उड़ान: पहली हवाई यात्रा की यादें

प्यारी पम्मी की यादें

फाइंडिंग फॉरेस्टर: आया मौसम दोस्ती का

अपने आप को लेखक मानने की ग़लती नहीं कर सकता लेकिन भूले बिसरे ये जो ब्लॉग पोस्ट लिखना होता है, तो इसलिए स्वयं को एक अदना सा ब्लॉग लिखने वाला ज़रूर बोल सकता हूं। अब लिखने में जो आलस हो जाता है उसके बहुत से कारण हैं। आप अगर मुझसे साक्षात मिलें हों तो शायद आपको ये और बेहतर दिखाई भी देगा और समझ भी आएगा।

आज से लगभग पच्चीस साल पहले एक अंग्रेजी फ़िल्म आई थी Finding Forrester फाइंडिंग फॉरेस्टर। ये फ़िल्म है एक लेखक के बारे में जिसने एक बहुत सफ़ल किताब के बाद अब लिखना छोड़ दिया है और शहर के अच्छे घरों वाले इलाके से दूर एक इलाके में फ़्लैट लेकर रहते हैं। वहां इनकी मुलाक़ात एक ग़रीब घर के लड़के से होती है जो कुछ लिखता रहता है। कैसे ये दोनों दोस्त बनते हैं और कैसे दोनों की ज़िंदगी में एक घटना के बाद भूचाल सा आ जाता है – ये इसकी कहानी है।

चलना शुरू करें

मैं आज इसका ज़िक्र इसलिए कर रहा हूं क्योंकि इसमें लेखक कैसे कहीं अटक जाता है, कैसे उसके विचार आगे नहीं बढ़ते इसका बख़ूबी चित्रण किया है। बहुत से लेखक इसको Writers ब्लॉक भी कहते हैं। जब आप बस सामने रखे कागज़ को देखते रहते हैं और कुछ लिख नहीं पाते।

फ़िल्म में इसका एक बड़ा अच्छा उपाय बताया गया है। उनके अनुसार जब लिखना शुरू करें तो बस लिखें। उस समय सोचना छोड़ दें। ये बात जीवन में किसी भी काम के लिए सभी है। हम अकसर किसी काम को तबतक टालते रहते हैं जब तक हमारे हिसाब से सब कुछ सही नहीं हो जाता। नतीजा ये होता है की हम इंतज़ार ही करते रह जाते हैं। इसी तरह फ़िल्म में जमाल वालेस जब विलियम फॉरेस्टर के घर पर कुछ लिख नहीं पाता तो विलियम उसको अपनी एक किताब के कुछ शुरुआती अंश से लिखने की सलाह देते हैं। जब जमाल ऐसा करना शुरू करता है तो उसके बाद वो उसी शुरुआत को अपने शब्दों में कहीं और ले जाता है।

ये सुझाव कितना कारगर है इसका मुझे पता नहीं। लेकिन मेरे साथ अक्सर ये होता है और ये मेरे पत्रकारिता की शुरुआती दिनों से चल रहा है। जब तक समाचार लिखना है तब तक तो गाड़ी ठीक चलती है। क्योंकि उस समय आप सिर्फ़ एक काम कर रहे होते हैं – अपने पाठकों तक ख़बर पहुंचाना। लेकिन जब कोई स्पेशल स्टोरी या फीचर लिखना हो तो श्रीमान असीम बस ढूंढते रहते हैं प्रेरणा को।

अच्छी बात ये रही कि इस पूरे कार्यक्रम में प्रेरणा नाम की कोई सहयोगी नहीं मिलीं। अगर वो होतीं तो लोगों को खामखां बातें बनाने का अवसर मिलता।

फ़िल्म पर वापस आते हैं। जमाल पढ़ाई में ठीक ठाक ही हैं लेकिन वो बहुत बढ़िया बास्केटबॉल खेलते हैं। अमरीका में अगर आप खेलकूद या अन्य किसी विधा में अच्छे हैं तो अच्छे कॉलेज/स्कूल आपको स्वयं अपने यहां दाखिला देते हैं। इसके चलते एक अच्छे स्कूल में उनकी आगे की पढ़ाई सुनिश्चित होती है। 

लेखक और इनके शागिर्द के बीच एक बात तय होती है कि जो भी इनके फ़्लैट में लिखा जाएगा वो बाहर नहीं ले जाया जाएगा। लेकिन जमाल स्कूल में एक लेखन प्रतियोगिता में घर पर लिखा हुआ एक निबंध जमा करा देते हैं। इस निबंध की शुरुआत उन्होंने विलियम की एक किताब के अंश से शुरू करी लेकिन बाक़ी अपने शब्दों में लिखा। प्रतियोगिता के नियम के अनुसार अगर आपके पास लेखक की अनुमति नहीं है तो इसके लिए आपको स्कूल से निकाल भी सकते हैं।

जमाल के शिक्षक राबर्ट अपने आप को एक तुर्रम लेखक मानते हैं। विलियम जो बरसों से घर से बाहर नहीं निकले थे, अपने दोस्त जमाल के लिये घर से निकलते हैं और उनका लिखा एक दूसरा निबंध सभी के सामने पढ़ते हैं।

अपना अपना नॉर्मल

कहानी में इन दो किरदारों के तरह मैं भी कभी विलियम तो कभी जमाल बन जाता हूँ। जब मेरी टीम के सदस्य लिखते हैं तो मैं विलियम बन उनकी मदद करता हूँ। मगर जब अपने लिखने की बारी आती है तो मैं जमाल बन जाता हूं।

भारत में लेखक या उनके ऊपर बहुत कम फ़िल्में बनी हैं। जो हैं, वो बहुत कुछ ख़ास नहीं लगती। लेकिन जब इस फ़िल्म को मैंने मुंबई के सिनेमाघर में देखा तो लगा था ये लिखने वालों के ऊपर उम्दा कहानी है। शॉन कॉनरी जो विलियम का किरदार निभा रहे हैं, इससे पहले जेम्स बॉन्ड के रोल में ज़्यादा याद थे। लेकिन इस फ़िल्म में लेखक की भूमिका में उनका यादगार अभिनय था। जमाल के रोल में रॉब ब्राऊन भी बहुत जंचे हैं।

इस फ़िल्म को हिंदी में भी डब किया गया है और यूट्यूब पर भी उपलब्ध है।

आइए आपका इंतज़ार था…

A beautiful silhouette of an airplane on a runway during a vibrant sunset at Čilipi Airport, Croatia.

यात्रा यादगार बन ही जाती है।

पिछले दिनों परिवार में एक शादी में शामिल होने का मौक़ा मिला। ख़ास बात इस बार ये थी की शादी के बहाने अयोध्या जाने का मौक़ा मिल रहा था। इस लिहाज़ से ये तो तय था की यात्रा यादगार होगी और यादगार बनी भी। जब किसी और के यहां शादी में जाओ तब लगता है लोग क्या क्या कारण से शादी को याद रखते हैं। उन्हीं मापदंडों के अनुरूप शादी तो यादगार बन गई। लेकिन यात्रा का जो अनुभव रहा, विशेषकर मुंबई वापस लौटने में, वो आपसे साझा कर रहा हूं।

बड़े शहरों में जिस तरह डिजिटल लेन देन का चलन बढ़ा है उसके चलते अब कैश रखने की आदत लगभग ख़त्म सी हो गई है। पिछले तीन वर्षों में जो भी यात्रा हुईं वो भोपाल या दिल्ली तक ही सीमित रहीं तो यही लेन देन का ज़रिया भी बना रहा। जिस तरह से सब जगह ये डिजिटल चल रहा था, उससे अयोध्या को लेकर भी बहुत आशान्वित थे। ये थी पहली भूल जो मुंबई वापसी के दिन बड़ी खटकी।

ऐसा नहीं है की रामजी की नगरी में डिजिटल नहीं चलता। शादी वाले दिन केश कर्तनालय में रूप सज्जा के लिए यही तरीका काम आया। विवाह के अगले दिन लखनऊ से दोपहर का उड़नखटोला पकड़कर मुंबई वापस आना था। इस १३५ किलोमीटर के सफ़र में तीन गाड़ियां बदलनी थी। जहां रुके थे वहां से टैक्सी स्टैंड, फ़िर टैक्सी से लखनऊ और आखिरी चरण था लखनऊ शहर से हवाई अड्डा। कैश के नाम पर बमुश्किल ₹१०० थे।

पहले चरण में ही गलती का एहसास हो गया था। जब बड़े शहर में ओला, उबर लोगों को परेशान करती हैं तो हम तो अयोध्या में थे जहां ये चलती नहीं है। क़िस्मत अच्छी हुई तो कोई लखनऊ से आई गाड़ी आपको मिल जायेगी। नहीं तो आप एप्प को देखते रहें और वो आपको झूठी आशा देती रहेगी।

अच्छी बात ये हुई की नज़दीक ही एक ई-रिक्शा मिल गया। बैठने से पहले पूछा नहीं और जब उतरने की बारी आई तो चालक ने डिजिटल तरीके से पैसे लेने से साफ़ इंकार कर दिया। मेरे साथ एक और सज्जन भी लखनऊ जा रहे थे। बेंगलुरू में रहते हुए वो भी मेरी तरह डिजिटल लेन देन में ही यकीं रखते हैं लेकिन अच्छी बात ये थी उनके पास एक ₹५०० का नोट था। अब समस्या थी छुट्टे पैसे की। चालक महोदय ने दस मिनिट इधर उधर पूछा और अंत में अपनी शर्ट और पतलून की सभी जेबों को खालीकर दस-बीस रुपए कम ही सही, पैसे दिए। बाद में ये विचार आया की अगर उन सज्जन के पास ₹ २००० का नोट होता तो।

अब दूसरे चरण में जब टैक्सी मिली तो वहां फ़िर वही कड़क नोट की मांग। जब उन्हें बोला नहीं है लेकिन बहुत जल्दी लखनऊ पहुंचना है तो उन्होंने कहा आप पूरी गाड़ी बुक कर लें। मैंने पूछा पैसा कहां से आयेगा? तो उन्होंने उसका उपाय भी सूझा दिया। नज़दीक के पेट्रोल पंप से स्कैन कर पैसे ले लिए और इस तरह लखनऊ का सफ़र शुरू हुआ।

अंतिम चरण का ड्रामा अभी बाक़ी था। जब टैक्सी से उतरे तो ऑटो वाले लाइन से खड़े थे। लेकिन समस्या जस की तस। डिजिटल पैसा नहीं लेंगे। वो तो भला हो उस ऑटो ड्राइवर का जिसने अपने अन्य चालक भाइयों से पूछा और अंततः एक चालक को डिजिटल लेन देन में कोई आपत्ति नहीं थी।

अब नजरें घड़ी पर और सामने दिखने वाले साइन बोर्ड पर थी जो ये बताता आप हवाई अड्डे पहुंच गए हैं। मैं तो ये मान बैठा था की अब उड़नखटोले को नीचे से उड़ते हुए ही देखूंगा। दूसरी फ्लाइट देखना भी शुरू कर दिया था।

जब हवाई अड्डे के नज़दीक पहुंचे तो ऑटो चालक जिसके लिए मन से सिर्फ़ दुआ निकल रही थी, उसने यू टर्न लिया और बोला पहुँच गए। मैंने कहा भाई अंदर तक तो छोड़ दो। महाशय बोले हम अंदर नहीं जायेंगे। हवाई अड्डा मुश्किल से ३०० मीटर दूर था। लेकिन इस भीमकाय शरीर को तो किसी तरह ले जाते, साथ में श्रीमती जी ने एक सूटकेस भी दिया था। उसके साथ दौड़ लगाना मुश्किल ही नहीं बहुत मुश्किल था। उसपर मई महीने की दोपहर।

Old green auto rickshaw turning at intersection on street near lush tropical trees on sunny day

किसी तरह पहुंचे तो वहां हवाई अड्डे में अंदर जाने के लिए लंबी लाइन लगी हुई थी। थोड़े अदब से वहां के कर्मचारी और बाक़ी यात्रियों से गुज़ारिश करी और सबने जाने दिया। मुझे अभी भी यही लग रहा था काउंटर पर जो भी होगा वो अफ़सोस जताते हुए कहेगा आप की फ्लाइट तो उड़ने को तैयार है।

मगर ये हुआ नहीं।

एयर इंडिया के स्टाफ को देखते ही मैने कहा मुंबई। उन्होंने कहा आइए। बस वही अजय देवगन वाली फीलिंग आ रही थी। आइए आपका इंतज़ार था। ताबड़तोड़ सूटकेस लिया गया, वज़न तौला गया और मुझे सिक्योरिटी के लिए जाने को कहा।

बस एक समस्या थी। मेरे पास बोर्डिंग पास का प्रिंटआउट नहीं था। लेकिन उन्होंने कहा ई टिकट चलेगा। ये मेरे लिए पहली बार था। मुझे लग रहा था सिक्योरिटी वापस भेजेगा। लेकिन नहीं। उन्होंने तो मेरी टिकट स्कैन करने में मदद करी। आगे खड़े यात्रियों से फ़िर दरख्वास्त करी। सिक्यूरिट के उस तरफ़ भी एयर इंडिया की एक कर्मचारी मुझे पार करवाने में मदद के लिए तैयार थीं।

अगले दो मिनिट में बस में बैठे थे हवाई जहाज में जाने के लिए। साथ में मेरे जैसे चार लेट लतीफ़ और थे। जब अंदर पहुंचे तो बाक़ी सभी यात्री जो शायद पिछले दस पंद्रह मिनट से बैठे थे, हम लोगों को देख रहे थे। मारे खुशी के बस नाचना ही बाकी रह गया था। मगर जब एक दिन पहले बारात में साली साहिबाओं के इसरार से नहीं मटके तो अब क्या ख़ाक कमरा हिलाते (कमर के लिए गुलज़ार साहब ने कहा है ।

परिचारिका ने भी पसीने से लथपथ यात्री पर रहम खाते हुए पानी पिलाया। जब उड़ गए तब स्वादिष्ट भोजन भी कराया। एयर इंडिया के सभी कर्मचारियों को सलाम!

इस पूरे प्रकरण से सीख या सीखें

— किसी नई जगह जा रहें हों तो कैश ज़रूर साथ में रखें

– जहां जा रहे हों वहां अपनी वाहन की ज़रूरत पहले से बता दें ताकि कुछ इंतज़ाम किया जा सके

– फ्लाइट में वेब-चेकिन ज़रूर से करवाएं। एयरपोर्ट में अंदर जाने के बाद मेरे बोर्डिंग पास के कारण सारे काम जल्दी जल्दी हो गए।

सबसे बडी सीख़: जब मौक़ा मिले लोगों की मदद करिए। आप किसी की मदद करेंगे, कोई और आपकी मदद करेगा। मेरी पूरी यात्रा में किसी न किसी ने मदद करी जिसके चलते फ्लाइट पकड़ पाये। और लोगों का शुक्रिया, धन्यवाद भी करते रहिए।

कुल मिलाकर यात्रा विवाह से ज़्यादा बाकी अनुभव के चलते यादगार बन गई।वैसे अयोध्या और इससे पहले भोपाल प्रवास के दौरान बहुत से लोगों से मिलना हुआ जो मेरे ब्लॉग के नियमित पाठक भी हैं। अगर आप लिखते हों और कोई पढ़ता है – ये जानकर अच्छा लगता है। उसपर ये भी सुनने को मिल जाये की अच्छा लिखते हो तो जलेबी संग रबड़ी वाली बात हो जाती है।

जन्मदिन तुम्हारा, मिलेंगे लड्डू हमको

A nostalgic collection of vintage photos in an old wooden box.

जन्मदिन हो और मिठाई न हो तो कुछ अधूरा सा लगता है।

प्यारी पम्मी,

सालगिरह मुबारक। पहले तो सोचा जो दो साल पहले तुम्हारे पहले जन्मदिन पर (मतलब तुम्हारे नहीं होने के बाद) जो लिखा था उसी से काम चला लेते हैं। फ़िर सोचा अब ये कोई नया सोनी का मंहगा म्यूजिक सिस्टम तो है नहीं जो नया लिख दिया तो तुम गुस्सा हो जाओगी और लड़ाई करने लगोगी। लेकिन फ़िर मेरी पसंदीदा जूही जी का QSQT का डायलॉग याद आ गया। क्या ऐसा हो सकता है। और आमिर ख़ान का जवाब \’नहीं\’। तो बस ये नई ताज़ा जन्मदिन की ढ़ेरों शुभकामनायें तुम्हारे लिए।

जब हम लोग पापा का सरकारी घर छोड़कर अपने घर में शिफ्ट हुए थे तब उस घर में पहला जन्मदिन तुम्हारा ही मनाया था। ये अलग बात है की 27 के बाद 28 आती है और नये घर में जाने के बाद दूसरे ही दिन तुम्हारा हैप्पी बर्थडे था। बस कह रहे हैं।

वैसे इस साल दिवाली में जब सब उसी घर में इकट्ठा हुए तो कोरम पूरा तो था लेकिन अब हमेशा के लिए अधूरा ही रहेगा। कोरम का कैरम से कोई लेना नहीं। बस बता रहे हैं। तुम सोचो कैरम के चार खिलाड़ियों की बात कर रहे हैं। वैसे कैरम से याद आया हम चारों ने कैरम साथ में कम ही खेला है या कभी खेला ही नहीं। ज्यादातर तो ताश ही खेलते थे। बस तीन पत्ती नहीं खेली, क्लब इस्टाइल में। 

ये कहना ग़लत होगा तुम्हारी याद आती है। याद तो उनकी आती है जिन्हे भूल जाते हैं। तुम्हारा ज़िक्र तो बस ऐसे ही होता रहता है। कभी गाना देखलो तो तुम्हारी बात निकल पड़ती है, कोई उटपटांग नाम सुनो तो ये सोचने लगते हैं तुम्हारी इस पर क्या प्रतिक्रिया होगी। कभी किसी जानने वाले की ताज़ातरीन हरक़त के बारे में कुछ बात होती है तो तुम्हारा क्या कहना होगा इस पर भी बात कर लेते हैं।

दो साल। 365*2। पता है तुम्हारा गणित मुझसे बेहतर है और मेरे पास होने के लाले पड़े रहते थे। लेकिन इसका जवाब तुम्हारा गलत होगा। ये महज़ 730 दिन की बात नहीं है। हर चीज़ गणित नहीं होती, गुणा भाग नहीं होती। ज़िंदगी इससे कहीं ऊपर है। और अब तुम्हारे पास तो टॉप फ्लोर से देखने का विकल्प भी है। वैसे नीचे से भी इतना कुछ बुरा नहीं दिखता है। हाँ दिल्ली में प्रदूषण कुछ ज़्यादा हो गया है।

गिरते संभलते हम लोग फ़िर से चल तो पड़े हैं, लेकिन मुड़ मुड़ के देखते रहते हैं। नादिरा और राज कपूर के पहले धीरे धीरे और बाद में थोड़ी तेज़ी में समझाने के बाद भी। वैसे इन दिनों गानों को बिगाड़ने का काम ज़ोरशोर से चल रहा है। कल ही मैंने \’आप जैसा कोई\’ का नया बिगड़ा हुआ रूप देखा। लेकिन 1980 की ज़ीनत अमान आज की नचनियों से मीलों आगे हैं। इस नए गाने के बजाय सिगरेट फूंकते फिरोज़ ख़ान को देखना ज़्यादा मज़ेदार है।

बचपन में एक गाना सुनते थे। जन्मदिन तुम्हारा मिलेंगे लड्डू हमको तो बस तुम्हारे जन्मदिन पर भी मुंह मीठा कर लिया। ज्यादा नहीं बस थोड़ा सा। बाक़ी खट्टी मीठी पुरानी यादों का अंबार है जिससे काम चल ही रहा है। शायद इसलिए शुगर कंट्रोल में आ रही है। बस ये कमबख्त वज़न का मुझसे इश्क कम हो जाये तो बात है। किसी ने सच ही कहा है इश्क़ और मुश्क छुपाए नहीं छुपते। और अपना तो ऐसे दिख रहा बायगॉड की क्या बताएं।

एक बार पुनः ढेर सारी बधाई। तुम जहां हो खुश रहो। सिर्फ़ तुम्हारा

मोटू डार्लिंग

रविवारीय: बालों की सफेदी से फ़ीका कब हुआ है रोमांस

PRE WEDDING

अभी कल किसी के परिवार के एक समारोह का वीडियो देखने को मिला। सब गाना बजाना चल रहा था। लेक़िन जो बात मुझे बड़ी अजीब सी लगी वो थी समारोह में सम्मिलित सभी लोगों के बाल देखकर।सभी के बाल रंगरोगन किये हुये औऱ एकदम चमकते काले बाल। शायद इतने तो तब भी न रहे हों जब इन बालों का रंग काला ही रहा होगा।

अब आप कह सकते हैं की ज़रुरी नहीं सब उम्र के उस दौर में हों जहाँ बालों को रंगरोगन की ज़रूरत हो। ये भी तो मुमकिन है की बालों का रंग वाकई में काला हो। जी बिल्कुल हो सकता है। लेक़िन उनमें से कई लोगों को जानते हैं औऱ शायद उनकी उम्र भी। ख़ैर बालों को रंगना कोई नई बात तो नहीं है। औऱ है भी बहुत ही व्यक्तिगत मामला।

जब हम छोटे थे तो कई बार टेलकम पाउडर को पेंट ब्रश से बालों पर लगाकर देखा करते थे। उस समय वो काले सफ़ेद बाल देखकर बड़ा अच्छा लगता। वर्ष 2003-4 की बात है। मेरे उन दिनों के मित्र मुम्बई किसी काम से आये हुये थे। एक दिन उनके साथ पहुँच गये सैलून पर। हमारा काम तो जल्दी समाप्त हो गया। लेक़िन ये क्या – महाशय तो बाल रंगवा रहे थे। इतने वर्षों में मुझे ये पता भी नहीं चला की वो ऐसा करवाते रहे हैं।

हमारे एक औऱ परिचित हैं। उनके बाल भी 50-55 की उम्र में बढ़िया काले। पहले कुछ सफ़ेदी थी लेक़िन शायद उन्होंने उसे छुपाना बेहतर समझा। एक दिन बिना बताये जब उनके घर पहुँचे तो देखा श्रीमान कालिख़ लगाये धूप में बाल सूखा रहे हैं। हमें सामने देखकर पहले तो कुछ समझ नहीं आया लेक़िन उसके बाद ऐसे बात करने लगे जैसे कुछ हुआ ही नहीं।

आजकल के नायक, नायिकाओं को देख लीजिये। सब हिजाब लगा लगा कर काले बाल लिये घूमते रहते हैं। मुझे अभी तक ये समझ नहीं आता की ऐसा करने की क्या ज़रूरत है। आपके शरीर में समय के साथ बदलाव आते हैं तो बजाये इसके की उन बदलावों को स्वीकार करें लोग वक़्त को पीछे मोड़ने में लगे रहते हैं।

सर्दी तो अब लगभग जा ही चुकी है औऱ अब बसंत आ गया है औऱ सब बंजर ज़मीन पर दिख रही हरियाली अब कुछ दिनों में गायब होने वाली है। घर के सामने जो पहाड़ी है वो तपती धूप में सब कुछ गवांने के बाद इन दिनों हरी भरी हो गयी है। कुछ दिनों बाद हरियाली गायब हो जायेगी। अब ये बालों की सफ़ेदी औऱ पहाड़ों की हरियाली – कहीं भटके तो नहीं?

