीच एक मौसम आता है। बसंत की ओर या इश्क़, मोहब्बत वाली फ़रवरी की तरफ़ मेरा इशारा कतई नहीं है। वैसे हमारे समय में वैलेंटाइन डे का इतना कुछ हो हल्ला नहीं था जैसा इन दिनों है। फ़रवरी शुरू होते ही हर जगह बस यही चलता रहता है। जहाँ तक बसंत पंचमी की बात है तो माँ सरस्वती की पूजा औऱ पीला रंग पहनने का काम बिल्कुल होता है।

बहरहाल, जिस मौसम की मैं बात कर रहा हूँ, वो है अपनी नई जिंदगी की तरफ़ एक औऱ कदम बढ़ाने का। अब अग़र फ़लसफ़े की बात करें तो हम रोज़ ही उस दिशा में कदम बढ़ाते रहते हैं। लेक़िन इस बात का एहसास उस समय ज़्यादा होता है जब आप स्कूल छोड़कर कॉलेज की तरफ़ बढ़ते हैं औऱ कॉलेज छोड़ आगे की पढ़ाई या नौकरी की तरफ़।

तो ये जो मौसम है जो सर्दी औऱ गर्मी के बीच में रहता है वो है फेयरवेल का या अपने स्कूल औऱ कॉलेज से बिदाई का। परीक्षा के ऐंन पहले आपकी संस्था से बिदाई।

जब तक स्कूल की पढ़ाई करते रहते हैं तब लगता है कॉलेज कब जाने को मिलेगा। जो आज़ादी दिखती है कुछ भी ओढ़ने पहनने की और क्लास का मूड न हो तो यार दोस्तों के साथ चाय की दुकान पर समय बिताने का या कोई नई फ़िल्म देखने निकल जाना। लेक़िन जब स्कूल छोड़ने से पहले ये बिदाई का क्षण आता है तो पिछले सालों की यादें आंखों के सामने आ जाती हैं।

स्कूल में तो फ़िर भी ये समारोह बहुत ही सलीके से आयोजित होता है। सब इस मौक़े को यादगार बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ते। मस्ती, मज़ा, नाच, गाना औऱ फ़िर वो क्षण जब आप स्कूल को अलविदा कहते हैं। स्कूल में जब फेयरवेल हुई तो सब थोड़े भावुक भी हो गये थे। मुझे भी इन चार सालों में लगाव हो गया था लेक़िन बहुत से ऐसे विद्यार्थी थे जिनका बचपन यही से शुरू हुआ था। उनका लगाव कुछ ज़्यादा था औऱ बिछड़ने का ग़म भी।

हमारे समय में इस आयोजन की इतनी तैयारी नहीं हुआ करती थी। मतलब आज के जैसे नये कपड़े औऱ कई जगह तो एक से ज़्यादा पार्टी भी होती हैं। कई बच्चे तो साथ मिलकर अलग पार्टी भी करते हैं इस खास मौक़े पर। शायद हमारे समय में भी ऐसा कुछ हुआ हो लेक़िन मुझे कोई न्यौता नहीं था।

जहाँ तक तैयारी की बात है तो मुझे बिल्कुल भी ध्यान नहीं कुछ विशेष तैयारी करी हो। उस समय जो सबसे अच्छे कपड़े रहे होंगे वही पहन कर गये थे। बहुत से लड़के सूट-पेंट-टाई में भी थे। जैसा मैंने पहले बताया था सरकारी घर के बारे में, हमारे आसपास शिक्षण संस्थाएँ थीं। छात्राओं वाली संस्था ज़्यादा थीं तो जिस दिन उनके यहाँ ये समारोह होता था, बाहर कुछ ज़्यादा ही रौनक़ रहती।

वापस तैयारी पर आयें तो दोनों बहनों ने भी माँ की कोई अच्छी सी साड़ी पहन कर ही अपनी फेयरवेल मनाई। हम लोगों के साथ साथ हमारे माता पिता के लिये भी ये एक यादगार क्षण होता है। उनकी संतान जीवन का एक नया अध्याय शुरू करने को तैयार हैं औऱ अपने भविष्य के निर्माण की तरफ़ क़दम बढ़ा रहे हैं।

कॉलेज में आकर सब बदल जाता है। मैं जिस संस्था में गया था वो बहुत बड़ी तो नहीं थी औऱ न ही ज़्यादा भीड़भाड़ वाली। मतलब सब काम आराम से होता था। लेक़िन स्कूल के बाद कॉलेज में जो बदलाव आया वो था अनुशासन औऱ परंपरा। जी बिल्कुल मोहब्बतें वाले अमिताभ बच्चन के जैसे।

स्कूल में तो सभी बाहरवीं के छात्रों के लिये एक ही ऐसा कार्यक्रम होता। लेक़िन कॉलेज में साइंस, आर्ट्स, कॉमर्स औऱ ग्रेजुएट एवं पोस्ट ग्रेजुएट सभी कक्षायें। सभी का फेयरवेल एक साथ कैसे संभव था। वैसे इसका पता भी नहीं चला। वो तो जब सेकंड ईयर में आये तब जनवरी आते आते फाइनल ईयर के लिये इस कार्यक्रम की चर्चा शुरू हुई।

जो तीसरी चीज़ मोहब्बतें में नहीं थी वो थी राजनीति। ये भी स्कूल से अलग मामला था। कॉलेज में छात्र नेता तो थे लेक़िन कभी आमना सामना नहीं हुआ था। इस कार्यक्रम के चलते वो मौका आ ही गया। मेरे साथ के कुछ सहपाठी का इन छात्र नेताओं से संपर्क था। जब फेयरवेल का कार्यक्रम बना तो पता चला दो गुट हैं औऱ उनकी इस कार्यक्रम को लेकर सहमति नहीं बनी।

हम लोगों पर ये दवाब था की कार्यक्रम हो। तो एक दिन नियत किया औऱ जितने लोगों को आना हो या जायें कार्यक्रम होगा। दूसरे गुट को भी जानकारी थी। हम लोगों की मजबूरी थी। उस दिन फिल्मों वाला सीन सामने देखने को मिला। मार पिटाई हुई औऱ सारी तैयारी धरी की धरी रह गयी। बस जो अच्छी बात हुई वो ये की हम लोगों को समोसे औऱ कोल्ड ड्रिंक पीने को मिल गई।

जब हमारी बारी आई तब तक ऐसे आयोजन पर रोक लग गयी थी। हम सब कहीं बाहर मिले औऱ साथ खाना खाया। जब 1988 में क़यामत से क़यामत तक आयी थी तब फेयरवेल का एक अलग माहौल देखने को मिला था। लेक़िन असल ज़िन्दगी में कॉलेज की पढ़ाई के दौरान ऐसा कुछ देखने को नहीं मिला। आमिर खान के जैसे सेकंड ईयर वालों का औऱ प्रीवियस के छात्रों का शुक्रिया करने का सपना ही रह गया। 

फ़िल्मों में स्कूल कॉलेज तो बहुत दिखाये लेक़िन फेयरवेल वाले कुछ ज़्यादा याद नहीं। एक बी आर चोपड़ा की फ़िल्म थी निक़ाह। उस फ़िल्म में एक बेहद खूबसूरत गीत था बीते हुये लम्हों की कसक साथ तो होगी । गाने के बोल से तो ये फेयरवेल वाला लगता है लेक़िन है ये सालाना होने वाले कार्यक्रम का हिस्सा। इसके अलावा औऱ तो कुछ याद नहीं।

संभव तो कुछ भी है। अग़र वो हमारे सेकंड ईयर के छात्र अगर ये पढ़ रहें हो तो, उनका शुक्रिया। औऱ आपको भी शुक्रिया कहेंगे की आप ये पढ़ रहे हैं। औऱ शुक्रगुजार रहेंगे अगर आप इस पर अपनी विशेष टिप्पणी साझा करें औऱ इसको आगे बढ़ायें। फ़िलहाल ये गाना देखें।

रविवारीय: जब रविवार बीतता था अख़बारों की सोहबत में

रविवार सचमुच एक बड़ा ही खास दिन है। मैंने पहले कभी लिखा था रविवार औऱ उस दिन सुबह दूरदर्शन पर आने वाले कार्यक्रमों के बारे में। ये बिल्कुल सही है टीवी के हमारे जीवन में आने के बाद बहुत सारे बदलाव हुये हैं। लेक़िन इन कार्यक्रमों का आगमन काफ़ी बाद में हुआ है। इसके पहले मनोरंजन का साधन तो नहीं लेक़िन रविवार का दिन होता था अख़बार पढ़ने का औऱ उस दिन जो रविवारीय आता था उसको पढ़ने का।

वैसे पूरे हफ़्ते ही कुछ न कुछ पढ़ने को रहता था अख़बारों में। कुछेक कॉलम हुआ करते है जिनको पढ़ना अच्छा लगता था। मेहरुनिस्सा परवेज़ का नईदुनिया में एक कॉलम आता था जिसे कब पढ़ना शुरू किया याद नहीं लेक़िन एक लंबे समय तक उनका लेख पड़ता रहा। उनके बारे में ज़्यादा कुछ पता नहीं था। जब पत्रकारिता शुरू करी औऱ मंत्रालय जाना शुरू हुआ तो कई बड़े अधिकारियों से मिलना हुआ। जनसंपर्क विभाग के अधिकारियों से नियमित ही मिलना जुलना होता था। चाय का दौर भी चलता था।

ऐसे ही एक बार एक अधिकारी के पास बैठे हुये थे। साथ में जो बाकी पत्रकार साथी थे उनमें से किसी ने पूछा \”औऱ इन दिनों मेहरुनिस्सा जी क्या लिख रही हैं\”। पहले मुझे लगा शायद मैंने ग़लत सुना है। जब मुलाक़ात ख़त्म हुई तो मैंने पूछा आप किसके बारे में पूछ रहे थे? तो उन्होंने कहा इनकी पत्नी मेहरुनिस्सा परवेज़ के बारे में।

किसी भी लेखक का लिखा पढ़ना एक अलग बात होती है। आप जब उनका लिखा पढ़ते हैं तो उनके बारे में नहीं जानते। आप सिर्फ़ उस लेखक को जानते हैं उस व्यक्ति को नहीं। लेक़िन जब सामने वो आते हैं तो जानिये क्या हो जाता है। बहरहाल मेहरुनिस्सा जी से मिलना तो नहीं हुआ लेक़िन मैंने उनके पति से ये ज़रूर कह दिया की वो बहुत अच्छा लिखती हैं। वो अभी भी भोपाल में ही रहती हैं लेक़िन मिलना नहीं हुआ।

तो ये जो अख़बार पढ़ने की आदत बनी थी इसमें आगे जाकर औऱ बढ़ोतरी हुई। एक से ज़्यादा अख़बार पढ़ने लगे। लेक़िन अंग्रेज़ी के अखबारों के कॉलम को पढ़ने में वो मज़ा कहाँ जो हिंदी में है। आज कई ऐसे हिंदी के कॉलम लेखकों को मैं जानता हूँ जो लिखते अंग्रेजी में है फ़िर उसका अनुवाद होता है।

रविवारीय उन दिनों एकमात्र अतिरिक्त पढ़ने की सामग्री वाला दिन होता था। इन दिनों तो कई अख़बार बीच सप्ताह में भी अलग से चार आठ पेज निकाल देते हैं। उन दिनों रविवारीय चार पेज का होता था लेक़िन सब पढ़ने लायक। जब थोड़ी बहुत पढ़ने की समझ आने लगी तो मैंने ये अलग से रखना शुरू किया। कई लेख फ़ुर्सत से पढ़ने वाले होते। उनको जितना समय देना चाहिये वो देते।

बाद में कई अखबारों के सिर्फ़ रविवारीय संस्करण ही ख़रीदने का सिलसिला शुरू हुआ। सप्ताह के बाकी दिनों में वैसे भी पढ़ने का समय नहीं रहता। जब पत्रकारिता शुरू की तो पता चला कई अखबारों में रविवार के अंक की अलग टीम होती थी। वो सिर्फ़ हफ़्ते दर हफ़्ते कैसे अच्छे लेख जुटायें इसीमें जुटे रहते। अंग्रेज़ी अख़बार DNA जब मुम्बई में शुरू हुआ तो उसकी संडे मैगज़ीन सबसे अलग। मात्र दस रुपये में आपको ढ़ेर सारी पढ़ने की सामग्री मिलती। हाँ ये ज़रूर था वो एक अलग तरह के पाठकों के लिये होती थी।

अब तो सब डिजिटल शुरू हो गया है तो श्रीमतीजी सबसे ज़्यादा ख़ुश हैं। किताबों के बाद जो सबसे ज़्यादा मेरा बिखरा सामान रहता वो अख़बार या उसके कुछ पन्ने। कोरोनाकाल के दौरान औऱ उसके बाद अख़बार पढ़ने का ज़रिया भी बदल गया। सारी दुनिया जैसे मोबाइल में समा गई है। विदेशों में ये पहले से हो रहा था की अखबारों की जगह स्क्रीन ने ले ली थी। हमारे यहाँ ये बदलाव कोरोना के चलते बहुत तेज़ी में हो गया।

विदेश से याद आया। मुझे ये जानने की उत्सुकता रहती की विदेशों में लोग रविवार या रोज़ाना भी अख़बार में क्या पढ़ते हैं। इसलिये जब एक परिचित विदेश जा रहे थे तो जैसा होता है उन्होंने पूछा क्या चाहिये। जो मैंने कहा उससे उन्हें आश्चर्य ज़रूर हुआ होगा। मैंने कहा आप जितने दिन रहें बस अखबारों के रविवार के संस्करण इकट्ठा कर ले आयें।

जब वो वापस आये तो मेरे लिये अख़बार लेते आये। मेरे लिये तो मानों लॉटरी लग गयी थी। वहाँ के अख़बार में अच्छे ख़ासे पन्ने होते हैं। शायद अपने यहाँ से दोगुने। मतलब पढ़ने का ढ़ेर सारा मसाला। भोपाल में उन दिनों ब्रिटिश कॉउंसिल लाइब्रेरी हुआ करती थी। जब सदस्य बने तो वहाँ ब्रिटिश अख़बार पढ़ने को मिलते। इसके जैसा पहले होता था जब अख़बार आते थे – जिसको समाचारों में रुचि नहीं होती वो रविवारीय पढ़ते औऱ बाक़ी पेपर के पन्ने भी बाँट लिये जाते। डिजिटल ने ये बाँटने का सुख भी छीन लिया।

आज मुम्बई की सुबह घने कोहरे के साथ हुई तो मुझे मेहरुनिस्सा परवेज़ जी का वो लेख याद आया जिसमें उन्होंने अपने पिताजी के साथ सुबह की सैर के बारे में बताया था। उस दौरान उनकी क्या बातचीत होती औऱ कैसे इस एक आदत ने उन्हें आगे बहुत मदद करी। अग़र हम अपने जीवन में देखें तो ऐसी छोटी छोटी आदतें हमारी दिनचर्या पर बड़ा प्रभाव डालती हैं। जैसे सुबह की चाय साथ में पीने की आदत या रात में खाने की टेबल पर सबका साथ होना। या साथ बैठकर कोई टीवी का कार्यक्रम देखना।

मेहरुनिस्सा जी की तरह ही एक औऱ लेखिका जिनका लिखा बहुत पसंद है, वो हैं उषा प्रियंवदा जी। पिछले दिनों उनका एक पुराना साक्षात्कार देखने को मिला। उनके बारे में बहुत कुछ जानने को भी मिला। क्या सभी लेखकों को सुनने में इतना ही अच्छा लगता है?

आपका रविवार के अख़बारों के साथ कैसा रिश्ता रहा? आप इस पोस्ट के नीचे कमेंट कर बता सकते हैं। औऱ जैसा पिछली पोस्ट से शुरू किया है – आप इसको पढ़ें औऱ बाक़ी लोगों के साथ भी साझा करें।

गाड़ी बुला रही है, सीटी बजा रही है

हमारे बड़े जो हैं अपने अनुभव से बहुत सी बातें हमें सिखाते हैं। सामने बैठा कर ज्ञान देने वाली बातों की बात नहीं कर रहा हूँ लेक़िन छोटी छोटी बातें जो हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में होती रहती हैं उनसे मिलने वाली सीख की बात कर रहा हूँ। जो सामने बैठा कर ज्ञान मिलता है वो तो कभी कभार होता है औऱ कुछ ख़ास मौकों पर या किसी व्यक्तिविशेष के संदर्भ में होता है।

पिताजी शिक्षक रहे हैं तो उन्होंने पढ़ाई/परीक्षा की बहुत सी बातें बतायीं जैसे पेपर मिलने पर उसको पूरा पढ़ें या लिखने के बाद दोबारा पढ़ ज़रूर लें। परीक्षा के पहले सारा सामान जैसे पेन, पेंसिल आदि जाँच लें। इसके अलावा पढ़ाई के लिये वो हमेशा कहते लिखने का अभ्यास बहुत ज़रूरी है। बार बार लिखो इससे चीज़ें याद रहती हैं।

आज इनका ज़िक्र क्योंकि एक लेख पढ़ रहा था। युवाओं के लिये था। अब अड़तालीस साल वाला भी युवा होता है यही मान कर मैंने भी पढ़ डाला। तो उसमें यही बताया गया की अगर आपका कोई लक्ष्य है तो आप उसको लिखें औऱ अपनी आँखों के सामने रखें जिससे आपको याद रहे की आप क्या पाना चाहते हैं। लक्ष्य लिखने से थोड़ी आपके विचारों में भी क्लैरिटी आती है। मैंने बहुत उपयुक्त शब्द ढूंढा लेक़िन क्लैरिटी से अच्छा कुछ नहीं मिला।

इसी तरह जब कहीं बाहर जाना होता तो पिताजी काफ़ी समय पहले घर से निकल जाते औऱ भले ही स्टेशन पर एक घंटा या ज़्यादा इंतज़ार करना पड़े, वो जो आखिर में भाग दौड़ होती है उससे बच जाते हैं औऱ प्लेटफॉर्म पर कुछ पल सुकून से बिताने को मिल जाते हैं। साथ ही पढ़ने के लिये कोई किताब देखने का समय भी मिल जाता है।

हर बार समय पर या समय से पहले पहुँच ही जाते थे लेक़िन एक बार समय से काफ़ी पहले निकलने के बाद भी कुछ ऐसा हुआ… आपकी कभी ट्रैन, फ्लाइट या बस छूटी है? माता-पिता एक बार मुम्बई आये थे। उनकी वापसी की ट्रेन शाम की थी तो तय समय से काफ़ी पहले हम लोग स्टेशन पर जाने को तैयार थे। क्योंकि मुम्बई में ही पहले कुछ रिश्तेदारों की ट्रेन छूट चुकी थी तो कोई रिस्क नहीं लेना चाहते थे। इसलिये टैक्सी भी बुक कर ली। लेक़िन ऐन समय पर बड़ी टैक्सी नहीं मिली तो दो छोटी टैक्सी बुक करी। एक में माता पिता के साथ मैं बैठा औऱ दूसरी में श्रीमतीजी एवं बच्चे। अब ये भी हमारे यहाँ एक आदत सी बन गयी है। हमारे मतलब हिंदुस्तान में जहाँ जाने वाले दो लोग औऱ विदा करने वाले दस। पिछले दिनों जब कुछ शहरों में प्लेटफार्म टिकट के दाम बढ़े तो काफ़ी हंगामा भी हुआ।