पिछले वर्ष कोरोना के कारण अस्पताल में समय बिताने के बाद जब घर वापसी हुई तो शक्ल में कुछ बहुत ज़्यादा बदलाव नहीं आया था। हाँ लगभग महीने भर की दाढ़ी थी औऱ सर पर कम होते बाल। जैसा इन दिनों चलन है, एक दिन पारिवारिक वीडियो कॉल हुआ। सेहत की बातें करते करते किसी ने बताया की मेरे सिर पर बाल कुछ ज़्यादा कम दिख रहे हैं। उस समय तो सब हंसी मजाक में टल गया लेक़िन मुझे भी पिछले कुछ दिनों से मैदान साफ़ होता हुआ दिख रहा था। जिस गति से ये सर से अलविदा कह रहे थे, लगता था शान फ़िल्म के शाकाल बन ही जायेंगे।

लेक़िन जब बाक़ी कोविड मरीजों से यही सुनने को मिला तो थोड़ी राहत मिली। वैसे भी जब बाल गायब होना शुरू होते हैं तो ये कहा जाता है की ये इस बात को बताता है की आपका बैंक बैलेंस बढ़ रहा है। अगर ये उम्र के हिसाब से हो रहा है तो ये सही भी होता है क्योंकि उस समय आप एक बड़े पद पर पहुँच चुके रहते हैं औऱ आपकी आय में उसी हिसाब से बढ़ोतरी भी होती है।

वैसे हर वो आदमी जिसके सिर से बाल या तो गायब हो चुके रहते हैं या लगभग नहीं के बराबर होते हैं वो ऐसा नहीं सोचते। पिछले दिनों एक सज्जन से मिलना हुआ। जब उनको देखा तो थोड़ा अजीब सा लगा। दरअसल उनकी जो तस्वीरें हैं वो बिना बालों की हैं लेक़िन सामने वो विग लगाये बैठे थे। ये माजरा थोड़ी देर बाद समझ आया।

फ़िल्म जाने भी दो यारों में इससे जुड़ा बड़ा ही अच्छा सीन है।

ऐसे ही एक औऱ सज्जन से मुलाक़ात हुई। उनको देखकर भी लगा मामला कुछ गड़बड़ है। कुछ देर में पता चला की महाशय सिर के बालों के साथ अपनी मूछों के बालों का भी रंगरोगन करते हैं। सिर के बाल से कुछ समय बाद रंग निकलना शुरू हो जाता है। लेक़िन उनकी मूछों के बाल एकदम बढ़िया काले। ये भी हो सकता है वो नत्थूलाल से प्रेरित हों औऱ मूछों का ज़्यादा ख़्याल रखते हों।

लेक़िन कुछ लोग होते हैं जो इस प्रकृति के नियम से कोई छेड़छाड़ नहीं करते। एक परिचित के काले सफ़ेद बाल वर्षों से देख रहे हैं औऱ वो उनके ऊपर बहुत जँचते भी हैं। कई ऐसे नौजवानों को भी जानते हैं जिनके सर से बाल कम उम्र में ही गायब हो गये औऱ उन्होंने उसको छिपाया नहीं। आजकल तो कई लोग इसको एक फ़ैशन के रूप में भी देखते हैं। जैसे दाढ़ी रखने का इन दिनों ज़बरदस्त चलन है।

बालों को रंगने या तकनीकी मदद से उनको पुराने जैसा बनाये रखने के बारे में आपकी क्या राय है?

रविवारीय: मेरी नज़र से देखो तो यारों, की मेरी मंज़िल है कहाँ

A close-up image of a graduate holding a diploma tied with a red ribbon, symbolizing achievement and success.

जनवरी की सर्दी जाते जाते औऱ गर्मी के बीच एक मौसम आता है। बसंत की ओर या इश्क़, मोहब्बत वाली फ़रवरी की तरफ़ मेरा इशारा कतई नहीं है। वैसे हमारे समय में वैलेंटाइन डे का इतना कुछ हो हल्ला नहीं था जैसा इन दिनों है। फ़रवरी शुरू होते ही हर जगह बस यही चलता रहता है। जहाँ तक बसंत पंचमी की बात है तो माँ सरस्वती की पूजा औऱ पीला रंग पहनने का काम बिल्कुल होता है।

बहरहाल, जिस मौसम की मैं बात कर रहा हूँ, वो है अपनी नई जिंदगी की तरफ़ एक औऱ कदम बढ़ाने का। अब अग़र फ़लसफ़े की बात करें तो हम रोज़ ही उस दिशा में कदम बढ़ाते रहते हैं। लेक़िन इस बात का एहसास उस समय ज़्यादा होता है जब आप स्कूल छोड़कर कॉलेज की तरफ़ बढ़ते हैं औऱ कॉलेज छोड़ आगे की पढ़ाई या नौकरी की तरफ़।

तो ये जो मौसम है जो सर्दी औऱ गर्मी के बीच में रहता है वो है फेयरवेल का या अपने स्कूल औऱ कॉलेज से बिदाई का। परीक्षा के ऐंन पहले आपकी संस्था से बिदाई।

जब तक स्कूल की पढ़ाई करते रहते हैं तब लगता है कॉलेज कब जाने को मिलेगा। जो आज़ादी दिखती है कुछ भी ओढ़ने पहनने की और क्लास का मूड न हो तो यार दोस्तों के साथ चाय की दुकान पर समय बिताने का या कोई नई फ़िल्म देखने निकल जाना। लेक़िन जब स्कूल छोड़ने से पहले ये बिदाई का क्षण आता है तो पिछले सालों की यादें आंखों के सामने आ जाती हैं।

स्कूल में तो फ़िर भी ये समारोह बहुत ही सलीके से आयोजित होता है। सब इस मौक़े को यादगार बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ते। मस्ती, मज़ा, नाच, गाना औऱ फ़िर वो क्षण जब आप स्कूल को अलविदा कहते हैं। स्कूल में जब फेयरवेल हुई तो सब थोड़े भावुक भी हो गये थे। मुझे भी इन चार सालों में लगाव हो गया था लेक़िन बहुत से ऐसे विद्यार्थी थे जिनका बचपन यही से शुरू हुआ था। उनका लगाव कुछ ज़्यादा था औऱ बिछड़ने का ग़म भी।

हमारे समय में इस आयोजन की इतनी तैयारी नहीं हुआ करती थी। मतलब आज के जैसे नये कपड़े औऱ कई जगह तो एक से ज़्यादा पार्टी भी होती हैं। कई बच्चे तो साथ मिलकर अलग पार्टी भी करते हैं इस खास मौक़े पर। शायद हमारे समय में भी ऐसा कुछ हुआ हो लेक़िन मुझे कोई न्यौता नहीं था।

जहाँ तक तैयारी की बात है तो मुझे बिल्कुल भी ध्यान नहीं कुछ विशेष तैयारी करी हो। उस समय जो सबसे अच्छे कपड़े रहे होंगे वही पहन कर गये थे। बहुत से लड़के सूट-पेंट-टाई में भी थे। जैसा मैंने पहले बताया था सरकारी घर के बारे में, हमारे आसपास शिक्षण संस्थाएँ थीं। छात्राओं वाली संस्था ज़्यादा थीं तो जिस दिन उनके यहाँ ये समारोह होता था, बाहर कुछ ज़्यादा ही रौनक़ रहती।

वापस तैयारी पर आयें तो दोनों बहनों ने भी माँ की कोई अच्छी सी साड़ी पहन कर ही अपनी फेयरवेल मनाई। हम लोगों के साथ साथ हमारे माता पिता के लिये भी ये एक यादगार क्षण होता है। उनकी संतान जीवन का एक नया अध्याय शुरू करने को तैयार हैं औऱ अपने भविष्य के निर्माण की तरफ़ क़दम बढ़ा रहे हैं।

कॉलेज में आकर सब बदल जाता है। मैं जिस संस्था में गया था वो बहुत बड़ी तो नहीं थी औऱ न ही ज़्यादा भीड़भाड़ वाली। मतलब सब काम आराम से होता था। लेक़िन स्कूल के बाद कॉलेज में जो बदलाव आया वो था अनुशासन औऱ परंपरा। जी बिल्कुल मोहब्बतें वाले अमिताभ बच्चन के जैसे।

स्कूल में तो सभी बाहरवीं के छात्रों के लिये एक ही ऐसा कार्यक्रम होता। लेक़िन कॉलेज में साइंस, आर्ट्स, कॉमर्स औऱ ग्रेजुएट एवं पोस्ट ग्रेजुएट सभी कक्षायें। सभी का फेयरवेल एक साथ कैसे संभव था। वैसे इसका पता भी नहीं चला। वो तो जब सेकंड ईयर में आये तब जनवरी आते आते फाइनल ईयर के लिये इस कार्यक्रम की चर्चा शुरू हुई।

जो तीसरी चीज़ मोहब्बतें में नहीं थी वो थी राजनीति। ये भी स्कूल से अलग मामला था। कॉलेज में छात्र नेता तो थे लेक़िन कभी आमना सामना नहीं हुआ था। इस कार्यक्रम के चलते वो मौका आ ही गया। मेरे साथ के कुछ सहपाठी का इन छात्र नेताओं से संपर्क था। जब फेयरवेल का कार्यक्रम बना तो पता चला दो गुट हैं औऱ उनकी इस कार्यक्रम को लेकर सहमति नहीं बनी।

हम लोगों पर ये दवाब था की कार्यक्रम हो। तो एक दिन नियत किया औऱ जितने लोगों को आना हो या जायें कार्यक्रम होगा। दूसरे गुट को भी जानकारी थी। हम लोगों की मजबूरी थी। उस दिन फिल्मों वाला सीन सामने देखने को मिला। मार पिटाई हुई औऱ सारी तैयारी धरी की धरी रह गयी। बस जो अच्छी बात हुई वो ये की हम लोगों को समोसे औऱ कोल्ड ड्रिंक पीने को मिल गई।

जब हमारी बारी आई तब तक ऐसे आयोजन पर रोक लग गयी थी। हम सब कहीं बाहर मिले औऱ साथ खाना खाया। जब 1988 में क़यामत से क़यामत तक आयी थी तब फेयरवेल का एक अलग माहौल देखने को मिला था। लेक़िन असल ज़िन्दगी में कॉलेज की पढ़ाई के दौरान ऐसा कुछ देखने को नहीं मिला। आमिर खान के जैसे सेकंड ईयर वालों का औऱ प्रीवियस के छात्रों का शुक्रिया करने का सपना ही रह गया। 

फ़िल्मों में स्कूल कॉलेज तो बहुत दिखाये लेक़िन फेयरवेल वाले कुछ ज़्यादा याद नहीं। एक बी आर चोपड़ा की फ़िल्म थी निक़ाह। उस फ़िल्म में एक बेहद खूबसूरत गीत था बीते हुये लम्हों की कसक साथ तो होगी । गाने के बोल से तो ये फेयरवेल वाला लगता है लेक़िन है ये सालाना होने वाले कार्यक्रम का हिस्सा। इसके अलावा औऱ तो कुछ याद नहीं।

संभव तो कुछ भी है। अग़र वो हमारे सेकंड ईयर के छात्र अगर ये पढ़ रहें हो तो, उनका शुक्रिया। औऱ आपको भी शुक्रिया कहेंगे की आप ये पढ़ रहे हैं। औऱ शुक्रगुजार रहेंगे अगर आप इस पर अपनी विशेष टिप्पणी साझा करें औऱ इसको आगे बढ़ायें। फ़िलहाल ये गाना देखें।

रविवारीय: तेरी एक निग़ाह की बात है, मेरी ज़िंदगी का सवाल है

आप सभी ने कभी न कभी वो साबुन वाला विज्ञापन ‘मेरी त्वचा से मेरी उम्र का पता नहीं चलता’ ज़रूर देखा होगा। इसकी एक लाइन है जो वर्षों से चली आ रही है। असल जीवन में मुझे ये विज्ञापन औऱ इसकी ये लाइन तब याद आती है जब…

मेरे साथ अक्सर तो नहीं लेक़िन कई बार हुआ है की मेरे अनुज को मेरा बड़ा भाई बताया गया है। जब भी ऐसा होता तो विज्ञापन की याद आती है। हाल ही में ये घटना एक बार औऱ हो गयी जब साल के अंत में हमारा गोवा जाना हुआ। होटल के रिसेप्शन से मैंने कुछ बात करी थी। उसके बाद भाई पहुँचे तो उनसे बोला आपके छोटे भाई आये थे अभी। पहले तो भाई को समझ में नहीं आता उनका छोटा भाई कौन आ गया। लेक़िन अब वो मुस्कुरा कर गर्दन हिला देते हैं।

इसके पहले आपको लगे इसमें किसी साबुन का योगदान है, तो मैं बता दूँ ऐसा कुछ नहीं है। आज जो ये बडे छोटे वाली बात निकली है दरअसल इसकी वजह हैं मेरी एक पुरानी सहयोगी जो इस समय शायद अपने जीवन के सबसे कठिन दौर से गुज़र रही हैं।

कुछ दिनों पहले उनसे फ़ोन पर बात हुई थी तो वो कहने लगीं, औऱ कुछ भी हो जाये घर का बड़ा नहीं होना चाहिये। बहुत सारी ज़िम्मेदारी होती हैं उनके कंधों पर जो बड़े होते हैं। ये ज़िम्मेदारी कुछ तो उनको इसलिये मिलती हैं क्योंकि वो बड़े हैं औऱ कुछ इसलिये उनको उठानी पड़ती हैं क्योंकि वो बड़े हैं।

परिवार में जो बच्चे बड़े रहते हैं वो समय से पहले ही बड़े हो जाते हैं अपने बड़े होने के कारण। थोड़ा पेचीदा सा लगता है लेक़िन अपने आसपास देखिये। घर में अगर दो बच्चे हैं तो जो बड़ा होता है उसको शुरू से ही यही समझाईश सुनने को मिलती है, \’तुम बड़ी/बड़े हो\’।

ज़्यादातर जितने भी बड़े लोगों को में जानता हूँ वो सभी थोड़े ज़्यादा संजीदा होते हैं। वहीं उसी घर के छोटे जो होते हैं वो ज़्यादा मस्तीखोर, चंचल। बहुत कम घर/परिवार में बड़ों को ऐसा करते देखा है। कभी कभार शायद, लेक़िन ज़्यादातर वो एक गंभीर मुद्रा में रहते हैं।

हिंदी फ़िल्मों को ही देख लीजिये। यादों की बारात के धर्मेंद्र हों या अमर अकबर एंथोनी के विनोद खन्ना। सभी तीनों भाइयों में बड़े भाई थे और सभी गंभीर। फ़िल्म में उनके जो छोटे भाई थे वो ज़्यादा चुलबुले थे।

फ़िल्मों में अगर बड़े भाई की बात करें तो ‘जो जीता वही सिकन्दर’ में भी बड़े भाई को थोड़ा गंभीर। सबका ख़्याल रखने वाला, ज़िम्मेदार। पूरी फ़िल्म में आमिर ख़ान एक के बाद एक मुसीबत में पड़ते रहते हैं औऱ मामिक सिंह उनको बचाते रहते हैं। लेक़िन एक जगह फ़िल्म में मामिक को अपना गंभीर होना छोड़ गाने में क़मर हिलानी पड़ी।

वैसे तो मामिक लगभग सभी गानों में हैं, लेक़िन बाक़ी कलाकारों के जैसे वो उछल कूद नहीं कर रहे हैं। लेक़िन ‘शहर की परियों के पीछे‘ गाने में मामिक आमिर के साथ नाचते हुये दिखाये गये हैं। आप अगर वो गाना देखें तो आपको भी मामिक थोड़े असहज दिखाई देंगे। इसके पीछे का कारण भी फ़राह खान ने बताया। दरअसल फ़िल्म में दो कोरियोग्राफर थे। पहले सरोज खान थीं औऱ बाद में उनकी जगह आईं फ़राह खान। तो सरोज खान ने ये गाना निर्देशित किया था। बक़ौल फ़राह “अगर वो ये गाना करती

फ़िल्मों से असल जीवन में वापस आते हैं। जिन सहयोगी के बारे में बता रहा था, वो घर में बड़ी हैं औऱ इस कठिन समय में सभी को संभालने का काम उन्हें करना है। अक़्सर ये होता है की कई बार सबको संभालते संभालते हम ख़ुद भी संभल जाते हैं। वैसे मेरे जीवन में ऐसे मौक़े जब भी आये हैं तो मेरे मुक़ाबले मेरे अनुज ने कहीं ज़्यादा संभाला है। मुझे संभलने में एक लंबा समय लगता है तो भाई ये ज़िम्मा उठा लेते हैं औऱ मुझे समय देते हैं।

कई ऐसे भी घर के बड़े देखें हैं जो ये भूल जाते हैं कि वो बड़े हैं। अपने छोटों की ग़लतियों के बारे में ख़ामोश रहना ही अपना बड़प्पन समझते हैं। कई बड़े अपना सारा दुख, परेशानी अपने तक ही सीमित रखते हैं। चूँकि वो बड़े हैं तो वो इनके बारे में सबसे बात नहीं कर सकते। सलाह मशविरा बड़ों से, लाड़ प्यार छोटों से।

मुझे कई बार बड़े होने में औऱ किसी संस्था या टीम के लीडर होने में बड़ी समानताएं दिखाई देती हैं। जब आप ऐसी किसी पोस्ट पर आ जाते हैं तो आपको कम से कम बोलना होता है औऱ आपके पास बहुत सी ऐसी जानकारी होती है जिसे आप किसी के साथ शेयर नहीं कर सकते। जो एक बड़ा फर्क़ होता है वो ये की कोई अनुज नहीं होता जो आपकी जगह चीजों को संभाल सके। ये सब आपको करना होता है।