हम मुद्दे पर वापस आते हैं। जैसा महानगरों में होता है, सड़कों पर बारह महीने काम होता है। जब बात करोड़ों की हो तो काम भले ही न हो रहा हो, दिखना चाहिये हो रहा है। तो हमारे रास्ते में भी ऐसा ही कुछ हुआ जिसके चलते लंबा जाम लगा हुआ था। ट्रैफिक रेंग रहा था लेक़िन उम्मीद थी कि समय पर पहुँच जायेंगे। लेक़िन थोड़ी देर बाद ऐसी आशायें ख़त्म होती दिख रही थीं। जब ये पक्का हो गया की ये संभव नहीं हो पायेगा तो ये निर्णय लिया गया कि दूसरे स्टेशन, दादर, जहाँ ट्रैन दस मिनिट बाद पहुँचती है वहाँ जाया जाय। या पहुँचने का प्रयास किया जाये।

वहाँ पहुँचने की उम्मीद ही नहीं यक़ीन भी था। बीच में पिताजी एक दो बार गुस्सा भी हुये लेक़िन ट्रैफिक जाम पर किसी का ज़ोर नहीं था। हम लोग साथ में ये भी बात करते जा रहे थे की अग़र वहाँ भी नहीं पहुँचे तो क्या क्या विकल्प हैं। ख़ैर जब दादर के नज़दीक पहुँचे तो सबने राहत की साँस ली। लेक़िन कहानी में ट्विस्ट बाक़ी था।

ट्विस्ट ये था की जो हमारे ड्राइवर साहब थे उन्होंने वो मोड़ छोड़ दिया जहाँ से दादर स्टेशन बस दो मिनिट की दूरी पर था। समय का मोल तुम क्या जानो ड्राइवर बाबू। उस पर महाशय कहने लगे आपको बताना चाहिये था। अचानक फ़ोन की घंटी बजने लगी। श्रीमतीजी का कॉल था।

अब इतना कुछ चल रहा था उसपर ये कॉल। लेक़िन घर वापस भी आना था औऱ चाय भोजन का भी सवाल था। तो फोन सुनना तो था ही। लेक़िन उधर से जो सुना उसके बाद हँसी छूट गयी। दरअसल श्रीमतीजी औऱ बच्चे जो माता पिता को विदा करने आये थे वो स्टेशन पहुँच चुके थे। लेक़िन मुसाफ़िर अभी भी टैक्सी की सवारी का आनद ले रहे थे।

जब स्टेशन पहुँचे तो सबसे पहले पूछा ट्रैन आ गयी है क्या। जब पता चला की अभी आने वाली है तो सबने दौड़ लगा दी। अब ये जो AC वाले डिब्बे होते हैं ये या तो बिलकुल आगे लगे होते हैं या पीछे। वैसे तो आजकल सभी डिब्बे जुड़े रहते हैं तो आप अंदर ही अंदर भी अपनी सीट तक पहुँच सकते हैं। लेक़िन माता पिता को उनकी सीट पर ही बैठाने का निर्णय लिया। ट्रैन आयी औऱ सामान रखकर वो बैठ भी गये। इस बात को समय काफ़ी समय हो गया है लेक़िन अब ये वाक्या समय पर या समय से पहुँचने के लिये एक उदाहरण बन गया है।

ऐसा ही एक औऱ वाक्या हुआ था जब श्रीमती जी एवं बच्चों को मायके में एक विवाह में सम्मिलित होने के लिये जाना था। उस समय टैक्सी मिली नहीं औऱ उन दिनों अपनी गाड़ी नहीं थी। एक पड़ोसी की गाड़ी मिल तो गयी लेक़िन उस समय मेरे लाइसेंस का नवीनीकरण होना बाक़ी था। अच्छी बात ये थी की पिताजी साथ में थे। पहले थोड़ी डाँट खाई उसके बाद हम स्टेशन के लिये रवाना हुये। चूँकि बच्चे छोटे थे औऱ सामान भी था इसलिये सीट तक छोड़ने का कार्यक्रम था। स्टेशन पहुँच कर माँ, श्रीमती जी औऱ मैंने फ़िर वही दौड़ लगाई। माँ के पैर में मोच आयी थी लेक़िन बच्चों का हाँथ पकड़कर उन्होंने भी अपना योगदान दिया। लेक़िन इस बार कोच आगे की तरफ़ था। भागते दौड़ते पहुँच ही गये औऱ सवारी को गाड़ी भी मिल गई। अक्सर ये विचार आता है अगर उस दिन गाड़ी छूट गई होती तो क्या होता? 

2019 में जब भोपाल जाना हुआ था तब हमारी ट्रेन छूट गयी। ट्रैफिक के चलते हम जब हमारी टैक्सी स्टेशन में दाख़िल हो रही थी तब ट्रैन सामने से जाती हुई दिखाई दे रही थी। जब तक टैक्सी रुकती तब तक आख़िरी कोच भी निकल चुका था। वो तो दो घंटे बाद वाली ट्रेन में टिकट मिल गया तो भोपाल जाना संभव हुआ। हमारे जीवन में बहुत सी चीजों का योग होता है तभी संभव होता है। इस यात्रा का योग भी बन ही गया।

रात की हथेली पर चाँद जगमगाता है

इन दिनों नवरात्रि की धूम है। बीते दो साल से त्योहारों की रौनक़ कम तो हुई है लेक़िन उत्साह बरकरार है। लोग किसी न किसी तरह त्यौहार मनाने का तरीक़ा ढूंढ ही लेते हैं। अगर सावधानी के साथ मनाया जाये तो बहुत अच्छा।

पिताजी को जो सरकारी मकान मिला था वो बिल्कुल मेन रोड पर था। भोपाल में चलने वाली बसों का एक रूट घर के सामने से ही जाता था। कुल मिलाकर आजकल जो घर देखे जाते हैं, ये भी पास हो, वो भी नज़दीक हो, बस ऐसा ही घर मिला था।

घर के सामने एक कन्या विद्यालय था जो हमारे सामने ही बना था औऱ हम लोगों ने वहाँ बहुत खेला भी (जब तक क्रिकेट से स्कूल में लगे शीशे नहीं टूटने शुरू हुये)। इसी स्कूल से लगा हुआ था लड़कों का स्कूल। लेक़िन दोनों ही स्कूल के आने जाने का रास्ता विपरीत दिशा में था।

ये जो लड़कों का स्कूल था वहाँ अच्छा बड़ा मैदान था औऱ हर साल नवरात्रि में गरबा का कार्यक्रम आयोजित होता। भोपाल शहर का शायद सबसे बड़ा गरबा कार्यक्रम हुआ करता था। सारा शहर मानो गरबा कर रहा हो इतनी भीड़ हो जाती। औऱ यही हमारी मुसीबत का कारण बनता।

घर के सामने जो भी अच्छी ख़ासी जगह थी रात होते होते वो सब गाड़ियों से भर जाती औऱ अगर हम लोग कोई बाहर निकले तो गाड़ी अंदर रखने का कार्यक्रम देर रात तक रुका रहता। हमारे प्यारे देशवासियों की आदत भी कुछ ऐसी ही है। अपने घर के सामने ऐसा कुछ हो तो पता नहीं क्या कर बैठें लेक़िन ख़ुद बिना सोचे समझे यही काम करते रहते हैं।

उन दिनों मेरा भी भोपाल में उसी संस्था से जुड़ाव था जो ये भव्य कार्यक्रम आयोजित करती थी। लेक़िन चूंकि हमारा काम ही शाम को शुरू होता था तो कभी जाने का मौक़ा नहीं मिला। जब श्रीमती जी से विवाह की बात शुरू हुई तो पता चला वो सामने वाले उसी स्कूल में पढ़ती थीं जिसका निर्माण हमारे सामने हुआ था। कई लोगों को लगा शायद मैंने उन्हें स्कूल आते जाते देखा औऱ…

दूसरा रहस्योद्घाटन ये हुआ की जिस गरबा की भीड़ से हम साल दर साल परेशान रहते थे वो उस भीड़ का भी हिस्सा थीं। अलबत्ता उनके ग्रुप की गाड़ियाँ हमारे घर के सामने नहीं खड़ी होती थीं।

जिस दिन हमारी सगाई हुई उन दिनों भी ये महोत्सव चल रहा था। समारोह के पश्चात सब अपने अपने घर चले गये लेक़िन श्रीमती जी औऱ उनके भाई बहन सबका गरबा कार्यक्रम में जाने का बड़ा मन था। लेक़िन सबको डाँट डपट कर समझाया गया औऱ सीधे घर चलने को कहा गया।

जब गरबा क्या होता है ये नहीं मालूम था, उस समय एक बार अहमदाबाद जाना हुआ था। एक गीत \’केसरियो रंग तने लागयो रे गरबो\’ ये सुना था औऱ यही याद भी रह गया है (अगर बोल ग़लत हो तो बतायें)। भोपाल में गुजराती समाज भी ऐसा कार्यक्रम आयोजित करता था लेक़िन सिर्फ़ सदस्यों के लिये। मुम्बई में भी ऐसे कई बड़े कार्यक्रम होते हैं जहाँ कभी जाना नहीं हुआ। गरबा क्वीन फाल्गुनी पाठक से मिलना ज़रूर हुआ था लेक़िन दिल्ली में जब वो अपने एक एल्बम रिलीज़ के सिलसिले में आई थीं।मुम्बई में तो उनके कार्यक्रम को टीवी पर ही देखा है। गरबे की असली धूम तो गुजरात में होती है लेक़िन अमिताभ बच्चन के बार बार कुछ दिन तो गुज़ारो गुजरात में बोलने के बाद भी इसका मौक़ा नहीं लगा है।

जो हमारे समय नवरात्रि का कार्यक्रम होता था वो था झाँकी देखने जाने का। एक दिन परिवार के सब लोगों को कार में भरकर पिताजी पूरे शहर की झाँकी दिखाते। ये सब घुमाने फिराने का कार्यक्रम पिताजी के ज़िम्मे ही आता क्योंकि – एक तो उनको शहर के इलाके बहुत अच्छे से पता हैं औऱ दूसरा ये की वो बिना किसी परेशानी के आराम से घूमने देते हैं। मतलब घूमते समय घड़ी पर नज़र नहीं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण? श्रीमती जी आज भी कहती हैं मार्केट जाना हो तो पापा के साथ जाना चाहिये वो आराम से घूमने देते हैं। हमारे साथ मार्केट जाना तो घंटो का नहीं मिनटों का काम होता है। अभी तक ये गुण नहीं आया है – देखिये आने वाले वर्षों में क्या कुछ बदलता है।

समय के साथ सब बदलता है। ऐसा ही कुछ शादी के लगभग दो साल बाद हुआ। कहाँ पास होने के बाद भी गरबा कार्यक्रम में कभी नहीं गये औऱ कहाँ विवाह उपरांत पूरे एक महीने गुजरात से सिखाने आये गुरुजी से गरबे की ट्रेनिंग ली। हम चारों – ताऊजी के बेटे और भाभी औऱ हम दोनों, शायद बहुत ही गंभीरता से सीख रहे थे। ये अलग बात है कभी गरबा कार्यक्रम में जाने का औऱ अपनी कला दिखाने का मौक़ा नहीं मिला।

तो ये हमारा भोपाल भ्रमण कार्यक्रम का बड़ा इंतज़ार होता। अलग तरह की प्रतिमाओं को देखना, कोई किसी घटना को दर्शा रहा है या कोई किसी प्रसिद्ध मंदिर की झाँकी औऱ सुंदर सी देवीजी की मूर्ति। इन सबकी अब बस यादें ही शेष हैं। अक्सर ये घूमना षष्ठी या सप्तमी के दिन होता क्योंकि कालीबाड़ी भी जाना होता था। नवरात्रि मतलब गरबा – ये वाला कार्यक्रम अभी भी पूरी तरह से नहीं हुआ है। मुम्बई में झाँकी/पंडाल वाला कार्यक्रम सिर्फ़ बंगाली समाज तक सीमित है तो वहाँ जाना हुआ है।

जो हमारा घर था उसके दायें औऱ बायें दोनों तरफ़ दुर्गाजी की झाँकी लगती औऱ सुबह सुबह से दोनों ही पंडाल भजन लगा देते। शुरुआत एक से होती लेक़िन दूसरे कमरे तक पहुंचते पहुंचते भजन भी बदल जाता। क्योंकि पहले वाले की आवाज़ दूसरे के मुक़ाबले कमज़ोर पड़ जाती।

आप नवरात्रि कैसे मानते हैं औऱ इतने वर्षों में क्या बदला ? अपनी यादें साझा करें।

हरेक जीवन है एक कहानी

श्रवण कुमार की कहानी आपको पता होगी। आज एक बार फ़िर से बताता हूँ। श्रवण कुमार के माता पिता नेत्रहीन थे। श्रवण कुमार उनकी बहुत सेवा करते औऱ उन्होंने एक कांवर बनाई थी जिसमें वो उनको लेकर यात्रा करते। एक दिन तीनो अयोध्या के समीप के जंगल के रास्ते कहीं जा रहे थे तब माता पिता को पानी पिलाने के लिये श्रवण कुमार रुके। उसी जंगल में अयोध्या के राजा दशरथ भी शिकार के लिये आये थे।

जब श्रवण कुमार तालाब से पानी निकाल रहे थे तब महाराज दशरथ को ऐसा लगा की शायद कोई हिरन है पानी पी रहा है औऱ उन्होंने तीर चला दिया। तीर श्रवण कुमार को लगा जिससे उनके प्राण निकल गये। राजा दशरथ ने ये दुःखद समाचार उनके माता पिता को सुनाया। ऐसा कहा जाता है उन्होंने राजा दशरथ को श्राप दिया की उन्हें भी पुत्र वियोग होगा। वर्षों बाद दशरथ पुत्र रामचंद्र जी को वनवास हुआ और पुत्र वियोग में राजा दशरथ ने भी प्राण त्याग दिये थे।

कहानी 2: बचपन में माँ एक कहानी सुनाती थीं। एक बहुत ही होनहार बालक था। पढ़ने, लिखने, संस्कार सभी में अव्वल। जब उसकी परीक्षा का समय आया तब माँ की तबियत ख़राब हो गयी। बालक ने परीक्षा छोड़ माँ की देखभाल करना उचित समझा औऱ उनकी सेवा में लगा रहा। माँ के बहुत समझाने के बाद भी वो विद्यालय नहीं गया।

जब बालक परीक्षा देने नहीं पहुँचा तब उसके अध्यापक को थोड़ी चिंता हुई। उन्होंने विद्यालय से किसी को भेज कर पता करवाया। जब उन्हें उसके नहीं आने का कारण पता चला तो उन्होंने एक अध्यापिका को घर भेजा की वो बालक की माँ की देखभाल करें ताकि वो परीक्षा दे सके।

विद्यालय से लौटते समय उन्होंने बालक के घर जाकर माँ का कुशलक्षेम पूछा औऱ बालक को ढ़ेर सारा आशीर्वाद भी दिया।

ये तो कहानी हुई। अग़र आप कौन बनेगा करोड़पति का नया सीज़न देख रहे हों तो ज्ञान राज नाम के जो प्रतियोगी झारखंड से आये थे उनके जीवन में ऐसा ही हुआ। इंजीनियरिंग करने के बाद जो नौकरी का ऑफर था उसे छोड़कर उन्होंने बीमार माँ की देखभाल करने का निर्णय लिया। आज वो एक शिक्षक हैं औऱ अपने छात्रों को नई टेक्नोलॉजी सिखाते हैं।

असल ज़िंदगी में मैंने स्वयं ये सब बहुत क़रीब से देखा है। मेरी दादीजी को लकवा हो गया था जिसके चलते उनकी हमेशा देखभाल की ज़रूरत थी। एक सहायिका दिनभर के लिये रखी थी। माँ-पिताजी भी उनकी बहुत सेवा करते। पिताजी का रोज़ का रूटीन था उनको व्हीलचेयर पर बैठाकर नहाने के लिये बाथरूम लेकर जाते औऱ स्नान के बाद जब सहायिका की मदद से वो तैयार हो जातीं, तब उनको बाहर लेकर आते, जहां वो सबके साथ बैठ कर बातचीत करतीं। हम लोग उनको अखबार की ख़बरें भी पढ़कर सुनाते। पिताजी ये सारा काम हमारे साथ स्कूल निकलने से पहले करते। भोजन के लिये दादी को सहारा देकर बैठाने का काम हम भाई बहन का रहता।

अब चलते हैं मेरे कॉलेज के दिनों की तरफ़। जिस कॉलेज में मेरा दाखिला हुआ था वो घर से काफ़ी दूर था (पास वाले कॉलेज में दाखिले के लिये जो नंबर चाहिये थे वो मेरे से बहुत दूर थे)। जाने के दो विकल्प थे – या तो कुछ पैदल औऱ कुछ पब्लिक ट्रांसपोर्ट पर निर्भर रहें या साइकल से जाया जाये। तीसरा विकल्प – गाड़ी वाला फाइनल ईयर में आकर मिला (परीक्षा के लिये)। तो साइकल की उस लंबी यात्रा के दौरान रास्ते में जो सुविचार वाले बोर्ड लगे रहते थे वो पढ़ते जाते थे। आज के जैसे मोबाइल फ़ोन तो हुआ नहीं करते थे की ईयरफोन लगाओ औऱ निकल पड़ो। हाँ चलता फिरता आदमी अर्थात वॉकमैन ज़रूर था लेक़िन जल्दी जल्दी बैटरी बदलना भी संभव नहीं था। कॉलेज लगभग रोज़ ही जाना होता था क्योंकि विज्ञान विषय था तो प्रैक्टिकल होते थे। तो ये सुविचार वाले बोर्ड यात्रा के साथी रहे लगभग तीन वर्ष।

भोपाल में जैसे ही आप भेल (BHEL) टाऊनशिप में प्रवेश करते हैं, बिजली के खम्बों पर लगे ये बोर्ड आपका स्वागत करते हैं। पूरे रास्ते ऐसे बोर्ड लगे हुये थे। ऐसा ही एक बोर्ड जो याद रह गया, उस पर लिखा था

माता पिता की सेवा करने वाला पुत्र कभी दुखी नहीं रहता

आपको बहुत से ऐसे उदाहरण मिल जायेंगे जो माता-पिता की देखभाल का ख़ूब दिखावा करेंगे लेक़िन बात कुछ औऱ ही रहती है। कोई अपने पालकों के नाम पर इमारत खड़ी कर ये समझते हैं समाज में उनकी वाहवाही होगी। कोई उनके बुत बनवा कर साल में एक बार साफ़ सफ़ाई करवा कर फ़ोटो खींच कर व्हाट्सएप ग्रुप में शेयर कर देते हैं। लेक़िन वो उन मूल्यों की तो तिलांजलि दे चुके रहते हैं, जिसका अग़र वो पालन करते तो शायद उनके दिवंगत माता पिता ज़्यादा खुश होते। लेक़िन जैसा इन दिनों फ़ैशन है सब चीज़ का दिखावा करिये। ख़ैर।

जो ऊपर दो कहानी औऱ अपनी दादी के बारे में बताया उसके पीछे कारण था इन दिनों ऐसी खबरें सुनना या पढ़ना जब बच्चे अपने माता पिता को छोड़कर चले जाते हैं या उनकी पूछ परख सिर्फ़ इसलिये करते हैं क्योंकि ज़मीन जायदाद का मामला रहता है। इन खबरों से दुःख तो होता ही है, आश्चर्य भी होता है। ऐसे बेटों की गलतियों के श्रेय ज़्यादातर बहुओं के हिस्से में आता है। चलिये एक बार को मान भी लें की बहू की ग़लती होगी, लेक़िन जिस बेटे को माँ बाप ने पाला पोसा वो कैसे अपने माता पिता के साथ ऐसा व्यवहार होता देख सकते हैं? कहीं न कहीं उनका मौन रहना उस ग़लत व्यवहार को बढ़ावा ही देता है। वैसे ही बड़ा भाई, जिसे मातापिता के न होने पर उनके स्थान पर रखा जाता है, वो कैसे अपने से छोटे भाई बहनों के साथ ग़लत होता देखते रहते हैं ख़ामोशी से? लेक़िन क्या सिर्फ़ संतान ही दोषी हैं? क्या माता-पिता भी कहीं इसके लिये कुछ हद तक दोषी हैं? यहाँ दोषी होने का मतलब क्या वो अपनी संतान से कुछ ज़्यादा की उम्मीद तो नहीं लगा बैठे? ज़्यादातर माता पिता ये मान कर चलते हैं की बुढ़ापे में जब उन्हें ज़रूरत होगी तब उनका पुत्र उनका ख़्याल रखेगा। लेक़िन कई बार ऐसा नहीं होता है। उल्टा माता पिता ही बच्चों के परिवारों का भी ख़्याल रखते हैं।

मुझे याद है जब अमिताभ बच्चन की फ़िल्म बाग़बान आयी थी। किसी कारण से मैं ये फ़िल्म नहीं देख पाया था। छोटे भाई ने फ़ोन कर बोला ये फ़िल्म ज़रूर देखना। जब देखी तो बहुत बढ़िया लगी। लेक़िन सभी को ये फ़िल्म पसंद नहीं आयी। हमारे एक रिश्तेदार फ़िल्म को देखने औऱ बाक़ी लोगों को इसको देखने के लिये बोलने से नाराज़ भी हुये थे। उनका दर्द समझ में भी आता था क्योंकि उनके सुपुत्र औऱ उनके संबंध लगभग ख़त्म से ही हो गये थे।

ख़ैर बात फिल्मों की नहीं है। असल ज़िन्दगी में अमिताभ बच्चन ने जिस तरह से अपने माता पिता की सेवा करी है उसकी भी मिसाल दी जाती है। ऐसी बहुत सी फ़िल्मों का यहाँ उदाहरण दिया जा सकता है।

बाग़बान के अंत का जो सीन है उसमें अमिताभ बच्चन बहुत सारा ज्ञान देते हैं। लेक़िन फ़िल्मों से जो भी ज्ञान मिले, असल ज़िन्दगी में क्यूँ हम ऐसे वाक्ये देखते हैं। भाई बहन के बीच तक़रार फ़िर भी समझ में आती है क्योंकि एक भाई थोड़ा लालची हो जाता है औऱ अपने फायदे के अलावा कुछ नहीं सोचते। लेक़िन माता-पिता के साथ ऐसा व्यवहार कैसे सही हो सकता है? माता पिता उम्र की उस दहलीज़ पर खड़े रहते हैं जहाँ उन्हें बस प्यार औऱ सम्मान की दरकार है। लेक़िन ऐसी बहुत सी संतान हैं जो इतना भी नहीं कर पाती। माता पिता सब इसलिये सह लेते हैं क्योंकि उनके पास औऱ कोई चारा नहीं है। वो अपना बचा हुआ जीवन बस गुज़ारना चाहते हैं।

जब तक माता पिता सामने रहते हैं उनकी क़दर नहीं करते औऱ उनके जाने के बाद सिर्फ़ अफ़सोस ही कर सकते हैं। वैसे ये बात सभी रिश्तों पर लागू होती है। कहाँ तो आप सालों साल बात नहीं करते औऱ फ़िर जब अचानक उनके न होने की ख़बर आती है तो जीवन भर न सही लेक़िन उनके जाने के शुरू के कुछ वर्षों तक आप अफ़सोस जताते रहते हैं। उसके बाद वही ढ़र्रे वाला व्यवहार वापस।

अपने आसपास सभी तरह के लोग देखें हैं। वो जो दिखावा करते नहीं थकते, वो जो माता पिता की क़दर नहीं करते औऱ वो भी जो माता पिता को ढ़ेर सारा प्यार देते हैं औऱ उनका ख़ूब सम्मान भी करते हैं। अगर आपके बच्चे ये देख रहें की आप अपने माता पिता से कैसे व्यवहार कर रहे हैं तो आपको अपने साथ भी ऐसे ही व्यवहार की उम्मीद करनी चाहिये। वैसे इतनी कहानी हो चुकी हैं, नहीं तो इस बारे में भी एक कहानी है। उसका नंबर भी आयेगा।

\”शायद आज की पीढ़ी ये भूल जाती है जहाँ आज हम हैं, कल वो वहाँ होंगे। कल वो भी बूढ़े होंगे।\”

बाग़बान

वैसे ये जो सुविचार वाले बोर्ड थे (अब जानकारी नहीं है वो हैं की नहीं। भेल टाऊनशिप भी अब भुतहा जगह हो गयी है), बड़े याद आतें हैं। हाईवे पर कई गाड़ियों के पीछे भी ऐसे ही गुरुमंत्र लिखे रहते हैं। क्या आपने ऐसा कुछ कभी पढ़ा है जो आपको याद रह गया? कमेंट करके बताइये।

आपको नई पोस्ट की जानकारी मिलती रहे इसके लिये आप मुझे फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम या टेलीग्राम पर फॉलो कर सकते हैं। बहुत जल्द कुछ औऱ नया करने का प्रयास है। उसकी जानकारी उचित समय पर।

न तुम हमें जानो, न हम तुम्हे जाने

आजकल खानेपीने के इतने सारे विकल्प उपलब्ध हैं की कई बार समझ नहीं आता की क्या खाया जाये।

आपने अग़र फ़ैमिली मैन का दूसरा सीजन देखा हो तो, उसमें निर्देशक द्वय राज-डी के ने इस बार दक्षिण भारत में कहानी बताई है। मनोज बाजपेयी अपनी टीम के साथ जब चेन्नई पहुँचते हैं तो एक सदस्य चेन्नई की टीम से कहते हैं मुझे दक्षिण भारतीय खाना बहुत पसंद है। उस टीम के मुख्य उनसे पूछते हैं दक्षिण भारत में कहाँ का भोजन पसंद है। दरअसल हमने पाँच राज्यों को एक में समेट लिया औऱ ये भी मान बैठे की सभी राज्यों में एक जैसा ही खाना खाया जाता है।

इसका ज़िक्र इसलिये कर रहा हूँ की मुझ पर ये इल्ज़ाम लगता है कि मुझे दक्षिण भारत में होना चाहिये था क्योंकि मुझे भी दक्षिण भारतीय व्यंजन बेहद पसंद हैं। अब किस राज्य में होना चाहिये ये मेरे लिये चुनना मुश्किल है। वैसे मुझे गुजराती व्यंजन भी बेहद पसंद हैं। आज गाड़ी दक्षिण की तरफ़ मुड़ चुकी है तो वहीं चलते हैं। दक्षिण भारतीय व्यंजन से परिचय बहुत देर से हुआ क्योंकि जब हम बड़े हो रहे थे तब खानेपीने के इतने सारे विकल्प नहीं थे। कुछ अलग खाने की इच्छा होती तो चाट या समोसा-कचोरी।  इसके अलावा सब कुछ घर पर ही बनता औऱ स्वाद लेकर खाया भी जाता। अब तो एप्प आ गईं हैं जो आपकी ये मुश्किल आसान कर देती हैं। जब एक वर्ष दिल्ली में रहा तो एप्प ने बड़ा साथ दिया लेक़िन कई बार समझ ही नहीं आता क्या खाया जाये। चाइनीज औऱ बाक़ी विकल्पों में घूमते हुये ही समय निकल जाता फ़िर थाली ही आर्डर करने के लिये बचती।

आज के जैसे तैयार घोल जिससे आप इडली डोसा उत्तपम आसानी से बना सकते हैं, वो भी उन दिनों उपलब्ध नहीं था। मतलब सब स्वयं तैयारी करिये औऱ उसपर से सब की अलग अलग पसंद। डोसा तो फ़िर भी कभी कभार बन ही जाता था लेक़िन इडली से मुलाक़ात बहुत बाद में हुई जब इडली बनाने का साँचा मिलने लगा। कई गृहणियों ने अपने अपने हिसाब से इन व्यंजनों को बनाने का तरीका भी निकाला। कुछ ने तो आज का चेन्नई औऱ उन दिनों के मद्रास से साँचे भी मंगाये। एक परिवार ने साँचे मंगा तो लिये लेक़िन उसका उपयोग उन्हें शुरू में समझ में नहीं आया तो उन्होंने अपना एक जुगाड़ निकाला। अप्पे के साँचे को इडली के घोल से भरने के बाद वो उसी के ऊपर तड़का भी लगा देतीं। ये नई तरह की डिश का उन्होंने नामकरण भी किया औऱ सबसे ज़्यादा अच्छी बात ये हुई की ये परिवार के सदस्यों को पसंद भी आई।

जब तक भोपाल में रहे तो बाहर खाना बहुत कम हुआ। ऐसे ही किसी ख़ास मौके पर जाना हुआ इण्डियन कॉफ़ी हाउस या ICH जो उन दिनों न्यू मार्केट के मुख्य बाज़ार का हिस्सा हुआ करता था। उसके बाद से इडली, डोसा औऱ उत्तपम के साथ कॉफ़ी से मोहब्बत का जादू ऐसा चला की आज भी ये खाने को मिल जाये तो औऱ कुछ नहीं सूझता। रही सही कसर कॉलेज में बने दोस्तों से पूरी हो गयी। मेरे उस समय के मित्र जय, विजय औऱ सलिल तीनों ही दक्षिण भारत से थे औऱ इनके यहाँ खाने का कोई मौक़ा मैं नहीं छोड़ता।

जब पत्रकारिता के क्षेत्र में कदम रखा तो कॉफ़ी हाउस जाना बहुत नियमित हो गया था। कारण? वहाँ बहुत सी पत्रकार वार्ता हुआ करती थीं। इसके अलावा उस समय के काफ़ी सारे पत्रकार सुबह वहाँ इकट्ठे होते औऱ कॉफ़ी औऱ सिगरेट के बीच पिछले दिन के समाचार की समीक्षा औऱ बाक़ी चर्चा होती। मेरा इसमें जाना हुआ नहीं क्योंकि सभी बहुत सीनियर लोग थे लेक़िन मेरे गुरु नासिर क़माल साहब ने बुलाया कई बार।

परिवार के साथ भी कहीं बाहर खाने के लिये जाना होता तो ज़्यादातर कॉफ़ी हाउस का ही रूख़ करते। खाना पसंद आने के अलावा एक औऱ चीज़ जो अच्छी थी वो थी क़ीमत जो जेब पर डाका डालने वाली नहीं थी। मध्यम वर्गीय परिवार के लिये इससे अच्छी बात औऱ क्या हो सकती थी। अच्छा उन दिनों का मेनू भी बहुत ज़्यादा बड़ा नहीं हुआ करता था। अब जो नया कॉफ़ी हाउस बना है वहाँ तमाम तरह की चीज़ें मिलने लगी हैं लेक़िन आज भी जो सांभर वहाँ मिलता है उसका कोई मुकाबला नहीं।

आज ये दक्षिण भारतीय खाने के बारे में इसलिये लिख रहा हूँ क्योंकि पिछले दिनों कहीं पढ़ा था की नागपुर शहर से इडली डोसा सांभर का परिचय करवाया था महान वैज्ञानिक सी वी रमन जी ने। बात 1922 की है जब अंग्रेजों ने उन्हें नागपुर में एक संस्थान खोलने के लिये भेजा था। नागपुर की गर्मी तो उन्होंने जैसेतैसे बर्दाश्त कर ली लेक़िन जैसा की अमूमन होता है, वहाँ जो खाना मिलता था उसमें बहुत तेल होता औऱ उसका स्वाद भी उन्हें नहीं भा रहा था। जिस तरह का खाना उनको चाहिये था वो कहीं भी मिल नहीं रहा था। रमन जी ने अपने घर से रसोइये रामा अय्यर को बुला लिया।

महाराज के आने के बाद रमन जी को उनके स्वाद का भोजन मिलने लगा। कुछ दिनों बाद उन्होंने सोचा इन व्यंजनों से नागपुर के रहवासियों का भी परिचय कराया जाय औऱ इस तरह शुरुआत हुई \’विश्रांति गृह\’ की। कुछ ही दिनों में ये रेस्टोरेंट चल निकला औऱ लोगों की भारी भीड़ रहने लगी। कई बार तो रविवार को पुलिस की मदद लेनी पड़ती भीड़ को काबू में रखने के लिये। जो व्यंजन मिल रहे थे न सिर्फ़ उनका स्वाद अलग था बल्कि उनको बनाने का तरीका भी। जैसे दक्षिण भारतीय व्यंजन में नारियल का प्रयोग होता है। महाराष्ट्रीयन खाने में सूखे नारियल का प्रयोग होता है। लोगों को स्वाद बेहद पसंद आया।

इस खाने के चर्चे दूर तक होने लगे औऱ कोई भी अभिनेता या नेता नागपुर आते तो \’विश्रांति गृह\’ के भोजन का स्वाद लिये बिना नहीं जाते। फ़िल्म अभिनेता अशोक कुमार, कांग्रेस की नेता इंदिरा गांधी भी यहीं से खाना मँगवाते। ये भी माना जाता है की आजकल जो रवा डोसा खाया जाता है उसकी उत्पत्ति भी नागपुर शहर में ही हुई है। जब डोसे का घोल समाप्त हो जाता लेक़िन भीड़ कम नहीं होती तो महाराज ने रवा घोल कर डोसा बनाना शुरू कर दिया। 1930 में अय्यर महाराज ने अपने ख़ास रसोइये मणि अय्यर को रेस्टोरेंट की ज़िम्मेदारी सौंप दी औऱ दक्षिण भारत वापस चले गये। नागपुर में ये रेस्टोरेंट आज भी चल रहा है औऱ परिवार के सदस्य जो किसी का पेट भरने को एक पुण्य का काम मानते हैं, उनका भी यही प्रयास है की ये कभी बंद न हो।

नागपुर से वापस आते हैं भोपाल औऱ यहाँ के कॉफ़ी हाउस में। इस बार लिटिल कॉफी हाउस जो ICH से थोड़ी दूरी पर बना था। इसके जो मालिक थे वो पहले एक ठेला लगाते थे औऱ धीरे धीरे उनके बनाये खाने का स्वाद लोगों की ज़ुबान पर चढ़ा औऱ उन्होंने अपना रेस्टोरेंट खोल लिया। लेक़िन उन्होंने उस हाथ ठेले को नहीं छोड़ा औऱ उसको भी अपने रेस्टोरेंट में रखा। यहाँ जाना थोड़ा कम हुआ करता था क्योंकि ये थोड़ा अंदर की तरफ़ था।

तो कॉफ़ी हाउस ICH में उन दिनों बैठने के अलग अलग हिस्से थे। मसलन परिवार के लिये अलग जगह थी औऱ बाक़ी लोगों के लिये जो मैन हॉल था वहीं पर ऊपर नीचे बैठने की व्यवस्था थी। अगर आप अपनी महिला मित्र को लेकर जा रहें औऱ किसी की नज़र में भी नहीं आना चाहते हैं तो आप फैमिली वाले एरिया में जा सकते हैं। वो फैमिली का हिस्सा बने या न बनें कॉफी हाउस की मुलाक़ात तो यादगार बन जायेगी। ऐसे ही वहाँ कई जोड़ियाँ भी पक्की हुई हैं। 1970 के दश्क में विवाह के लिये परिवारों को मिलना होता या लड़का/लड़की को दिखाने का कार्यक्रम होता तो वो भी इसी जगह होता। बात आगे बढ़ती तभी घर पर जाना होता। किसी की पहली मुलाक़ात, कॉफी हाउस जैसी चहल पहल वाली जगह औऱ वहाँ की कॉफ़ी। भला इससे बेहतर एक सफ़र की शुरुआत क्या हो सकती है।

हमारे समय तक आते आते नये होटल आ गये थे तो ये कार्यक्रम वहाँ सम्पन्न होता। वैसा अच्छा ही हुआ क्योंकि अग़र कॉफ़ी हाउस जाते औऱ सांभर चटनी पर ध्यान लग जाता तो ये कार्यक्रम वहीं धरा का धरा रह जाता। अगर कभी भोपाल जाना हुआ तो कॉफ़ी हाउस के लिये समय निकाल लें। बहुत कुछ बदल ज़रूर गया है, भीड़ भी होने लगी है लेक़िन स्वाद लगभग वैसा ही है।

क्या आपको वो दिन याद हैं जब होटल जाना एक बड़ा जश्न हुआ करता था? अपनी यादों को मेरे साथ साझा करें। आप कमेंट कर सकते हैं या इस ब्लॉग के टेलीग्राम चैनल से भी जुड़ सकते हैं।


https://t.me/aseemshrivastava

कल भी आज भी कल भी, इन यादों का सफ़र तो रुके न कभी

आज भारत में रेडियो के प्रसारण की वर्षगाँठ पर कुछ बातें रेडियो की

बचपन औऱ उसके आगे के भी कई वर्ष रेडियो सुनते हुये बीते। उस समय मनोरंजन का एकमात्र साधन यही हुआ करता था। फिल्में भी थीं लेक़िन कुछ चुनिंदा फिल्में ही देखी जाती थीं। रेडियो से बहुत सी यादें जुड़ी हुई हैं। आज ये मानने में कुछ मुश्किल ज़रूर हो सकती है लेक़िन एक समय था जब पूरी दिनचर्या रेडियो के इर्दगिर्द घुमा करती थी। चूँकि रेडियो के जो भी कार्यक्रम आते थे उनका एक निश्चित समय होता था तो आपके भी सभी काम उस समय सारिणी से जुड़े रहते थे।

मेरे दादाजी का जो रूटीन था वो इसका एक अच्छा उदाहरण है। उनका रात का खाने का समय एक कार्यक्रम \’हवामहल\’ के साथ जुड़ा था। इस कार्यक्रम में नाटिका सुनाई जाती है औऱ इसके तुरन्त बाद आता है समय समाचारों का। खाना खाते खाते दादाजी नाटिका का आनंद लेते औऱ उसके बाद समाचार सुनते। इस कार्यक्रम के शुरुआत में जो धुन बजती है ये वही है जो मैं दादाजी के समय सुनता था। आज जब सुनो तो एक जुड़ाव सा लगता है इस धुन से।