जब मुझे टीम की ज़िम्मेदारी मिली तो बड़ी खुशी हुई। कई बार बहुत कड़े फ़ैसले भी लेने पड़े। उस समय आपके साथ कोई नहीं होता है लेक़िन आपको जो भी काम है वो करना पड़ता है। चूँकि आपको सिर्फ़ एक दो नहीं बल्कि पूरी संस्था या टीम के बारे में देखना होता है, तो आपको बहुत से अप्रिय निर्णय भी लेने पड़ सकते हैं। जैसे हर लीडर का काम करने का औऱ चीजों को देखने का अपना एक अंदाज़ होता है, वैसे ही घर के बड़ों का भी अलग अलग अंदाज होता है। यहाँ फ़र्क़ ये होता है की लीडर के ऊपर औऱ भी कोई बड़ा अधिकारी होता है, लेक़िन घर में ये बड़ों पर आकर रुक जाता है। शायद इसलिये बड़े जो हैं बड़े ही बने रहते हैं।

होंडा की एक कार आयी थी जैज़। उस साबुन के तरह इस कार के विज्ञापन की जो लाइन थी Why so serious… तो आप भी आप बड़े हों या छोटे, जीवन का भरपूर आनंद लें। औऱ कभी मामिक के जैसे गलती से ही सही, नाचने का मौक़ा मिले तो दिल खोलकर नाचें।

रविवारीय: वक़्त रहता नहीं कहीं रूककर, इसकी आदत भी आदमी सी है

आज सुबह सुबह यूँ ही, गाना सुनने का नहीं बल्कि देखने का मन हुआ। अगर आप यूट्यूब पर गाने देखते हैं तो आपको पता होगा पहली बार आप जो देखना चाहते हैं वो ढूँढते हैं उसके बाद सामने से ही सुझाव आने लगते हैं।

मुझे जब सुझाव में क़यामत से क़यामत तक का गीत \’ऐ मेरे हमसफ़र\’ दिखाई दिया तो अपने आपको रोक नहीं सका सुबह सुबह ऐसा मधुर गीत सुनने से। गाने की शुरुआत में दो चीज़ें दिखायीं गयीं जिनका अब इस्तेमाल कम होने लगा है। आमिर खान के सामने घड़ी है क्योंकि संगीत में घड़ी की टिक टिक है। जूही चावला इस गाने से ऐन पहले आमिर से एक दुकान में मिलती हैं जो उन्हें सही वक्त का इंतज़ार करने को कहते हैं।

जूही चावला जब घर पहुँचती हैं तो वो सीधे अपने कमरे में जाती हैं औऱ दीवार पर टंगे कैलेंडर पर पेन से उस दिन पर निशान लगाती हैं जब तक उन्हें इंतज़ार करना है। ये पोस्ट का श्रेय जुहीजी को कम औऱ उस कैलेंडर को ज़्यादा। 

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आज से क़रीब 10-12 साल पहले तक ऐसा होता था की साल ख़त्म होने को आता औऱ नये कैलेंडर के लिये ढूँढाई शुरू। कैलेंडर से ज़्यादा उनकी जो ये मुहैया करा सकें। सरकारी कैलेंडर तो मिल ही जाते थे सरकारी डायरी के साथ। लेक़िन तलाश होती कुछ अच्छे, कुछ नये तरह के कैलेंडर की। जिनसे मिलना जुलना था तो वो सरकारी कैलेंडर वाले ही थे। जब हमारे पास ज़्यादा हो जाते तो वो आगे बढ़ा दिये जाते।

सरकारी डायरी में ढ़ेर सारी जानकारी रहती जो उस समय लगता था किसी काम की नहीं है। प्रदेश से संबंधित सारे आँकड़े औऱ सभी से संपर्क साधने के लिये फ़ोन नंबर। लेक़िन लिखने की जगह कम रहती औऱ शनिवार, रविवार जो छुट्टी के दिन रहते सरकार के लिये उस दिन तो औऱ कम जगह। मतलब कुल मिलाकर इन डायरीयों की ज़्यादा पूछ परख नहीं थी।

बिज़नेस से जुड़े कम लोगों को जानते थे। फ़िर बचते दुकानदार जिनके यहाँ से सामान आता था। उनके कैलेंडर बड़े सादा हुआ करते थे लेक़िन सब रख लेते थे। निजी क्षेत्र में जो नौकरी करते उनके कैलेंडर की मांग सबसे ज़्यादा रहती। क्योंकि कंपनी पैसा खर्च करके अच्छे कैलेंडर छपवाती, इसलिये ये बहुत ही सीमित संख्या में मिलते कर्मचारियों को। किस को देना है ये बड़ा कठिन प्रश्न होता। लेक़िन तब भी कहीं न कहीं से हर साल कुछ अच्छे कैलेंडर मिल ही जाते।

किसी बड़ी कंपनी की दुकान से आपको ये कैलेंडर अगर किस्मत से मिला तो उसकी कीमत चुकानी पड़ती – एक बढ़िया सा बिल बनवाकर। अगर ऐसी किसी दुकान के आप नियमित ग्राहक हैं तो आपके लिये ये ख़रीदारी ज़रूरी नहीं है। आपके पिछले ख़र्चे की बदौलत आपको कैलेंडर मिल ही जायेगा।

जब पत्रकारिता में कदम रखा तो कई जगह से डायरी, कैलेंडर मिलने लगे। कई बार तो ऑफिस में ही किसी सहयोगी को भेंट दे देते। आख़िर आप कितनी डायरी लिखेंगे? कई बार तो ये भी हुआ की आपके नाम से कुछ आया लेक़िन आप तक कुछ पहुँचता नहीं।

ये कैलेंडर हमारी ज़िंदगी का इतना अभिन्न अंग है। आज वो दीवाल पर भले ही टंगा नहीं हो औऱ हमारे मोबाइल में आ गया हो लेक़िन तब भी एक कैलेंडर आज भी ज़रूर रहता है, वो है पंचांग। सरकारी घर में तो डाइनिंग रूम में इसकी एक नियत जगह थी जहाँ हर साल ये दीवाल की शोभा बढ़ाता। जब कभी तारीख़ देखने की बात होती तो अपने आप नज़र वहीं चली जाती।

महीना बदलने पर कैलेंडर में भी बदलाव होता। जहाँ बाकी अच्छी अच्छी तस्वीरों वाले कैलेंडर में नई तस्वीर होती, पंचांग में ऐसा कुछ नहीं होता। इसमें सब कुछ वैसा ही होता बस नये तीज, त्यौहार औऱ ढ़ेर सारी जानकारी उनके लिये जो इनको मानते हैं या पालन करते हैं। जब तक घर पर रहे तो इन सबकी ज़रूरत नहीं पड़ी, लेक़िन जब बाहर निकले औऱ उसके बाद जब श्रीमतीजी का आगमन हुआ तबसे ये पंचांग भी ज़रूरी चीज़ों में शुमार हो गया है।

मुम्बई आये तो उस पंचांग को ढूँढा जिसको देखने की आदत थी। एक दुकान पर मिल भी गया। लेक़िन जब कुछ दिनों बाद ध्यान से देखा तो मामला कुछ ठीक नहीं लगा। ज़रा बारीकी से पड़ताल करी तो पता चला रंग, स्टाइल सब कॉपी तो किया है लेक़िन असली नहीं है। तबसे हर साल कोशिश रहती है की अगर दीवाली पर घर जाना हो तो नया पंचांग साथ में लेते आयें। पिछले साल ये संभव नहीं हुआ। मुंबई में खोजबीन करके मिल ही गया।

ऐसा नहीं है की महाराष्ट्र में पंचांग नहीं है। लेक़िन हम मनुष्य आदतों के ग़ुलाम हैं। तो बस साल दर साल उसी पुराने पंचांग की तलाश में रहते हैं। घर में अब कैलेंडर के नाम पर बस यही एक चीज़ है। बाक़ी मोबाइल आदि सभी जगह तो कैलेंडर है। इसकी अच्छी बात ये है की एक ही कैलन्डर में आप कुछ नोट करें औऱ हर उस यंत्र में आपको ये देखने को मिल जाता है।

पंचांग में दूध का हिसाब रखने का भी एक हिस्सा है। ये शायद वर्षों से नहीं बदला गया है। ये दूध का हिसाब भी सुबह शाम का है। मुझे याद नहीं हमारे यहाँ दोनों समय दूध आता हो। लेक़िन शायद कहीं अब भी सुबह शाम ऐसा होता हो इसके चलते अभी तक यही हिसाब चल रहा है। एक छोटी सी जगह है जहाँ आप को कुछ याद रखना हो तो लिख सकते हैं। किसी का जन्मदिन या औऱ कोई महत्वपूर्ण कार्य जैसे आपकी रसोई में गैस सिलिंडर की बदली कब हुई। या आपकी कामवाली कब नहीं आयी या कब से काम शुरू किया आदि आदि।

ज़्यादातर कैलेंडर जो होते हैं वो छह पेज के होते हैं जिसमें दोनों तरफ़ एक एक महीना होता। लेक़िन पंचांग में ऐसा कुछ नहीं होता। यहाँ हर महीने का एक पेज होता है। तो उसके पीछे क्या खाली जगह होती है? इसका पता मुझे तब चला जब मुझे नये महीने के शुरू होने पर कैलेंडर में भी बदलने को कहा गया।

पंचांग में तो जानकारी की भरमार होती है ये बात तब पता चली जब इसको पलट कर देखा। वार्षिक राशिफल से लेकर घरेलू नुस्खे, अच्छी आदतें कैसे बनाये औऱ पता नहीं क्या क्या। अगर आपने नहीं देखा हो तो ज़रूर देखें। पढ़ने का काफ़ी माल मसाला है।

कुछ वर्षों से अभिनेत्रियों औऱ अभिनेताओं का एक कैलेंडर काफ़ी चर्चा में रहता है। कैलेंडर का भी एक बड़ा लॉन्च प्रोग्राम होता है जिसमें वो कैसे बना इसकी भी पूरी कहानी होती है। अगर आपको ये कैलेंडर चाहिये तो अच्छी ख़ासी रक़म देनी पड़ती है। उसी तरह एक स्विमसूट कैलेंडर भी काफ़ी चला था। बाद में कंपनी के मालिक अपनी लंगोट बचा कर इधर उधर भागते फिरते रहे हैं। औऱ फ़िलहाल इस कैलेंडर पर भी पर्दा डल गया है।1

हम लोगों के लिये कैलेंडर मतलब सरकारी, या खिलाड़ियों का या फिल्मी हस्तियों का। इसके आगे क्या? ये पता तब चला जब एक परिचित के घर गये। किसी कारण से जिस कमरे में बैठे थे उसका दरवाज़ा  बंद हुआ औऱ उसके बाद परिचित थोड़े से असहज औऱ बाक़ी लोगों के चहरे पर हँसी। हुआ यूँ की दरवाज़े के पीछे एक कन्या का बड़ा सा पोस्टर कैलेंडर लगा था। लेक़िन कम से कम कपड़ों में उसकी फ़ोटो से आप की नज़र साल के बारह महीनों तक जाये, तो।

बहरहाल जूही चावला वाला कैलेंडर बढ़िया है कुछ छोटी छोटी बातों को याद रखने के लिये। इतने बड़े कैलेंडर को देखने के बाद आपको भी वक़्त रुका रुका सा लगेगा लेक़िन… वक़्त रहता नहीं कहीं रुककर, इसकी आदत भी आदमी सी है

अंत में आपसे फ़िर वही गुज़ारिश। इसको पढ़ें औऱ अच्छा लगा हो तो सबको बतायें। बुरा कुछ हो तो सिर्फ़ मुझे।

बस नग़मे तेरे प्यार के गाते जायें

सर्दियों का मौसम हो और चाय की बात न हो तो कुछ अधूरा सा लगता है। मुम्बई में पिछले कुछ दिनों से अच्छी ठंड पड़ रही है। उत्तर भारत या पूर्वी भाग में जैसी ठंड है उसके मुकाबले में तो कुछ नहीं है, लेक़िन हम मुम्बई में रहने वालों के लिये ये भी काफ़ी होती है।

गोवा (पिछली दो पोस्ट में ये गोआ रहा लेक़िन इस बार सही पकड़ लिया) जहाँ की ख़ुमारी अभी तक नहीं गयी, वहाँ के पीने पिलाने के बारे में मैंने पिछले साल लिखा था। लेक़िन अब कोई ख़ानदानी पियक्कड़ तो हैं नहीं कि सुबह से शुरू हो जायें। सुबह तो चाहिये चाय। औऱ वहीं से शुरू होती है मशक्क़त। वैसे भी घर से बाहर निकलते ही ये चयास आपको कई तरह के अनुभव भी कराती है। क्योंकि गोवा में चाय पी तो जाती है लेक़िन बाक़ी पेय पदार्थों से थोड़ी कम।

जब हम दस ग्यारह बजे नाश्ता करने पहुँचते तो आस पास की टेबल पर पीने का कार्यक्रम शुरू हो चुका रहता था। हम लोग सुबह से लहरों के साथ समय बिताने के बाद से चाय की जुगाड़ में रहते। हर शहर का अपना एक मिज़ाज होता है। गोवा का भी है। यहाँ शामें औऱ रातें बड़ी ख़ूबसूरत होती हैं। लहरों के साथ समय कैसे गुज़रता है पता नहीं चलता शायद इसीके चलते यहाँ सुबह थोड़ी देर से होती है।

वैसे होटल में मशीन वाली चाय, कॉफ़ी दोनों मिलते थे लेक़िन दिन में एक से ज़्यादा बार नहीं पी सकते थे। उसमें अगर बाक़ी सभी तरह की चाय होती तो बदल बदल कर पी जा सकती थी। एक ही जैसी चाय जिसको पीने की इच्छा नहीं हो तो आप कितना पी सकते हैं? ख़ैर एक दिन बाद बाज़ार से टी बैग लाये गये ताक़ि कुछ चाय जैसा

अब हम चाय के शौकीनों के साथ भी मसले रहते। जैसे चाय अगर ताज़ी बनी हुई हो तो उसका ज़्यादा मज़ा आता है औऱ अग़र सामने ही बन रही हो तो उसमें अपने हिसाब से कम या बिना शक़्कर वाली चाय अलग से मिल जाती है। लेक़िन पहले दिन ऐसा कुछ मिला नहीं। पहले से तैयार चाय मिली जो यही कहकर बेची गयी कि अभी अभी बनी है।

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समुद्र के किनारे जो रेत रहती है, ख़ासकर वो जो सूखी रेत रहती है, उसपर चलने में ढ़ेर सारी मशक्कत करनी पड़ती है। वहीं अग़र आप सागर किनारे चलें तो गीली रेत के कारण चलना आसान होता है। चूँकि जिस जगह हम रुके थे वहाँ से बीच मुश्किल से दो मिनट की दूरी पर था तो कमरे से बिना किसी चरणपादुका के ही निकल जाते। अब वो हाँथ में चरणपादुका के साथ तस्वीर किसी भी तरह से खूबसूरत नहीं लगती। एक बार किसी ने उतार कर दी औऱ घूमने लगे। थोड़ी देर बाद बड़ी लहर आई तो चरणपादुका वापस लेकर बस निकल ही गयी थी कि नज़र पड़ गयी। तो अपनी सहूलियत के लिये बस ऐसे ही कमरे से निकल जाते।

वापस चाय की यात्रा पर आतें हैं। तो दूसरे दिन पहले दिन के अनुभव के बाद सुबह सुबह सागर किनारे ये निर्णय लिया की आज कहीं औऱ चाय पी जाये। बस फ़िर क्या था, निकल पड़े प्याले की तलाश में। गोवा के बारे में जैसा मैंने पहले भी कहा था, ओढ़ने पहनने पर कोई ज़्यादा ध्यान नहीं रहता। तो जब हम निकले चाय की तलाश में तो पैरों में कुछ नहीं पहना था। जब तक सागर किनारे रहे कुछ फ़र्क नहीं पड़ा। जब सड़क पर पहुँचे तो यही लगा गोवा पहुँचकर हम भी मिलिंद सोमन हो गये। काश उनके जैसे फिट भी होते। लेक़िन हमने शुरुआत उनकी दूसरी आदत से करी – नंगे पैर घूमना। हम गोवा की गलियों में चाय ढूंढ़ते हुये औऱ उसके काफ़ी देर बाद भी ऐसे ही घूमते रहे।

वैसे उस दिन बढ़िया चाय मिली भी। जो ताज़ी बनी हुई थी साथ ही कुछ बढ़िया नाश्ता भी। उसके बाद भी ऐसे ही, बिना चरणपादुका के, नाश्ता करने भी पहुँच गये। वो तो अच्छा हुआ की उस होटल में कोई ड्रेस कोड नहीं था, अन्यथा हम भी ख़बर बन गये होते।

रविवारीय: वाह री दुनिया, तेरे जलवे हैं निराले

नये साल को शुरू हुये एक हफ़्ता भी हो गया औऱ लगता है अभी कल की ही बात है जब हम गोआ में नये साल का स्वागत कर रहे थे। कहाँ 2021 के गुज़रने का इंतज़ार कर रहे थे औऱ कहाँ 2022 ही हफ़्ते भर पुराना हो गया है।

जब साल ख़त्म हो रहा था तब से मैं यही सोच रहा था 2021 का अपना अनुभव लिखूँ। लेक़िन अचानक गोआ का कार्यक्रम बन गया औऱ लिखने का कार्यक्रम पीछे रह गया। जो साल की आखिरी पोस्ट मैं लिख पाया वो भी जैसे तैसे हो ही गया। जब 31 दिसम्बर की ढेरों फ़ोटो देखीं तो ज़्यादातर में फ़ोन पर ही कुछ करता हुआ दिख रहा हूँ। दरअसल वो बस लिखने का प्रयास ही कर रहा था। उस बीच में खाना औऱ पीना दोनों भी चल रहा था।

ख़ैर, जब वापस लौटने का कार्यक्रम बना तो मैंने बस से आने का कार्यक्रम बनाया। अपने जीवन में मैंने सबसे कम बस से यात्रायें करीं हैं। जब भी ये यात्रायें हुईं तो वो सरकारी बस से ही हुई औऱ उन्हीं जगहों पर जाना हुआ जहाँ रेलगाड़ी से जाना संभव नहीं था। अब हमारी सरकारी बसों के बारे में जितना लिखा जाये वो कम ही है। हमारे देश की एक बड़ी जनता के लिये बस ही सस्ता औऱ सुलभ यात्रा का साधन रहा है लेक़िन सुविधाओं में विकास उतना तेज़ी से नहीं हुआ। हाँ, निजी बस सर्विस ज़रूर शुरू हो गईं लेक़िन ये यात्रायें कितनी आरामदायक हो गईं हैं, इसका अनुभव मुझे करना था। शायद एकाध बार ही वीडियो कोच बस में यात्रा करी है औऱ उसकी भी कोई ज़्यादा याद नहीं है।

लेक़िन गोआ से मुम्बई से पहले चलते हैं प्राग। जब ऑफिस की सालाना मीटिंग के लिये प्राग जाना हुआ तो म्युनिक से बस से जाना था। शायद तीन-चार घंटे की यात्रा थी। पहले ही लंबी विमान यात्रा उसके बाद ये बस यात्रा – लगा जैसे सब गड़बड़ हो गया। लेक़िन जब बस बैठे तो एक बड़ी सुखद अनुभूति हुई। एक तो क़माल की रोड हैं उसपर  बडी आरामदायक बस। जो नई बात थी वो थी बस में एक शौचालय। ये पहली बार किसी बस में देखा था। अपने यहाँ तो बस रुकने तक रुकिये या बस रुकवाईये। बीच में जहाँ बस रुकी भी तो वहाँ भी बड़े अच्छे शौचालय थे औऱ एक छोटी सी दुकान जहाँ खाने पीने का सामान मिलता है।

जब गोआ से मुम्बई की स्लीपर कोच में सीट बुक करी तो मैं बड़ा उत्सुक था इस यात्रा को लेकर। मेरा ये मानना है जब तक आपको किसी भी चीज़ का व्यक्तिगत अनुभव न हो तो उसके बारे में कहना या लिखना एक ग़लत बात हो जाती है। कई बार मन में आया की किसी तरह ट्रैन में टिकट जुगाड़ी जाये औऱ आराम से घर पहुंचा जाये। भाई ने भी बोला ट्रेन में मुंबई तक साथ चलने के लिये। लेक़िन रात भर की बात थी तो मैं भी तय कार्यक्रम के अनुसार ही चला।

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अग़र आपने इन बसों में यात्रा न करी हो तो इनकी सीट रेल की बर्थ की तरह ही होती हैं। जगह ठीकठाक रहती है। आपको सोने के लिये थोड़ी मशक्कत करनी पड़ सकती है। क्यूँ? इस पर आगे। तो यात्रा शुरू हुई औऱ सीट पर बैठने या कहें लेटने के बाद उठने के कष्ट के अलावा औऱ कोई परेशानी नहीं हुई। बीच में भोजन के लिये रुके औऱ वापस अपनी सीट पर। बस शायद हर दो घंटे के बाद कहीं रुकती क्योंकि एक बंदा आकर बोलता किसी को अग़र लघुशंका के लिये जाना हो तो चला जाये।