जब हमारा स्कूल जाने का समय हुआ तो विविध भारती सुबह से सुनते। सुबह 7.30 बजे संगीत सरिता कार्यक्रम आता जिसमें किसी राग पर आधारित फिल्मी गाना औऱ उस राग से जुड़ी बारीकियों के बारे में बताते। इसके बाद 7.45 से आठ बजे तक तीन या चार फ़िल्मी गाने औऱ फ़िर सुबह के समाचार।

कभी स्कूल जाने में देरी होती तो वो भी गाने का नंबर बता कर बताया जाता। मसलन तीसरा गाना चल रहा है मतलब आज तो स्कूल में सज़ा मिलने की संभावना ज़्यादा है। ख़ैर विविध भारती का ये साथ तब तक रहा जब तक स्कूल सुबह का रहा। जब दोपहर की शिफ़्ट शुरू हुई तो विविध भारती सुनने का समय भी बदल गया। अग़र मुझे ठीक ठीक याद है तो सुबह दस बजे सभा समाप्त औऱ बारह बजे फ़िर से शुरू। लेक़िन तबतक अपना स्कूल शुरू हो चुका रहता। स्कूल बदला तो औऱ सुबह जाना पड़ता तो सुबह का रेडियो छूट सा ही गया था।

सुबह का जो एक और कार्यक्रम याद में रहा वो था मुकेश जी की आवाज़ में रामचरित मानस। इसका प्रसारण सुबह 6.10 पर होता था तो अक़्सर छूट ही जाता था लेक़िन जब कभी सुबह जल्दी होती तो ज़रूर सुनते। जैसे ही वो मंगल भवन बोलते लगता बस सुनते रहो।

https://youtu.be/ndamULt4n6c

दोपहर को ज़्यादा सुनने को नहीं मिलता। कभी छुट्टी के दिन ऐसा मौक़ा मिलता तो दो कार्यक्रम ही याद आते – भूले बिसरे गीत औऱ लोकसंगीत। दूसरा कार्यक्रम लोक गीतों का रहता जिसे दादी बड़े चाव से सुनती। जो अच्छी बात थी उस समय रेडियो के बारे में वो थी सभी के लिये कुछ न कुछ कार्यक्रम रहता।

शाम को विविध भारती की सभा शुरू होने से पहले भोपाल के स्थानीय प्रसारण सुनते। एक जानकारी से भरा कार्यक्रम आता \’युववाणी\’। हमारे घर से लगे दूसरे ब्लॉक में सचिन भागवत दादा रहते थे औऱ वो उस कार्यक्रम का संचालन करते तो इस तरह से इसको सुनने का सिलसिला शुरू हुआ। एक बार तो उन्होंने अपने कार्यक्रम में मुझे भी बुला लिया। ये याद नहीं क्या ज्ञान दिया था मैंने लेक़िन उसके बाद कभी मौका नहीं मिला रेडियो स्टेशन जाने का। पिताजी प्रदेश के समाचार जानने के लिये कभी कभार शाम को प्रादेशिक समाचार भी सुनते।

शाम को विविध भारती सुनने का नियम भी हुआ करता था। शाम सात बजे के समाचार औऱ उसके बाद आता फ़ौजी भाइयों के लिये कार्यक्रम \’जयमाला\’। इसमें हमारे फ़ौजी अपनी फ़रमाइश भेजते जिसको हम लोगों को सुनाया जाता। अपने घर से दूर फौजियों का एक तरह से संदेश अपने परिवार के लिये औऱ पूरा परिवार भी रेडियो के आसपास इकट्ठा होकर साथ में गाना भी सुनते। हफ़्ते का एक दिन किसी एक फ़िल्मी हस्ती के नाम रहता जहाँ वो अपनी पसंद के गाने सुनाते औऱ अपने अनुभव भी बताते।

हमारे घर में दो बड़े पुराने रेडियो थे जो शुरू होने में अपना समय लगाते। एक ट्रांज़िस्टर भी था जिसको लेकर हम बाहर जो खुली जगह थी वहाँ बैठ जाते औऱ गाने सुनते। मुझे याद है ऐसे ही रेडियो सिलोन पर अमीन सायानी साहब का बिनाका गीतमाला सुनना। बाद में ये प्रोग्राम विविध भारती पर भी आया लेक़िन रेडियो सिलोन पर ऊपर नीची होती आवाज़ को सुनने का मज़ा ही कुछ औऱ था। ज़्यादा मज़ा तब आता जब वो गाने की पायदान के बारे में कुछ बताना शुरू करते औऱ आवाज़ गायब औऱ जब तक वापस आते तब तक गाना शुरू। अब उस समय रिपीट तो नहीं होता था तो बस अगले हफ़्ते तक इंतज़ार करिये।

जब समसामयिक विषयों पर औऱ अधिक जानकारी की ज़रूरत पड़ी तो बीबीसी सुनना शुरू किया। बीबीसी लंदन पर हिंदी सेवा की पहले तीन शो हुआ करते थे औऱ बाद में एक औऱ जोड़ दिया गया था। कई बार जो सुनते उसको नोट भी करते। औऱ क्या कमाल के कार्यक्रम होते। आज भले ही टेक्नोलॉजी बहुत अच्छी हो गई है लेक़िन उस समय के कार्यक्रम एक से बढ़कर एक।

टीवी का आगमन तो 1984 में हो गया था लेक़िन उसका चस्का लगने में बहुत वक़्त लगा। इसके पीछे दो कारण थे। एक तो बहुत ही सीमित प्रसारण का समय औऱ दूसरा रेडियो तब भी एक सशक्त माध्यम हुआ करता था।

आज भी गाना सुनने में जो आनंद है वो गाना देखने में नहीं। कोई भी रेडियो कार्यक्रम सुन लीजिये, ये आपकी कल्पना को पंख लगा देता। कोई गाना सिर्फ़ सुना हो तो आप कल्पना करते हैं की उसे किस तरह फ़िल्माया गया होगा। लेक़िन जहाँ आपने उस गाने को देखा तो आपकी पूरी कल्पना पर पानी फ़िर जाता है। दूसरा सबसे बड़ा फ़ायदा है रेडियो का वो है आप को कहीं बैठकर उसको सुनना नहीं होता। आप अपना काम भी करते रहिये औऱ बैकग्राउंड में रेडियो चल रहा है। जैसे फ़िल्म अभिमान के गाने \’मीत न मिला रे मन का\’ में एक महिला गाना सुनते हुये अपने होठों पर लिपिस्टिक लगाती रहती हैं। आप यही काम टीवी देखते हुये करके दिखाइये। फ़िल्म चालबाज़ में रोहिणी हट्टनगड़ी जैसा मेकअप हो जायेगा।

जैसे मुझे अभी भी फ़िल्म क़यामत से क़यामत तक का रेडियो प्रोमो याद है जिसमें जूही चावला का एक डायलॉग था औऱ अमीन सायानी साहब की आवाज़ में फ़िल्म के बारे में कुछ और जानकारी। उसके बाद फ़िल्म का गाना। क्या दिन थे…

रेडियो से जुड़ी एक मज़ेदार घटना भी है। कार्यक्रम के बीच में परिवार नियोजन के विज्ञापन भी आते। एक दिन सभी परिवारजन साथ में बैठे हुये थे औऱ एक ऐसा ही विज्ञापन आ गया। मेरी बुआ के बेटे जो उन दिनों वहीं रहकर परीक्षा की तैयारी कर रहे थे औऱ ये विज्ञापन पहले कई बार सुन ही चुके होंगे, अचानक विज्ञापन के साथ साथ उसकी स्क्रिप्ट बोलने लगे। उस समय परिवार नियोजन तो समझ नहीं आता था लेक़िन ये समझ गये कुछ गड़बड़ बोल गये क्योंकि उसके फ़ौरन बाद वो कमरा छोड़ कर भाग गये थे।

जाड़ों की नर्म धूप और…

पिछले कुछ दिनों से सभी जगह ठंड ने अपने पैर जमा लिये हैं। मुम्बई में भी मौसम कुछ रूमानी सा ही रहा है पिछले कुछ दिनों से। उत्तर भारत जैसी कड़ाके की सर्दी तो नहीं लेक़िन मुम्बई वालों के हिसाब से यही काफी है सबके गर्म कपड़ों के ढ़ेर को बाहर निकालने के लिये।

हर मौसम की अपनी एक ख़ासियत होती है। सर्दियों के अपने आनंद हैं। आज की इस पोस्ट का श्रेय जाता है मेरे फेसबुक मित्र चारुदत्त आचार्य जी को। उन्होंने एक पोस्ट करी थी सर्दियों में स्नान के बारे में और कैसे पानी बचाते हुये ये स्नान होता था और उसका अंतिम चरण। आप इस पोस्ट को यहाँ पढ़ सकते हैं।

आज जो शहरों में लगभग सभी घरों में जो गीजर होता है, उसका इस्तेमाल 1980-90 के दशक में इतना आम नहीं था। सर्दियाँ आते ही गरम पानी की भी ज़रूरत होती स्नान के लिये। चूँकि गैस सिलिंडर उन दिनों इतनी जल्दी जल्दी नहीं मिलते थे तो पानी गर्म करने के लिये दो ही विकल्प रहते – या तो घासलेट (केरोसिन) से चलने वाला स्टोव या लकड़ी या कोयले से चूल्हा जलाया जाये।

ये भी पढ़ें: दिल्ली के मौसम के मिज़ाज़ और कुल्फी की मीठी यादें

केरोसिन के साथ भी समय पर मिलने की समस्या होती। राशन की दुकान पर आने के पहले ही ख़त्म हो जाने का बोर्ड लग जाता। स्टोव जलाना भी एक मशक्क़त वाला काम हुआ करता था। थोड़ी थोड़ी देर में जैसे चूल्हे की आग को देखते रहना पड़ता वैसे ही स्टोव को भी पंप करते रहना पड़ता था।

लेक़िन कोयला आसानी से मिलता था। सुबह सुबह ठेले पर जैसे सब्ज़ी वाले निकलते वैसे ही कोयले वाले भी निकलते। कोयला स्टॉक कर लीजिये और सर्दियों की सुबह लग जाइये इस काम पर। अगर कोयला भी नहीं मिले तो लकड़ी का जुगाड़ करिये क्योंकि ठंडे पानी से नहाने का अवार्ड अभी भी नहीं मिलता। वैसे कई लोगों को जानता हूँ जो हर मौसम ठंडे पानी से ही स्नान करते हैं।

बहरहाल, बहुत लंबे समय तक पानी ऐसे ही गर्म होता रहा। हमारे सरकारी घर में जो पड़ोसी थे उनके यहाँ पानी गर्म करने का अलग यंत्र था। उसकी तस्वीर नीचे लगी है। बस रोज़ सुबह जिस समय हमारे यहाँ आग लगा कर चूल्हा जलाने की मशक्कत चालू रहती उनके यहाँ इस यंत्र को आंगन में रखा जाता और पानी गर्म करने की प्रक्रिया शुरू।

पानी की समस्या तो नहीं थी लेक़िन जैसा चारुदत्त जी ने कहा गर्म पानी का सप्लाई बहुत ही सीमित मात्रा में होता। मतलब जितनी बड़ी पतीली उतना ही पानी। तो आज जो शॉवर के नीचे या टब के अंदर समय न पता चलने वाला जैसा स्नान संभव नहीं होता। और उस स्नान का अंत एकदम वैसा जैसा की वर्णन किया गया है – बाल्टी उठा कर सिर पर पानी डालने की प्रक्रिया।

जैसे गीजर जीवन में लेट आया वैसे ही प्लास्टिक भी। तो उस समय जो बाल्टी हुआ करती थी वो भी लोहे की। मतलब उसका भी वज़न रहता। बस वो 3 Iditos वाला सीन, सिर के ऊपर बाल्टी, नहीं हुआ।

जब गीजर आया तो वो ड्रम गीजर था। मतलब जो आजकल के स्टोरेज गीजर होते हैं वैसा ही लेक़िन दीवाल पर नहीं टंगा होता। मतलब अब गर्म पानी की सप्लाई में कोई रोकटोक नही। जब तक सरकारी घर में रहे तब तक इसका ही आसरा रहा। जब स्वयं के घर में गये तो थोड़ा सॉफिस्टिकेटेड से हो गए। मतलब अब सबके बाथरूम में अलग गीजर।

गीजर से जुड़ा एक मज़ेदार वाकया भी है। किसी रिश्तेदार के यहाँ सर्दियों में गये थे। उनके यहाँ एक गीजर था जिसकी सप्लाई सभी जगह थी। लेक़िन समस्या ये थी की अगर कहीं और भी गर्म पानी का इस्तेमाल हो रहा होगा तो आपको नहीं मिलेगा या कम मात्रा में मिलेगा। ये बात तब मालूम पड़ी जब शॉवर के नीचे खड़े हुये।

मॉरल ऑफ द स्टोरी: सर्दी हो या गर्मी हर मौसम के मज़े लीजिये। हर मौसम के ज़ायके का भी जब तक मज़ा ले सकते हैं, ज़रूर से लें। जैसे सर्दियों में गाजर का हलवा और छौंका मटर।

दिल दा मामला है

पहली लाइन में क्लियर कर दूँ। ये उस दिल के मामले की बात नहीं हो रही है जिसपर काफ़ी कुछ लिखा जा चुका है बल्कि ये बात है और गहरे कनेक्शन की।

जब घर से बाहर निकले नौकरी करने के लिये तो शुरुआती समय तो काम समझने और अकेले रहने के तामझाम में ही निकल जाता। तामझाम से मेरा मतलब है अपने रहने, खाने आदि का इंतज़ाम करने में निकल जाता। जो छुट्टी मिलती उसके काम बिल्कुल निर्धारित होते। कपड़े धुलना, उनका प्रेस करवाना और सोना। उस समय गाने देखने से ज़्यादा सुनने का चलन था तो रेडियो चलता रहता और काम भी।

इन सबके बीच अगर घर की याद आये तो एसटीडी बूथ पर पहुंच जाइए औऱ 11 बजे का इंतजार करिये जब कॉल करने में सबसे कम पैसे लगते। उसके बाद सरकार ने तरस खाकर ये समय बदला। आज जब फ़ोन कॉल फ्री हो गया है और आप जितनी चाहें उतनी बात कर सकते हैं। लेक़िन एक समय था जब नज़र सामने चलते काउंटर पर होती थी और उँगली तुरंत डिसकनेक्ट करने को तैयार।

इन सबके बीच घर की याद बीच रोड पर आ जाती या इस बात का एहसास करा जाती की आप घर से दूर हैं, जब आपको उस प्रदेश/शहर के नंबर प्लेट की गाड़ियों के बीच एक नंबर अपने प्रदेश का दिखाई दे जाय। औऱ चूँकि आपकी नज़रें उन नंबरों को अच्छे से पहचानती हैं तो वो नज़र भी फ़ौरन आ जाते हैं। मुझे नहीं पता ऐसा आप लोगों के साथ हुआ है या नहीं लेक़िन मेरे साथ ज़रूर हुआ है।

आदमी स्वभाव से लालची ही है। तो प्रदेश का नंबर ठीक है लेक़िन अपने शहर का देखने को मिल जाये तो लगता उस गाड़ी वाले को रोककर उससे कुछ गप्प गोष्ठी भी करली जाये। क्या पता कुछ जान पहचान भी निकल जाये। हालांकि ऐसा कभी किया नहीं लेक़िन इच्छा ज़रूर हुई।

पहले जो गाड़ियों के नंबर हुआ करते थे उनमें ऐसा करना थोड़ा मुश्किल होता था लेक़िन जब नया सिस्टम आया जिसमें राज्य के बाद शहर का कोड होता है तो अब शहर जानना आसान हो गया है। मतलब वाहन चालक आपके शहर से है ये नंबर प्लेट बता देती है। अब तो एप्प भी है जिसमें आपको गाड़ी की पूरी जानकारी भी मिल सकती है। कहाँ तो नंबर प्लेट से कनेक्शन ढूंढ रहे थे और कहाँ अब मालिक का नाम पता भी मिल जाता है। वैसे मैं तबकी बात कर रहा हूँ जब ये व्हाट्सएप या वीडियो कॉल या फ़ेसबुक कुछ भी नहीं होता था। लेक़िन लोगों की नेटवर्किंग ज़बरदस्त। लोगों ने अपने प्रदेश, शहर आदि के लोगों को ढूंढ भी लिया और वो नियमित मिलते भी।

ये दिल का कनेक्शन तब और खींचता है जब आप कहीं बाहर गये हों। मतलब घर से और दूर विदेश में। उस समय कोई भारत से मिल जाये तो अच्छा, उस पर अपनी बोली, प्रदेश और शहर का हो तो लगता है दुआ कबूल हो गई औऱ घर पर खाने के लिये बुला ले तो…

पिछले दिनों कमला हैरिस के उपराष्ट्रपति बनने पर कुछ ऐसा ही देखने को मिला। सबने ढूंढ ढूंढ कर उनके भारतीय कनेक्शन निकाले औऱ उसके बाद बस ऐसा माहौल बना जैसे कोई भारतीय बन गया हो। लेक़िन सच्चाई कुछ और ही है। वैसे भी इस राजनीतिक टिप्पणी से भटकने की संभावना ही ज़्यादा है।

तो विदेश यात्रा पर ये दिल हिंदुस्तानी हो जाता है औऱ एक दो दिन के अंदर ही भारतीय खाने की तलब लगने लगती है। अच्छा बुरा जैसा मिले बस खाना अपना हो। उस समय ये जज़्बात फूट फूट के बाहर निकलते हैं। अब भारत वापस आ जाते हैं। यहाँ भी ऐसा ही होता है। जैसे जिस शहर से आप आये हैं वहाँ का अगर कुछ खानपान मिलने लगे तो सबको पता चल जाता है।

मैं तो कुछ ऐसे लोगों को भी जनता हूँ जो शहर, प्रदेश घूमने के बाद भी वही नंबर रखते हैं क्योंकि ये नंबर प्लेट से उनका दिल का कनेक्शन होता है। आज ये विषय दरअसल कौन बनेगा करोड़पति की देन है। एक प्रतियोगी ने मध्यप्रदेश में अपने किसी संबंधी को कॉल करके मदद माँगी थी। टीवी स्क्रीन पर इंदौर देखा तो एक अलग सी फीलिंग आयी। हालाँकि इंदौर शायद बहुत कम जाना हुआ है लेक़िन है तो अपना शहर।

वैसे अब ऐसा नंबर प्लेट देखकर प्यार कम उमड़ता है क्योंकि जैसे जैसे समझ आती जा रही है ये पता चल रहा है की ये सब सोच का कमाल है। आप कई बार सिर्फ़ शरीर से कहीं होते हैं लेक़िन मन से कहीं और। मतलब घर की यादों को अब महसूस करते हैं और रूहानी तौर पर वहीं पहुँच भी जाते हैं। लेक़िन फ़िर भी कभी कभी ऐसा हो जाता है।