मतलब इस बस में शौचालय नहीं था। शायद कुछ बसों में ये सुविधा अब मिलने लगी है लेक़िन सभी बसों में ये उपलब्ध नहीं है। वैसे स्लीपर कोच की यात्रा बहुत आरामदायक हो सकती है (अगर आपको उठने बैठने में परेशानी न हो तो)। लेक़िन हमारे यहाँ इसके आरामदायक होने में अभी कुछ वर्ष लगेंगे। कारण? यात्रा के आरामदायक होने के लिये दो चीज़ों का होना बहुत ज़रूरी है। एक तो बस का आरामदायक होना औऱ दूसरा सड़कों का अच्छा निर्माण।

गोआ से चले तो कुछ हिस्से तक सड़क बहुत बढ़िया थी। अब किसी अदाकारा के गालों की मिसाल देना तो ठीक नहीं होगा। बस बहुत अच्छी रही शुरू के एकाध घंटे की यात्रा। उसके बाद जब ख़राब सड़क आयी तो उह, आह, आउच वाली स्थिति रही। ख़ैर कुछ देर बाद ख़राब सड़क कब ख़त्म हो गयी औऱ कब नींद लग गयी पता नहीं चला।

थोड़े समय बाद ऐसा आभास हुआ की बस तो चल ही नहीं रही है। शायद इसलिये अच्छी नींद आ रही थी। खिड़की से देखा तो ऐसा नहीं लगा किसी होटल पर रुके हैं क्योंकि ज़्यादातर ड्राइवर चाय पीने के लिये कहीं रुकते हैं। यहाँ तो वो भी गायब। किसी तरह उठकर बाहर आये तो पता चला बस में कुछ ख़राबी है जिसको वो लोग ठीक कर रहे थे। नींद तो आ ही रही थी तो वापस पहुँच गये नींद्रलोक लोक में।

थोड़ी देर बाद फ़िर नींद खुली तो लगा अभी भी बस नहीं चल रही है। नीचे उतरकर पता किया तो बताया इसको ठीक करने कंपनी का मैकेनिक ही आयेगा। पंदह बीस मिनट से शुरुआत होते होते बात आठ घंटे तक खींच गयी। उसके बाद फ़िर यात्रा शुरू हुई तो सुबह के घर पहुँच कर काम शुरू करने का कार्यक्रम धरा का धरा रह गया औऱ ग्रह प्रवेश शाम को ही हो सका।

ऐसी घटनायें मैंने सुन तो रखीं थीं लेक़िन पहली बार अनुभव किया था। इंदौर से बिलासपुर (छत्तीसगढ़) जाने के लिये एक इंदौर-बिलासपुर ट्रैन चलती है। इसमें भोपाल से भी कोच लगता है। अभी का पता नहीं लेक़िन पहले ये ट्रेन बहुत ही लेट लतीफ़ हुआ करती थी। भोपाल से चढ़ने वाले यात्रियों की सुविधा के लिये रेलवे ने उनको कोच में बैठने की इजाज़त से दी। यात्रियों के लिये भी ये सुविधाजनक हो गया। इंदौर से ट्रैन जब आये तब आये, वो आराम से बैठ सकते थे औऱ सो भी सकते थे।

एक बार किसी परिचित का जाना हुआ। उनको स्टेशन पर छोड़कर आ गये क्योंकि ट्रेन का कोई अता पता नहीं था। वो भी आराम से सोने चले गये। जब सुबह गाड़ी के जबलपुर पहुँचने के समय पर उठ कर दरवाज़े पर आये तो उन्हें स्टेशन थोड़ा जाना पहचाना से लगा। औऱ क्यूँ न लगे क्योंकि उनकी ट्रैन या कहें उनका कोच अभी तक भोपाल में ही खड़ा हुआ था।

इस ट्रेन का भोपाल आने का समय भी अल सुबह होता था। लेक़िन जितना इसको जाने में समय लगता, आने में ये बिल्कुल समय पर या उससे भी पहले। सर्दियों की सुबह किसी को स्कूटर पर लेने जाना हो तो आनंद ही आनंद। उसपर ट्रेन के इंतज़ार में अग़र स्टेशन की चाशनी जैसी चाय भी हो तो सुभानअल्लाह। वैसे चाय से गोआ का एक वाक्या भी याद आया लेक़िन उसके लिये थोड़ा इंतज़ार।

ख़ैर, साल के दूसरे ही दिन ख़ूब सारा ज्ञान प्राप्त हुआ। औऱ ये सब अपने ही एक निर्णय के चलते। तो क्या आपको स्लीपर कोच से यात्रा करनी चाहिये? ये इसपर निर्भर करता है आप उम्र के किस पड़ाव पर हैं। औऱ आप अगर जिस जगह जा रहें हैं वहाँ की सड़कों हालत की थोड़ी जानकारी निकाल लें तो बेहतर होगा। यही यात्रा अग़र बैठे बैठे करी गई होती तो? तो शायद ये पोस्ट नहीं होती। ये हम लोगों की यूँ होता तो क्या होता वाली सोच हमेशा कहीँ न कहीं प्रकट हो जाती है। श्रीमतीजी को भी लगा की मैंने फ़ालतू इतनी मुसीबत झेली। लेक़िन सब कुछ होने के बाद तो सभी समझदार हो जाते हैं। देखिये अब अग़र कहीं आसपास जाना होता है तो क्या इस फ़िर से बस यात्रा के लिये मन बनेगा?

आप सभी इस पोस्ट को पढ़ें औऱ आगे भी शेयर करें औऱ थोड़ा कष्ट अपनी उंगलियों को भी दें इस सर्दियों में। एक कमेंट लिख कर बतायें आपकी प्रतिक्रिया। आपकी बस यात्रा का अनुभव। आप तक ये पोस्ट किस तरह पहुँचे ये भी बतायें। क्या एक औऱ … व्हाट्सएप ग्रुप आप को परेशान तो नहीं करेगा? आपके जवाब/बों का इंतज़ार करेगा असीम।

हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी की…

आज एक फ़ोटो देखने औऱ एक कहानी पढ़ने के बाद ये पोस्ट लिखना तय हुआ। अब दिमाग़ में तो कहानी बन जाती है, लेक़िन उसको जब लिखना शुरू करो तो मामला टायें टायें फिस्स हो जाता है। चलिये आज फ़िर से प्रयास करते हैं।

तो आज एक अदाकारा ने अपनी नई गाड़ी के साथ फ़ोटो साझा करी। जो गाड़ी उन्होंने ली वो मुझे भी बहुत पसंद है औऱ जीवन में पहली बार बैठना हुआ 2018 में जब दिल्ली में काम करता था। मोहतरमा ने लिखा कि ये गाड़ी खरीदना उनके लिये एक सपने के जैसा है। उन्होंने कभी नहीं सोचा था की उनके जीवन में ये दिन कभी आयेगा।

जो गाड़ी उन्होंने ख़रीदी है वो कोई ऐसी ख़ास महंगी नहीं है। मतलब आज जिस तरह से हमारे कलाकार करोड़ों रुपये की गाड़ी ख़रीद कर फ़ोटो साझा करते हैं, उसके मुकाबले ये गाड़ी कोई ख़ास महँगी नहीं है।

लेक़िन जब आप किसी गाड़ी का अरमान लेकर बड़े होते हैं तो औऱ जब आप उसको ख़रीद लेते हैं तो वो बेशकीमती हो जाती है। उसके साथ जो आपका जुड़ाव होता है वो पैसे से नहीं नापा जा सकता है। उसको ख़रीदना एक सपना ही रहता है। आप सारा जीवन ललचाई नज़रों से औऱ लोगों के पास उस गाड़ी को जब देखते रहते हैं औऱ एक दिन उस लंबे इंतज़ार के बाद जब वही गाड़ी आपके पास होती है तो विश्वास नहीं होता। जब आप उसपर बैठकर घूमने निकलते हैं तो आपका एक अलग अंदाज भी होता है औऱ एक अलग उमंग भी।

पिछले कुछ समय से पिताजी से नई गाड़ी लेने के लिये आग्रह किया जा रहा है। अब वो ज़माने लद गये जब एक ही गाड़ी जीवन भर चल जाती थी औऱ अगर देखभाल ठीक ठाक करी हो तो उसको अगली पीढ़ी को भी सौंप देते हैं। अभी तो नियम कायदे भी ऐसे हो गये हैं की पुरानी गाड़ी रखना मुश्किल है। अभी जो गाड़ी है उसका भरपूर उपयोग किया गया है। पिताजी का गाड़ियों के प्रति वैसे भी कुछ ज़्यादा ही लगाव रहता है।

इसलिये पिताजी को गाड़ी बदलने के लिये मनाना कोई आसान काम नहीं है। उस गाड़ी के साथ ढेरों यादें भी जुड़ी हुई हैं। उसको लेकर कई चक्कर मुम्बई के लगाये हैं औऱ एक बहुत ही यादगार यात्रा रही भोपाल से कश्मीर की। वैसे तो हम लोगों ने कार से कई यात्रायें करी हैं लेक़िन ये सबसे यादगार यात्रा बन गई।

अब इससे पहले की यात्रा के संस्मरण शुरू हो जायें, मुद्दे पर वापस आते हैं। तो मोहतरमा का गाड़ी के प्रति प्यार देखकर मुझे याद आयी मेरे जीवन की पहली गाड़ी। गाड़ी लेने के प्रयास कई बार किये लेक़िन किसी न किसी कारण से ये टलता ही रहा। फ़िर कुछ सालों बाद एक दो पहिया औऱ उसके कुछ वर्षों बाद चार पहिया वाहन भी ख़रीद लिया।

जब कार ख़रीदी तब सचमुच लगा की आज कुछ किया है। तूफ़ानी भी कह सकते हैं। मेरे लिये कार ख़रीदना के सपने के जैसा था। जिस तरह से मैं काम कर रहा था या जैसे शुरुआत करी थी, जब गाड़ी आयी तो लगा वाकई में जीवन की एक उपलब्धि है। औऱ इसी से जुड़ी है आज की दूसरी फ़ोटो जिसका ज़िक्र मैंने शुरुआत में किया था। एक उड़ान खटोले वाली निजी कंपनी ने अपना एक विज्ञापन दिया – हम आपके जीवन के लक्ष्य या बकेट लिस्ट को पूरा करने में आपकी मदद करेंगे।

इन दिनों इस बकेट लिस्ट का चलन भी बहुत है। लोग अपने जीवन में जो भी कार्य उन्हें करने है, कहीं घूमने जाना है, पैराशूट पहन कर कूदना है, या किसी ख़ास व्यक्ति से मिलना है, आदि आदि की लिस्ट बना कर रखते हैं। औऱ उनको पूरा करने का प्रयास करते हैं। जब ये हो जाता है तो सोशल मीडिया पर पूरी दुनिया को बताते हैं।

क्या मेरी कोई लिस्ट है? नहीं। क्योंकि मुझे तो लगता है मेरा जीवन भी कोई बकेट लिस्ट से कम नहीं है। मैं ये लिख रहा हूँ, आप ये पढ़ रहे हैं – ये किसी लिस्ट का हिस्सा नहीं हो सकते। हाँ अब लगता है एक लिस्ट बना ही लूँ लेक़िन उसमें सिर्फ़ एक ही चीज़ लिखूँ। बेशर्मी। नहीं नहीं वो नहीं जो आप सोच रहे हैं, बल्कि बेशर्म हो कर लिखना औऱ उससे भी ज़्यादा बेशर्म होकर सबसे कहना पढ़ो औऱ शेयर करो। औऱ हाँ कमेंट भी करना ज़रूर से। लीजिये शुरुआत हो भी गयी। 😊

हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी की हर ख्वाइश पे दम निकले, बहुत निकले मेरे अरमान लेक़िन फ़िर भी कम निकले

काहे का झगड़ा बालम, नई नई प्रीत रे

आमिर ख़ान पहली फ़िल्म से पसंद आये थे औऱ क़यामत से क़यामत तक के बाद उनकी अगली कुछ फ़िल्में देखने लायक नहीं थीं। जब उनकी औऱ मंसूर ख़ान की जो जीता वही सिकंदर की घोषणा हुई तो इसका इंतज़ार शुरू हुआ। जूही चावला को न लेने का दुःख तो था लेक़िन फ़िल्म अच्छी होगी इसका यक़ीन था।

उन दिनों गाने सुनने का ज़्यादा चलन था। देखने के लिये सिर्फ़ बुधवार औऱ शुक्रवार को चित्रहार ही हुआ करता था। उसमें अगर गाना आया तो आपकी किस्मत। तो इस फ़िल्म के गाने ख़ूब सुने थे लेक़िन देखे नहीं थे।

पहला नशा के बारे में बहुत कुछ सुन रखा था। जब अंधेरे सिनेमाघर में गाना शुरू हुआ तो एक अलग ही दुनिया में पहुँच गये थे। इससे पहले गाने ऐसे नहीं फिल्माये गये थे। अक़्सर ऐसा होता है आप गाना जब सुनते हैं तो आप के मन में ये विचार ज़रूर आता है की इसको कैसे फ़िल्माया गया होगा। इस गाने को जब सुना था तब पता नहीं क्या विचार आये होंगे लेक़िन आज 27 बरस के बाद लगता है ये उन गिने चुने गानों में से है जिसकी धुन के साथ उसका फिल्मांकन बिल्कुल सही बैठा था।

अब आज ये कहाँ की यात्रा पर निकले हैं? दरअसल आज सुबह गुरुदत्त जी की फ़िल्म आरपार का गाना ये लो मैं हारी पिया सुन रहे थे। जब ये गाना रेडियो पर सुना था तब पता नहीं था इस गाने का फिल्मांकन कैसा हुआ होगा। बरसों बाद जब देखा तो गाना औऱ खूबसूरत लगा। मुंबई की सड़कों पर दौड़ती टैक्सी में गुरुदत्त एवं श्यामा जी औऱ उनकी उफ़्फ़ उनकी अदायें।

वैसे ही जीवन में हमें जब कोई मिलता है तो ये पता नहीं होता ये साहब क्या साबित होंगे – एक सबक़ या एक वरदान।

हम सबका एक मूल स्वभाव होता है जो जन्म से ही हमारे अंदर रहता है। अगर आपने हालिया रिलीज़ \’शेरशाह\’ देखी हो तो उसमें विक्रम बत्रा बचपन से ही ग़लत बात के ख़िलाफ़ लड़ते हैं औऱ फ़िर उन्हें इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता की सामने वाले बच्चे उनसे उम्र में बड़े हैं। वो बस लड़ जाते हैं।

जैसे जैसे हम बड़े होते जाते हैं जो हमारा मूल स्वभाव होता है उसमें कोई बदलाव नहीं होता। हाँ हम इसको छिपाना, या इसको कोई दूसरा चोला पहनाना सीख जाते हैं। लेक़िन ये कहीं नहीं जाता। ये कभी बदलता भी नहीं है। ये रहता है औऱ कभी न कभी बाहर निकलता ही है। वो कहावत भी है न – अपने असली रंग दिखाना।

हम सभी ऐसे लोगों को जानते हैं। हमारे परिवार में या दोस्तों में ऐसे लोग होते हैं जो सबकी मदद को आतुर रहते हैं। उनको बस कोई मौका मिल जाये और वो किसी न किसी तरह मदद करने को हमेशा तैयार। ये वो हैं जिनकी कथनी औऱ करनी में कोई अंतर नहीं होता है।

लेक़िन इसके ठीक विपरीत ऐसे लोग भी होते हैं जो हमेशा लोगों को तकलीफ़ ही देते हैं। फ़िल्मों में अक़्सर ऐसे क़िरदार होते हैं जो शुरू में तो बड़ी मीठी मीठी बात करते हैं और उसके बाद जब समय आता है तो उनका असली चेहरा सामने आता है। असल ज़िन्दगी में भी ऐसे कई लोग मिलते ही रहते हैं।

ऊपर जो दो श्रेणी के लोग बताये हैं उसमें से दूसरी श्रेणी वाले ज़्यादा किसी कष्ट में नहीं रहते। लेक़िन जो पहली श्रेणी वाले हैं उनके साथ कुछ न कुछ ग़लत होता रहता है। इसके पीछे भी उनका मूल स्वभाव ही ज़िम्मेदार है क्योंकि उनका स्वभाव ही है लोगों पर भरोसा कर उनकी मदद करना लेक़िन लोग उनके इस स्वभाव का फ़ायदा उठाते हैं। इस श्रेणी के लोग बहुत से कटु अनुभव के बाद भी अपने को बदल नहीं पाते क्योंकि यही उनका स्वभाव है। वो चाहकर भी उसको बदल नहीं सकते।

मेरे एक वरिष्ठ सहयोगी ने मुझसे एक दिन कहा की मुझे अपनी ये मिडिल क्लास, छोटे शहर वाली सोच त्याग देना चाहिये। इससे उनका मतलब था जिन उसूल, आदर्शों को मैं मानता हूँ उसको छोड़ दूँ। मुझे ये बात थोड़ी अजीब सी भी लगी क्योंकि यही सब तो आपका व्यक्तित्व बनाते हैं। बस उन्होंने फ़िल्म दीवार के अमिताभ बच्चन जैसा नहीं कहा।

हमारे एक परिचित हैं। मुझे उनका स्वभाव वैसे भी शुरू से पसंद नहीं था क्यूँकि उनका पैसे पर बहुत ज़्यादा भरोसा रहा है औऱ उनको लगता की अगर उन्होंने किसी की मदद करी है तो उसको ख़रीद लिया है। दूसरे उनकी मदद पैसे से नहीं लेक़िन किसी दूसरे रूप में करते थे। लेक़िन उन्होंने हर रिश्ते को पैसे से ही तोला औऱ शायद वर्षों से ही तौल रहे थे। इसका पता तब चला जब उनका एक बार किसी से विवाद हुआ तो उन्होंने बरसों पुराना हिसाब किताब निकाल के रख दिया कैसे उन्होंने फलां काम के लिये कितने पैसे ख़र्च किये थे। मतलब ये बहीखाता कभी न कभी बाहर आता क्योंकि उसको रखा इसीलिये था। कहाँ तो लोग डायरी में यादों का लेखा जोखा रखते हैं और कहाँ ये महाशय खर्चों से बाहर निकल नहीं पाये।

आपने भी ऐसे कई लोगों को जानते होंगे \’जिनके पास भगवान का दिया सब कुछ होता है\’। लेक़िन किसी फ़िल्मी कहानी की तरह एक दिन अचानक आपको सुनाई देता है सब कुछ होने के बावजूद भी उन्होंने परिवार के अन्य सदस्यों से लड़ाई कर ली है औऱ सारी जायदाद ख़ुद हड़पना चाहते हैं। आप वर्षों से उन्हें जानते हैं औऱ आपके लिये ये मानना नामुमकिन सा होता है। लेक़िन यही कड़वा सच है।

ये दोनों उदाहरण किसी व्यक्ति का मूल स्वभाव दर्शाने के लिये हैं। इसलिये जो मीठा मीठा बोलते हैं उनसे दूर से राम राम औऱ जो चिकनी चुपड़ी बोलते हैं उनको भी सलाम। ये जो मीठा बोलने वाले होते हैं इनसे तो जितना बच सकते हैं बचिये। ये लोग किसी विवाद में पड़ना ही नहीं चाहते क्योंकि ये चिकना घड़ा होते हैं। जहाँ उनका फ़ायदा होता है वहाँ चल देते हैं।

मतलब की बात ये की कई गाने सुनने में अच्छे लगते हैं लेक़िन देख कर लगता है गाना बर्बाद कर दिया। ऐसे कई गाने हैं। नये थोड़े ज़्यादा हैं क्योंकि सब एक जैसे ही फिल्माये जाते हैं। कुछ पुराने भी हैं। आपके पास ऐसे कुछ हों तो बतायें।

फ़िलहाल आप इस गाने का आंनद लें। सबक औऱ वरदान तो जीवन पर्यंत चलने वाले हैं।

रविवारीय: रुक जाना नहीं तू कहीं हार के

पिछले दिनों कौन बनेगा करोड़पति में Scam वेब सिरीज़ में हर्षद मेहता का रोल करने वाले प्रतीक गाँधी एवं जानेमाने अभिनेता पंकज त्रिपाठी आये थे। Scam सीरीज़ पिछले साल अक्टूबर के महीने में ही रिलीज़ हुई थी। सबको प्रतीक गाँधी का काम इतना पसंद आया की वो रातों रात एक स्टार बन गये औऱ उनको बहुत सा अच्छा काम करने को मिला औऱ अब शायद आगे भी मिलता रहेगा।