वैसे ये फीलिंग आप नीचे धरती पर हों या हवाई जहाज में या अंतरिक्ष में। पहले और एकमात्र भारतीय अंतरिक्ष यात्री राकेश शर्मा से भी जब इंदिरा गांधी ने पूछा कि ऊपर से भारत कैसा दिखता है तो उनका जवाब – सारे जहाँ से अच्छा।

यही तो है दिल का कनेक्शन।

आ अब लौट चलें

दिल्ली से चला परिवार आशा है सकुशल रायपुर के पास अपने गाँव पहुँच गया होगा। हम सभी लोगों के लिये भी ये एक ताउम्र याद रखने वाला अनुभव बन चुका है। कभी न ख़त्म होने वाली लगने वाली यात्रा इस परिवार को अलग कारण से याद रहेगी और हम घर में क़ैद लोग इन दिनों को बिल्कुल अलग कारणों से याद रखेंगे। मैं बोल तो ऐसे रहा हूँ की लोककल्याण मार्ग निवासी से मेरी दिन में दो चार बार बात हो जाती है और वहाँ से मुझे पता चला है कि ये जल्दी ख़त्म होने वाला है। ये कारावास अगले आठ दिनों में ख़त्म होगा, ये मुश्किल लगता है।

आज से करीब चौदह वर्ष पूर्व मुझे भोपाल में कार्य करते हुये एक संस्था से जुड़ने का मौक़ा मिला जो ग्रामीण क्षेत्रों में हो रहे विकास कार्यों की मोनिटरिंग करती थी। मुझे शुरू से ऐसे कामों में रुचि रही है। इससे पहले भी मैंने थोड़ा बहुत कार्य किया था।

ये भी पढ़ें: घर जाने की बात ही कुछ और

इस कार्य के लिये मुझे जबलपुर के समीप के गाँव में जाने का अवसर प्राप्त हुआ। गाँव से मेरा कोई नाता नहीं रहा है। पुष्तैनी गाँव भोपाल के समीप ही था लेक़िन जैसे होता है \’बहुत\’ से कारणों के चलते जाने के बहुत ही सीमित अवसर मिले। शहरों के समीप जो गाँव थे उनका उस समय ज़्यादा शहरीकरण नहीं हुआ था। लेकिन जिस गाँव में मुझे जाना था वो थोड़ा अंदर की और था।

मेरे लिये ये अनुभव बिल्कुल अलग था। गाँव को दूर से देखना और वहाँ जाकर उनके साथ समय बिताना, उनके रहन सहन को देखना, उनके तौर तरीकों को समझना। ये सब इस यात्रा में जानने की कोशिश हुई। एक बार जाना और चंद घंटे में ये समझ पाना बहुत ही मुश्किल है।

लेकिन उस दिन मैंने देखा हमारे गाँव दरअसल एक अलग दुनिया है। गाँधीजी ने सही कहा था – असली भारत गाँव में बसता है। उस समय गाँव में सभी बुनियादी सुविधाओं का अभाव था। दस किलोमीटर दूर से खाने पीने का सामान लेकर आना पड़ता था। स्वास्थ्य सुविधायें कागज़ पर ही रही होंगी। लगा था इतने वर्षों में स्थिति में सुधार हुआ होगा। लेकिन पिछले दिनों देखा दिल्ली के समीप एक गाँव है जहाँ नाव द्वारा पहुँचा जा सकता है लेकिन वहाँ कोई सरकारी मदद नहीं पहुँची थी।

ये भी पढ़ें: चाय पर चर्चा कोई जुमला नहीं है

अगर इसको हम ज़्यादातर गाँव की सच्चाई मान लें तो क्यूँ इतनी बड़ी संख्या में लोग लॉकडाउन के बाद पैदल ही निकल पड़े? कारण बहुत ही सीधा सा है। वो जहाँ के लिये निकले थे वो उनका घर है। वहाँ उनके अपने हैं। घर कैसा भी हो, सुविधाओं का भले ही अभाव हो लेकिन वो अपना है। शहर तो सिर्फ़ परिवार के भरण पोषण के लिये टिके हुए हैं। सिर्फ़ पैसा कमाने के लिये।

घर जाने पर एक आनन्द की अनुभूति। जैसी मुझे आज भी होती है जब कभी भोपाल जाने का मौक़ा मिलता है। बाक़ी बहुत कुछ मुझे उस परिवार से सीखना है।

https://youtu.be/DIbc7G-q6Rg

हम हैं राही प्यार के, हमसे कुछ न बोलिये

1993 में आई फ़िल्म हम हैं राही प्यार के घर के नज़दीकी सिनेमाघर में लगी थी। आमिर खान और जूही चावला की फ़िल्म थी और ट्रेलर देख और गाने सुनने में अच्छे थे। मैं जूही चावला का बड़ा फैन कैसे इस फ़िल्म को नहीं देखता। फ़िल्म का एक गाना घूंघट की आड़ से दिलबर का ज़बरदस्त हिट हुआ था। आजकल तो ऐसा बहुत कम होता है पर उन दिनों ऑडियंस स्क्रीन के पास जाकर अपनी नृत्य कला का प्रदर्शन करती। ऐसा पिछली कई फिल्मों के दौरान, जिनके गाने बहुत हिट थे, ऐसा माजरा देखने को मिला था।

जब सिनेमाघर में ये गाना आया तो वही हुआ। पूरे गाने तक सब जमकर नाचे। लेकिन उसके बाद जो हुआ वो उसके पहले और बाद कभी नहीं हुआ। गाना ख़त्म होते ही हॉल में शोर बढ़ गया और शो को रुकवाया गया। फ़िल्म को गाने के पहले से फ़िर से दिखाने की माँग की गई। सिनेमाघर के मैनेजमेंट ने स्थिति को समझते हुये यही बेहतर समझा की गाना फ़िर से दिखाये जाने में ही समझदारी है। बस फ़िर क्या गाना फ़िर से लगाया गया और इस बार सबने बैठकर गाने का आनंद लिया।

मेरे जीवनकाल में ये पहली और अंतिम बार हुआ था। उसके बाद एक से एक हिट गानों वाली फिल्म देखी लेकिन दोबारा ऐसा नहीं हुआ।

ये घटना आज इसलिये याद आयी की एक वीडियो देखा जा रहा है जिसमें एक कश्मीरी महिला आज रिलीज़ हुई फ़िल्म शिकारा को देख बहुत ज़्यादा दुखी हुईं। इस फ़िल्म को देखने फ़िल्म के निर्देशक विधु विनोद चोपड़ा भी पहुँचे थे फ़िल्म के कलाकारों के साथ। महिला दर्शक ने विनोद चोपड़ा पर आरोप लगाया कि उन्होंने पूरी सच्चाई नहीं दिखाई।उन्होंने कहा उनके परिवारों ने इतना कुछ झेला है लेकिन फ़िल्म में कश्मीरी पंडितों पर हुई ज़्यादतियों को दिखाया ही नहीं गया है। उन्होंने ख़ूब गुस्से में अपनी ये प्रतिक्रिया दी और उसके बाद वो फफककर रो पड़ीं।

https://twitter.com/kashmiriRefuge/status/1225728440248094720?s=19

मैंने ऐसी प्रतिक्रिया भी पहली बार देखी। फ़िल्म देख कर कई बार आँखों से आँसू निकले या फ़िल्म बहुत ही घटिया हुई तो खर्राटे भी निकले लेक़िन इस तरह की प्रतिक्रिया नहीं देखी। शायद अगर मुझे पता होता कि निर्देशक भी साथ में फ़िल्म देख रहे हैं तो मेरी प्रतिक्रिया भी कुछ और होती। लेकिन वो कौन सी फ़िल्म होती?

शादी के कई सालों बाद एक और बात पता चली। जिस हम हैं रही प्यार के शो में ये हंगामा हुआ और गाना दुबारा देखा गया उसी शो में मेरी पत्नी के बड़े भाई भी मौजूद थे। आप एक बार और इस गाने को देखिये।

कानून या पीड़ित: कौन ज़्यादा मजबूर है?

हमारी लचर कानून व्यवस्था की बदहाली अगर कोई घटना दर्शाती है तो वो भोपाल गैस त्रासदी है। इतना लंबा समय बीत जाने के बाद भी गैस पीड़ितों को न्याय नहीं मिला। अगर मुआवजा मिला भी तो बहुत थोड़ा। उनकी भावी पीढ़ियों तक को उस भयावह त्रासदी की मार झेलनी पड़ रही है।

जब 1984 में ये घटना घटी तो उस समय ज़्यादा कुछ समझ में नहीं आया। लेकिन जब पत्रकारिता में काम शुरू किया तो इस मुद्दे को समझा। इसमें बहुत लोगों का योगदान रहा उसमें से एक थे अब्दुल जब्बार भाई जो एक संस्था, भोपाल गैस पीड़ित महिला उद्योग संगठन, चलाते थे। जब्बार भाई का हफ़्ते में एक दो बार ऑफिस आना होता ही था। कभी फुरसत में रहते तो बैठ कर बातें कर लेते नहीं तो प्रेस रिलीज़ पकड़ाई और बाद में मिलना तय हुआ।

ये भी पढ़ें: एक और रेप? चलिये रोष व्यक्त करते हैं

मृदु भाषी, सरल स्वभाव के जब्बार भाई निःस्वार्थ भाव से लड़ते रहे। भोपाल में भी और दिल्ली में भी। जब पिछले दिनों खबर आई की जब्बार भाई नहीं रहे तो उनका वही मुस्कुराता हुआ चेहरा आंखों के सामने आ गया।

निर्भया मामले को सात साल हो गए। इसमें सभी चीजें साफ हैं – अपराधी कौन, क्या अपराध किया, कैसे किया आदि। लेकिन तब भी ये मामला कोर्ट में लटका हुआ है। फैसला नहीं हुआ की इन दरिंदों को क्या सज़ा दी जाए।

भोपाल गैस त्रासदी में एक विदेशी कंपनी थी लेकिन हमारी तत्कालीन सरकार ने एक समझौता कर लिया जिसके चलते पीड़ितों को सही मुआवजा और सहूलियतें नहीं मिली। अगर यही हादसा किसी विदेशी धरती पर होता तो उस कंपनी की ख़ैर नहीं होती। लेकिन हमारे चुने हुये प्रतिनिधि पहले अपनी तिजोरियों को भरने में ज़्यादा विश्वास रखते हैं। कुछ बच गया तो बाँट दो आम जनता में। उन्हें लगेगा कुछ तो मिला। इस त्रासदी में अगर कई पीढ़ियां तबाह हो गईं तो कई की पीढ़ियों का भविष्य बन गया।

ये भी पढ़ें: त्रासदी ये है कि पूरा देश भोपाल बनने की कगार पर है और हम सो रहे हैं

लेकिन हमारी फिक्र किसे है? हम आप जिसे वोट देकर चुनते हैं वो संसद में लीनचिंग को सही ठहराते हैं और कहते हैं ऐसे अपराध के आरोपियों को सरे आम सज़ा देनी चाहिये। मतलब सरकार की देखरेख में ऐसा कुछ हो तो वो न्याय व्यवस्था का हिस्सा है लेकिन अगर कोई दस लोग अपनी दुश्मनी निकालने के लिये यही काम करें तो वो ज़ुर्म।

लेकिन ये एक भोपाल गैस त्रासदी या निर्भया, हैदराबाद या कठुआ की बात नहीं है। भोपाल जैसी किसी और घटना के आरोपी को सज़ा इसलिये कम मिले की कम लोगों की मौत हुई है या आने वाली पीढ़ियों पर इसका असर नहीं होगा?

अगर ऐसे किसी मामले में आरोपी ने पीड़िता को ज़िंदा छोड़ दिया तो उसे रियायत मिलनी चाहिये? क्यों उस आरोप की सज़ा सभी के लिये एक जैसी न हो? क्यों एक धर्मगुरु के साथ भी वही सलूक क्यों न किया जाये जैसा इन चारों के साथ करने का हमारे माननीय सांसदों की राय है? क्यों उन सांसद या विधायक महोदय को भी ऐसे ही न न्याय मिले?

हाँ तो सबके लिये हाँ और ना तो सबके लिये ना।

आओ मीलों चलें, जाना कहाँ न हो पता

हमारे जमाने में साइकिल तीन चरणों में सीखी जाती थी , पहला चरण कैंची और दूसरा चरण डंडा तीसरा चरण गद्दी……..
तब साइकिल चलाना इतना आसान नहीं था क्योंकि तब घर में साइकिल बस पापा या चाचा चलाया करते थे.

तब साइकिल की ऊंचाई 24 इंच हुआ करती थी जो खड़े होने पर हमारे कंधे के बराबर आती थी ऐसी साइकिल से गद्दी चलाना मुनासिब नहीं होता था।

\”कैंची\” वो कला होती थी जहां हम साइकिल के फ़्रेम में बने त्रिकोण के बीच घुस कर दोनो पैरों को दोनो पैडल पर रख कर चलाते थे।

और जब हम ऐसे चलाते थे तो अपना सीना तान कर टेढ़ा होकर हैंडिल के पीछे से चेहरा बाहर निकाल लेते थे, और \”क्लींङ क्लींङ\” करके घंटी इसलिए बजाते थे ताकी लोग बाग़ देख सकें की लड़का साईकिल दौड़ा रहा है।

आज की पीढ़ी इस \”एडवेंचर\” से मरहूम है उन्हे नही पता की आठ दस साल की उमर में 24 इंच की साइकिल चलाना \”जहाज\” उड़ाने जैसा होता था।

हमने ना जाने कितने दफे अपने घुटने और मुंह तोड़वाए है और गज़ब की बात ये है कि तब दर्द भी नही होता था, गिरने के बाद चारो तरफ देख कर चुपचाप खड़े हो जाते थे अपना हाफ कच्छा पोंछते हुए।

अब तकनीकी ने बहुत तरक्क़ी कर ली है पांच साल के होते ही बच्चे साइकिल चलाने लगते हैं वो भी बिना गिरे। दो दो फिट की साइकिल आ गयी है, और अमीरों के बच्चे तो अब सीधे गाड़ी चलाते हैं छोटी छोटी बाइक उपलब्ध हैं बाज़ार में।

मगर आज के बच्चे कभी नहीं समझ पाएंगे कि उस छोटी सी उम्र में बड़ी साइकिल पर संतुलन बनाना जीवन की पहली सीख होती थी! \”जिम्मेदारियों\” की पहली कड़ी होती थी जहां आपको यह जिम्मेदारी दे दी जाती थी कि अब आप गेहूं पिसाने लायक हो गये हैं।

इधर से चक्की तक साइकिल ढुगराते हुए जाइए और उधर से कैंची चलाते हुए घर वापस आइए !

और यकीन मानिए इस जिम्मेदारी को निभाने में खुशियां भी बड़ी गजब की होती थी।

और ये भी सच है की हमारे बाद \”कैंची\” प्रथा विलुप्त हो गयी।

हम लोग की दुनिया की आखिरी पीढ़ी हैं जिसने साइकिल चलाना तीन चरणों में सीखा !
पहला चरण कैंची
दूसरा चरण डंडा
तीसरा चरण गद्दी

पिछले दिनों जब व्हाट्सएप पर ये संदेश मिला तो पढ़ कर यादों के सफर पर निकल पड़े और याद गयी अपनी पहली साईकल। लेक़िन इसपर लिखने का कोई इरादा नहीं था। लेकिन कल बरसों बाद साईकल चलायी तो बस…

भोपाल में सरकारी घर में नया गेट लग रहा था। सरकार ने अपने हिसाब से साइड से एक छोटा सा गेट लगा दिया था। उससे एक स्कूटर आराम से निकल सकता था। लेकिन मैंने उसे शुरुआत से ही बंद देखा था। हमने सामने के तरफ से गेट बनाया था जिससे कार अंदर रखी जा सके।

ये जो दरवाज़ा था वो लकड़ी का हुआ करता था। लेकिन बारिश शुरू होते वो लकड़ी फूलने लगती और गेट झूलने लगता। इससे जानवर आने का हमेशा अंदेशा रहता। इसको ख़त्म करने के लिये ये निर्णय लिया की लोहे का दरवाज़ा लगवाया जाये। डिज़ाइन का ज़िम्मा मैंने ले लिया। चूंकि डिज़ाइन में रुचि थी इसलिये लगा कोई बड़ा काम नहीं है। डिज़ाइन दरअसल कुछ थी ही नहीं। चारों तरफ से पाइप था बीच में जाली और ऊपर एवं बीच में क्रमशः बंद करने और ताला लगाने की सुविधा।

नया गेट बन गया और उस पर पेंट भी कर दिया। लेकिन काफ़ी सारा पेंट बच भी गया। अब उस बचे पेंट का सदुपयोग कैसे हो? मैं उन दिनों जो कभी पिताजी की साईकल रही थी, उससे स्कूल जाता था। उसका पेंट वगैरह काफ़ी खराब था। बस बचे हुए पेंट से साईकल सफेद रंग से रंग दी गयी। उस समय साईकल मुख्यतः काले रंग वाली ही होती थी। ऐसे में मेरी सफ़ेद साईकल बहुत ही अजीब लगती थी। घर पर कुछ पुरानी टेबल थीं तो वही पेंट उनपर भी कर दिया। आज भी हमलोग इस घटना को याद करके हंसते हैं।

आजकल जैसे रंगबिरंगी साईकल उस समय मिलना शुरू ही हुई थीं और काफी महँगी थीं। कुछ समय बाद मेरी नई साईकल आयी। मेरी खुशी का ठिकाना नहीं। मुझे एक नार्मल साईकल नहीं मिली थी बल्कि पूरे भोपाल में कहीं भी जाने का ज़रिया मिला था।

नवी मुम्बई में नई सेवा शुरू हुई है जिसमें आठ-दस जगहों पर सायकिल खड़ी रहती हैं। आप एप्प के ज़रिये किराया भरिये और निकल जाइये घूमने। सच में स्कूटर, कार से भरी सड़कों पर सायकिल चलाने का मज़ा ही कुछ और है। अपने यहाँ साईकल चलाने के लिये प्रोत्साहित नहीं करते लेकिन विदेशों में खास ट्रैक रहता है। अपने यहाँ भी हैं लेकिन उसमें मोटरसाइकिल चलते देखने को मिलती है। और फ़िर आप उसे पार्क कहाँ करें?