जब में वो गरबा वाली पोस्ट लिख रहा था तो सलमान ख़ान की 2018 में निर्मित फ़िल्म लवयात्री का एक गाना देख रहा था ढ़ोलीडा। फ़िल्म सलमान खान ने अपने बहनोई आयुष शर्मा के लिये बनाई थी। मैंने फ़िल्म नहीं देखी है तो जब गाना देखा तो थोड़ी हैरत हुई, बहुत गुस्सा भी आया। गाने में कुछ सेकंड के लिये प्रतीक गाँधी भी दिखे। पहले तो विश्वास नहीं हुआ इसलिये दोबारा देखा। थे तो प्रतीक गाँधी ही। पूरे गाने में वो बाकी एक्स्ट्रा के तरह काम कर रहे थे क्योंकि सारा ध्यान तो बहनोई साहब पर था।

वापस आते हैं केबीसी की रात पर। अमिताभ बच्चन ने जब उनसे उनके रातों रात सफ़ल होने के बारे में पूछा तो प्रतीक ने बहुत ही सरलता से कहा,

\”लोगों के लिये ये रातों रात होगा। मेरे लिये ये रात चौदह साल लंबी थी।\”

प्रतीक गाँधी

जब वो गाना देख रहा तब मुझे यही ख़्याल आ रहा था, प्रतीक तब भी हर्षद मेहता के क़िरदार जैसी प्रतिभा के धनी थे। ज़रूरत थी उनकी उस प्रतिभा में किसी के विश्वास की। ज़रूरत थी उस मौक़े की। जब वो मौक़ा मिला तो प्रतीक ने धो डाला औऱ ऐसा धोया है की वो अब एक मिसाल बन गए हैं।

उस फ़िल्म के बाद आयुष शर्मा की नई फ़िल्म (साले साहब ने फ़िर से पैसा ख़र्च किया है) भी तैयार है। लेक़िन उन्हीं के साथ उस फ़िल्म में छोटा सा रोल करने वाले प्रतीक गाँधी आज मीलों आगे निकल गये हैं।

ऐसी बहुत सी घटनायें हैं। हैरी पॉटर की लेखिका की क़िताब बारह जगह से वापस लौटाई गई थी। सलमान ख़ान का पैसा है वो आयुष शर्मा पर लगायें या नूतन की पोती पर। प्रतीक गाँधी जैसे प्रतिभावान कलाकार को हंसल मेहता जैसा जोहरी मिल ही जाता है।

आप बस अपना काम करते रहें। उसी लगन, निष्ठा के साथ जैसे प्रतीक गाँधी करते रहे अपने छोटे छोटे रोल में।

कल के लिये आज को न खोना

जब महाभारत का युद्ध समाप्त हुआ औऱ पांडव विजयी हुये तो श्रीकृष्ण गांधारी से मिलने गये। युद्ध में अपने पुत्रों की मृत्यु से दुःखी गांधारी ने श्रीकृष्ण को श्राप दिया था की जैसे उनके सामने उनके कुल का अंत हुआ था वैसे ही श्रीकृष्ण के सामने यदुवंश का भी ऐसे ही अंत होगा।

श्रीकृष्ण को तो इस बारे में सब ज्ञात था लेक़िन श्रीराधा ने जब स्वपन में ये प्रसंग देखा तो वो तहत विचलित हुईं। वो किसी भी तरह से आगे जो ये होने वाला था उसको रोकने का प्रयास करने लगीं। उन्होंने उस व्यक्ति को भी ढूंढ निकाला जिसके तीर से वासुदेव के प्राण निकलने वाले थे। राधा ने जरा नामक उस व्यक्ति को स्वर्ण आभूषण भी दिये ताकि वो अपना जीवन आराम से व्यतीत कर सके औऱ शिकार करके जीवनयापन की आवश्यकता ही न पड़े।

श्रीकृष्ण ये सभी बातें जानते थे औऱ वो अपने तरीक़े से राधा को ये समझाने का प्रयास भी कर रहे थे की कोई कुछ भी करले जो नियत है वो होकर ही रहेगा। अंततः श्रीराधा को ये बात समझ आ जाती है की जिस पीड़ा से वो डर रही हैं वो एक चक्र है। अगर एक पुष्प खिला है तो उसका मुरझाना निश्चित है। जब इस बात का उन्हें ज्ञान हो जाता है तो उनका बस एक ही लक्ष्य रहता, जो भी समय है उसको श्रीकृष्ण के साथ अच्छे से व्यतीत करें।

यही हमारे जीवन का भी लक्ष्य होना चाहिये। हर दिन को ऐसे बितायें जैसे बस आज की ही दिन है। कल पर टालना छोड़ें।

गाड़ी बुला रही है, सीटी बजा रही है

हमारे बड़े जो हैं अपने अनुभव से बहुत सी बातें हमें सिखाते हैं। सामने बैठा कर ज्ञान देने वाली बातों की बात नहीं कर रहा हूँ लेक़िन छोटी छोटी बातें जो हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में होती रहती हैं उनसे मिलने वाली सीख की बात कर रहा हूँ। जो सामने बैठा कर ज्ञान मिलता है वो तो कभी कभार होता है औऱ कुछ ख़ास मौकों पर या किसी व्यक्तिविशेष के संदर्भ में होता है।

पिताजी शिक्षक रहे हैं तो उन्होंने पढ़ाई/परीक्षा की बहुत सी बातें बतायीं जैसे पेपर मिलने पर उसको पूरा पढ़ें या लिखने के बाद दोबारा पढ़ ज़रूर लें। परीक्षा के पहले सारा सामान जैसे पेन, पेंसिल आदि जाँच लें। इसके अलावा पढ़ाई के लिये वो हमेशा कहते लिखने का अभ्यास बहुत ज़रूरी है। बार बार लिखो इससे चीज़ें याद रहती हैं।

आज इनका ज़िक्र क्योंकि एक लेख पढ़ रहा था। युवाओं के लिये था। अब अड़तालीस साल वाला भी युवा होता है यही मान कर मैंने भी पढ़ डाला। तो उसमें यही बताया गया की अगर आपका कोई लक्ष्य है तो आप उसको लिखें औऱ अपनी आँखों के सामने रखें जिससे आपको याद रहे की आप क्या पाना चाहते हैं। लक्ष्य लिखने से थोड़ी आपके विचारों में भी क्लैरिटी आती है। मैंने बहुत उपयुक्त शब्द ढूंढा लेक़िन क्लैरिटी से अच्छा कुछ नहीं मिला।

इसी तरह जब कहीं बाहर जाना होता तो पिताजी काफ़ी समय पहले घर से निकल जाते औऱ भले ही स्टेशन पर एक घंटा या ज़्यादा इंतज़ार करना पड़े, वो जो आखिर में भाग दौड़ होती है उससे बच जाते हैं औऱ प्लेटफॉर्म पर कुछ पल सुकून से बिताने को मिल जाते हैं। साथ ही पढ़ने के लिये कोई किताब देखने का समय भी मिल जाता है।

हर बार समय पर या समय से पहले पहुँच ही जाते थे लेक़िन एक बार समय से काफ़ी पहले निकलने के बाद भी कुछ ऐसा हुआ… आपकी कभी ट्रैन, फ्लाइट या बस छूटी है? माता-पिता एक बार मुम्बई आये थे। उनकी वापसी की ट्रेन शाम की थी तो तय समय से काफ़ी पहले हम लोग स्टेशन पर जाने को तैयार थे। क्योंकि मुम्बई में ही पहले कुछ रिश्तेदारों की ट्रेन छूट चुकी थी तो कोई रिस्क नहीं लेना चाहते थे। इसलिये टैक्सी भी बुक कर ली। लेक़िन ऐन समय पर बड़ी टैक्सी नहीं मिली तो दो छोटी टैक्सी बुक करी। एक में माता पिता के साथ मैं बैठा औऱ दूसरी में श्रीमतीजी एवं बच्चे। अब ये भी हमारे यहाँ एक आदत सी बन गयी है। हमारे मतलब हिंदुस्तान में जहाँ जाने वाले दो लोग औऱ विदा करने वाले दस। पिछले दिनों जब कुछ शहरों में प्लेटफार्म टिकट के दाम बढ़े तो काफ़ी हंगामा भी हुआ।

हम मुद्दे पर वापस आते हैं। जैसा महानगरों में होता है, सड़कों पर बारह महीने काम होता है। जब बात करोड़ों की हो तो काम भले ही न हो रहा हो, दिखना चाहिये हो रहा है। तो हमारे रास्ते में भी ऐसा ही कुछ हुआ जिसके चलते लंबा जाम लगा हुआ था। ट्रैफिक रेंग रहा था लेक़िन उम्मीद थी कि समय पर पहुँच जायेंगे। लेक़िन थोड़ी देर बाद ऐसी आशायें ख़त्म होती दिख रही थीं। जब ये पक्का हो गया की ये संभव नहीं हो पायेगा तो ये निर्णय लिया गया कि दूसरे स्टेशन, दादर, जहाँ ट्रैन दस मिनिट बाद पहुँचती है वहाँ जाया जाय। या पहुँचने का प्रयास किया जाये।

वहाँ पहुँचने की उम्मीद ही नहीं यक़ीन भी था। बीच में पिताजी एक दो बार गुस्सा भी हुये लेक़िन ट्रैफिक जाम पर किसी का ज़ोर नहीं था। हम लोग साथ में ये भी बात करते जा रहे थे की अग़र वहाँ भी नहीं पहुँचे तो क्या क्या विकल्प हैं। ख़ैर जब दादर के नज़दीक पहुँचे तो सबने राहत की साँस ली। लेक़िन कहानी में ट्विस्ट बाक़ी था।

ट्विस्ट ये था की जो हमारे ड्राइवर साहब थे उन्होंने वो मोड़ छोड़ दिया जहाँ से दादर स्टेशन बस दो मिनिट की दूरी पर था। समय का मोल तुम क्या जानो ड्राइवर बाबू। उस पर महाशय कहने लगे आपको बताना चाहिये था। अचानक फ़ोन की घंटी बजने लगी। श्रीमतीजी का कॉल था।

अब इतना कुछ चल रहा था उसपर ये कॉल। लेक़िन घर वापस भी आना था औऱ चाय भोजन का भी सवाल था। तो फोन सुनना तो था ही। लेक़िन उधर से जो सुना उसके बाद हँसी छूट गयी। दरअसल श्रीमतीजी औऱ बच्चे जो माता पिता को विदा करने आये थे वो स्टेशन पहुँच चुके थे। लेक़िन मुसाफ़िर अभी भी टैक्सी की सवारी का आनद ले रहे थे।

जब स्टेशन पहुँचे तो सबसे पहले पूछा ट्रैन आ गयी है क्या। जब पता चला की अभी आने वाली है तो सबने दौड़ लगा दी। अब ये जो AC वाले डिब्बे होते हैं ये या तो बिलकुल आगे लगे होते हैं या पीछे। वैसे तो आजकल सभी डिब्बे जुड़े रहते हैं तो आप अंदर ही अंदर भी अपनी सीट तक पहुँच सकते हैं। लेक़िन माता पिता को उनकी सीट पर ही बैठाने का निर्णय लिया। ट्रैन आयी औऱ सामान रखकर वो बैठ भी गये। इस बात को समय काफ़ी समय हो गया है लेक़िन अब ये वाक्या समय पर या समय से पहुँचने के लिये एक उदाहरण बन गया है।

ऐसा ही एक औऱ वाक्या हुआ था जब श्रीमती जी एवं बच्चों को मायके में एक विवाह में सम्मिलित होने के लिये जाना था। उस समय टैक्सी मिली नहीं औऱ उन दिनों अपनी गाड़ी नहीं थी। एक पड़ोसी की गाड़ी मिल तो गयी लेक़िन उस समय मेरे लाइसेंस का नवीनीकरण होना बाक़ी था। अच्छी बात ये थी की पिताजी साथ में थे। पहले थोड़ी डाँट खाई उसके बाद हम स्टेशन के लिये रवाना हुये। चूँकि बच्चे छोटे थे औऱ सामान भी था इसलिये सीट तक छोड़ने का कार्यक्रम था। स्टेशन पहुँच कर माँ, श्रीमती जी औऱ मैंने फ़िर वही दौड़ लगाई। माँ के पैर में मोच आयी थी लेक़िन बच्चों का हाँथ पकड़कर उन्होंने भी अपना योगदान दिया। लेक़िन इस बार कोच आगे की तरफ़ था। भागते दौड़ते पहुँच ही गये औऱ सवारी को गाड़ी भी मिल गई। अक्सर ये विचार आता है अगर उस दिन गाड़ी छूट गई होती तो क्या होता? 

2019 में जब भोपाल जाना हुआ था तब हमारी ट्रेन छूट गयी। ट्रैफिक के चलते हम जब हमारी टैक्सी स्टेशन में दाख़िल हो रही थी तब ट्रैन सामने से जाती हुई दिखाई दे रही थी। जब तक टैक्सी रुकती तब तक आख़िरी कोच भी निकल चुका था। वो तो दो घंटे बाद वाली ट्रेन में टिकट मिल गया तो भोपाल जाना संभव हुआ। हमारे जीवन में बहुत सी चीजों का योग होता है तभी संभव होता है। इस यात्रा का योग भी बन ही गया।

हरेक जीवन है एक कहानी

श्रवण कुमार की कहानी आपको पता होगी। आज एक बार फ़िर से बताता हूँ। श्रवण कुमार के माता पिता नेत्रहीन थे। श्रवण कुमार उनकी बहुत सेवा करते औऱ उन्होंने एक कांवर बनाई थी जिसमें वो उनको लेकर यात्रा करते। एक दिन तीनो अयोध्या के समीप के जंगल के रास्ते कहीं जा रहे थे तब माता पिता को पानी पिलाने के लिये श्रवण कुमार रुके। उसी जंगल में अयोध्या के राजा दशरथ भी शिकार के लिये आये थे।

जब श्रवण कुमार तालाब से पानी निकाल रहे थे तब महाराज दशरथ को ऐसा लगा की शायद कोई हिरन है पानी पी रहा है औऱ उन्होंने तीर चला दिया। तीर श्रवण कुमार को लगा जिससे उनके प्राण निकल गये। राजा दशरथ ने ये दुःखद समाचार उनके माता पिता को सुनाया। ऐसा कहा जाता है उन्होंने राजा दशरथ को श्राप दिया की उन्हें भी पुत्र वियोग होगा। वर्षों बाद दशरथ पुत्र रामचंद्र जी को वनवास हुआ और पुत्र वियोग में राजा दशरथ ने भी प्राण त्याग दिये थे।

कहानी 2: बचपन में माँ एक कहानी सुनाती थीं। एक बहुत ही होनहार बालक था। पढ़ने, लिखने, संस्कार सभी में अव्वल। जब उसकी परीक्षा का समय आया तब माँ की तबियत ख़राब हो गयी। बालक ने परीक्षा छोड़ माँ की देखभाल करना उचित समझा औऱ उनकी सेवा में लगा रहा। माँ के बहुत समझाने के बाद भी वो विद्यालय नहीं गया।

जब बालक परीक्षा देने नहीं पहुँचा तब उसके अध्यापक को थोड़ी चिंता हुई। उन्होंने विद्यालय से किसी को भेज कर पता करवाया। जब उन्हें उसके नहीं आने का कारण पता चला तो उन्होंने एक अध्यापिका को घर भेजा की वो बालक की माँ की देखभाल करें ताकि वो परीक्षा दे सके।

विद्यालय से लौटते समय उन्होंने बालक के घर जाकर माँ का कुशलक्षेम पूछा औऱ बालक को ढ़ेर सारा आशीर्वाद भी दिया।

ये तो कहानी हुई। अग़र आप कौन बनेगा करोड़पति का नया सीज़न देख रहे हों तो ज्ञान राज नाम के जो प्रतियोगी झारखंड से आये थे उनके जीवन में ऐसा ही हुआ। इंजीनियरिंग करने के बाद जो नौकरी का ऑफर था उसे छोड़कर उन्होंने बीमार माँ की देखभाल करने का निर्णय लिया। आज वो एक शिक्षक हैं औऱ अपने छात्रों को नई टेक्नोलॉजी सिखाते हैं।

असल ज़िंदगी में मैंने स्वयं ये सब बहुत क़रीब से देखा है। मेरी दादीजी को लकवा हो गया था जिसके चलते उनकी हमेशा देखभाल की ज़रूरत थी। एक सहायिका दिनभर के लिये रखी थी। माँ-पिताजी भी उनकी बहुत सेवा करते। पिताजी का रोज़ का रूटीन था उनको व्हीलचेयर पर बैठाकर नहाने के लिये बाथरूम लेकर जाते औऱ स्नान के बाद जब सहायिका की मदद से वो तैयार हो जातीं, तब उनको बाहर लेकर आते, जहां वो सबके साथ बैठ कर बातचीत करतीं। हम लोग उनको अखबार की ख़बरें भी पढ़कर सुनाते। पिताजी ये सारा काम हमारे साथ स्कूल निकलने से पहले करते। भोजन के लिये दादी को सहारा देकर बैठाने का काम हम भाई बहन का रहता।

अब चलते हैं मेरे कॉलेज के दिनों की तरफ़। जिस कॉलेज में मेरा दाखिला हुआ था वो घर से काफ़ी दूर था (पास वाले कॉलेज में दाखिले के लिये जो नंबर चाहिये थे वो मेरे से बहुत दूर थे)। जाने के दो विकल्प थे – या तो कुछ पैदल औऱ कुछ पब्लिक ट्रांसपोर्ट पर निर्भर रहें या साइकल से जाया जाये। तीसरा विकल्प – गाड़ी वाला फाइनल ईयर में आकर मिला (परीक्षा के लिये)। तो साइकल की उस लंबी यात्रा के दौरान रास्ते में जो सुविचार वाले बोर्ड लगे रहते थे वो पढ़ते जाते थे। आज के जैसे मोबाइल फ़ोन तो हुआ नहीं करते थे की ईयरफोन लगाओ औऱ निकल पड़ो। हाँ चलता फिरता आदमी अर्थात वॉकमैन ज़रूर था लेक़िन जल्दी जल्दी बैटरी बदलना भी संभव नहीं था। कॉलेज लगभग रोज़ ही जाना होता था क्योंकि विज्ञान विषय था तो प्रैक्टिकल होते थे। तो ये सुविचार वाले बोर्ड यात्रा के साथी रहे लगभग तीन वर्ष।

भोपाल में जैसे ही आप भेल (BHEL) टाऊनशिप में प्रवेश करते हैं, बिजली के खम्बों पर लगे ये बोर्ड आपका स्वागत करते हैं। पूरे रास्ते ऐसे बोर्ड लगे हुये थे। ऐसा ही एक बोर्ड जो याद रह गया, उस पर लिखा था

माता पिता की सेवा करने वाला पुत्र कभी दुखी नहीं रहता

आपको बहुत से ऐसे उदाहरण मिल जायेंगे जो माता-पिता की देखभाल का ख़ूब दिखावा करेंगे लेक़िन बात कुछ औऱ ही रहती है। कोई अपने पालकों के नाम पर इमारत खड़ी कर ये समझते हैं समाज में उनकी वाहवाही होगी। कोई उनके बुत बनवा कर साल में एक बार साफ़ सफ़ाई करवा कर फ़ोटो खींच कर व्हाट्सएप ग्रुप में शेयर कर देते हैं। लेक़िन वो उन मूल्यों की तो तिलांजलि दे चुके रहते हैं, जिसका अग़र वो पालन करते तो शायद उनके दिवंगत माता पिता ज़्यादा खुश होते। लेक़िन जैसा इन दिनों फ़ैशन है सब चीज़ का दिखावा करिये। ख़ैर।

जो ऊपर दो कहानी औऱ अपनी दादी के बारे में बताया उसके पीछे कारण था इन दिनों ऐसी खबरें सुनना या पढ़ना जब बच्चे अपने माता पिता को छोड़कर चले जाते हैं या उनकी पूछ परख सिर्फ़ इसलिये करते हैं क्योंकि ज़मीन जायदाद का मामला रहता है। इन खबरों से दुःख तो होता ही है, आश्चर्य भी होता है। ऐसे बेटों की गलतियों के श्रेय ज़्यादातर बहुओं के हिस्से में आता है। चलिये एक बार को मान भी लें की बहू की ग़लती होगी, लेक़िन जिस बेटे को माँ बाप ने पाला पोसा वो कैसे अपने माता पिता के साथ ऐसा व्यवहार होता देख सकते हैं? कहीं न कहीं उनका मौन रहना उस ग़लत व्यवहार को बढ़ावा ही देता है। वैसे ही बड़ा भाई, जिसे मातापिता के न होने पर उनके स्थान पर रखा जाता है, वो कैसे अपने से छोटे भाई बहनों के साथ ग़लत होता देखते रहते हैं ख़ामोशी से? लेक़िन क्या सिर्फ़ संतान ही दोषी हैं? क्या माता-पिता भी कहीं इसके लिये कुछ हद तक दोषी हैं? यहाँ दोषी होने का मतलब क्या वो अपनी संतान से कुछ ज़्यादा की उम्मीद तो नहीं लगा बैठे? ज़्यादातर माता पिता ये मान कर चलते हैं की बुढ़ापे में जब उन्हें ज़रूरत होगी तब उनका पुत्र उनका ख़्याल रखेगा। लेक़िन कई बार ऐसा नहीं होता है। उल्टा माता पिता ही बच्चों के परिवारों का भी ख़्याल रखते हैं।