आपको मौका मिले तो ज़रूर चलायें। कुछ अलग ही मज़ा है सायकिल चलाने का। एक अजीब सी आज़ादी, आसपास देखने का समय और ये गाना गुनगुनाते हुये आनंद लें।

उड़ती हुई वक़्त की धूल से, चुन ले चलो रंग हर फूल के

ट्रैन के सफ़र का एक अलग ही आनंद है। पिछले काफ़ी सालों से ट्रैन से चलना कम हुआ है लेक़िन यदा कदा जब भी मौक़ा मिलता है (जब फ्लाइट का किराया बहुत ज़्यादा हो तो) भारतीय रेल की सेवायें ली जाती है।

जबसे ट्रैन का सफ़र याद है, तबसे लेकर अभी तक बहुत सारे बदलाव देखें हैं। पहले सफ़र स्लीपर क्लास में ही होता था मौसम कोई भी हो। मुझे फर्स्ट क्लास में भी सफ़र करना याद नहीं है। पहली बार एसी कोच अंदर से देखा था तो किसी परिचित को छोड़ने गये थे। उस समय ये नहीं मालूम नहीं था कि रात के अँधेरे में अगर अंदर की लाइट जली हो तो बाहर से सब दिखता है। अब पर्दा खींच कर ही रखते हैं।

जब पीटीआई ने दिल्ली से मुम्बई भेजा था तब पहली बार राजधानी में सफ़र किया था और शायद एसी में भी। मेरे सहयोगी रणविजय के साथ उस सफ़र का बहुत आनन्द लिया। अब राजधानी में पता नहीं है की नहीं पर उन दिनों सैटेलाइट फ़ोन हुआ करते थे। मैंने उससे माता पिता को कॉल भी किया था।

पिछले हफ़्ते भोपाल जाने का मौका मिला तो ट्रैन को चुना। अब स्लीपर में सफ़र करने का मन तो बहुत होता है लेक़िन हिम्मत नहीं होती। लेकिन इस बार की एसी से यात्रा भी स्लीपर का आनंद दे गई। आसपास बात करने वाले बहुत सारे लोग थे तो विचारों का बहुत आदान प्रदान हुआ। मैं सिर्फ एक श्रोता बन उसको सुन रहा था।

एक माता पिता अपने बेटों से मिल कर वापस लौट रहे थे तो एक महिला यात्री कुछ दिनों के लिये भोपाल जा रहीं थीं। लेकिन दोनों ने भोपाल से जुड़ी इतनी बातें कर डालीं की बस ट्रैन के पहुंचने का इंतज़ार था। अगर आप एक ऐसी ट्रैन से यात्रा कर रहे हों जो उसी शहर में खत्म होती है जहाँ आप जा रहें है तो सबकी मंज़िल एक होती है। ऐसे मैं ये सवाल बेमानी भी हो जाता है कि आप कहाँ जा रहे हैं। उनकी बातें सुनकर भोपाल के अलग अलग इलाके आंखों के सामने आ गये। ये बातचीत ही दरअसल ट्रैन और फ्लाइट की यात्रा में सबसे बड़ा अंतर होता है।

ऐसे ही एक बार मैं भोपाल जा रहा था फ्लाइट से। ऑफिस के एक सहयोगी भी साथ थे। उन्हें कहीं और जाना था। हम दोनों समय काटने के लिये कॉफी पी रहे थे की अचानक मुझे कुछ भोपाल के पहचान वाले नज़र आ गए। चूंकि दोनों आमने सामने थे तो मेरा बच निकलना मुश्किल था। दुआ सलाम हुआ और हम आगे बढ़ गए। मेरे सहयोगी से रहा नही गया और वो बोल बैठे लगता है तुम उनसे मिलकर बहुत ज़यादा खुश नहीं हुये। बात खुश होने या न होने की नहीं थी। उन लोगों के भोपाल में रहने पर कोई मुलाक़ात नहीं होती तो 800 किलोमीटर दूर ऐसा दर्शाना की मैं उनका फैन हूँ कुछ हजम नहीं होता। मेरे इन ख़यालों को भोपाल में उतरने में बाद मुहर भी लग गयी जब हम दोनों ने ही एक दूसरे की तरफ़ देखना भी ज़रूरी नहीं समझा औऱ अपने अपने रास्ते निकल गये।

एक वो यात्रा थी, एक ये यात्रा थी।

हर मायने में राम मिलाय जोड़ी

कॉलेज के दिन थे और भविष्य की बातों में एक रात सलिल, विजय और मैं उलझे थे। बात धीरे धीरे गंभीर से हल्की हो रही थी। हम तीनों इस बारे में अपने विचार कर रहे थे की हमारा भावी जीवनसाथी कैसा हो। उन दिनों हम तीनों में से किसी एक का दिल कहीं उलझा हुआ था। किसका ये मैं नहीं बताऊंगा क्योंकि बात निकलेगी तो फ़िर दूर तलक जाएगी।

हम सभी ने अपनी अपनी पसंद बताई। कैसा जीवन साथी चाहते हैं, उनमें क्या खूबियाँ हों आदि आदि। मैं हमेशा से शादी अरंजे ही चाहता था। ठीक ठीक याद नहीं बाकी दोनों क्या चाहते थे लेकिन शायद लव मैरिज के पक्षधर थे। ये कॉलेज के दिनों की बात हो रही है और हम तीनों को नहीं पता था कि भविष्य में क्या होने वाला है।

जब मैं पहले दिल्ली और फ़िर मुम्बई आया तो परिवार में तो नहीं लेकिन रिश्तेदारों ने ये मान लिया थे कि लड़का तो हाँथ से गया। दिल्ली में अपनी मित्र वाली घटना के बारे में तो बता ही चुका हूँ। लेकिन इससे ज़्यादा कुछ हुआ नहीं या कहें होने नहीं दिया। इस बारे में ज़्यादा नहीं। दिल्ली जाने से भोपाल में मेरी नादानियों का ज़िक्र भी किया जा चुका है। माता-पिता ने सिर्फ ये हिदायत ही दी थी कि अगर तुम्हें कोई पसंद हो तो बाहर से पता चले उसके पेजले हमको बताना। जब कभी मेरी कोई महिला सहकर्मी को मिलवाता तो क्या माजरा होता होगा आप सोच सकते हैं।

मेरी लिस्ट कोई बहुत लंबी नहीं थी लेकिन अपने जीवनसाथी से सिर्फ दो एक चीजों की अपेक्षा थी। पढ़ी लिखी तो हों ही इसके साथ बाहर के कामकाज के लिये मुझ पर निर्भर कम से कम रहें। मुम्बई में इसकी ज़रूरत बहुत ज़्यादा महसूस हुई इसलिए इसको मैंने सबसे ऊपर रखा। लेकिन इसके चलते रिश्तेदारों के साथ बड़ी मुश्किल भी हो गयी जिसका असर अभी तक बरक़रार है।

जब बहुत सारी लड़कियों से मिलकर अपनी होने वाली पत्नी से मिला तो शायद पहली बार मैंने किसी के पक्ष में कुछ बात करी थी। माता पिता ने इसे पॉजिटिव माना और फ़टाफ़ट आगे बढ़कर बात पक्की कर दी। हमारी जोड़ी को मैं सही में राम मिलाय जोड़ी कहता हूँ क्योंकि श्रीमतीजी के पिता के पास भी कुछ और विवाह प्रस्ताव थे। लेकिन मेरे स्वर्गीय ससुर साहब ने अन्य प्रस्तावों को मना कर दिया और मुझे चुना। पत्नी जी ने भी अपने पिता, जिन्हें घर में राम बुलाते हैं, के निर्णय से सहमति जताई। तो ऐसे हुई हमारी राम मिलाय जोड़ी।

अम्माँ

शाहरुख खान की फ़िल्म स्वदेस में कावेरी अम्माँ की तरह उन्होंने हमें पाला तो नहीं था लेकिन फ़िर भी हम सब उन्हें अम्माँ कहते हैं। उनको ऐसा कैसे बुलाना शुरू किया ये याद नहीं लेकिन घर के सभी सदस्य उन्हें अम्माँ ही बुलाते। शायद उनके माँ के जैसे प्यार करने के कारण ही उनको अम्माँ बुलाना शुरू किया होगा। आज अचानक अम्माँ की याद वो भी इतने लंबे समय बाद कैसे आ गयी?

दरअसल ट्विटर पर एक चर्चा चल रही थी कि कैसे हम अपने घर में काम करने वालों के साथ भेदभाव करते हैं। जैसे उनके खाने पीने के अलग बर्तन होते हैं, शहरों में कई सोसाइटी में काम करने वालों के लिये अलग लिफ़्ट होती है और रहवासियों के लिये अलग। काम करनेवाले उस लिफ़्ट का इस्तेमाल नहीं कर सकते।

इस सब को पढ़ते हुये अम्माँ का चेहरा सामने आ गया। याद नहीं कबसे उन्होंने हमारे घर काम करना शुरू किया। अम्माँ के पति की मृत्यु हो चुकी थी और उनकी कोई संतान नहीं थी। रिश्तेदार आस पास ही रहते थे लेकिन अम्माँ को भी ये पता था कि उनकी नज़र उनके पैसों पर है। शायद इसलिये एक दिन उन्होंने आकर बोला कि उनका एक बैंक खाता खुलवा दिया जाए। घर के पास वाले बैंक में जहाँ हमारा खाता था वहीं उनका भी खाता खुलवा दिया।

उनसे पहले भी कई काम करने वाले आये लेक़िन वो बस काम करती और निकल जातीं। अम्माँ कब सिर्फ़ एक काम करने वाली न होकर घर की एक सदस्य बन गयीं पता नहीं चला। उन्होंने भी कब हमको अपना मान लिया इसकी याद नहीं। उनके हाथ की बनी ज्वार की रोटी का स्वाद कुछ और ही था। अक्सर उनके डिब्बे से अदला बदली कर लेते और वो खुशी खुशी इसके लिये तैयार हो जातीं।

आज ट्विटर पर काफी सारे लोगों ने बताया कि कैसे लोग अपने घरों में काम करनेवालों के साथ व्यवहार करते हैं, कैसे दूसरी जाति के लोगों को सुबह सुबह देखना अपशकुन माना जाता है, कैसे काम करनेवाले जिस स्थान पर बैठते हैं उसको उनके जाने के बाद धो कर साफ किया जाता है इत्यादि।

मुम्बई में जो घर में काम करती हैं वो दरअसल बड़ी विश्वासपात्र हैं। कई बार उनके काम करने के समय हम लोग घर पर नहीं होते लेकिन वो पड़ोसियों से चाबी लेकर काम करके चली जाती हैं। कभी कोई विशेष आयोजन रहता है तो सबसे पहले वो ही भोजन ग्रहण करती हैं क्योंकि उन्हें जल्दी घर जाना होता है।

बाहर निकलिये तो अक्सर ऐसे जोड़े दिख जाते हैं जिनके बच्चों को संभालने के लिये आया रखी होती है। होटल में वो आया अलग बैठती है और उसका काम साहब और मेमसाब को बिना किसी परेशानी के खाना खाने दिया जाये यही होता है। अम्माँ तम्बाकू खातीं थीं तो उनको ऐसे ही चिढ़ाने के लिये मैं बोलता मसाला मुझको भी देना और वो मुझे डाँट कर भगा देतीं।

पिताजी जब रिटायर हुये तो अम्माँ का साथ भी छूट गया। हम सरकारी घर छोड़ कर नये घर में रहने आ गये। अम्माँ के लिये नया घर बहुत दूर हो गया था। शायद एक बार वो नये घर में आईं लेकिन उसके बाद से उनसे कोई संपर्क नहीं रहा। वो अभी भी भोपाल में हैं या महाराष्ट्र वापस आ गईं, किस हाल में हैं पता नहीं लेकिन यही प्रार्थना है कि स्वस्थ हों, प्रसन्न हों और वो मुस्कुराहट उनके चेहरे पर बनी रहे।

पत्र अपडेट: काफी लोगों से पतों का आदान प्रदान हुआ है और दोनों ही पार्टीयों ने जल्द ही पत्र लिखने का वादा किया है। पहले पत्र का बेसब्री से इंतज़ार है।

यादों से भरी सालगिरह

भोपाल में पिताजी को जो सरकारी घर मिला था उसकी लोकेशन बड़ी कमाल की थी। हबीबगंज स्टेशन के बारे में आपको बता ही चुका हूँ। दो सिनेमाघर भी हमारे घर के पास ही हुआ करते थे ज्योति और सरगम। जो भी बड़ी नई फिल्म रिलीज़ होती वो इन दो में से किसी सिनेमा हॉल में ज़रूर लगती।

चूंकि मेरा घर इनके समीप था तो हर गुरुवार को मेरी ड्यूटी रहती टिकट खिड़की पर खड़े होने की। उन दिनों आज की बुकमाईशो जैसी सुविधा तो थी नहीं तो बस सुबह से यही एक काम रहता की लाइन में लगो और धक्के खाते हुए टिकट निकालो। टिकट न मिलने की स्थिति मे कई बार खाली हाथ भी लौटना पड़ता। उन दिनों टिकट खिड़की से टिकट लेकर फर्स्ट डे फर्स्ट शो देखने का मज़ा आज की एडवांस बुकिंग में कहाँ। और उस दौरान हो रहे हंगामे की क्या बात।

महिलाओं की लाइन में भीड़ कम होती तो लड़के किसी भी अनजानी लड़की को बहन बना टिकट लेने की गुज़ारिश करते। उन लड़कियों के परिवार वाले इन लड़कों पर नज़र रखते के कोई बदतमीजी न करें।

मेरे कॉलेज जाने का रास्ता ज्योति टॉकीज से ही जाता था। नई फिल्म रिलीज़ होते ही मैं बाहर खड़ी भीड़ से अंदाज़ा लगता कि फ़िल्म हिट होगी या फ्लॉप। जब यश चोपड़ा की लम्हे रिलीज़ हुई तो सिनेमा हॉल खाली था। फ़िल्म देखी तो समझ में नहीं आया कि आखिर क्यों लोगों ने इसको पसंद नहीं किया। ऐसा ही कुछ हाल था अंदाज़ अपना अपना का। एक किस्सा शाहरुख खान की फ़िल्म डर का भी है लेकिन उसका ज़िक्र फिर कभी।

हमारे घर की एक ख़ासियत और थी। घर के सामने ही था गर्ल्स हायर सेकंडरी स्कूल, थोड़े आगे जाने पर वुमेन्स पॉलीटेक्निक और उसके बाद गर्ल्स कॉलेज। जिन दिनों विवाह के लिए लड़की ढूंढी जा रही थी उस समय दूर दराज से रिश्ते आ रहे थे। कुछ लोग मेरे दिल्ली और उसके बाद मुम्बई जाने के बाद ये मान चुके थे कि मैं लव मैरिज ही करूँगा। खैर ये हुआ नहीं और खोज चलती रही। लेकिन ये पता नहीं था कि मेरी भावी जीवन संगिनी कई वर्षों से मेरे घर के सामने से ही आ जा रही थीं।

इस तलाश को खत्म हुए आज पंद्रह वर्ष हों गये हैं। दिखता एक लंबा समय है लेकिन लगता है इस बात को अभी ज़्यादा वक़्त नहीं हुआ।

त्रासदी ये है कि पूरा देश भोपाल बनने की कगार पर है और हम सो रहे हैं

कुछ दिन पहले दिल्ली और इन दिनों मुम्बई में शहर की हरियाली पर सरकार की नज़र है। इनके नुमाइंदे खुद तो बढ़िया हरियाली से घिरे घरों में रहते हैं और आम आदमी को विकास का हवाला देकर सब कुछ बेचने को तैयार रहते हैं। कुछ गलती हमारी भी है कि हम खुद उदासीन बने रहते हैं और सब सरकार भरोसे छोड़ देते हैं।

आज से 34 साल पहले हम भोपाल के निवासीयों ने भी सरकार के एक फैसले की बहुत बड़ी कीमत दी थी, शायद आज भी दे रहे हैं।

सर्दी के दिन थे और उन दिनों सर्दी भी कुछ ज़्यादा ही होती थी तो खाना खाने के बाद सब सो ही गये थे कि अचानक लगातार घंटी बजने लगी और ज़ोर ज़ोर से दरवाज़ा पीटने की आवाज़ आने लगी। पहले तो समझ नहीं आया इतनी रात में कौन है और क्या हुआ है।

पुराने भोपाल में रहने वाले हमारे रिश्तेदार दरवाज़े पर खड़े थे। सब अस्तव्यस्त हालत में थे, कुछ को साँस लेने में तक़लीफ़ हो रही थी। लेकिन हुआ क्या था ये किसीको नहीं पता था। शुरुआत में उन लोगों को लगा की बहुत बड़ी आग लगी है क्योंकि सब जगह सफेद धुआं था और लोगों के मुँह से झाग निकल रहा था।

जिसको जैसे समझ में आया अपने घर से निकल गया। ताला लगाया तो ठीक नहीं तो पहली चिंता जान बचाने की थी। नवजात शिशुओं को छोड़ माता पिता घर से निकल गए। उस ठिठुरती सर्दी की रात में कोई बिना किसी गरम कपड़े के तो कोई पायजामा बनियान में घर छोड़ कर भागा। पापा के एक छात्र 5-6 किलोमीटर दौड़े फिर रास्ते में एक आदमी गिरा हुआ था। उसकी साईकल उठा कर वो हमारे घर आये थे। लोगों ने बताया सड़क पर भागते हुये के लोग गिर पड़े और फ़िर वहीं उनके प्राण निकल गए।

उन दिनों 24 घंटे के चैनल नहीं हुआ करते थे। टीवी 1982 के एशियन गेम्स में आ गया था लेकिन प्रसारण का समय बहुत ही सीमित था। इसलिये जानकारी के लिये बचता सिर्फ रेडियो और अखबार।

अफवाहों का बाज़ार भी गर्म की गैस फ़िर से रिस सकती है। अनिश्चितता के माहौल के चलते घर के लिये राशन लेने पापा-मम्मी बाज़ार गये थे जहां भगदड़ मच गई। किसी ने बोल दिया फिर से गैस रिस रही है और सामने चौराहे तक आ गयी है। सबका भागना शुरू। सब्जी-फल के ठेले वाला ऐसे ही भाग खड़ा हुआ।

इस हादसे के बारे में आने वाले सालों में कभी मैं भी लिखूंगा इसका कोई इल्म नहीं था। जब भोपाल में नौकरी करना शुरू किया तो भोपाल गैस कांड भी कवर किया। लेकिन धीरे धीरे गैस पीड़ित और उनकी समस्याएं सालाना याद करने वाला एक मौका हो गईं।

कई लोगों ने अगर सही में उनके लिये काम किया तो अधिकतर ने इसमें अपना फायदा देखा। सरकारें आईं और गईं लेकिन गैस पीड़ितों के साथ न्याय नहीं हुआ। ये ज़रूर हुआ कि भोपाल में रहने वाले उन कई लोगों को सरकार से पैसा मिला जो इस हादसे से अछूते रहे।

लेकिन जिस तरीके से सरकार ने यूनियन कार्बाइड से हाथ मिलाया उससे ये बात तो साबित हो गयी कि भारत में जान की कोई कीमत नहीं। आज भी हालात बदले नहीं हैं। भोपाल अगर सबसे बड़ी औद्योगिक दुर्घटना थी तो अपने आसपास देखिये। महानगर ही नहीं छोटे शहर भी विकास की बलि चढ़ रहे है। अगर समय रहते नहीं चेते तो पूरा भारत ही भोपाल बन जायेगा…बहुत जल्दी।

जब रविवार सचमुच होता था एक ख़ास दिन

जब हम पढ़ रहे थे तब दूसरे और चौथे शनिवार स्कूल की छुट्टी रहती थी। पिताजी का साप्ताहिक अवकाश रविवार को ही होता था। मतलब रविवार का केवल एक दिन मिलता था जब सब घर पर साथ में रहते थे। लेकिन उन दिनों रविवार का मतलब हुआ करता था ढेर सारा काम। गाड़ियों – स्कूटर, सायकल और हमारी रामप्यारी अर्थात ऑस्टिन – की धुलाई एक ऐसा काम होता था जिसका हम सब इंतज़ार करते थे।

पिताजी ने हमेशा गाड़ी का खयाल रखना सिखाया। हमारे पास था भी एंटीक पीस जिसका रखरखाव प्यार से ही संभव था। गाड़ी चलाने से पहले गाड़ी से दोस्ती का कांसेप्ट। उसको जानिये, उसके मिज़ाज को पहचानिये। गाड़ी तो आप चला ही लेंगे एक दिन लेकिन गाड़ी को समझिये। इसकी शुरुआत होती है जब आप गाड़ी साफ करना शुरू करते हैं। एक रिश्ता सा बन जाता है। ये सब आज लिखने में बड़ा आसान लग रहा है। लेकिन उन दिनों तो लगता था बस गाड़ी चलाने को मिल जाये किसी तरह।

गाड़ी से ये रिश्ते का एहसास मुझे दीवाली पर भोपाल में हुआ। चूंकि कार से ये सफ़र तय किया था तो गाड़ी की सफ़ाई होनी थी। उस दिन जब गाड़ी धो रहा था तब मुझे ध्यान आया कि एक साल से आयी गाड़ी की मैंने ऐसे सफाई करी ही नहीं थी। मतलब करीब से जानने की कोशिश ही नहीं करी। कभी कभार ऐसे ही कपड़े से सफ़ाई कर दी। नहीं तो बस बैठो और निकल पड़ो। कभी कुछ ज़रूरत पड़ जाये तो फ़ोन करदो और काम हो जायेगा।

जब तक नैनो रही साथ में तो उसके साथ ऐसा बर्ताव नहीं किया। लेकिन नई गाड़ी आते ही दिल्ली निकल गये इसलिये गाड़ी चलाने का भी कम अवसर मिला। लेकिन दिल्ली में भी गाड़ी को बहुत याद ज़रूर करता और इसका दुख भी रहता कि नई गाड़ी खड़ी रहती है। यहां आकर उसको थोड़ा बहुत चला कर उस प्यार की खानापूर्ति हो जाती। बस उसको पार्किंग में देख कर खुश हो लेते। श्रीमती जी की लाख ज़िद के बाद भी अभी उन्हें इससे दूर रखने में सफल हूँ। लेकिन जब कार से लंबी यात्रा करनी हो तब लगता है उन्हें भी कार चलाना आ जाये तो कितना अच्छा हो। हम लोगों को कार से घुमने का शौक भी विरासत में मिला है। जिससे याद आया – मैंने आपसे मेरी अभी तक कि सबसे अनोखी कार यात्रा जो थी झीलों की नगरी भोपाल से धरती पर स्वर्ग कश्मीर के बीच – उसके बारे कुछ बताया नहीं है। फिलहाल उसकी सिर्फ एक झलक नीचे। दस साल पुरानी बात है लेकिन यादें ताज़ा हैं।

अगर हम गाड़ी की जगह इन्सान और अपने रिश्ते रखें तो? हम कितना उनको सहेज कर रखते है? क्या वैसे ही जैसे कभी कभार गाड़ी के ऊपर जमी धूल साफ करते हैं वैसे ही अपने रिश्तों के साथ करते हैं? या फिर हमने उनके रखरखाव की ज़िम्मेदारी एक कार साफ करने वाले के जैसे अपने लिये खास मौके छोड़ दिये हैं? समझें क्या कहा जा रहा है बिना कुछ बोले।

पिताजी और ऑस्टीन के बारे में अक्सर लोग कहते कि वो उनसे बात करती हैं। कई बार लगता कि ये सच भी है क्योंकि जब ऑस्टीन किसी से न चल पाती तब पिताजी की एंट्री होती जैसे फिल्मों में हीरो की होती है और कुछ मिनटों में ऑस्टीन भोपाल की सड़कों पर दौड़ रही होती। क्यों न हम भी अपने रिश्ते बनायें कुछ इसी तरह से।

चलिये नया कुछ करते हैं कि श्रेणी में आज अपना फ़ोन उठाइये और किन्ही तीन लोगों को फ़ोन लगायें। कोई पुराने मिलने वाले पारिवारिक मित्र, कोई पुराना दोस्त या रिश्तेदार। शर्त ये की आपका उनसे पिछले तीन महीनों में किसी भी तरह से कोई संपर्क नहीं हुआ हो। जैसा कि उस विज्ञापन में कहते हैं, बात करने से बात बनती है तो बस बात करिये और रिश्तों पर पड़ी धूल को साफ करिये। सिर्फ अपनी कार ही नहीं अपने रिश्तों को भी चमकाते रहिए। बस थोडा समय दीजिये।

काली कार की ढेर सारी रंगबिरंगी यादें

ऑफ़िस में एक नई कार आयी थी टेस्ट ड्राइव के लिए। टीम के सदस्य बता रहे थे कि कैसे उन्होंने कार चलाना सीखा। सुवासित ने बताया कि कैसे वो जब मारुती 800 सीख रहे थे तो चप्पल उतारकर गाड़ी चलाते थे की गलती से कहीं पैर ब्रेक के बजाए एक्सीलेटर पर स्लीप न हो जाये। प्रतीक्षा ने बताया कि उनको सीखने के दौरान डाँट पड़ी तो उन्होंने सीखना ही छोड़ दिया।

हमारे परिवार में एक विंटेज कार है। ऑस्टिन 10 जिसे मैं बचपन से देखता आ रहा हूँ। मेरा कार चलाना सीखना उसी पर हुआ। काले रंग की कार के चलते हमारा घर काली कार वाला घर के नाम से जाना जाता था। जब सीख रहा था तब सिर्फ ऑस्टिन में ही फ्लोर गियर थे। बाकी सभी गाड़ियों में स्टीयरिंग से लगे हुए गियर थे। तब लगता था इसी गाड़ी में गियर अलग क्यूँ हैं। आज सभी गाड़ियों में फ्लोर गियर देख कर लगता है ऑस्टिन ने अच्छी तैयारी करवा दी थी।

बहरहाल, गाड़ी सीखते समय पिताजी से काफी मार खाई। गियर और स्टेयरिंग का तालमेल बिठाना एक अलग ही काम लगता था। आजकल के पॉवर स्टेयरिंग के जैसे आराम से घूमने वाले स्टेयरिंग बहुत बाद में चलाने को मिले। ऑस्टिन का स्टेयरिंग बहुत ही मुश्किल से चलता था शुरुआत में। पूरी ताकत लग जाती गाड़ी घुमाने में।

जब पिताजी घर पर नहीं तो सामने जो छोटी सी जगह थी उसमें गाड़ी घुमाते। कई बार दीवार या गैरेज से कार टकराई। लेकिन ऑस्टिन की बॉडी मतलब लोहा। मजाल है एक ख़रोंच भी आये। जब कभी गाड़ी रोड पर निकलती तो नये ज़माने की नाज़ुक कारों के लिए डर लगता की कहीं ऑस्टिन से टकराकर वो चकनाचूर न हो जाएं।

एक बार देर रात परिवार के सदस्य और कुछ मेहमान कहीं से लौट रहे थे। सुनसान सड़क पर ज़ोर से आवाज़ हुई जैसे कुछ बड़ी सी चीज कहीं गिरी हो। पापा ने कार रोकी देखने के लिए। लेकिन रोड खाली। कहीं किसी जीव जंतु का नामोनिशान नहीं। ऑस्टिन स्टार्ट करी लेकिन कार आगे नहीं बढ़े। उतरकर देखा तो ड्राइवर साइड का जो बाहर निकला हुआ टायर का कवर था वो अंदर धंसा हुआ था। लोहे की बॉडी वाली ऑस्टिन के साथ क्या हुआ था ये एक सस्पेंस अभी भी बरकरार है। जब ये ठीक हो रही थी तो मेकैनिक भी परेशान की ये हुआ कैसे। उनका ये मानना था कि ज़रूर किसी खंबे से टकरा गई होगी।

आजकल की गाड़ियों के बॉंनेट खोलें तो समझ में नहीं आता कहाँ क्या है। अगर गाड़ी कहीं खड़ी हो जाये तो आपके पास हेल्पलाइन को फोन करने के अलावा और कोई चारा ही नहीं बचता। लेकिन ऑस्टिन के इंजन जैसा बिल्कुल सिंपल सा इंजन मैंने आजतक नहीं देखा। गाड़ी कहीं खड़ी हो जाये तो आप कोशिश कर सुधारकर आगे चल सकते हैं।

ऑस्टिन में अनुज की बिदाई

ऑस्टिन के साथ बहुत सारी यादें हैं। बहुत ही मज़ेदार भी। जैसे जब हम कहीं से लौट रहे थे तो स्टेयरिंग जाम हो गया। गाड़ी मोड़ रहे थे उल्टे हाथ की तरफ लेकिन गाड़ी सीधे चली जा रही थी। या जब हमारी गाड़ी के बगल से किसी गाड़ी का एक टायर निकला। सब बोले अरे देखो ये क्या है। वो तो जब ऑस्टिन का पिछला हिस्सा तिरछा हुआ तो समझ में आया कि ये तो अपनी कार का टायर निकल गया है।

आखरी बार ऑस्टिन चलाने की याद है जब छोटे भाई की शादी की बिदाई हुई। दोनों भाई अपनी पत्नी के साथ ऑस्टिन का आनद ले रहे थे कि पेट्रोल खत्म हो गए। शेरवानी पहने दूल्हे राजा गए थे पेट्रोल लाने। लोगों ने बहुत दिए लेकिन ऑस्टिन ने कभी धोका नहीं दिया।

आज भी जब कभी गाड़ी चलाते हैं तो काली कार की याद आ ही जाती है।

हमारा जीवन और इन्टरनेट की क्रांति

मुम्बई में अगर आपके रहने और खाने का बंदोबस्त है तो इस शहर में रहना बहुत आसान है। रहने का बंदोबस्त PTI ने कर दिया था और खाने का हमने खुद। इस वजह से कुछ पैसा बचा और जब थोड़ा बहुत पैसा इकट्ठा कर लिया तो सोचा मोबाईल लिया जाए।

आज के जैसे उन दिनों फ़्री काल जैसी कोई चीज़ नहीं हुआ करती थी। और आपको दोनो इनकमिंग और आउटगोइंग दोनो के लिए पैसा देना पड़ता था। लेकिन मुझे टेक्नोलॉजी में शुरू से ही बडी रुचि रही है। इसलिए ये खर्चा कम और निवेश ज़्यादा लगा।

उसके बाद से तो जैसे रिलायंस ने मोबाइल क्रांति ले आया अपने धीरूभाई अंबानी ऑफर से। परिवार में सबने ये फ़ोन लिया और दिलवाया भी ये सोच कर की पैसा कम खर्च होगा। लेकिन उन्ही दिनों मेरी सगाई हुई थी तो बातों का सिलसिला काफी लंबा चला करता था। नतीज़न पैसे बचने की कोई उम्मीद सबने छोड़ दी थी सिवाय रिलायंस के। उन्हें तो मेरे जैसों ने ही खूब बिज़नेस कराया।

वो जो उठा पटक वाली बात मैंने एक पोस्ट में कही थी वो आज के इंटरनेट के बारे में थी। कंप्यूटर से मेरा साक्षात्कार बड़ी जल्दी हो गया था। जहां बाकी लोगों की तरह में भी उसमे पहले खेल खेलता था मेरा प्रयास यह रहता था कि कुछ और सीखने को मिल जाये। उस समय फ्लॉपी हुआ करती थी तो कुछ तिकड़म कर एक संस्थान का मासिक तनख्वाह का प्रोग्राम बना दिया।

उसके बाद आगमन हुआ इंटरनेट का। ये तो तय था ये कुछ बड़ा बदलाव लाएगा लेकिन कितना बड़ा इसका अंदाज़ा नहीं था। हाँ अपने उस समय के दोस्तों से मैं भी ये ज़रूर कहता कि एकदिन देखना सब ऑनलाइन मिलेगा। न अमेजान और न ही फ्लिपकार्ट के बारे में कुछ मालूम था। ये भी नहीं मालूम था कि एक दिन इसमें मेरा करियर बनेगा।

एक बड़ा तबका आज व्हाट्सएप और वीडियो देखने की क्षमता को ही इंटरनेट की बड़ी सफलता मानता है। लेकिन सही मायने में इसे इंटरनेट की जीत तब माना जायेगा जब उन लोगों के जीवन में एक ऐसा परिवर्तन लाए जिसकी कल्पना भी करना मुश्किल हो।

मुझे समय समय पर इस दिशा में कुछ करने का फितूर चढ़ता है और फिर वापस वही ढ़र्रे वाली ज़िन्दगी पर। हमको इस इंतज़ार का कुछ तो सिला मिले…

घर जाने की बात ही कुछ और

उस दिन जब शाम को एयरपोर्ट के लिए निकल रहा था तो टीम की एक मेम्बर बोलीं देखिए चेहरे की रौनक। लगता है घर जा रहे हैं। पता नहीं ऐसा क्या हो जाता है जब घर जाने का मौका आता है एक अलग ही उत्साह। जब PTI से दौड़ते भागते ट्रेन पकड़ता था 18 साल पहले तब भी और आज जब ट्रैफिक जाम से लड़ते हुए टैक्सी से एयरपोर्ट जाता हूँ तब भी।

दरअसल ये कहना ये खुशी घर जाने के कारण है सही नहीं है। घर तो यहाँ भी है दिल्ली में जिसमे मैं इन दिनों सोने जाता हूँ। ये असल में घरवाले हैं जो घर को रहने लायक बनाते हैं। फिर हम चाहे 2 कमरे के फ्लैट में हों या एक बड़े बंगले में।

वैसे बंगले में रहा नहीं हूँ तो इसलिए ज़्यादा नहीं जानता वहां रहना कैसा होता है। पला बढ़ा सरकारी घर में जो बहुत बड़े तो नहीं थे लेकिन उसमें रहते हुए ही परिवार की कई शादीयाँ हुई। मेहमानों से घर भरा हुआ है लेकिन सब मज़े में और आराम से। आज जब शादी में जाना होता है तो सबके अलग अलग कमरे हैं और सब किसी रस्म के दौरान या खाने पीने के समय मिल जाते हैं। खैर इस पर कभी और।

एक परिचित को किसी ने अपना नया घर देखने के लिए बुलाया। उन्हें बोला गया उस घर में अलग क्या होगा। ऐसी ही दीवारें होंगी, ऐसे ही खिड़की दरवाज़े होंगे। कोई ज़रूरत नहीं जाने की। अब ये बात भले ही मज़ाक कही हो लेकिन है तो सच। ईंट पत्थर की दीवारें होती हैं। घर तो घरवालों से बनता है। आप आलीशान घर में चले जाइये। सारी सुख सुविधाओं से लैस। लेकिन सुकून दूर दूर तक नहीं। और एक कमरे का घर आपको इतनी शांति देता है।

एक समय था जब ये गूगल देवी आपको अपने या किसी और के घर का रास्ता नहीं बता रही होतीं थी। तब घर ढूँढने के अलग मज़े थे। पता पूछते हुये कुछ ऐसे ही बातचीत हो जाती और चाय पीते पिलाते आप के नए दोस्त बन जाते। अब गूगल देवी तो आपको घर के बाहर तक छोड़ती हैं तो ऐसी चाय का मौका नहीं मिलता।

अगर मैं ये कहूँ की इस बहाने लड़की भी देख ली जाती थी तो? किसी का घर ढूँढने के बहाने लड़की देखी भी गयी और शादी पक्की भी हुई। परिवार में किसी की शादी की बात चल रही थी लेकिन लड़के ने ये ज़िम्मेदारी अपने परिजनों को दी। चूँकि बार बार लड़की के घर जाने पर ऐतराज़ था तो पता पूछने के तरीके को आज़माया गया। हाँ ये सुनिश्चित किया गया कि लड़की की फ़ोटो ध्यान से देखकर जाएँ जिससे कोई गड़बड़ न हो। आखिर ज़िन्दगी भर की बात है।

ऐसा कहते हैं मोबाइल ने दूरियों को मिटा दिया है। लेकिन जो मज़ा आमने सामने बैठ कर गप्प गोष्ठी करने में है वो वीडियो चैट में कहाँ। शायद उस दिन चेहरे की रौनक यहीं बयान कर रही थी।

भोपाल के प्रति मेरा प्यार

\"timelapse

मैंने सिर्फ शहर बदला था और मेरा भोपाल के प्रति मेरा प्यार और गहरा हो रहा था। परिवार और दोस्त सब वहीं थे इसलिये जब भी मौका मिलता भोपाल की तरफ़ दौड़ पड़ता। ऐसा अमूमन हर महीने ही होता था। आजकल की ईमेल जनता के लिए ये बड़े अचरज की बात होगी कि उन दिनों हम एक दूसरे को पत्र लिखा करते थे।

कुछ पत्र लंबे होते थे जो 3-4 पेज के होते थे और ज़्यादातर अंतर्देशीय पत्र हुआ करते थे। आज भी उन संभाल के रखे पत्रों के साथ कभी कभार एक यादों की यात्रा पर निकल पड़ते हैं। कभी हंसी आती है उन बातों पर जो अब बचकानी लगती हैं तो कभी उन कागज़ पर उमड़े हुए जज़्बात आंखे नम कर जाते हैं।

ये पत्रों का सिलसिला जो दिल्ली से शुरू हुआ था वो मुम्बई में भी चलता रहा। हाँ मुम्बई में पत्रों को पहुंचने में समय लगता था। फ़ोन ज़्यादातर अभी भी लैंडलाइन ही हुआ करते थे। लेकिन पत्रों का मज़ा उन फ़ोन कॉल्स में कहां जब आपकी नजर सिर्फ डिस्प्ले स्क्रीन पर बढ़ते हुए पैसे की तरफ रहती थी।

PTI गेस्टहाउस में एक फ़ोन दे रखा था और बहुत तेज़ आँधी बारिश के बाद भी वो काम कर रहा था। नहीं मैं उसको हर घंटे चेक नहीं कर रहा था बल्कि सुबह सुबह फ़ोन आ गया। बारिश के चलते कोई नहीं आया है आप दोनों फौरन पहुँचे। यहाँ दूसरे शख्स हैं रणविजय सिंह यादव। इनके बारे में फ़िर कभी। इसके पहले की ये बताया जाए कि यही मजबूरी हमारी भी है, बताया गया बस चल रही है और उससे आप ऑफिस पहुंच सकते हैं।

एजेंसी में काम कभी रुकता नहीं है और आपको अपने उपभोक्ताओं को समाचार देना है। बस यही एकमात्र उद्देश्य रहता है। चेंबूर में घर के नीचे से ही बस मिलती थी तो तैयार होकर पहुँच गए बेस्ट के इंतज़ार में। बस आयी औऱ उसमे बैठ गए। ये पता था समय लगेगा लेकिन कितना ये नहीं पता था।

आगे जो नज़ारा देखा वो काफी डरावना ही था। प्रियदर्शिनी पार्क के कुछ पहले पानी जमा था और ड्राइवर काफी सावधानी पूर्वक चलाते हुए जा रहा था। थोड़ी देर में पानी बस की सीढ़ियों तक पहुँच गया था। ये सब पहले देखा नहीं था हाँ एक बार भोपाल में ऐसी ही बरसात में कार पानी में चलाई थी और वो बीच रोड पर बंद हो गयी थी। गनीमत है मुम्बई में दिन था लेकिन अगर ये बस भी बंद हो गयी तो?