मुझे याद है जब अमिताभ बच्चन की फ़िल्म बाग़बान आयी थी। किसी कारण से मैं ये फ़िल्म नहीं देख पाया था। छोटे भाई ने फ़ोन कर बोला ये फ़िल्म ज़रूर देखना। जब देखी तो बहुत बढ़िया लगी। लेक़िन सभी को ये फ़िल्म पसंद नहीं आयी। हमारे एक रिश्तेदार फ़िल्म को देखने औऱ बाक़ी लोगों को इसको देखने के लिये बोलने से नाराज़ भी हुये थे। उनका दर्द समझ में भी आता था क्योंकि उनके सुपुत्र औऱ उनके संबंध लगभग ख़त्म से ही हो गये थे।

ख़ैर बात फिल्मों की नहीं है। असल ज़िन्दगी में अमिताभ बच्चन ने जिस तरह से अपने माता पिता की सेवा करी है उसकी भी मिसाल दी जाती है। ऐसी बहुत सी फ़िल्मों का यहाँ उदाहरण दिया जा सकता है।

बाग़बान के अंत का जो सीन है उसमें अमिताभ बच्चन बहुत सारा ज्ञान देते हैं। लेक़िन फ़िल्मों से जो भी ज्ञान मिले, असल ज़िन्दगी में क्यूँ हम ऐसे वाक्ये देखते हैं। भाई बहन के बीच तक़रार फ़िर भी समझ में आती है क्योंकि एक भाई थोड़ा लालची हो जाता है औऱ अपने फायदे के अलावा कुछ नहीं सोचते। लेक़िन माता-पिता के साथ ऐसा व्यवहार कैसे सही हो सकता है? माता पिता उम्र की उस दहलीज़ पर खड़े रहते हैं जहाँ उन्हें बस प्यार औऱ सम्मान की दरकार है। लेक़िन ऐसी बहुत सी संतान हैं जो इतना भी नहीं कर पाती। माता पिता सब इसलिये सह लेते हैं क्योंकि उनके पास औऱ कोई चारा नहीं है। वो अपना बचा हुआ जीवन बस गुज़ारना चाहते हैं।

जब तक माता पिता सामने रहते हैं उनकी क़दर नहीं करते औऱ उनके जाने के बाद सिर्फ़ अफ़सोस ही कर सकते हैं। वैसे ये बात सभी रिश्तों पर लागू होती है। कहाँ तो आप सालों साल बात नहीं करते औऱ फ़िर जब अचानक उनके न होने की ख़बर आती है तो जीवन भर न सही लेक़िन उनके जाने के शुरू के कुछ वर्षों तक आप अफ़सोस जताते रहते हैं। उसके बाद वही ढ़र्रे वाला व्यवहार वापस।

अपने आसपास सभी तरह के लोग देखें हैं। वो जो दिखावा करते नहीं थकते, वो जो माता पिता की क़दर नहीं करते औऱ वो भी जो माता पिता को ढ़ेर सारा प्यार देते हैं औऱ उनका ख़ूब सम्मान भी करते हैं। अगर आपके बच्चे ये देख रहें की आप अपने माता पिता से कैसे व्यवहार कर रहे हैं तो आपको अपने साथ भी ऐसे ही व्यवहार की उम्मीद करनी चाहिये। वैसे इतनी कहानी हो चुकी हैं, नहीं तो इस बारे में भी एक कहानी है। उसका नंबर भी आयेगा।

\”शायद आज की पीढ़ी ये भूल जाती है जहाँ आज हम हैं, कल वो वहाँ होंगे। कल वो भी बूढ़े होंगे।\”

बाग़बान

वैसे ये जो सुविचार वाले बोर्ड थे (अब जानकारी नहीं है वो हैं की नहीं। भेल टाऊनशिप भी अब भुतहा जगह हो गयी है), बड़े याद आतें हैं। हाईवे पर कई गाड़ियों के पीछे भी ऐसे ही गुरुमंत्र लिखे रहते हैं। क्या आपने ऐसा कुछ कभी पढ़ा है जो आपको याद रह गया? कमेंट करके बताइये।

आपको नई पोस्ट की जानकारी मिलती रहे इसके लिये आप मुझे फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम या टेलीग्राम पर फॉलो कर सकते हैं। बहुत जल्द कुछ औऱ नया करने का प्रयास है। उसकी जानकारी उचित समय पर।

हम होंगे कामयाब एक दिन

वर्ष 1983 में रिलीज़ हुई हिंदी फिल्मों पर अगर नज़र डालें तो उस साल मेनस्ट्रीम औऱ आर्ट फिल्में या मुख्य धारा औऱ समानांतर सिनेमा की कई यादगार फिल्में रिलीज़ हुई थीं।

अगर आप उस वर्ष की दस सबसे ज़्यादा कमाई वाली फिल्मों की लिस्ट देखेंगे तो लगेगा उस वक़्त लोगों को क्या हो गया था। जब मैंने ये लिस्ट देखी तो मुझे हँसी भी आई औऱ आश्चर्य भी हुआ। उस वर्ष की जो दस सर्वाधिक कमाई वाली फिल्में थीं उनकी लिस्ट कुछ इस तरह है:

  • हिम्मतवाला
  • बेताब
  • हीरो
  • कुली
  • अंधा कानून
  • मवाली
  • नौकर बीवी का
  • जस्टिस चौधरी
  • महान
  • जानी दोस्त

आगे बढ़ने से पहले इस लिस्ट की बात कर लेते हैं क्योंकि उसके बाद इसका नंबर नहीं आयेगा। तो इस 10 कि लिस्ट में से आपने कौन कौन सी फिल्में देखी हैं? मैंने इनमें से आजतक सिर्फ़ चार फिल्में ही देखी हैं – बेताब, हीरो, कुली औऱ नौकर बीवी का। जितेंद्र कुछ ख़ास पसंद नहीं थे औऱ ऐसा ही कुछ अमिताभ बच्चन के साथ भी था। कुली मेरे ख़्याल से इसलिये देखी होगी क्योंकि इस फ़िल्म के दौरान बच्चन साहब घायल हुये थे तो सबकी उत्सुकता रही होगी। नौकर बीवी का शायद इसलिये की ये कॉमेडी फिल्म थी। ये दोनों ही फिल्में सिनेमाघर में देखी थीं। हीरो औऱ बेताब तो काफ़ी समय बाद छोटे पर्दे पर देखी थी। वैसे नौकर बीवी का एक गाना \’क्या नाम है तेरा\’ काफ़ी सुना गया था औऱ आज भी भूले बिसरे सुन लेते हैं। इसकी भी एक कहानी है लेक़िन उसका वक़्त जब आयेगा तब आएगा। फ़िलहाल आप भी देखिये औऱ सुनिये औऱ आगे पढ़ते भी रहिये। :–)

तो ये दस फिल्में आपको ये बिल्कुल भी नहीं बताती उस साल की जो क़माल की फिल्में आयीं थीं उनके बारे में। कारण भी साफ़ है – सफलता का पैमाना जब सिर्फ़ बॉक्सऑफिस पर कमाई हो तो आप क्या कर सकते हैं। लेकिन इसी वर्ष 1983 में आईं थीं कुछ ऐसी फिल्में जिनका नाम हमेशा के लिये सिनेमा के चाहने वालों की ज़ुबान पर चढ़ गया औऱ इतिहास के पन्नों पर उनका नाम भी हमेशा के लिये दर्ज़ हो गया।

अर्द्धसत्य, कथा, सदमा, मासूम, मंडी, रज़िया सुल्तान, वो सात दिन औऱ… जाने भी दो यारों। इन आठ में से सिर्फ़ रज़िया सुल्तान ही नहीं देखी है। बाक़ी सातों देखी है औऱ जाने भी दो यारों को तो इतनी बार देखा है की अब तो गिनती भी याद नहीं। अब ये फ़िल्म एक क्लासिक बन गयी है औऱ 1983 में आज ही के दिन, अगस्त 12 को ये रिलीज़ हुई थी। क्या इस फ़िल्म को भोपाल के किसी सिनेमाघर में रिलीज़ किया गया था, ये रिसर्च का विषय हो सकता है। ऐसा इसलिये अगर आप दस पैसा कमाने वाली फिल्मों पर नज़र डालें तो जाने भी दो यारों के कलाकार अलग नज़र आते हैं। उसपर से फ़िल्म में न कोई गीत संगीत न कोई ऐसी अदाकारा जिसे देखने लोग आयें।

मैंने ये फ़िल्म 1983 में शायद नहीं देखी थी। शायद इसलिये क्योंकि फ़िल्म वीसीआर पर देखी थी औऱ उन दिनों इसका लाभ गर्मियों की छुट्टी में ही लिया जाता था। वैसे दीवाली पर भी उस समय लंबी छुट्टी होती थीं इसलिये शायद। उसके बाद से इस फ़िल्म को देखना हर छुट्टी में एक रूटीन सा बन गया था।

उस समय इतनी समझ नहीं थी की फ़िल्म के ज़रिये क्या संदेश दिया जा रहा है या की फ़िल्म हमारे सिस्टम पर कटाक्ष कर रही है। यही मेरे ख़्याल से इस फ़िल्म की ख़ूबी भी है की बहुत ही सीधे, सरल शब्दों में बहुत गहरी बात कर जाती है। फ़िल्म मनोरंजन भी करे औऱ कुछ सवाल भी उठाये – ये उसकी बहुत बड़ी उपलब्धि होती है। ज़्यादातर फिल्में सवाल पूछने से डरती हैं क्योंकि उसके चक्कर में मनोरंजन की बलि न चढ़ जाये। आज ऐसी फिल्मों की संख्या कम है। उल्टा दर्शक अब पूछने लगते हैं भाई फ़िल्म बनाई क्यों थी? सलमान खान की रेस 3 औऱ राधे उसका अच्छा उदाहरण हैं।

विषय से भटकें उसके पहले वापस आते हैं।विनोद, सुधीर, तरनेजा, आहूजा, डिमैलो या शोभा जी ये सब हमारे आसपास के ही क़िरदार लगते हैं। इतने वर्षों में बदला कुछ भी नहीं है। पुल आज भी गिर जाते हैं, फ़िल्म में बिल्डिंग में फ्लोर बढ़ाने का तरीका बताया है, आज तो पूरी की पूरी बिल्डिंग खड़ी हो जाती है औऱ किसी को पता भी नहीं चलता।

इन दिनों बारिश का मौसम है औऱ साल दर साल रोड़ बनाने का करोड़ों का कॉन्ट्रैक्ट दिया जाता है। लेक़िन हर बारिश में ठीक उसी जगह की रोड़ फ़िर ख़राब होती है औऱ फ़िर से बनाई जाती है। ख़ैर इस गंभीर विषय से वापस फ़िल्म पर आते हैं। इस फ़िल्म में एक लाइट स्विच ढूँढने का सीन है। वैसे ही कुछ हमने भी एक बार लाइट जाने के बाद टॉर्च ढूंढी थी। इस किस्से के बारे में बस इससे ज़्यादा कुछ बता नहीं सकते। ;–)

जैसा मैंने बताया, इस फ़िल्म को अब इतनी बार देख चुके हैं की फ़िल्म कंठस्थ हो गयी है। लेक़िन अभी पिछले दिनों जब इसको फ़िर से देखा तो मज़ा वैसा ही आया। क्लाइमेक्स में जो महाभारत का संदर्भ है वो तो क़माल का है। इसका पूरा श्रेय फ़िल्म के लेखकों को जाता है। फ़िल्म के अंत में जब सब आपस में सेटिंग कर विनोद औऱ सुधीर को बलि का बकरा बनाते हैं।  बैकग्राउंड में हम होंगे क़ामयाब एक दिन बजने लगता है औऱ मुम्बई के फ़ोर्ट के फुटपाथ पर विनोद औऱ सुधीर को जेल की पौशाक में देखकर आप निराश भी होते हैं औऱ गाना आपको उम्मीद भी जगाता है।

जो दूसरी लिस्ट की फिल्में हैं उसमें से मासूम, सदमा, रज़िया सुल्तान औऱ वो सात दिन का संगीत क़माल का है। इसी साल आयी एक औऱ फ़िल्म जिसका ये गाना दरअसल जीने का फलसफा है।

कहो कैसे रस्ता भूल गये, अच्छे तो हो दिलबरजान

हम इंसान आदतों के मारे हैं। ये कैसे बन जाती हैं ये हमें पता भी नहीं चलता।

जब कोई एक काम रूटीन से हट जाता है तब समझ आता है की हमें कैसे उसकी आदत सी हो गयी थी। कोरोनकाल के चलते ऐसी कई अच्छी औऱ कुछ बुरी आदतों को मजबूरी में छोड़ना पड़ा।

ऐसी ही एक अजीब सी बात आज सुबह सुबह हुई। घर का दरवाज़ा खोला तो बहुत दिनों से गुम अख़बार भी रखा हुआ था। पिछले क़रीब 17 महीने के बाद से सुबह सुबह अख़बार औऱ चाय का साथ भूल ही गये थे। चाय का आनंद अब ऐसे ही लेते हैं। कुछ दिन अखबार की कमी भी खली लेक़िन लॉक डाउन में रहने के बाद सब आदतें बदल गयी थीं।

बचपन से अख़बार पढ़ने की आदत तो नहीं थी। लेक़िन जब कभी पढ़ने को मिल जाता तो पढ़ ज़रूर लेते। घर में उन दिनों सुबह सुबह \’नईदुनिया\’ आता था। चूँकि पिताजी इंदौर में काफ़ी समय रहे तो इस पेपर को पढ़ने की आदत हो गयी औऱ जब भोपाल आये तब भी यही अख़बार आता रहा। इन दिनों समाचार में छाये दैनिकभास्कर किसी को ख़ास पसंद नहीं आता। \’नईदुनिया\’ में काफ़ी क़माल के लेख पढ़ने तो मिले औऱ ये कहूँ की पत्रकारिता का पहला पाठ भी (अनजाने में ही सही)।

बरसों तक नईदुनिया ही पढ़ते रहे। औऱ जैसा होता है की धीरे धीरे आपको उस समाचार पत्र के लिखने का अंदाज़ औऱ जिस लिपि में वो छपता है, वो सब भाने लगता है। मतलब कम्पलीट पैकेज। हम लोगों की अंग्रेज़ी बेहतर हो इसके लिये पिताजी ने एक अंग्रेजी अख़बार भी लगवाया – टाइम्स ऑफ इंडिया। लेक़िन शुरू में सिर्फ़ पिताजी ही उसको पढ़ने का कष्ट करते। इसी पेपर में आर के लक्ष्मण जी का मशहूर कार्टून भी आता औऱ पापा कहते अगर कोई न भी पढ़े लेक़िन सिर्फ़ उस कार्टून के लिये ही अख़बार पैसा वसूल है।

ख़ैर समय के साथ साथ दोनों अखबारों को अच्छे से पढ़ना शुरू किया। हम तो दो अख़बार से ही घबरा जाते थे लेक़िन मामाजी के यहाँ 4-5 पेपर रोज़ आते थे। सबको पढ़ने का शौक़ भी था। अख़बार के अलावा हमारे यहाँ कई मैगज़ीन भी आती थीं औऱ बाकी किताबों के बारे में पहले ही बता चुका हूँ।

कई बार आदतें आगे काम आती हैं, ये एहसास उस समय हुआ जब पत्रकारिता के क्षेत्र में क़दम रखा। अपना अखबार तो पढ़ते ही थे, साथ में दूसरे अख़बार भी पढ़ते ये जानने के लिये की कहीं कुछ ज़रूरी ख़बर छूट तो नहीं गई। जब पीटीआई पहुँचे तो वहाँ सुबह की शिफ़्ट में एक रिपोर्ट बनाने का काम हुआ करता था। इस रिपोर्ट के आधार पर सभी संपादकगण की मीटिंग होती। किस अख़बार ने हमारी ख़बर ली औऱ क्या छूटा। उस समय के हमारे एक वरिष्ठ संपादक हुआ करते थे अरुण कुमार जी। उनकी ट्रेनिंग क़माल की थी। उन्होंने ये भी सिखाया की स्टोरी को अलग अलग तरीके से कैसे कवर कर सकते हैं।

ये जो ट्रेनिंग मिली उसकी बदौलत आज भी दिमाग़ यही दौड़ता रहता है जब अख़बार पढ़ते हैं। तो उस सुबह अख़बार मिला तो थोड़ा अटपटा सा लगा। बहुत दिनों बाद मिलने के बाद कि ख़ुशी भी नहीं हुई। हाँ अख़बार को हाँथ लगाने के पहले औऱ बाद हाँथ धोने की हिदायत का पालन किया।

कोरोना के चलते बहुत सी आदतें बदल गयी हैं। अख़बार हाँथ में न सही, मोबाइल पर तो मिलता है। तो अब सब कुछ वहीं से। हाँ अब नईदुनिया पढ़ने की आदत छूट गई है क्योंकि अब बहुत सारे अख़बार पढ़ते हैं औऱ पुराने पेपर के मालिक भी बदल गये तो लिख़ने का अंदाज़ भी औऱ लोग भी बदल गये हैं।

नईदुनिया में उस समय रोज़ का कॉमिक्स की एक स्ट्रिप आती थी मॉडेस्टी ब्लेज़। शायद औऱ कुछ भी लेक़िन मॉडेस्टी डेस्टी ब्लेज़ याद है। कहानी पूरी होने पर उसकी कटाई कर के किसी पुरानी कॉपी पर चिपका देने का काम होता। इसके बाद वो कहानी को एक साथ पढ़ने में बड़ा मज़ा आता। आज भी घर में इस काम के कुछ नमूने ज़रूर होंगे। मज़ा तो तब आता जब किसी कारण से कुछ दिन की कटिंग नहीं रख पाये। बस फ़िर जानने वाले जो नईदुनिया के पाठक थे उनसे ये हासिल करी जाती। ऐसे ही औऱ भी कई कटिंग्स रखी जातीं, किसी अच्छे लेख की या किसी अच्छे विचार की। आज भी जो दस्तावेजों का खज़ाना, जिसको श्रीमतीजी कई बार हटाने की चेतावनी दे चुकीं हैं, उसमें शायद कुछ रखा भी हो।

अब इतना लिख़ने के बाद लगता है फ़िर से अख़बार लगा लिया जाये। हाथ में अख़बार औऱ चाय की प्याली हो या अख़बार पढ़ते हुये रेडियो सुनने का जो आनंद है वो डिजिटल में कहाँ।

अख़बार का आपके जीवन में क्या स्थान रहा है? क्या कोरोनकाल में आपका भी अख़बार से नाता टूट गया था? कमेंट कर बतायें।

Corona Lessons: Always Stay Positive

When rising covid cases in India was hogging all the news space, I had no clue I too would be part of the data. When it happened I had no clue what was in store for me. But after spending 17-days in the hospital, including a week in the ICU, a lot has changed. These are my life lessons.


Share: Your society WhatsApp group, yes the same where people get into lot of useless debates, will be most beneficial. Post your queries and someone will help you. I was in a very difficult situation after 3 family members tested positive as PMC smarties had sealed society. It was another covid +ive who came to my rescue and took me to hospital. Remember बात करने से बात बनती है। So pick up the phone and talk. The disease is such even when people want to help, they cannot. But they have connection oops network. So share with your friends as well.


Lessons: It just might be your lucky day. Mine certainly was (only difference it was night ). Got oxygen bed in a hospital close by. I was hopeful I would be out in couple of days but that was not to be. Learnt many lessons inside the hospital and here they come.


Stay positive: Whatever happens around you, stay focused on your recovery. Follow every single word your doctor says. They know the best. Whatever gyan you may have acquired from whatsapp univ or any such place, just delete it.

Fringe benefit: I had no visitors during my entire stay but I benefited hugely from visitors my ICU bed neighbor had. His two sons would share such positive messages with their father on life support that it rubbed on me. Would I be typing this in their absence? YES. Because I was good kid there. Followed all the instructions to T. Which reminds me of the tea served. It was awesome. Next is food. Day 1 in a shared ward, I did not polish off the dinner served. The senior citizen next to me said very simply – eat properly or you will become weak and recovery will take time.

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Eat right: After that, not one meal was seen as what is this. Whatever was served was enjoyed and sometimes asked for a second helping as well (mostly daal). Huge credit to my lovely dear Maa. She made us eat whatever was served. That habit helped me get strength. In addition to hospital food, I had very few other things to eat (except some dryfruits by my amazing family friend ). I also had amazing hospital staff who fed me while I was in the ICU. As a vegetarian every morning I would say no to eggs. One attendant saw this. While feeding dinner, she said eat eggs till you are here and once out take a dip in any of the river and भगवान से माफ़ी माँग लेना। With support like this yeh dil nahin maange kuch aur.


Stay positive: The family friend would visit hospital to get update on my condition.The hospital staff started identifying him as my relative. Isn\’t it amazing. It happens only in India. 
Half the battle is won by staying positive and other half by eating right and following instructions and just listening to right things like pep talks to my neighbor. So were there no dark nights or bad days?

Blinkers: Well there were plenty, specially in ICU, but put on your blinkers and focus on your recovery. That\’s all that matters. Since I also had mobile with me, the family decided to censor all the unfortunate news on family whatsapp groups. I also stopped checking Twitter after situation became very bad outside. Fortunately I had couple of books downloaded but in Kindle cold storage. So brought them to life and read them. Huge thank you to Manish Misra for the recommendation. Better late than never.

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Friends indeed: I am forever indebted to Suvasit Sinha who coordinated with a week-old first time father Naeem Shaikh to get my medicines. I cannot describe emotions when I saw Naeem from my bed. He was first and last familiar face I will see for next fortnight. Family n friends came together.

Go back to roots: Pranayam is best. Do the basics regularly. YouTube is flooded. Pick who you like and practice. Same for meditation. Couple of days off oxygen support I was to take a 6 min walk test (hope all know about it now). My levels dropped and so did my hopes of early discharge from hospital.But I started taking 5 min walk 3-4 times a day and it helped when I finally cleared the test and allowed to go home. Start small. 15 mins of pranayam and meditation. Plus some walk. Do what works but Just Do It (No Nike money). 

One day: Take one day at a time. Don\’t worry about when will you go home. As the son told my ICU neighbor, you are here for treatment not to stay here. So just focus on getting better.

Thank you all the amazing doctors, sisters, brothers, support staff, cook who fed us nutritious meals every single day. We as a society may never be able to repay what you have done to save so many lives in various parts of the country. Gratitude forever.

To sum up my learnings:

Stay positive
Don\’t panic
Eat proper
Read positive books
Watch hobby videos

अपने पास क्या, अरमां के सिवा

कोरोनकाल औऱ अस्पताल की बातें तो अब ख़त्म हो गयी हैं लेक़िन एक बात साझा करना रह गई।

जब घर से अप्रैल में अस्पताल में भर्ती होने के लिये चले थे तो तैयारी सब थी। मतलब साबुन से लेकर कपड़े धोने का सब सामान साथ में था। अब कोई होटल तो था नहीं की कपड़े धुलने को दे दिये औऱ आराम से बैठ गये। और कुछ पता भी नहीं था की कितने दिन का प्रवास होगा।

लेक़िन पहुँचने के अगले दिन से ऑक्सिजन मास्क लग गया औऱ उसको कभी भी न हटाने की ताक़ीद भी मिल गयी थी। वाशरूम की सवारी वाली बात आपको बता ही चुका हूँ। तो ऐसे हालात में नहाने का या कपडे धोने का सवाल ही नहीं उठता। शुरू में घर से लाये हुये कपड़ों से काम चल गया लेक़िन कुछ दिन बाद कपड़ों की ज़रूरत महसूस हुई। मगर मजबूरी का भी ऐसा आलम था कि क्या कहें। सोसाइटी सील हो चुकी थी औऱ घर पर बाक़ी सब पॉजिटिव। तो सामान आने की कोई संभावना भी नहीं थी।

इसी बीच हमारी भी ICU में एंट्री हो गयी थी और वहाँ एक राहत वाला काम भी हुआ। एक दिन सुबह सुबह स्पंज के लिये जब कोई आया तो साथ कपड़े भी लाया। लेक़िन जिस राहत को मैंने महसूस किया था वो ज़्यादा देर नहीं मिली। जो अस्पताल से कपड़े मिले वो छोटे निकले। पायजामा तो फ़िर भी ठीक ही था (मतलब किसी तरह पहन लिया गया था), वो जो शर्ट दी थी मेरे पेट की बरसों की मेहनत वाली गोलाई पर फ़िट नहीं बैठ रही थी। अस्पताल का स्टॉफ शायद खाते पीते लोगों को ध्यान में रख कर कपडे नहीं बनाते।

तो शर्ट को वापस कर अपनी टीशर्ट से काम चलाया। लेक़िन पायजामा की तकलीफ़ आखिरी दिन तक बनी रही। सुबह सुबह स्टाफ से अपने नाप का पायजामा मांगना एक रूटीन हो गया था। कभी अगर न मिले तो उससे छोटे साइज वाले से काम चलाना पड़ता। उससे जो हालात उत्पन्न होते वो यहाँ बताना मुनासिब नहीं है।

पायजामे के बाद मशक्कत वाला काम होता था उसको बाँधा कैसे जाये। हाँथ में तो कैनुला लगा होता तो ज़्यादा कुछ कर नहीं सकते तो किसी तरह इस काम को धीरे धीरे अंजाम देते। ये समझ से परे है कि इलास्टिक क्यों नहीं लगाते जिससे इन सब परेशानियों से बचा जा सके।

ख़ैर अस्पताल में कोई इतना ध्यान भी नहीं देता है, लेक़िन चूँकि ज़्यादातर महिला स्टाफ होता था तो लगता था कपड़े ठीक हों। शुरुआत के दिनों में जब जनरल वार्ड में था तो एक सरदारजी एवं उनकी पत्नी भी इलाज के लिये भर्ती थे। उस दंपत्ति को लगता हॉस्पिटल से विशेष व्यवस्था के तहत कपड़े उपलब्ध हो रहे थे। दोनों हमेशा एक जैसे कपडे पहनते।

मेरा तो ये सुझाव भी था का की वो फ़्री साइज वाला पजामा रखें जिससे हृष्टपुष्ट लोगों को कोई परेशानी न हो। एक बार तो ये भी लगा की लुंगी जैसा कुछ पहन को दिया जाना चाहिये। मुझे लुंगी औऱ धोती पहनना बड़ा अच्छा लगता लेक़िन उसे संभालना नहीं आता। तो वर्षों पहले सुबह जब सोकर उठे तो ऐसा भी हुआ है की लुंगी कहीं पीछे रह गयी औऱ हम कहीं औऱ। ये दक्षिण भारत की फिल्मों में तो जिस आसानी से किरदार लुंगी पहनकर सब काम (बाइक भी चला लेते हैं), देखकर आश्चर्य ही होता है। वैसे अब संभालना आ गया है लेक़िन बाइक चलाने जैसा नहीं। पता चला बाइक पर बैठे तो सही लेकिन लुंगी हवा से बातें करने लगी और…

हँसते, मुस्कुराते रहिये औऱ अपना ध्यान रखिये।

कोरोना से सीख: जा तन लागे, वो तन जाने

अस्पताल में शुरू के चार दिन तो ठीक रहे लेक़िन जब ICU में शिफ़्ट करने के बात हुई तब लगा मामला कुछ गंभीर है। ख़ैर अब औऱ कोई चारा तो था नहीं तो अपनी जो भी हिम्मत बची हुई थी उसको सहेजकर रखा औऱ कोरोना से अपनी लड़ाई का दूसरा औऱ निर्णायक दौर शुरू किया।

अपने आसपास के मरीज़ों को कोरोना से हारते हुये देख तो नहीं रहा था लेक़िन ये पता ज़रूर चल जाता था। बाहर के ख़राब हालात की पूरी तो नहीं थोड़ी थोड़ी जानकारी थी। मोबाइल पास ज़रूर था लेक़िन उसको इस्तेमाल करना एक कष्ट वाला काम था। कभी कभार ऐसे विचार जब आये की क्या कोई ऐसा काम जो करना रह गया? वैसे तो इसकी लिस्ट बहुत लंबी बन सकती है, लेक़िन मेरी लिस्ट में सिर्फ़ एक चीज़ थी उस समय – जीवन में जो कुछ भी मिला उसके लिये धन्यवाद, उन अनगिनत लोगों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना जिन्होंने किसी भी रूप में मदद करी या कुछ सीखा कर गये।

पढ़े-लिखे मूर्ख

जब घर वापस आया तो बाहर मेरे अस्पताल में रहने के दौरान कोरोना से परिवार में क्या घटित हुआ इसके बारे में थोड़ा सा पता चला। उस समय तक स्थिति संभली तो नहीं थी लेक़िन थोड़ी बेहतर हुई थी। लेक़िन तब भी रोज़ ही सुनते किसी जान पहचान वाले ने अपने क़रीबी को खोया है। ये सिलसिला अभी भी चल रहा है लेक़िन ईश्वर की कृपा से अब ऐसी खबरें कभीकभार सुनने को मिल रही हैं।

घर में क़ैद शाम अक़्सर बालकनी से बाहर चल रही दुनिया देखकर गुज़र जाती। लेक़िन बाहर का नज़ारा देखकर दुःख भी होता और गुस्सा भी आती। लोग कोरोना जब बहुत तेज़ी से फैल रहा था तब भी ऐसे घूम रहे थे जैसे कुछ हुआ ही नहीं हो। पति पत्नी, बच्चे, नौजवान सबने जैसे सच्चाई से मुँह मोड़ लिया हो। सबसे ज़्यादा हैरानी औऱ दुःखी होने वाली बात थी कि जो भी इस कार्य में लिप्त थे वो सभी पढ़े लिखे थे। उनको कोरोना के कहर के बारे में भी निश्चित रूप से पता होगा। इसके बाद वो इतने लापरवाह कैसे हो सकते हैं?

चूँकि मैंने कोरोना के कहर को बहुत क़रीब से देखा था औऱ परिवार-जान पहचान वाले कई लोगों की जान कोरोना से गयी थी, तो ख़राब भी लगता। कई लोग ये कहते कोरोना जैसा कुछ नहीं है या बार बार बोलने के बाद भी मास्क नहीं पहनते, तो मन करता उनको कुछ घंटों के लिये ICU वार्ड में छोड़ दिया जाये। मुझे अभी भी समझ में नहीं आया की इतना सब होने के बाद लोग बिना किसी चिंता के बारात निकालकर शादी भी कर रहे औऱ रिश्तेदारों के कोरोना के चलते शादी में शरीक़ नहीं होने पर लड़ाई भी। अग़र पढ़ाई लिखाई के बाद भी लोगों की समझ ऐसी है तो इसका क्या फ़ायदा?

डर के आगे क्या है?

ये बात सही है कि हम डर कर नहीं रह सकते, लेक़िन हम जानबूझकर अपने पैर पर कुल्हाड़ी भी तो नहीं मार सकते। जब भोपाल गैस काँड हुआ था तब बहुत छोटे थे औऱ जिन इलाकों में मिथाइल आइसोसाइनाइट ने क़हर बरपाया था वहाँ हमारे जान-पहचान वाले नहीं रहते थे। वो तो जब पत्रकारिता शुरू की औऱ उन इलाकों में गये तब पता चला लोगों ने क्या खोया। इस बार सब कुछ देखा भी, समझ भी आया। लेक़िन क्या हमने इससे जो भी सीखा है इसको याद रखेंगे?

तो आज की कोरोनकाल की सीख वाली किश्त के अंतिम भाग में सभी का धन्यवाद। किसी कार्यक्रम में अगर आप गये हों धन्यवाद ज्ञापन सबसे अंतिम काम होता है। आजकल इसको बीच में भी जगह मिल जाती है क्योंकि जिन लोगों के सहयोग से वो कार्यक्रम सम्पन्न हुआ उनके बारे में जानने की किसी को उत्सुकता नहीं रहती औऱ लोग बस बाहर निकलने की जल्दी में रहते हैं। तो मुझे अस्पताल के बिस्तर पर लेटकर यही लगता की \’बाहर\’ निकलने से पहले अग़र एक काम करना है तो जीवन के लिये धन्यवाद, उसमें जो कुछ भी मिला उसके लिये धन्यवाद ज़रूर करना चाहिये। ये एक काम अक़्सर हम टाल ही देते हैं।

ये धन्यवाद उन सभी का जो इसको पढ़ रहे हैं। शायद मैं आपको जानता हूँ, शायद हम कभी मिले हों, शायद कभी बात हुई हो या शायद अब हम सम्पर्क में न हों, शायद इसमें से कुछ भी नहीं। शायद मेरी लेखनी के ज़रिये हम जुड़े हों। आप सभी का आभार। जीवन आपके अनुभव का निचोड़ ही है तो इसमें आपके योगदान के लिये धन्यवाद।

औऱ मेरी प्रिय पम्मी। तुम्हारी लड़ाई को बहुत क़रीब से देखा है औऱ तुम्हारा वही जज़्बा अस्पताल में हिम्मत भी देता रहा। तुम्हारी अनगिनत मीठी यादों के लिये धन्यवाद। ❤️❤️❤️

कोरोना से सीख: चलते चलते यूँ ही कोई मिल गया था

आज वापस कोरोना से सीख पर क्योंकि कई बार ऐसा होता है की समय निकलते औऱ सीख भूलते देर नहीं लगती। तो इससे पहले की जो सीख हैं वो इस भीड़भाड़ में कहीं खो जायें, उन्हें संभाल कर रख दें। वैसे तो मेरा प्रयास है की ये सीख ताउम्र साथ रहें लेक़िन हूँ तो आख़िर इंसान ही।

क़दम क़दम बढ़ाये जा

तो इस सफ़र में जनरल वार्ड से ICU तक का माजरा आपको बताया है। अब बारी है स्पेशल वार्ड की जहाँ की सीख आपके साथ साझा कर रहा हूँ। बचपन से हमें ये सिखाया जाता है की किसी भी काम में महारत हासिल करनी हो तो उसकी रोज़ाना या नियमित प्रैक्टिस करो (गणित इसका अपवाद रही है मेरे लिये)। फ़िर चाहे वो संगीत हो या खेल या पढ़ाई। औऱ ये सही भी है। जैसे शुरू में जब साईकल चलाना सीखा तो ज़्यादा चलाने पर पैर दर्द होते लेक़िन फ़िर आदत हो गयी। कुछ ऐसा ही हुआ जब मॉर्निंग वॉक शुरू किया आदत तो थी नहीं तो बस दो दिन के बाद जब एक दिन आलस किया तो…!

अस्पताल में कुछ ग्यारह दिनों से ज़मीन पर चलने का काम नहीं किया था। कभी कभार बिस्तर से उठकर खड़े हो जाते जब बेडशीट बदली जाती नहीं तो जहाँ जाना होता वो भी एक ड्रिल होती। मतलब ऑक्सिजन सिलिंडर मंगाया जाता औऱ साथ में व्हीलचेयर भी। बस वही सवारी होती कहीं भी जाने के लिये। लेक़िन उसका भी उपयोग वार्ड बदलते समय या शुरुआती दिनों में वॉशरूम के लिये हुआ। चलना नहीं हुआ।

जब स्पेशल वार्ड में आये तो सबसे पहली ख़ुशी यही थी कि ICU से बाहर निकले लेक़िन आगे की राह कोई आसान नहीं थी। पहले ही दिन वहाँ के जो ब्रदर थे नाईट डयूटी पर उन्होंने बड़े प्यार से बात करी औऱ मेरे हाथ में जो सूजन आ गयी थी उसका ख़ास ध्यान भी रखा। नींद का थोड़ा सा मसला था तो काफ़ी देर तक जागता रहा औऱ उस दौरान ब्रदर औऱ उनके साथ जो नर्स थी, दोनों को सारी रात मरीजों का ख़्याल रखते देखा। वो मेरे वार्ड के सभी छह मरीजों के साथ एक और वार्ड की ज़िम्मेदारी बहुत ही अच्छे से उठा रहे थे।

ICU छोड़ने के एक दिन पहले से खाना अपने हाथ से खाने लगे थे औऱ यही सिलसिला यहाँ भी चला। हाँथ में IV कैनुला लगी हो तो थोड़ी मुश्किल ज़रूर होती लेक़िन कभी दायें से तो कभी बायें हाँथ से खा कर काम हो जाता था। अच्छा वो अस्पताल की कर्मी जिनके बारे में मैंने ज़िक्र किया था वो दो दिन से ICU में भी नहीं दिखीं औऱ नये वार्ड में भी उनका आना नहीं हुआ। लेक़िन उनसे मिलना हुआ।

चलते चलते

तो जिस वजह से मुझे ICU से निकलने का मौक़ा मिला था वो थी हालत में सुधार। अब दो दिनों में सेहत में थोड़ा औऱ सुधार हुआ था तो मुझे रात में अगर वॉशरूम जाना हो तो बिना किसी सहायक के जाने की परमिशन मिल गयी। लेक़िन ब्रदर की सख़्त हिदायत थी कि दरवाज़ा बंद न करूं। और जब वापस बेड पर आऊँ तो ऑक्सिजन लेवल चेक होता की पूरे चहलकदमी के कार्यक्रम से क्या असर पड़ा। चूँकि छोटा सा छह बिस्तर वाला वार्ड था तो इतना चलना भी नहीं होता था।

मेरे बेड से बाहर जो कॉरिडोर था वहाँ दिन में कई मरीज़ चहलकदमी करते दिखते। तीसरे दिन मैंने पूछ ही लिया कि क्या मैं भी वॉक कर सकता हूँ औऱ डयूटी पर जो डॉक्टर थीं उन्होंने कहा ठीक है आपका एक वॉक टेस्ट करते हैं। ये जो 6 minute वॉक टेस्ट आजकल चल रहा है, उस चिड़िया का नाम पहली बार उस दिन सुना था। उन्होंने कहा शाम को करते हैं औऱ मैं तैयार हो गया। अपनी वॉशरूम वाली चहलक़दमी से जो खुशफहमी पाल रखी थी शाम को उसकी ख़ुद मैंने ही धज्जियाँ उड़ा दीं। वॉक टेस्ट हुआ जिसमें मुझे कोई ख़ासी ऊपरी परेशानी नहीं तो हुई लेक़िन जब ऑक्सीजन लेवल नापा गया तो सब गड़बड़। हाँ रेखा की फ़िल्म घर का गाना आजकल पावँ ज़मी पर नहीं पड़ते मेरे ज़रूर याद आया। कमज़ोरी के चलते ये गाना आगे भी कई दिनों तक याद आया जब भी चलना होता।

डॉक्टर ने फ़िर समझाया की आपके फेफड़े (lungs) का काम अभी पूरी तरह ठीक नहीं हुआ है औऱ चलने के बाद आपको साँस लेने में तक़लीफ़ हो सकती है। ऑक्सीजन जो अब दिन में कई बार हटा भी दी जाती थी वो वापस लगा दी गयी। उन्होंने बोला अभी आपको कुछ दिन औऱ रहना पड़ेगा। इसके बाद तो लक्ष्य यही था की इस टेस्ट में अच्छे नम्बरों से पास होना है। बस तो फ़िर मैंने उसी दिन से तीन चार बार 2 मिनिट चलना शुरू किया वार्ड के अंदर ही। अगले दिन समय 4 मिनिट का औऱ उसके बाद 5 मिनिट। इसके साथ मैंने बिस्तर पर बैठे बैठे थोड़ा थोड़ा प्राणायाम भी शुरू किया।

ऊपर जो नियमित प्रैक्टिस वाली बात को समझने के लिये थोड़ा पीछे चलते हैं। आपको मैंने हमारे पास जो काली कार थी उसके बारे में बताया था। अगर आपने नहीं पढ़ा है तो आप उसे यहाँ पढ़ सकते हैं (काली कार की रंगीन यादें) औऱ रोड पर उसकी शान की सवारी आप यहाँ देख सकते हैं। तो ऑस्टिन नियमित चलती नहीं थी लेक़िन पापा हर थोड़े दिन में कार को गैराज से निकालकर उसे सामने जो जगह थी वहाँ खड़ी कर देते औऱ रात में कार को वापस गैराज में। चूँकि बैटरी डाउन रहती तो कार को धक्का लगाकर ये काम करना होता। पापा से पूछा कि इतनी मशक्कत क्यूँ तो उन्होंने इसका कारण बताया। अस्पताल से लौटने के बाद बालकनी में चाय का आनंद लेते हुये बहुत सी नई चीजों पर गौर करना शुरू किया। जैसे सामने वाली बिल्डिंग में एक शख्स अपनी गाड़ी को रोज़ शाम कवर्ड पार्किंग से निकालकर ओपन पार्किंग में खड़ी करते औऱ उसकी सफ़ाई करते। ये उनका रोज़ का रूटीन है। उनको ऐसा करता देख कर पिताजी का जवाब याद आ गया औऱ उसमे छिपी सीख भी जो कार और हमारे शरीर दोनों के लिये मान्य है। उन्होंने कहा था एक जगह खड़े रहने से कार के टायर खराब होते हैं औऱ उनकी हवा भी निकल जाती है। साथ ही गाड़ी को थोड़ा ही चलाने से भी टायर की पोजीशन बदल जाती है। यही तो हमें शरीर के साथ भी करना है क्योंकि कहा भी तो गया है शरीर भी एक मशीन है औऱ नहीं चलने से जैसे मशीन ख़राब होती है वैसे ही शरीर भी।