खैर सही सलामत आफिस पहुँच गए जहां ढेर सारा काम हमारा इंतज़ार कर रहा था। कितने दिन तक ऑफिस में ही रहे इसकी कुछ याद नहीं लेकिन मुंबई की बारिश के बारे मे अब नज़रिया बदल गया था। लेकिन आज भी ये मानता हूँ कि दिल्ली की सर्द सुबह और मुम्बई की बारिश का कोई मुकाबला नहीं है।

इतने सालों से मुम्बई की बारिश का आनंद लिया है अब है समय दिल्ली की सर्दियों का लुत्फ उठाने का।

पत्रकारिता के सफर की शुरुआत

दिल्ली से जो मेरा पत्रकारिता का सफर शुरू हुआ था उसकी नींव भोपाल में पड़ी थी। कॉलेज करने के बाद PG करने का मन तो नहीं था लेकिन LLB नहीं कर पाने की वजह से MA में दाखिला ले लिया। लेकिन दो घंटे के कॉलेज के बाद समय ही समय होता था। संयोगवश वहीं से प्रकाशित दैनिक में आवयश्कता थी और मैंने अर्ज़ी भेज दी और चुन भी लिया गया।

जिस समय मैं इस फील्ड को समझ रहा था उस समय भी इसका आभास नहीं था कि एक दिन में इसे बतौर करियर अपनाऊंगा। उस समय इसका सिर्फ एक उद्देश्य था -समय का सदुपयोग। पता नहीं कैसे धीरे धीरे मुझे पत्रकारिता रास आने लगी और आज इतना लंबा सफर गुज़र गया जो लगता है जैसे कुछ दिन पुरानी बात ही हो।

डॉ सुरेश मेहरोत्रा मेरे संपादक थे और नासिर कमाल साहब सिटी चीफ। अगर आज मैं इस मुकाम पर हूँ तो इसका श्रेय इन दो महानुभाव को जाता है। मुझे अभी भी याद मेरी पहली बाइलाइन जो कि पहले पन्ने पर छपी थी। आज के जैसे उन दिनों बाइलाइन के लिए बड़े कठोर नियम हुआ करते थे। बाइलाइन का मतलब उस स्टोरी को किसने लिखा है।

पहली बाइलाइन स्टोरी वो भी फ्रंट पेज पर। खुशी का ठिकाना नहीं। स्टोरी थी मध्य रेल के अधिकारी के बारे में और उनके एक वक्तव्य को लेकर। स्टोरी छपी और दूसरे दिन मुझे ढूंढते हुए कुछ लोग पहुँचे। उनकी मंशा निश्चित रूप से मुझे अपने परिवार का दामाद बनाने की नहीं रही होगी और मैं खुश भी था और डरा हुआ भी। खैर उनसे आमना सामना तो नहीं हुआ लेकिन छपे हुए शब्दों का क्या असर होता है उसको देखा।

डॉ मेहरोत्रा ने हमेशा हर चीज़ के लिये प्रोत्साहित ही किया। नहीं तो इतनी जल्दी से विधानसभा पर कवरेज, मंत्रालय बीट आदि मिलना बहुत ही मुश्किल था।

नासिर कमाल साहब कब बॉस से दोस्त बन गए पता नहीं चला। मामू, नासिर भाई के नाम से हम सब उन्हैं प्यार बुलाते थे। उनके काम करने अंदाज एकदम अलग। ओर बिना किसी शोर शराबे के सारा काम आराम से हो जाया करता था। और भोपाल के इतिहास के उनके पास जो किस्से थे वो कभी किताब की शक्ल ले ही नहीं पाये।
आज अगर कोई मुझे अच्छे बॉस होने के श्रेय देता है तो मैं कृतज्ञता प्रकट करता हूं डॉ मेहरोत्रा और नासिर क़माल साहब के प्रति। और धन्यवाद देता हूँ उन सबको जिनके चलते मुझे ऐसे सुलझे व्यक्तित्व के धनी दो व्यक्ति मिल गए अपने शुरुआती में। #असीमित #भोपाल #दिल्ली

दिल संभल जा ज़रा

कल जब शान-ए-भोपाल से दिल्ली वापसी का सफर शुरू किया तो एक बार फिर दिल मायूस हुआ। भोपाल छोड़े हुए इतने साल हो गए लेकिन तब भी हर बार शहर छोड़ने का दुख रहता है। ऐसा नहीं है की मुम्बई ने अपनाया नहीं। मुम्बई ने तो कभी पराया समझा ही नहीं और ऐसे गले लगाया जैसे पता नहीं कब से एक दूसरे को जानते हैं।

कब मुम्बई मेरी और मैं मुम्बई का हो गया ये पता ही नहीं चला। ठीक वैसे ही जब ऐश्वर्या राय अपनी माँ से हम दिल दे चुके सनम में सलमान खान से प्यार कब हुआ, कैसे हुआ पूछने पर कहती है – पता ही नहीं चला। शायद इसलिए इसे मायानगरी कहते हैं।

लेकिन फ़ोन किया गया था और शुभकामनाएं इत्यादि बातें हुई ये पता चल गया था। हिंदी की कहावत काटो तो खून नहीं वाली हालत थी। चोरी पकड़ी गई थी और अब सज़ा की तैयारी थी। लेकिन जवानी का जोश ऐसा की जो करना है करलो। अब बात शादी तक पहुंच गई थी तो कुछ ज़्यादा सीरियस मामला लग रहा था। मतलब ट्रेलर बन रहा था और पिक्चर सिनेमा हॉल में लगने को तैयार।

अल्ताफ ने पूछा कि दिलवाले दुल्हनिया ले गए या देवदास बन गए। हुआ कुछ भी नहीं। ना तो दुल्हनिया लाये न देवदास बने। क्योंकि ये सारी मंज़िलें थोड़ी ऊपर थीं। हम तो बस इस मोहब्बतनुमा इमारत के दरवाजे पर दस्तक ही दे पाए थे की ये सब हो गया।

एनकाउंटर होने वाला था दोनो पक्ष के परिवार वालों का एक अलग शहर में और समझ में ये नहीं आ रहा था कि इससे निकला कैसे जाए। खैर हमारे बड़े बहुत समझदार निकले और ऐसी कोई नोबत आयी नहीं और दोनों पक्ष बहुत ही सौहार्दपूर्ण वातावरण में मिले। घटना का ज़िक्र नहीं हुआ और न ज़िक्र हुआ उस फिल्मी डायलॉग का – क्यूं न हम अपनी दोस्ती को रिश्तेदारी में बदल लें। वैसे परिवार में ऐसे विवाह हुए हैं लेकिन इस एपिसोड के काफी बाद।

इस पूरे समय दिमाग में सवाल यही था कि पता कैसे चला। उन दिनों लैंडलाईन हुआ करती थी और बड़े घरों में उसका एक्सटेंशन लगाया जाता था ताकि फ़ोन उठाने के लिए दौड़ भाग न करनी पड़े। उस रात दौड़ भाग तो नहीं हुई बस मेरा फ़ोन ठीक वैसे ही सुना गया जैसे गोगा कपूर फ़िल्म कयामत से कयामत तक में आमिर खान और जूही चावला की बातें सुन लेते हैं। यहां बात किसने सुनी ये रहने देते हैं।

क्या इसके बाद सुधार गए या फिर दिल संभल जा ज़रा फिर मोहब्बत करने चला है तू वाला मामला रहा ?

पहले पहले प्यार का किस्सा

उम्र के अलग अलग पड़ाव पर हम अलग अलग तरह के जोखिम उठाते हैं। बचपन में जब चलना सीख रहे होते हैं तो बार गिर कर तब तक कोशिश करते हैं जब तक ठीक से चलना नहीं सीख लेते। आपको अपना साईकल सीखने का समय याद है? जब कोई पीछे से अपना हाँथ खींच लेता है और आपका संतुलन बिगड़ जाता है। मगर कोशिश जारी रहती है। जोखिम उठाने के ये तरीक़े आगे बदलते रहते हैं।

जवानी के ऐसे बहुत से जोखिम आपका जीवन बदल देते हैं। मसलन दोस्तों के साथ कुछ नए तजुर्बे। ये वो समय भी रहता है जब आप नए दोस्त/सखी बनाते है जो आपके जीवन पर्यन्त मित्र रहते हैं। और कुछ दिलों के मामले होते हैं जिस पर किसी का जोर नहीं। ग़ालिब ने कहा भी खूब है ये इश्क़ नहीं आसान।

जिस तूफान का ज़िक्र मैंने किया था वो दरअसल खुद का खड़ा किया हुआ था जिसकी नींव रखी गयी थी कुछ तीन महीने पहले। एक परिचित के घर के सदस्य का आगमन हुआ हमारे यहाँ और बस माहौल कुछ वैसा होगया जैसा शाहरुख खान के साथ होता है फ़िल्म मैं हूँ ना में जब भी वो सुष्मिता सेन को देखते हैं।

इसके बारे में बहुत आगे तक सोचा नहीं था। बस उस समय का आनंद ले रहे थे। सच माने तो ये आँख मिचौली का खेल किस राह पर चलेगा या खत्म होगा इसका कोई पता न था। बहरहाल इस खेल को विराम लग ही गया जब वो अपने घर वापस गये। अब इसमें तूफान जैसा तो कुछ दूर दूर तक दिखाई नहीं देता?

जवानी के जोश में अक्सर हम कुछ खून की गर्मी के चलते ऐसे काम कर बैठते हैं जो शांत बैठ कर सोचा जाए तो बहुत बचकाने लगते हैं। वैसे खून की गर्मी का उम्र से कोई लेना देना नहीं होता है। आप को कई अधेड़ भी मिल जायेंगे जो ऐसी हरकतें नियमित करते हैं। लेकिन जब आप जवान होते हैं तो सारा ज़माना आप का दुश्मन होता है और बस जो आपकी सुन ले और जो आप सुनना चाहते हैं वो कह दे वही दोस्त होता है। वो तो समय के साथ पता चलता है कौन दोस्त है और कौन दुश्मन।

जब यह आंखों की गुस्ताखियां चल रही थीं उस दौरान मैं भोपाल के अंग्रेज़ी दैनिक में बतौर रिपोर्टर काम कर रहा था। साथ में पढ़ाई भी कर रहा था। इन सबसे जो समय बचा था उसका कुछ बहुत अच्छा सदुपयोग हो रहा हो ऐसा नहीं था। लेकिन सब इससे बड़े प्रभावित थे। हाँ अगर वो पूछ लेते पिछले परीक्षा परिणाम के बारे में तो मेरी और अमोल पालेकर की हालत में ज़्यादा फर्क नहीं होता जब उत्पल दत्त के सामने पानी पीते हुए उनकी नकली मूँछ निकल जाती है। बेटा रामप्रसाद…

तो एक रात जाने क्या सूझी सोचा एक फ़ोन लगा लूँ। परीक्षा के लिए शुभकाननाएँ दी जाएं। एसटीडी पीसीओ ऑपरेट कर रहीं भाभीजी की मदद से फ़ोन तक तो बुला लिया और संदेश भी दे दिया। मिशन सफल ठीक वैसे ही जैसे अभय देओल और आएशा टाकिया सोचा न था में रहते हैं। हम और कुछ उम्मीद कर भी नहीं रहे थे। लेकिन सब आप के जैसी सोच वाले मिल जाएं तो पति-पत्नी के जोक्स का क्या होगा। और यही जोक मेरा इंतेज़ार कर रहा था भोपाल में।

मुंबई, पुणे के प्रवास से लौटते जैसे पैरों को पर लग गए थे। बर्ताव कुछ ऐसा जैसे कौन सा क़िला फतेह कर के आये हों। लेकिन गिरे भी उतनी ही ज़ोर से जब पता चला की फ़ोन की खबर घर तक पहुंच चुकी है और रिश्ते की बात भी छेड़ी जा चुकी है।
अब मुझे तैयारी करनी थी उस एनकाउंटर की जो कि कुछ दिनों बाद था लेकिन उसका होना तय था।

जीवन एक चक्र है

जीवन एक चक्र है ऐसा सुना करते हैं लेकिन इसका एक साक्षात अनुभव पिछले दिनों हुआ। हालांकि इसका आभास तब हुआ जब मैं दिल्ली से भोपाल की ट्रेन यात्रा के लिए हज़रत निज़ामुद्दीन स्टेशन पर शान-ए-भोपाल में बैठा।

यही वो स्टेशन है जिससे मैंने न जाने कितनी बार भोपाल की यात्रा करी जब मैंने अपना पत्रकारिता का करियर PTI से शुरू किया था। उन दिनों हज़रत निज़ामुद्दीन से ये ट्रेन नहीं थी और मुझे दिन के अलग अलग समय अलग अलग ट्रेन से सफर करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। ऐसा इसलिए भी की PTI में शिफ्ट डयूटी हुआ करती है और समय अनुसार भोपाल की ट्रेन में चढ़ जाया करते थे। भोपाल के लिये ट्रेन की कोई कमी भी नहीं थी सो इतना कष्ट नहीं हुआ करता था। तनख्वाह इतनी ज्यादा नहीं हुआ करती थी सो सर्दी हो या गर्मी स्लीपर क्लास में ही सफर करते थे। कई बार ऐसे भी मौके आये की करंट टिकट लेकर जनरल कोच में दरवाज़े की सीढ़ियों पर बैठ कर भी सफर करना हुआ।

उन यात्राओं का बस एक ही आनंद होता था – घर जा रहें हैं तो सारे कष्ट माफ। और सच में सर्दी में ठिठुरते हुए या गर्मी में पसीना पोंछते हुए ये सफर बस यूं ही कट जाता था। मेरे उन दिनों के अभिन्न मित्र सलिल की ये डयूटी लगा रखी थी कि वो स्टेशन से मुझे घर पहुंचाए। और रात का कोई भी समय हो सलिल स्टेशन पर मौजूद l उन दिनों आज के जैसे मोबाइल फ़ोन तो हुआ करते थे लेकिन उनको रखना एक महँगा शौक हुआ करता था। तो सलिल तक संदेश पहुंचे कैसे? स्टेशन पहुँचकर टिकट खरीदने के बाद दूसरा काम हुआ करता था सलिल को एसटीडी पीसीओ से फ़ोन की साहब कब पधार रहे हैं।

एक बार कुछ ऐसा हुआ कि समय की कमी के चलते फ़ोन नहीं हो पाया। वो तो भला हो दूरसंचार विभाग का जिन्होंने प्लेटफार्म पर ये सुविधा उपलब्ध करा दी थी। बस फिर क्या जहां ट्रेन रुकी वहीं से फ़ोन और सवारी स्टेशन पर मौजूद। वैसे सलिल से ये सेवा मैंने मुम्बई से भी खूब कराई लेकिन उसके बारे में फिर कभी। फिलहाल चक्र पर वापस आते हैं।

PTI में रहते हुए ही तबादला मुम्बई हो गया और दिल्ली छूट गया। सच कहूँ तो दिल्ली छूटने का जितना ग़म नहीं था उससे कहीं ज़्यादा खुशी मायानगरी मुम्बई में काम करने की थी। फिल्मों का चस्का तो था ही उसपर मुम्बई में काम करने का मौका जैसे सोने पे सुहागा। दिल्ली बीच में कई बार काम के सिलसिले में आना हुआ लेकिन वो सभी प्रवास दौड़ते भागते ही निकल जाते।

जब नवंबर 15 को दिल्ली के हवाईअड्डे पर उतरा तो काफी मायूस था। मुम्बई छूटने का ग़म, परिवार से अलग रहने की तकलीफ और अपने खाने पीने का खुद इंतज़ाम करना बड़ा भारी लग रहा था। लेकिंन दिल्ली फिर से मेरी कर्मभूमि बनने वाली थी ऐसा मन बना लिया था।

वो तो जब आज रात ट्रेन में बैठा तो जैसे एक झटका लगा। इसी शहर से अपना सफर एक प्रशिक्षु पत्रकार के रूप में शुरू करने के बाद आज में एक संपादक के रूप में वापस आया हूँ। जो सारे अनुभव दिल्ली से शुरू हो कर मुम्बई तक पहुंचे और जो मैंने मुम्बई की विभिन्न संस्थाओं से ग्रहण किया, उन सभी को आज फिर से दिल्ली में अपनी नई टीम के साथ न सिर्फ साझा करने का मौका मिलेगा बल्कि बहुत कुछ उनसे सीखने का मौका भी। और इस सफर की शुरुआत इसी दिल्ली से हुई थी जहां 17 वर्षों के बाद मैं वापस आया हूँ। आभार दिल्ली

CWG – The Lost Opportunity

\"\"I am sure a certain Mr Modi must be smiling. Well make that two Modi’s. The first one: holidaying abroad away from the Commonwealth and IPL circus here will be smiling as the whole country and the Queen wonder what made them award the CWG 2010 to India and the second one for getting a reprieve after “the party with a difference” did the same thing as other parties and struck a deal with the ruling Congress party.

The CWG games were supposed to be India’s entry into the big league. But forget the entry. India is set to make a humiliating exit. Just what the organisers were doing for the past seven years is something worth RTIing. What is different between the first Modi and Mr Kalmadi?

Mr Modi has the enviable track record of organising one of the most successful events in the history of Indian sports. That proved that India can do it and also gave us the false hope that CWG too would repeat the success. \"\" And Mr Kalmadi is doing just the opposite. I am sure both made huge money but while delivered and how, the other has failed. The second Modi and Mr Kalmadi have a lot in common. But another post another time.

The Babu’s who run the country have been assigned the games as well. Going by my experience of their running the country for the past 37-years, I firmly believe this is a bad choice. Now these Babu’s work according to a system. And with every action of anybody remotely associated with CWG being scrutinised with a magnifying lens it will be all the more difficult for these guys to put the house in order. Not that I think they can.

Was wondering if any of the Modis could have done some justice to the event with their experience?

Comparison with China is something India should learn to live with. While the communist country used the Olympics to develop the infrastructure in the country, the thinktanks here thought it was best to have the event again in Delhi. Infact the games were a good chance for India to develop sports facilities in other parts of the country. But what have we done? We are going to have more stadiums in Delhi as if the crumbling remains of 1984 Asian Games were not enough. Now we have Delhi which already had good roads, metro, airport getting more of all these and more.

Seven years. Long enough to develop anything. The Delhi airport was ready in record 37 months (that is still not ready for use is another story). The leaders who have Delhi fixation can learn a lesson or two from their Chinese counterparts.

Imagine the same fund being used to develop facilities in a city like Bhopal (that is where I come from, so naturally but it could be any tier-II city) it would have done the city and state whole lot of good and who knows would have cost a little less and would have been ready fast. But…

Like scores of other Indians I take very little from these games. Why? Because that is how sports is treated in the country. Just what Mr Kalmadi and Co did.