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लेक़िन तीन दिन की प्रैक्टिस रंग लाई औऱ डिसचार्ज के पहले जो वॉक टेस्ट हुआ उसको ठीक ठाक नंबरों से पास कर लिया। घर आने के बाद से अब प्रणायाम को अपनी दिनचर्या का एक हिस्सा बना लिया है। कई लोगों ने कहा भी की इन साधारण से साँस लेने- छोड़ने की तकनीक से न सिर्फ़ फेफड़े बल्कि पूरे शरीर को फ़ायदा होता है। अपने 17 दिनों के प्रवास से वो समझ में आया जो इतने लंबे समय से समझ नहीं आया था। और वो कर्मी जिन्होंने मुझे खाना खिलाया था वो भी मुझे मिल गयीं जब मैं अस्पताल छोड़ कर निकल रहा था।

मेरे इस पूरे अनुभव से न सिर्फ़ डॉक्टर बल्कि इससे जुड़े अन्य कर्मियों के प्रति आदर औऱ सम्मान कई कई गुना बढ़ गया है। विशेषकर जिन परिस्थितियों में औऱ जितने सीमित साधनों में वो इस कठिन समय में मरीजों का ध्यान रख रहे थे वो काबिलेतारीफ है। औऱ बहुत कम मुझे सीनियर डॉक्टर्स या कर्मी मिले। सब नौजवान लेक़िन क़माल का जज़्बा। धन्यवाद शब्द बहुत छोटा लगता है उनके लिये औऱ शायद जो इस समय उनलोगों ने हम सभी के लिये किया है वो हम कभी भुला भी नहीं पायेंगे। उन सभी के इस सेवाभाव के लिये हमेशा कृतज्ञ रहूँगा।

सीख: आप अपने शरीर को किसी न किसी रूप में कष्ट देते रहें। हमारे बहुत से मेन्टल ब्लॉक होते हैं जिनके चलते हमें लगता है की हम इतना ही कर सकते हैं। जैसे जब कॉलेज जाना शुरू किया तो साईकल ही सवारी थी औऱ कॉलेज आना-जाना 20 किलोमीटर होता लेक़िन दो साल तक ये सफ़र किया रोज़ाना (लगभग)। उसी तरह अपने शरीर को भी आदत डलवाएं। प्राणायाम या जो आपको अच्छा लगे वो व्यायाम करें लेक़िन करें ज़रूर। प्राणायाम हमें विरासत में मिला वो तोहफ़ा है जिसकी क़दर हमने देर से की। इसको करने के कई फ़ायदे हैं जैसे जगह का कोई मसला नहीं औऱ मौसम का कोई बहाना नहीं। औऱ अब तो ये योगा बनकर विश्व में छाया हुआ है। तो किसी भी रूप में व्यायाम को अपने जीवन का हिस्सा बनायें। आपका शरीर आपको धन्यवाद कहेगा।

कोरोना से सीख: जब डाउनग्रेड से मिली अपग्रेड से ज़्यादा ख़ुशी

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अस्पताल का सफ़र जब शुरू हुआ तब लगा था कुछ ही दिनों में घर वापस। जिन सज्जन ने खाने की सीख दी थी, जब उन्होंने बताया की अगले दो दिन में उन्हें छुट्टी मिल जायेगी तो लगा मुझे भी जल्द ही घर जाने का मौक़ा मिलेगा। लेक़िन ऐसा कुछ नहीं होने वाला था।

अगले दो दिनों में मुझे ICU में शिफ़्ट किया गया। इसकी जानकारी मुझे घर पर मेरे विश्वस्त सूत्र (श्रीमतीजी) ने पहले दे दी थी। हुआ कुछ ऐसा था की जब नईम दवाई के सिलसिले में अस्पताल आये थे, तब डॉक्टर ने उन्हें मुझे ICU में शिफ़्ट करने की बात करी थी औऱ श्रीमतीजी को भी इस बारे में बताने को कहा था। श्रीमतीजी ICU सुनकर घबड़ा भी गयीं थीं औऱ उन्होंने फ़ौरन मुझे फ़ोन कर ताज़ा जानकारी माँगी। चूँकि मुझे कुछ भी मालूम नहीं था इस बारे में सो मैंने बता दिया। लेक़िन जब फ़ोन रखा तो अस्पताल के कर्मी तैयार थे मुझे ICU में शिफ़्ट करने को।

ICU के बारे में कुछ मैं पहले भी बता चुका हूँ। जिस समय मैं भर्ती हुआ था उस समय कोरोना का कहर अपनी चरम सीमा पर था। फ़ोन बहुत ज़्यादा देखने को नहीं मिलता या देखना बंद कर दिया था। पारिवारिक जो व्हाट्सएप्प ग्रुप थे वहाँ ज़्यादा कुछ हलचल नहीं थी। वो तो बाहर आकर पता लगा की सभी को वहाँ कोई भी ऐसी ख़बर नहीं शेयर करने को कहा गया था जिसको पढ़कर मुझे आघात लगे। सही कहूँ तो आसपास भी इतना कुछ चल रहा था की मन ख़राब तो था लेक़िन इलाज और कमज़ोरी के चलते बहुत सी बातें जानने के बाद भी कुछ समय लगता उसका असर होने में।

ICU में रहते समय खाने में काफ़ी परेशानी हुई। चूँकि पूरे समय मास्क लगा रहता तो वहाँ पर तैनात डॉक्टर ने स्टॉफ से कहा कि मुझे नाश्ता खाना खिलाने की ज़िम्मेदारी उनकी। उस समय जो भी सामने होता उसको बुलाकर ये काम हो जाता। दो दिन के बाद जब रात को खाना मिला तो कोई था नहीं। एक अस्पताल की कर्मी जिन्हें मैं अपने दाखिले के पहले दिन से देख रहा था वो सामने आ गईं औऱ पूछने लगीं खाना खिलाना है? अगले तीन दिनों तक उन्होंने ही खाना खिलाया और समझाया भी की मुझे अंडा जो नाश्ते में मिलता है, वो खाना चाहिए। जब मैंने बताया मैं वेजेटेरियन हूँ तो उन्होंने बड़ी ही मासूमियत से कहा, \”अभी खा लो। बाहर जाकर किसी भी नदी में स्नान कर अपने भगवान से माफ़ी माँग लेना\”। हालाँकि मेरा नहीं खाने के निर्णय का धार्मिक नहीं है।

अंडा तो मैंने नहीं खाया लेक़िन उनकी सीख याद रखी कि खाना ठीक से खाना। उसके बाद वो दिखी नहीं औऱ अच्छी बात ये हुई की मेरी हालत में सुधार के चलते औऱ एक गंभीर मरीज़ को बेड की ज़रूरत के कारण ICU से दूसरे वार्ड में शिफ़्ट कर दिया।

यहाँ एक वाक्या साझा करना चाहता हूँ। इस बात को लगभग चौदह वर्ष हो गए हैं। मैं रेल से ओडिशा जा रहा था औऱ ट्रैन बीना से पकड़नी थी। भोपाल से बीना पहुँचकर अगली लंबी यात्रा का इंतजार कर रहे थे। लंबे सफ़र के चलते एसी में रिज़र्वेशन करवाया था। लेक़िन जब अपनी सीट पर पहुँचे तो वहाँ कोई औऱ ही विराजमान था और उनके पास बाकायदा टिकट भी था। एक बार तारीख़ वाली ग़लती के कारण पेपर बिछा कर सोना पड़ा था लेक़िन उस वक्त अकेले थे तो कोई परेशानी नहीं थी और था भी रात का सफ़र। इस बार परिवार भी साथ था औऱ सफ़र भी लंबा। लेक़िन अचानक प्रकट हुये टीसी ने कहा आप बगल वाले कोच में जाइये। आपका टिकट अपग्रेड हुआ है। वो पहली औऱ शायद अंतिम बार था जब भारतीय रेल मेहरबान हुई थी। यात्रा औऱ आराम से कटी।

इस घटना का ज़िक्र इसलिये की हमेशा अपग्रेड का अरमान होता है लेक़िन उस रात जब डॉ अश्विनी ने कहा की मुझे डाउनग्रेडेड स्पेशल वार्ड में शिफ़्ट कर रहे हैं तो इस डाउन ग्रेड को सबसे बड़ा अपग्रेड मानकर खुशी ख़ुशी मंज़ूर किया। अब इंतज़ार था कब घर जाने को मिलता। लेक़िन अभी भी समय था। कुछ औऱ बहुत ही प्रतिभावान हॉस्पिटल कर्मियों से मिलना बाक़ी था। कुछ अपने बारे में भी जानना बाक़ी था।

कोरोना से सीख: नये के साथ पुराना, यही जीवन का तानाबाना

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बीमारी कोई भी हो वो आपको शारीरिक और मानसिक दोनों ही रूप से प्रभावित करती है। कई बार इसका असर जल्दी चला जाता है तो कभी कुछ ज़्यादा दिनों तक रह जाता है। कई लोगों को कोरोना बस छू कर निकल गया और कई लंबे समय तक इससे परेशान रहे। आगे बढ़ने से पहले थोड़ा सा पीछे चलते हैं।

पापा जी मोबाइल का इस्तेमाल तो करते हैं लेक़िन बहुत ही सीमित रूप में। जैसे फ़ोन में नंबर ढूँढना एक मुश्किल काम है। आज भी उनके पास फ़ोन नंबर की लिस्ट की एक फ़ाइल है जिसमें सभी जरूरी नंबर हैं। किसी को फ़ोन लगाना होता है तो इस फ़ाइल की मदद ली जाती है। अब कोरोना के अपने अनुभव की शृंखला में यहाँ ये फ़ोन की लिस्ट कैसे आ गयी?

यहाँ मैं इसका ज़िक्र इसलिये कर रहा हूँ कि जब मैं अस्पताल में एडमिट हो गया तो मेरा फोन और उसमें के नंबर सब मेरे पास रह गये। वैसे तो श्रीमतीजी के पास सभी करीबी रिश्तेदारों के नंबर थे, लेक़िन मेरे दो बहुत ही क़रीबी सहयोगी जिनको वो जानती हैं और मुलाक़ात भी है औऱ जिन्होंने मेरे इलाज में एक बहुत बड़ी भूमिका निभायी, उनके नंबर नहीं थे।

ये नंबर न होना इसका एक पहलू था। दूसरा और परेशान करने वाला पहलू जिसका ज़िक्र मैंने पहली किश्त में किया था वो था बढ़ते कोविड केस के चलते हमारी सोसाइटी का सील होना। इसका मतलब आना जाना बंद। जो कोई ज़रूरी सेवाओं से जुड़े थे वही आ जा सकते थे। हमारे घर में दो पॉजिटिव केस थे तो घर भी सील तो नहीं लेक़िन आने जाने पर रोक। मतलब कुल मिलाकर अच्छी परीक्षा ली जा रही थी और जैसा मैंने बताया तैयारी बिल्कुल नहीं थी। आप कह सकते हैं कोरोना वायरस ने सिलेबस के बाहर का सवाल पूछ लिया था। एक तो मेरे पढ़ाई से वैसे ही ज़्यादा अच्छे संबंध नहीं रहे औऱ इस बार तो कुछ बहुत ही अजब गजब हो रहा था।

ख़ैर थोड़ी देर के बाद ही सही नम्बरों का आदान प्रदान हुआ औऱ मेरे इलाज का सिलसिला आगे बढ़ा। मैं जितने भी दिन अस्पताल में रहा मुझसे मिलने कोई नहीं आया। घर में सभी कोविड से ग्रस्त तो किसी के भी आने का प्रश्न ही नहीं उठता। अस्पताल में एक कर्मी ने हारकर एक दिन पूछ ही लिया घर से कोई मिलने नहीं आता आपके?

जो एकमात्र पहचान वाली शक्ल दिखी थी वो थी नईम शेख़ की। नईम अस्पताल में भर्ती होने के चार दिन बाद मेरी दवाई के सिलसिले में आये थे। नईम जो कुछ दस दिन पहले ही पिता बने थे, दौड़भाग कर दवाई का इंतज़ाम कर रहे थे। इस दवाई के इंतज़ाम में परिवार के बाक़ी सदस्य औऱ पुराने पारिवारिक मित्र भी लगे हुये थे लेक़िन मुझे इसकी कोई जानकारी नहीं थी औऱ मेरा ICU का सफ़र शुरू हो रहा था।

जब अस्पताल से छुट्टी मिली तो मैंने एक टेलीफ़ोन नंबरों की लिस्ट बनानी शुरू करी। फ़िलहाल ये काम चल रहा है। लिखने में मेहनत भी लगती है औऱ कुछ याद भी रह जाता है। फ़ोन में नंबर हो और आप शेयर कर सकें तो इससे अच्छी कोई बात नहीं। लेक़िन जब नंबर ही न हो तो?

लेक़िन ये जानकारी साझा करने का काम सिर्फ़ टेलीफोन लिस्ट तक सीमित न रखें। अगर आपके बच्चे बड़े होगये हैं तो उनके साथ अपने बैंक एकाउंट से संबंधित जानकारी भी साझा करें, साथ ही अपना अगर हेल्थ इंश्योरेंस कराया है तो उसके बारे में भी जानकारी दें। जैसा की इस कोरोनाकाल में हुआ, कई घरों में पति, पत्नी दोनों ही अस्पताल में भर्ती रहे। ऐसे में बच्चों के पास जानकारी हो तो अच्छा है। एक औऱ ज़रूरी सीख ये थी सबको सभी काम के बारे में पता हो – मोबाइल से खाना कैसे ऑर्डर करने से लेकर बैंक का एटीएम कैसे ऑपरेट करते हैं। हैं बहुत छोटी छोटी बातें लेक़िन जानना बेहद ज़रूरी। आप परिवार से शायद प्यार के कारण सभी काम करते हैं या घर के बाकी सदस्य भी आप के होने पर इन चीजों के बारे में नहीं जानना चाहते। लेक़िन कभी उनको ये काम करना पड़ जाये और आप बताने की स्थिति में न हों, तो उनको पता होना चाहिये।

सीख: अपने ख़ास सहयोगियों के नंबर साझा ज़रूर करें। अगर कोई पुरानी डायरी हो तो वहाँ सभी ज़रूरी नंबर लिख कर रखिये और समय समय पर अपडेट भी करते रहें तो न बैटरी ख़त्म होने का डर न फ़ोन के नुकसान की चिंता। साथ ही घर के सभी सदस्यों के पास भी ये नंबर रहेंगे।

कोरोना ने पिछले दिनों ऐसा कहर ढाया है जिससे उबरने में समय लगेगा।  हमने अपने परिवार, रिश्तेदारों या जानने वालों को खोया है औऱ कई ख़ुद भी इस बीमारी से ग्रस्त हुये और ठीक भी हुये। सबके अपने अनुभव हैं इस समय के जो इतिहास में अब हमेशा के लिये दर्ज हो गया हैं। जो अब हमारे साथ नहीं हैं उन सभी को सादर नमन।

कोरोना से सीख: अनजाने में हौसलाफजाई औऱ हर हाल में मस्तमौला

कोरोना से सीख: स्थिति कैसी भी हो, सोच सकारात्मक रखें

सकारात्मक सोच पर ही बात आगे बढ़ाते हैं क्योंकि इस पर मुझे बहुत मदद मिली और वो भी बिल्कुल अनचाहे (लेक़िन बहुत ही कीमती ज्ञान)। पहली किश्त में मैंने भोजन वाली बात औऱ मेरे साथ वार्ड शेयर करने वाले एक वरिष्ठ नागरिक की सीख के बारे में बताया था, इस बार बिल्कुल उल्टा हुआ। एक वरिष्ठ नागरिक को उनके पुत्र सीख दे रहे थे।

ICU में मेरे बगल के बेड पर जो सज्जन भर्ती थे उनकी तबियत थोड़ी ऊपर नीचे चल रही थी। कभी तो सब ठीक रहता औऱ कभी थोड़ी चिंता की हालत रहती। रोज़ शाम को जब मिलने का समय रहता तो उनके पुत्र मिलने आते और उनसे बात करते। वो उन्हें बार बार समझाते और उन सज्जन के साथ मैं भी चुपचाप उनके पुत्र की हौसला बढ़ाने वाली बातें सुनता। इन सभी बातों का निश्चित रूप से मुझे भी लाभ हुआ क्योंकि मोबाइल बहुत सीमित समय के लिये इस्तेमाल कर पाता औऱ मिलने जुलने वाला कोई आना नहीं था (घर पर भी कोविड के मरीज़ थे)। तो अंकल जी के बाद शायद मुझे उनके पुत्रों का इंतज़ार रहता।

आपके आसपास ICU में मरीज़ रहते हों औऱ  कुछ न कुछ चलता रहता हो तो ये सकारात्मक बातें बहुत बड़ा टॉनिक हो जाती हैं। ICU के बाहर अपने रोज़ मर्रा के जीवन में भी ऐसे परिवारजन, रिश्तेदार और दोस्त हों तो आपके लिये बहुत मदद हो जाती है। वैसे तो हम सभी सकारात्मक सोच रखते हैं, लेक़िन शायद अपने अंदर। वो जो आजकल एक नई श्रेणी के वक्ता या कहें एक नया व्यवसाय बन गया है मोटिवेशनल स्पीकर वाला, उन अंकल के बेटे उन सब से कहीं बेहतर। कम समय में वो अंकल (और साथ में मुझे भी) नये हौसले से भर देते। मैं हमेशा उन अनजान लोगों का ऋणी रहूँगा।

सकारात्मक सोच का एक बिल्कुल दूसरा रूप देखने को मिला जब ICU से दूसरे वार्ड में शिफ़्ट हुआ। वैसे तो हमेशा अपग्रेड होना ही अच्छा लगता है लेक़िन ये वो डाउनग्रेड था जिसका मुझे इंतज़ार था। इस वार्ड में रोज़ एक युवा, जिसने शायद अभी स्कूल ख़त्म ही किया हो, बार बार आता। लेक़िन वो अपने काम से काम रखता। मतलब वार्ड में कुछ भी चल रहा हो ये महाशय की एंट्री होती और ये सीधे जाकर सेनेटाइजर से अपने हाथों को साफ़ करते और उसके बाद वो अपना कुछ काम करते। इस पूरे समय उनका ध्यान सेनेटाइजर औऱ अपनी कुछ परेशानी पर रहता। जैसे एक दिन शायद उनकी चप्पल काट रही थी तो को पहले अपने पैर पर कुछ लगाया फ़िर अपनी चप्पल पर टेप लगाते रहे। वो इस बात से बिल्कुल भी परेशान नहीं कि वो अस्पताल के एक वार्ड में हैं जहाँ मरीज़ हैं या डॉक्टर भी आते जाते रहते हैं। इस बंदे के जज़्बे को भी सलाम!

तो पहले भोजन का ज्ञान और फ़िर बीमारी से लड़ने का हौसला बढ़ाने वाली बातें और सकारात्मक सोच। इन सबका निचोड़ यही की मन के हारे हार, मन के जीते जीत। जो अगली सीख मिली वो थी कुछ पुरानी आदतें को छोड़ना नहीं चाहिये।

Don\’t let one bad experience stop you from trying something again

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Security is one thing that we all look for in life. A majority of us trying to look for all things secure, opt for jobs offering us that security. Only a handful of try the route less taken and those who do have a more fulfilling life than the rest of us.

But how secure one wants to play in life? I have a friend who parked his vehicle a kilometer away thinking the place he was going to will have a parking problem. But that without checking out if there was one. He relied on his past experience and did that.

On the other hand there was another acquaintance who started late for a meeting thinking it will start late and end late as usual. Again going by his past experience.

But both were wrong on that given day. There was no traffic and ample parking space and the meeting lasted just ten minutes.

Would their life be different if they had not allowed their presumptions to cloud their view? If my friend first visited the place and checked if there was any parking problem, he would have been pleasantly surprised. His approach would have been to things ahead in the day would have been different. Same applies to the second case.

We often judge people and situations based on our previous experience. But there are chances, like stated above, that our predictions fall flat. We always judge on the basis of our bad experience in any situation.

I am quite sure the two gentlemen above will do the same thing again next time too for we always take something good happening to us as an aberration. But this comes from experience and also from our mindset.

Take another situation. A friend of mine was having a bad day with his boss. He tried his best to stay in the job and fight it out. He finally quit. Tried something else which did not work out. But he did not give up. He continued his fight. Today he is doing quite good. Again it was his attitude which made him what he is today.

As they say it is how you look at it: glass as half full or half empty. So here\’s to the glass half full. Enjoy.